अरे ! हम भँडौ़वा लिखते रहे ….

इसी माह की २३ तारीख को न्यूयार्क में हुये कवि सम्मेलन में अनूप भार्गव भी सिरकत कर रहे थे। कवि सम्मेलन मुशायरे की विस्तृत रिपोर्ट तो नहीं मिली लेकिन छुटपुट समाचारों के अलावा अनूप भार्गव के बारे में लिखते हुये रिपुदमन पचौरी ने लिखा है:-

काव्य संध्या थी उस दिन
चिंता से हृदय धड़कता था
जगा अनूप सुबह तभी से
बायां नयन फड़कता था।
जो कवितायें उसने याद करीं
उसमें से आधी याद हुईं
वो भी मुशायरे में जाने तक
यादों में ही बरबाद हुयीं
जब स्टेज पर पर्चा पढ़ा
तब सारा बदन पसीना था
फिर भी श्रोताओं से डरा नहीं
वह अनूप का ही सीना था।

यह अंदाजे बयां पढ़कर हमें अपनी पुरानी मेलों की याद आयी। जब नेट पर नये-नये हाथ आजमाना शुरू किया ही था तब लगभग रोज मेलबाजी होती। ठेलुहा नरेश के स्कूली यार बिनोद गुप्ता नें अपना फोटो भेजा। काफी दिन बाद देखने पर लगा कि बालों की छत कुछ हल्की हो गयी है। कुछ मौज भी लेना जरूरी था ,सो श्याम नारायण पाण्डेय की तर्ज पर लिखा ,अवस्थी ने लिखा:-

सर पर बालों की तंगी थी
पर फिर भी जेब में कंघी थी
कंघी सर पर ही ठिठक गयी
वह गयी गयी फिर भटक गयी
जिस पर पहले हरियाली थी
वह दूर-दूर तक खाली थी।

मौज-मजे के लिये इस तरह की तुकबंदियां आम हैं। जिसको भी जरा सा तुक मिलाना आता है वह कवि कहला कर सीना फुला लेता था। जिसकी तुक में कुछ काव्यात्मक जटिलता आ जाती है ,कुछ पुरातन बिंब गुंथ जाते हैं उसके लिये महाकवि का खिताब तो पक्का ही समझा जाय।

इसी तर्ज पर हम भी अपने कि कवि मानने की हिम्मत बना रहे थे कि हमारे हत्थे आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का लिखा हिंदी साहित्य का इतिहास पड़ गया । पड़ गया तो मैं उसे कुछ पढ़ भी गया। जब पढ़ा तो हमें पता चला कि जिन तुकबंदियों के बल पर मैंने कवि कहलाने का पर्चा भरने की सोची थी वे कवितायें हैं नहीं । वे तो भँडौ़वा हैं। मतलब कि हम भँडौ़वा लिखकर अपने को कवि समझ रहे थे । मजे कि बात कि यह बात हमें पता ही नहीं थी। गोया हम भी सांसद हो गये जिनको पता ही नहीं कि जिस पद पर वे सुशोभित हैं वह लाभ का पद है।

बहरहाल अब जो हुआ सो हुआ। होनी को कौन टाल सकता है। आगे के लिये अपनी तथा जनता की जानकारी के लिये भँडौ़वा के बारे में जानकारी दे रहा हूं ।

भँडौ़वा का शाब्दिक अर्थ है-भदेस,भद्दी हास्य कविता,घटिया कविता,तुकबंदी,तुक्का आदि।

भँडौ़वा भँडौ़वा हास्यरस के अंतर्गत आता है । इसमें किसी की उपहास पूर्ण निंदा रहती है। यह प्राय: सब देशों के साहित्य का अंग रहा है। जैसे फारसी और उर्दू की शायरी में ‘हजों’ का एक विशेष स्थान है वैसे ही अँगरेजी में सटायर(satire) का। पूरबी साहित्य में उपहासकाव्य के लक्ष्य अधिकतर कंजूस अमीर या आश्रयदाता अमीर ही रहे हैं और यूरोपीय साहित्य में समसामयिक कवि और लेखक। इसमें यूरोप के उपहास काव्य में साहित्यिक मनोरंजन की सामग्री अधिक रहती थी। उर्दू साहित्य में सौदा ‘हजों’ के लिये प्रसिद्ध हैं। उन्होंने किसी अमीर के दिये घोड़े की इतनी हंसी की है कि सुनने वाले लोटपोट हो जाते हैं। इसीप्रकार किसी कवि ने औरंगजेब की दी हुई हथिनी की निंदा की है:-

तिमिरलंग लइ मोल,चली बाबर के हलके।
रही हुमायूँ संग फेरि अकबर के दल के।।
जहाँगीर जस लियो पीठ को भार हटायो
साहजहाँ करि न्याव ताहि पुनि माँड़ि चटायो।
बलरहित भई,पौरुष थक्यो,भगी फिरत बन स्यार डर
औरंजगजेब करिनी सोई लै दीन्ही कविराज कर।

(तैमूरलंग की खरीदी हुई हथिनी जो बाबर, हुमायूँ, अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ के पास होते हुये औरंगजेब के पास आई तथा जो इतनी अशक्त हो गयी है कि सियारों के डर से जंगल को भाग जाती है उसे औरंगजेब ने कविराज को सौंप दिया)

रायबरेली के रहने वाले कवि बेनी बंदीजन अपने भँडौ़वों के संग्रह के लिये जाने जाते हैं। बेनी जी ने कहीं बुरी रजाई पायी तो उसकी निंदा की कहीं छोटे आम पाये तो उसकी खिंचाई की। छोटे आमों का मजाक उड़ाते हुये बेनी जी ने लिखा है:-

चींटी को चलावै को,मसा के मुख आपु जाय,
स्वास की पवन लागे कोसन भगत है।
ऐनक लगाए मरु-मरु के निहारे जात
अनु परमानु की समानता खगत है।
बेनी कवि कहै हाल कहाँ लौ बखान करौं
मेरी जान ब्रह्म को बिचारिबो सुगत है
ऐसे आम दीन्हें दयाराम मन मोद करि
जाके आके सरसों सुमेरु-सी लगत है।

(आम इतने छोटे है कि चींटी इसे चला(खींच) सकती है,मच्छर के मुंह में अपने आप चला जाता है,सांस की हवा लगने मात्र से कोसों दूर भाग जाता है,चश्मा लगाने के बावजूद बड़ी मुश्किल से नजर आते हैं,अणु-परमाणु के कद के बराबर हैं,बेनी कवि कहते है कि ऐसे आमों का हाल कहाँ तक बयान करें। इसके मुकाबले ब्रह्म का वर्णन करना ज्यादा आसान है। दयाराम ने खुश होकर ऐसे आम दिये जिनके आगे सरसों के दाने सुमेरू पर्वत के समान बड़े लगते हैं)

कानपुर भँडौ़वा लेखकों का गढ़ रहा है। लोग बताते है कि कानपुर में गया प्रसाद शुक्ल’सनेही’के समय में भँडौ़वा लिखने-सुनने-सुनाने की महफिलें जमती थीं। इनमें हास्यरस प्रधान कविताओं की सुनी-सुनायी जाती थीं बकौल स्वामीजी पेली जातीं थीं। अखबारों में सूचना देकर रँड़ुआ सम्मेलन आयोजित किये जाते थे जिसमें भँडौ़आ जैसी ही रचनायें सुनी-सुनाई जातीं होंगी। चतुर्थ रंडुवा महासम्मेलन की सूचना इस प्रकार छपी है-

आप चाहें रंडुआ हों या न हों,नीचे लिखे स्थान पर आइये अवश्य। अगर आपको कलम पकड़ने का सामर्थ्य है तो अपनी रची रचाई बानगी अवश्य लाइयेगा,नहीं तो लोग कहेंगे कि आपको कुछ शउर नहीं है।

स्थान-बिहारी जी का मंदिर

समय-ढाई हद्द पौने तीन बजे वुधवार होली भोर

बुलायक-दयाशंकर दीक्षित’देहातीजी’

सभापति-लक्ष्मीपति बाजपेयी

उन दिनों समाज के तीन शत्रु माने जाते थे-पुलिस,पतुरिया,पटवारी। इन्ही को लक्ष्य करके कवितायें लिखीं जाती थीं।

बहरहाल, यह तय भँडौ़आ से आशय हल्की , बिना साहित्यिक महत्व की कविता से रहा है।जब किसी कविता को हल्का,उपहासात्मक बताना हो तो कह दिया ये तो भँडौ़आ है।नयी परम्परा बुढ़वा मंगल पर व्लाककटानन्द की लावनी है:-

बुढ़वा मंगल नहीं ये भड़ुआ मंगल है देखो धर ध्यान,
अब कम्पू का नाश करने आया,कहना लो मान ।

कानपुर के प्रख्यात रंगकर्मी,कवि,कहानीकार सिद्धेश्वर अवस्थी के बारे में लिखते हुये डा.उपेन्द्र ने लिखा है:-

एक बार मस्ती के मूड में सिद्धेगुरू किसी दुष्टव्यक्ति के साथ बात करते परेड से बड़े चौराहे की तरफ चले जा रहे थे कि वार्ताप्रसंग में अभिरामगुरू(सनेही मंडल के लब्ध प्रतिष्ठित कवि,हिंदी में विजयावाद के पुरस्कर्ता)का जिक्र आ गया।दोनों ने न जाने किस प्रेरणा के वशीभूत हो अभिरामजी पर एक नटखट तुकबन्दी रच डाली जिसकी कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं:-

अभिराम गुरू! अभिराम गुरू
धोती में बंधे।…।गुरू।।
तुम मालरोड तक हो आओ
अद्धा ,व्हिस्की का ले आओ
अब भंग हुयी नाकाम गुरू।

जब इसी तरह के दो तीन बंद पूरे हो गये तो दोनो व्यक्ति शर्मा रेस्ट्रां की ओर चले। अभिरामजी बाहर ही निकटवर्ती मंदिर के चबूतरे के सामने बेंत हाथ में लिये खड़े दिखाई दे गये।उन्हें प्रणाम देकर आशीर्वाद लेने के पश्चात सिद्धेभाई ने नयी पीढ़ी के लड़कों की उद्दंडता और असभ्यता पर अफसोस जाहिर करते हुये शिकायती लहजे में निहायत संजीदगी के साथ पूरा का पूरा पद्य सुना डाला। शाम का वक्त था,’विजयाविलास’ के विश्रुत कवि अभिराम शर्मा भंग की तरंग में थे,अचानक उनकी त्योरियाँ चढ़ गयीं,क्रोध में कांपते हुये बोले-’किसने लिखा है?’ सिद्धेभाई पहले तो सकपकाये ,किसका नाम लें ,फिर कुछ सोंचकर एक ऐसे व्यक्ति का नाम बता दिया जो शहर के दूरवर्ती मोहल्ले में रहता था और वहां बहुत कम आया करता था। फिलहाल बला-टली ,’आगे देखा जायेगा’ यह सोचकर उन्होंने निश्चिंतता की सांस ली। अभिराम गुरू भीतर उबलने लगे और सिद्धेभाई आग लगाकर वहां से हट गये।अकल्पनीय संयोग कुछ ऐसा हुआ कि जिसको सिद्धेभाई ने उस दुष्ट रचना रचयिता बताया था वह दुर्भाग्य का मारा अचानक उसी समय न जाने कहां से वहां आ टपका। अभिराम जी को देखते ही ‘गुरू प्रणाम’! कहते हुये लपककर उनके पांव छुये,प्रणाम करने वाले पर ज्योंही गुरू की शिथिल ‘भंगालस’ दृष्टि जमी,उनके क्रोध के पारे को सातवें आसमान पर पहुंचते देर नहीं लगी। दहकते अँगारों से लाल आँखें निकालते हुये क्रोधोन्मत गुरू ने कृतघ्न शिष्य की गर्दन दोनों हाथों से दबोच ली। आवेश में उनकी हकलाहट और बढ़ गयी। दाँत पीसते हुये बोले-स्साले भ भ भ भड़उवा लिखता है?अभिराम गुरू अभिराम गुरू ध ध ध ध धोती में बंधे… समझता क क क क्या है अपने को? म म म मैं तेरे प प प्राण निकालूँगा …। सिद्धेभाई टोपीबाजार वाले नुक्कड़ से मैनपुरी( तम्बाकू) की पुड़िया बंधवाकर लौट रहे थे। मंदिर के सामने भीड़ देखकर उनका माथा ठनका। आगे बढ़कर देखा तो स्तम्भित रह गये। प्रहसन की दिशा में बढ़ने वाला उनका नाटक त्रासदी में बदल जायेगा इसकी तो उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी। खैर,लोगों ने बीचबचाव करके मामला रफा-दफा करा दिया पर असली अपराधी कौन थे,इसका पता न लग सका।

हास्य कविता को भँडौ़आ नाम तब दिया गया होगा जब केवल धीर-गंभीर कविता को कविता माना जाता होगा। अब तो हास्य-व्यंग्य कविता की सबसे पसंद की जाती है। अपने हिंदी ब्लाग जगत में नीरज त्रिपाठी मजेदार कवितायें रचते हैं। लक्ष्मी नारायण गुप्त जी तथा समीरजी भी तमाम कविताओं के बीच-बीच में हास्य का झण्डा फहरा देते हैं। हम भी मौज मजे के लिये तुकबंदी करते रहे लेकिन यह अहसास सच्ची में नहीं था कि कोई इनको पढ़कर कहेगा हम जो लिख रहे है उसे लोग भँडौ़आ कहा करते थे।

संदर्भ-१.आचार्य रामचंद्र शुक्ल रचित हिंदी साहित्य का इतिहास
२.डा.उपेन्द्र का लेख- ‘सिद्धेश्वर’ संज्ञा के सही हकदार
३.कानपुर कल आज और कल

मेरी पसंद

चंदन विष व्यापत नहीं लिपटे रहत भुजंग

और हियां सब हमरे साथी हमका करते तंग

हम भोले भाले प्राणी सब कहते हमका भोलू

हमरे हिय की हालत कैसी किससे हम यह बोलूं

जब खाएं सब पिज्जा बर्गर हम खा लेई केला

इत्ते सारे संगी साथी भोलुवा तबहूं अकेला

संगी खाएं गोश्त चिकन हम भोलू शाकाहारी

बोलैं मार ठहाका कब तक घास फूस तरकारी

जब पियैं सब व्हिस्की हम लै लेई कोका कोला

भोलू अब बड़े हुइ जाओ एक साथी हमते बोला

देर रात तक जागैं संगी हम जल्दी सोए जाई

सुबह देर तक सोवैं संगी हम उठ दौड़ लगाई

लौट के आई तुरत करै हम लागी प्राणायाम

देखि कहैं हमरे साथी भोलुआ क न कोई काम

कहैं प्रकट भये हैं बाबा सब इनका करौ प्रणाम

भोलू कहि कहि के जब हारे बाबा दीन्हिन नाम

कहत कहै देओ एक कान सुनि दूजे देई निकार

भले बुरे सब तन के मनई मिलैं बनै संसार

एक रोज बौरावा मनवा मारी गय यह मति

हम लागेन तुरत टटवालै संगति केर गति

ऎसी देखी वैसी सोंची का का देखी का का सोंची

सोंचेन ठीकै है सब कइका समय कौन सोंची

पति पत्नी आजीवन संघै रहिकै बदल न पावत

पति पत्नी का पत्नी पति का जीवन पर्यन्त सतावत

कुत्तौ दयाखौ चाहें जौने मालिक संग रहि जावै

अच्छा मालिक चाहें खराब पूंछ टेढ़ रहि जावै

संगत तौ मनइन केर है मनइन मा गुण औ अवगुण

सदगुण सदगुण चुन लेओ भोला का होई देखि कै अवगुण

-नीरज त्रिपाठी

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

13 responses to “अरे ! हम भँडौ़वा लिखते रहे ….”

  1. जीतू

    दूसरी बार पढ रहा हूँ, छोटी बुद्दि है इसलिये दूसरी बार में भी, ये लेख, हमारे ऊपर से निकल गया। पूरा लेख समझने के बाद टिप्पणी की जाएगी। मतलब जगह मिलने पर पास दिया जाएगा।

    और दद्दा इ बताओ, ये गद्य से इत्ती नाराजगी काहे, लौटो जल्द से जल्द, वरना हम भौजी को एक ज्ञापन भेजते है, फिर ऐसा ना हो कि कविता से ही नजरे चुराने लगो।

  2. Amit

    दूसरी बार पढ रहा हूँ, छोटी बुद्दि है इसलिये दूसरी बार में भी, ये लेख, हमारे ऊपर से निकल गया। पूरा लेख समझने के बाद टिप्पणी की जाएगी। मतलब जगह मिलने पर पास दिया जाएगा।

    भाई जी, कुछ ऐसा ही हाल अपना भी है। अनूप जी क्या लिखते हैं, बाऊंसर की तरह अपने सर के ऊपर से ही निकल जाता है, पहले कुछ थोड़ा बहुत समझ तो आता था पर अब तो वह भी नहीं आता!! क्या इनका लेवल बढ़ गया है या अपना नीचे गिर गया है? :(

  3. राजीव

    अनूप भाई,
    तीन बातें यहां पर समीचीन लगती हैं

    बहुत हद तक मैं जीतू भाई और अमित जी से सहमत हूँ। यद्यपि बात कुछ साहित्य के विकास और इतिहास की अवश्य है किंतु सम्प्रति के साहित्य और जन-मानस से कुछ दूर। इतना होने के पश्चात भी ब्लॉग के मूल सिद्धांत – अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खरी है – सो जीतू जी और अमित जी, कोई विशेष बात नहीं है – अनूप भाई कुछ भी लिख सकते हैं – आखिरकार वे स्वयं कहते हैं – हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै ? बस लिखते अवश्य रहें ।

    दूसरी बात यह कि सिद्धे गुरु के प्रसंग को वही व्यक्ति आनन्द्पूर्वक समझ सकता है, जो कभी उनके सम्पर्क में आया हो।

    तीसरी यह कि – श्री सिद्धे गुरु की एक और विशेषज्ञता और उपलब्धि – उनका नौटंकी विधा के विकास में महत्वपूर्ण योगदान।

  4. समीर लाल

    अनूप भाई
    जैस ही शीर्षक देखा: “अरे ! हम भँडौ़वा लिखते रहे ….” मै समझ गया, अरे, ये तो मेरे बारे में कलम भांजने जा रहे हैं, पढता गया, और अंत के पहले नाम देख विचार वीरगति को प्राप्त हुआ…बहुत सही लिखें हैं. मज़ा आ गया पढ कर…इंतज़ार लगवा देते है आप अपनी अगली रचना का. :)

  5. प्रत्यक्षा

    बडी जल्दी आपने अपने आप को पहचान लिया ;-) ))
    रिसर्च मोड में लगे हुयें हैं आजकल ?

  6. ratna

    कविता के भेद जो जाने हमने,फुरसतिया के संग
    अकाल मौत का ग्रास बनी ,लिखने की प्रबल उमंग
    यह तुकबन्दी मानिए,कविता इक उच्च कोटि की
    सूट-बूट जो पास ना हो तो,तन ढांपे सादी धोती भी

  7. e-shadow

    थोडा समझा थोडा ऊपर से गया पर पडने में आनान्द आया अनूप जी। भँडौ़आ की परिभाषा समझ आने के बाद कितनी ही कवितायें भँडौ़आ लगने लगी। मेरा विचार यह है कि कविता भँडौ़आ हो या साहित्यिक कसौटी पर खरी उतरे, अगर जनसाधारण के करीब है तो सफल है।

  8. Tarun

    भँडौ़वा का क्‍या मतलब होता है

  9. Amit

    इतना होने के पश्चात भी ब्लॉग के मूल सिद्धांत – अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खरी है – सो जीतू जी और अमित जी, कोई विशेष बात नहीं है – अनूप भाई कुछ भी लिख सकते हैं

    बिलकुल कुछ भी लिख सकते हैं जी, और हम भी कुछ भी लिख सकते हैं। तभी तो साफ़गोई का परिचय देते हुए कहे दिये कि हमका कछु न समझ आयो(अब नहीं आया तो नहीं आया, इसमें अनूप जी की गलती थोड़े न है)। नहीं तो हम भी कह सकत थे कि “वाह वाह अनूप जी, का लिखे हो, मजा आई गवा”!! :)

  10. फ़ुरसतिया » छीरसागर में एक दिन

    [...] फ़ुरसतिया » छीरसागर में एक दिन on तुलसी संगति साधु कीAmit on अरे ! हम भँडौ़वा लिखते रहे ….Tarun on अरे ! हम भँडौ़वा लिखते रहे ….e-shadow on अरे ! हम भँडौ़वा लिखते रहे ….ratna on अरे ! हम भँडौ़वा लिखते रहे …. [...]

  11. Laxmi N. Gupta

    शुकुल जी,

    बहुत बढ़िया लिख्यो है। मज़ा आ गया। कहाँ से यह सामग्री लाते हो? ऐसे आम जिनके सामने सरसोँ सुमेरु जैसी लगे! क्या बात कही है, बेनी कवि ने। मेरी अगली पोस्ट आपके इस लेख के फुटनोट की तरह होगी।

  12. mrinal

    thanks for quoting the verse on those undersized mangoes

  13. फुरसतिया » झाड़े रहो कलट्टरगंज, मण्डी खुली बजाजा बंद

    [...] कानपुर में मौज-मजे की परम्परा के ही चलते भडौआ साहित्य का चलन हुआ जिसमें नये-नये अंदा़ज में पैरोडिया के स्थापित लोगों की खिंचाई का पुण्य काम शुरू हुआ। आज किसी एक् शहर् के सर्वाधिक् सक्रिय ब्लागर् की गिनती की जाये तो वे कानपुर के ही निकलेंगे। यह् भी कि इनमें से ज्यादातर मौज-मजे वाले मूड में ही रहते हैं(अभय तिवारीजी संगति दोष के चलते कभी-कभी भावुक हो जाते हैं) ।दिल्ली वाले इसका बुरा न मानें क्योंकि किसी शहर में जीने-खाने के लिये बस जाने से उसका मायका नहीं बदल जाता। [...]

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