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	<title>Comments on: आरक्षण-कुछ बेतरतीब विचार</title>
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	<description>हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै?</description>
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		<title>By: फ़ुरसतिया-पुराने लेख</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/131/comment-page-1#comment-41629</link>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया-पुराने लेख</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 26 Jul 2009 05:17:20 +0000</pubDate>
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		<description>[...] 4.थेथरई मलाई तथा धूमिल की कविता 5.आरक्षण-कुछ बेतरतीब विचार 6.आवारा भीड़ के खतरे 7.अति सर्वत्र [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] 4.थेथरई मलाई तथा धूमिल की कविता 5.आरक्षण-कुछ बेतरतीब विचार 6.आवारा भीड़ के खतरे 7.अति सर्वत्र [...]</p>
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		<title>By: अशोक</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/131/comment-page-1#comment-19654</link>
		<dc:creator>अशोक</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 13 Mar 2008 12:41:53 +0000</pubDate>
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		<description>सर्वप्रथम मैं श्रीमान् जीतू एवं श्रीमान् ईस्‍वामी को उनके ज्‍वलंत एवं तथ्‍यात्‍मक विचारों को प्रस्‍तुत करने हेतु धन्‍यवाद ज्ञापित करना चाहूँगा।  वहीं श्रीमान् अनूप जी भी इस बात से पूर्णतया सहमत हैं कि इस मुद्दे पर पक्ष या विपक्ष में कहने को उनके पास भी बहुत कुछ है।  मैं अपने शहर की एक घटना का वर्णन कर रहा हूँ।  आज से ग्‍यारह वर्ष पहले एक युवक का आरक्षण के आधार पर (व़ह भी ॠणात्‍मक अंक प्राप्‍त करने पर) शासकीय मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस की शिक्षा के लिए चयन हो गया (दुर्भाग्‍यवश)।  अब चूँकि उस युवक का बौद्धि‍क‍ स्‍तर किसी चिकिस्‍तक का कंपाउण्‍डर बनने के लायक भी नहीं था, उस युवक ने चार वर्षीय पाठ्यक्रम को पूरा करने में अपनी लगन, मेहनत और सहनशीलता का परिचय देते हुए पूरे दस वर्ष  च‍िकित्‍सक बनने के प्रयास में लगाए।  यह उसका दुर्भाग्‍य (?) था कि ग्‍यारहवें वर्ष उसे न्‍यायालय की शरण में जाना पड़ा, यह कहते हुए कि उसे जानबूझकर उत्‍तीर्ण नहीं किया जाता है।  न्‍यायालय में प्रकरण की जॉंच में यह स्‍पष्‍ट हो गया कि जब छात्र कॉपी में लिखेगा ही नहीं, तो वह उत्‍तीर्ण होने के स्‍वप्‍न कैसे देख सकता है।

सिर्फ़ एक इसी प्रकरण से अब आप सोचें कि अयोग्‍य जन को आरक्षण सुविधा देना कितना खतरनाक साबित हो सकता है। अगर वह युवक मुन्‍नाभाई की स्‍टाईल में डॉक्‍टर बन जाता तो ?  और भी आगे सोचिए, अगर आप बीमार पड़ने की अवस्‍था में ऐसे ही किसी चिकित्‍सक के पास इलाज कराने पहुँचते।  बेहतर होता कि उस युवक को प्राथमिक कक्षा से ही नि:शुल्‍क पुस्‍तकें, कपड़े आदि ईमानदारी से मुहैया कराए जाते, तो शायद वह युवक कम से कम कम्‍पाऊन्‍डर तो बनने की प्रवेश परीक्षा में मेरिट में आ सकता था।  यही नहीं, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति में में कोई क्रीमीलेयर वर्ग की श्रेणी न होने से किसी कलेक्‍टर, एसडीएम यानि वर्ग एक अधिकारी के पाल्‍य भी आरक्षण सुविधा का लुत्‍फ उठाते हैं।  यह तो अन्‍याय है। आप ज्रबरन ही किसी को जम्‍प कराकर किसी संवैधानिक पद पर बिठाऍंगे तो क्‍या वास्‍तविक तरक्‍की मिल पाना संभव है ?  बौद्धिक विकास एक सतत् प्रक्रिया का फल है, यदि विकास कराना ही है तो बौद्धिक विकास हो, ऐसा प्रयास करें।

अंत में यही कहना चाहूँगा, आरक्षण से विकास तो कतई नहीं हो सकता।

(लेखक स्‍वयं अन्‍य पिछड़ा वर्ग से संबंध रखता है एवं आरक्षण के लाभ से कोसों दूर रहने में ही देशहित को देखता है)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सर्वप्रथम मैं श्रीमान् जीतू एवं श्रीमान् ईस्‍वामी को उनके ज्‍वलंत एवं तथ्‍यात्‍मक विचारों को प्रस्‍तुत करने हेतु धन्‍यवाद ज्ञापित करना चाहूँगा।  वहीं श्रीमान् अनूप जी भी इस बात से पूर्णतया सहमत हैं कि इस मुद्दे पर पक्ष या विपक्ष में कहने को उनके पास भी बहुत कुछ है।  मैं अपने शहर की एक घटना का वर्णन कर रहा हूँ।  आज से ग्‍यारह वर्ष पहले एक युवक का आरक्षण के आधार पर (व़ह भी ॠणात्‍मक अंक प्राप्‍त करने पर) शासकीय मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस की शिक्षा के लिए चयन हो गया (दुर्भाग्‍यवश)।  अब चूँकि उस युवक का बौद्धि‍क‍ स्‍तर किसी चिकिस्‍तक का कंपाउण्‍डर बनने के लायक भी नहीं था, उस युवक ने चार वर्षीय पाठ्यक्रम को पूरा करने में अपनी लगन, मेहनत और सहनशीलता का परिचय देते हुए पूरे दस वर्ष  च‍िकित्‍सक बनने के प्रयास में लगाए।  यह उसका दुर्भाग्‍य (?) था कि ग्‍यारहवें वर्ष उसे न्‍यायालय की शरण में जाना पड़ा, यह कहते हुए कि उसे जानबूझकर उत्‍तीर्ण नहीं किया जाता है।  न्‍यायालय में प्रकरण की जॉंच में यह स्‍पष्‍ट हो गया कि जब छात्र कॉपी में लिखेगा ही नहीं, तो वह उत्‍तीर्ण होने के स्‍वप्‍न कैसे देख सकता है।</p>
<p>सिर्फ़ एक इसी प्रकरण से अब आप सोचें कि अयोग्‍य जन को आरक्षण सुविधा देना कितना खतरनाक साबित हो सकता है। अगर वह युवक मुन्‍नाभाई की स्‍टाईल में डॉक्‍टर बन जाता तो ?  और भी आगे सोचिए, अगर आप बीमार पड़ने की अवस्‍था में ऐसे ही किसी चिकित्‍सक के पास इलाज कराने पहुँचते।  बेहतर होता कि उस युवक को प्राथमिक कक्षा से ही नि:शुल्‍क पुस्‍तकें, कपड़े आदि ईमानदारी से मुहैया कराए जाते, तो शायद वह युवक कम से कम कम्‍पाऊन्‍डर तो बनने की प्रवेश परीक्षा में मेरिट में आ सकता था।  यही नहीं, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति में में कोई क्रीमीलेयर वर्ग की श्रेणी न होने से किसी कलेक्‍टर, एसडीएम यानि वर्ग एक अधिकारी के पाल्‍य भी आरक्षण सुविधा का लुत्‍फ उठाते हैं।  यह तो अन्‍याय है। आप ज्रबरन ही किसी को जम्‍प कराकर किसी संवैधानिक पद पर बिठाऍंगे तो क्‍या वास्‍तविक तरक्‍की मिल पाना संभव है ?  बौद्धिक विकास एक सतत् प्रक्रिया का फल है, यदि विकास कराना ही है तो बौद्धिक विकास हो, ऐसा प्रयास करें।</p>
<p>अंत में यही कहना चाहूँगा, आरक्षण से विकास तो कतई नहीं हो सकता।</p>
<p>(लेखक स्‍वयं अन्‍य पिछड़ा वर्ग से संबंध रखता है एवं आरक्षण के लाभ से कोसों दूर रहने में ही देशहित को देखता है)</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: e-shadow</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/131/comment-page-1#comment-1438</link>
		<dc:creator>e-shadow</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 22 May 2006 20:48:12 +0000</pubDate>
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		<description>जीतू भैया को मेरा भी पूरा समर्थन।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>जीतू भैया को मेरा भी पूरा समर्थन।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: सृजन शिल्पी</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/131/comment-page-1#comment-1432</link>
		<dc:creator>सृजन शिल्पी</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 22 May 2006 14:52:50 +0000</pubDate>
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		<description>जीतू जी की इस टिप्पणी के संदर्भ में कि 
&quot;सृजनशिल्पी जी, रहा सवाल परिचर्चा पर चर्चा का, मै स्वस्थ चर्चा मे विश्वास रखता हूँ, जो लोकतन्त्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, यदि उस पर भी आपको शिकायत है तो मै नही मानता है आप लोकतन्त्रीय परम्परा मे विश्वास रखते है&quot; 
मेरा उनसे यह स्पष्टीकरण है कि  स्वस्थ चर्चा में मेरा भी विश्वास है। मुझे कतई शिकायत नहीं है आरक्षण पर किसी बहस से। इसीलिए मैंने उत्साहपूर्वक परिचर्चा में भाग भी लिया और उठाए गए मुद्दों पर विस्तार से टिप्पणी भी की। ऊपर मैंने सिर्फ उस बहस का जिक्र भर किया था। आप तो नाहक ही नाराज हो गए।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>जीतू जी की इस टिप्पणी के संदर्भ में कि<br />
&#8220;सृजनशिल्पी जी, रहा सवाल परिचर्चा पर चर्चा का, मै स्वस्थ चर्चा मे विश्वास रखता हूँ, जो लोकतन्त्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, यदि उस पर भी आपको शिकायत है तो मै नही मानता है आप लोकतन्त्रीय परम्परा मे विश्वास रखते है&#8221;<br />
मेरा उनसे यह स्पष्टीकरण है कि  स्वस्थ चर्चा में मेरा भी विश्वास है। मुझे कतई शिकायत नहीं है आरक्षण पर किसी बहस से। इसीलिए मैंने उत्साहपूर्वक परिचर्चा में भाग भी लिया और उठाए गए मुद्दों पर विस्तार से टिप्पणी भी की। ऊपर मैंने सिर्फ उस बहस का जिक्र भर किया था। आप तो नाहक ही नाराज हो गए।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: रजनीश मंगला</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/131/comment-page-1#comment-1414</link>
		<dc:creator>रजनीश मंगला</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 22 May 2006 09:27:56 +0000</pubDate>
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		<description>ये सारी चर्चा बहुत शिक्षाप्रद रही। क्या आरक्षण की चर्चा नक्सलवादियों के संदर्भ में की जा सकती है?</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>ये सारी चर्चा बहुत शिक्षाप्रद रही। क्या आरक्षण की चर्चा नक्सलवादियों के संदर्भ में की जा सकती है?</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: फ़ुरसतिया</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/131/comment-page-1#comment-1328</link>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 21 May 2006 09:06:45 +0000</pubDate>
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		<description>जैसा कि मैंने बताया कि यह लेख मैंने जैसा समझा उस हिसाब से लिखा था। लोगों ने पसंद किया उसके लिये आभार। कुछ किंतु-परंतु ,लेकिन के बारे में मेरा यही कहना है कि यह निर्भर करता है कि आपका &#039;फ्रेम आफ रेफेरेन्स&#039; क्या है? कुछ बातें जो मैं फिर से चूंकि मौका है वह कहना चाहता हूँ।

-अनुसूचित जाति,जनजाति तथा पिछड़ी जातियों की कुल आबादी देश की आबादी की लगभग ६०-७० प्रतिशत है। उनके विकास के बिना देश कैसे विकसित हो सकता है?

-अभी तक आरक्षण से कोई खास फायदा नहीं हुआ इसके कारण क्या रहे यह सोचना जरूरी है।इन वंचितों के लाभ की सारी योजनाओं का क्रियान्वयन ऊँची जातियों के लोग करते रहे।इन योजनाओं के क्रियान्नवयन में हुये घपले घोटालों के लिये वंचित लोग क्या करें?आये दिन छात्रवृत्ति घोटाला,मिड-डे मील घोटाला आदि के सूत्र तो गैरआरक्षित लोगों के हाथ में रहे हैं।

-जहां तक प्रतिभा की बात है तो देश में अभी तक के सारे घपले,घोटाले,गोलमाल देश के सबसे जहीन,प्रतिभाशाली माने जाने वाले लोगों ने किये हैं। देश का ९०% से अधिक काला धन देश के सबसे जहीन माने जाने वाले अनारक्षित वर्ग के पास होगा।

-देश की सबसे जहीन,प्रतिभाशाली,ताकतवर लाबी आई.ए.एस. की नौकरी करने वाले माने जाते हैं। अगर ये अड़ जायें तो कोई भी गलत काम नहीं हो सकता। लेकिन यह संस्था अपनी सुविधाओं के लिये देश के आवारा नेताओं के आगे समर्पण करती रही तथा केवल अपना घर भरती रही। यह भी संयोग है कि सिविल सेवा में २२.५% आरक्षण के मुकाबले में अनुसूचित जाति,जनजाति का प्रतिशत १५-१६ प्रतिशत है। मतलब बहुतायत में अनारक्षित जातियों के लोग हैं।

- तमाम तरह के घालमेल हैं जिनके कारण जितना फायदा वंचितों को मिलना चाहिये उतना मिला नहीं। अभी तक भी ये लोग अपनी ताकत समझे नहीं हैं। अगर ईमानदारी से प्रयास किये जाते तो शायद सामाजिक हालात में इतना अंतर नहीं होता।

- वंचित,दलित,पिछड़े तो चलो बेअकल हैं। प्रतिभावान लोग बतायें कि कैसे इनका विकास हो सकता है। कौन सा ऐसा माडल है जो देश की सत्तर फीसदी आबादी को नजरअंदाज करके विकसित कर देगा?

-आरक्षण तो  देश के सामने की तमाम समस्याओं में से एक है। एक तरह से भ्रष्टाचार,बेरोजगारी,अशिक्षा,बेईमानी का बाईप्रोडक्ट है। जब तक ये समस्यायें रहेंगी इस तरह की समस्यायें बनीं रहेंगी। जब तक प्रयासों में ईमानदारी नहीं होगी किसी भी समस्या का हल जीरो बटा सन्नाटा ही होगा तथा नित नयी समस्यायें सामने आती रहेंगी।

हर समस्या के लिये नेताओं को दोष देने की हमारी प्रवृत्ति है।नेता तो  हमारे समाज के प्रतिनिधि हैं। जैसे हम होंगे वैसे हमारे रहनुमा होंगे। नेता कहीं आसमान से तो नहीं आयेंगे।हमारे बीच से ही आयेंगे। बकौल &lt;b&gt;मेराज फैजाबादी&lt;/b&gt; नेताओं का तो काम ही है-

&lt;b&gt;पहले पागल भीड़ में शोला बयानी बेचना
फिर जलते हुये शहरों में पानी बेंचना ।&lt;/b&gt;</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>जैसा कि मैंने बताया कि यह लेख मैंने जैसा समझा उस हिसाब से लिखा था। लोगों ने पसंद किया उसके लिये आभार। कुछ किंतु-परंतु ,लेकिन के बारे में मेरा यही कहना है कि यह निर्भर करता है कि आपका &#8216;फ्रेम आफ रेफेरेन्स&#8217; क्या है? कुछ बातें जो मैं फिर से चूंकि मौका है वह कहना चाहता हूँ।</p>
<p>-अनुसूचित जाति,जनजाति तथा पिछड़ी जातियों की कुल आबादी देश की आबादी की लगभग ६०-७० प्रतिशत है। उनके विकास के बिना देश कैसे विकसित हो सकता है?</p>
<p>-अभी तक आरक्षण से कोई खास फायदा नहीं हुआ इसके कारण क्या रहे यह सोचना जरूरी है।इन वंचितों के लाभ की सारी योजनाओं का क्रियान्वयन ऊँची जातियों के लोग करते रहे।इन योजनाओं के क्रियान्नवयन में हुये घपले घोटालों के लिये वंचित लोग क्या करें?आये दिन छात्रवृत्ति घोटाला,मिड-डे मील घोटाला आदि के सूत्र तो गैरआरक्षित लोगों के हाथ में रहे हैं।</p>
<p>-जहां तक प्रतिभा की बात है तो देश में अभी तक के सारे घपले,घोटाले,गोलमाल देश के सबसे जहीन,प्रतिभाशाली माने जाने वाले लोगों ने किये हैं। देश का ९०% से अधिक काला धन देश के सबसे जहीन माने जाने वाले अनारक्षित वर्ग के पास होगा।</p>
<p>-देश की सबसे जहीन,प्रतिभाशाली,ताकतवर लाबी आई.ए.एस. की नौकरी करने वाले माने जाते हैं। अगर ये अड़ जायें तो कोई भी गलत काम नहीं हो सकता। लेकिन यह संस्था अपनी सुविधाओं के लिये देश के आवारा नेताओं के आगे समर्पण करती रही तथा केवल अपना घर भरती रही। यह भी संयोग है कि सिविल सेवा में २२.५% आरक्षण के मुकाबले में अनुसूचित जाति,जनजाति का प्रतिशत १५-१६ प्रतिशत है। मतलब बहुतायत में अनारक्षित जातियों के लोग हैं।</p>
<p>- तमाम तरह के घालमेल हैं जिनके कारण जितना फायदा वंचितों को मिलना चाहिये उतना मिला नहीं। अभी तक भी ये लोग अपनी ताकत समझे नहीं हैं। अगर ईमानदारी से प्रयास किये जाते तो शायद सामाजिक हालात में इतना अंतर नहीं होता।</p>
<p>- वंचित,दलित,पिछड़े तो चलो बेअकल हैं। प्रतिभावान लोग बतायें कि कैसे इनका विकास हो सकता है। कौन सा ऐसा माडल है जो देश की सत्तर फीसदी आबादी को नजरअंदाज करके विकसित कर देगा?</p>
<p>-आरक्षण तो  देश के सामने की तमाम समस्याओं में से एक है। एक तरह से भ्रष्टाचार,बेरोजगारी,अशिक्षा,बेईमानी का बाईप्रोडक्ट है। जब तक ये समस्यायें रहेंगी इस तरह की समस्यायें बनीं रहेंगी। जब तक प्रयासों में ईमानदारी नहीं होगी किसी भी समस्या का हल जीरो बटा सन्नाटा ही होगा तथा नित नयी समस्यायें सामने आती रहेंगी।</p>
<p>हर समस्या के लिये नेताओं को दोष देने की हमारी प्रवृत्ति है।नेता तो  हमारे समाज के प्रतिनिधि हैं। जैसे हम होंगे वैसे हमारे रहनुमा होंगे। नेता कहीं आसमान से तो नहीं आयेंगे।हमारे बीच से ही आयेंगे। बकौल <b>मेराज फैजाबादी</b> नेताओं का तो काम ही है-</p>
<p><b>पहले पागल भीड़ में शोला बयानी बेचना<br />
फिर जलते हुये शहरों में पानी बेंचना ।</b></p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: eswami</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/131/comment-page-1#comment-1270</link>
		<dc:creator>eswami</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 20 May 2006 23:09:39 +0000</pubDate>
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		<description>&quot;तो यह कहना बचकानापन तथा सच से मुंह चुराना होगा कि गधे,गधे ही बने रहेंगे। आरक्षण या प्रशिक्षण से उन्हें घोड़ा नहीं बनाया जा सकता । गुणवत्ता जन्मजात नहीं होती । सुविधा,संरक्षण तथा प्रशिक्षण से गुणवत्ता को निखारा जा सकता है।&quot;

गुरुदेव, 

मेरे अनुरोध पर यह लेख लिखने के लिए आभारी हूं! आपके संतुलित विचार पढ कर बहुत प्रसन्न भी हूं! 

मोटे तौर पे लाजिकल टेबिल बनाने पर आठ तरह के केंडिडेट हैं आपके पास - 

१) सामान्य वर्ग वाला संपन्न गुणी 
२) सामान्य वर्ग वाला असंपन्न गुणी 

३) सामान्य वर्ग वाला संपन्न कम गुणी
४) सामान्य वर्ग वाला असंपन्न कम गुणी

५) पिछडे वर्ग वाला संपन्न गुणी
६) पिछडे वर्ग वाला असंपन्न गुणी

७) पिछडे वर्ग वाला संपन्न कम गुणी
८) पिछडे वर्ग वाला असंपन्न कम गुणी

यदी गुणवत्ता जन्मजात नही होती तो आरक्षण का आधार जातियां तो होना ही नही चाहिए - गुणी चाहे असंपन्न हो चाहे संपन्न हो, वो चाहे सामान्य वर्ग मे हो या पिछडे वाले में - वो अपना स्थान बना लेगा!चाहो तो पिछडे वर्ग के असंपन्न गुणी को छात्रवृत्तीयां दो ना हम विरोध कहां कर रहे हैं?

अब रही की कम गुणी को मौका देने की बात - तो आरक्षण के आधार पर पिछडा संपन्नवर्ग जो है वो सामान्य वर्ग के असंपन्न गुणी का हक क्यों छीन रहा है? 

बाकी आसान कांबिनेशन आप भी इंजीनियर हो - लगा के देख लो की आरक्षण के तौर तरीके अन्यायपूर्ण हैं और तुष्टीकरण और वोट बैंक की राजनीति को बढावा देने के लिए ही गढे गए हैं. 

ओवर आल मैं जीतू की बात का समर्थन करता हूं!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>&#8220;तो यह कहना बचकानापन तथा सच से मुंह चुराना होगा कि गधे,गधे ही बने रहेंगे। आरक्षण या प्रशिक्षण से उन्हें घोड़ा नहीं बनाया जा सकता । गुणवत्ता जन्मजात नहीं होती । सुविधा,संरक्षण तथा प्रशिक्षण से गुणवत्ता को निखारा जा सकता है।&#8221;</p>
<p>गुरुदेव, </p>
<p>मेरे अनुरोध पर यह लेख लिखने के लिए आभारी हूं! आपके संतुलित विचार पढ कर बहुत प्रसन्न भी हूं! </p>
<p>मोटे तौर पे लाजिकल टेबिल बनाने पर आठ तरह के केंडिडेट हैं आपके पास &#8211; </p>
<p>१) सामान्य वर्ग वाला संपन्न गुणी<br />
२) सामान्य वर्ग वाला असंपन्न गुणी </p>
<p>३) सामान्य वर्ग वाला संपन्न कम गुणी<br />
४) सामान्य वर्ग वाला असंपन्न कम गुणी</p>
<p>५) पिछडे वर्ग वाला संपन्न गुणी<br />
६) पिछडे वर्ग वाला असंपन्न गुणी</p>
<p>७) पिछडे वर्ग वाला संपन्न कम गुणी<br />
८) पिछडे वर्ग वाला असंपन्न कम गुणी</p>
<p>यदी गुणवत्ता जन्मजात नही होती तो आरक्षण का आधार जातियां तो होना ही नही चाहिए &#8211; गुणी चाहे असंपन्न हो चाहे संपन्न हो, वो चाहे सामान्य वर्ग मे हो या पिछडे वाले में &#8211; वो अपना स्थान बना लेगा!चाहो तो पिछडे वर्ग के असंपन्न गुणी को छात्रवृत्तीयां दो ना हम विरोध कहां कर रहे हैं?</p>
<p>अब रही की कम गुणी को मौका देने की बात &#8211; तो आरक्षण के आधार पर पिछडा संपन्नवर्ग जो है वो सामान्य वर्ग के असंपन्न गुणी का हक क्यों छीन रहा है? </p>
<p>बाकी आसान कांबिनेशन आप भी इंजीनियर हो &#8211; लगा के देख लो की आरक्षण के तौर तरीके अन्यायपूर्ण हैं और तुष्टीकरण और वोट बैंक की राजनीति को बढावा देने के लिए ही गढे गए हैं. </p>
<p>ओवर आल मैं जीतू की बात का समर्थन करता हूं!</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: ratna</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/131/comment-page-1#comment-1264</link>
		<dc:creator>ratna</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 20 May 2006 19:07:21 +0000</pubDate>
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		<description>मैं जीतू जी के विचारों से सहमत हूँ ।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मैं जीतू जी के विचारों से सहमत हूँ ।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: समीर लाल</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/131/comment-page-1#comment-1251</link>
		<dc:creator>समीर लाल</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 20 May 2006 18:30:49 +0000</pubDate>
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		<description>बहुत बढियां, तार्किक जुगलबंदी से बचते हुये अपने अहसासों को बेहद बखूबी व्यक्त किया है, अनूप जी.वाकई,आगे-आगे देखिये क्या होता है. शायद कुछ अच्छा ही हो...</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत बढियां, तार्किक जुगलबंदी से बचते हुये अपने अहसासों को बेहद बखूबी व्यक्त किया है, अनूप जी.वाकई,आगे-आगे देखिये क्या होता है. शायद कुछ अच्छा ही हो&#8230;</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: जीतू</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/131/comment-page-1#comment-1245</link>
		<dc:creator>जीतू</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 20 May 2006 15:47:24 +0000</pubDate>
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		<description>अनूप भाई के अपने विचार है, कोई जरुरी नही है कि हम एक दूसरे के विचारों से सहमत हों।अनूप भाई ने अपने विचार प्रभावशाली तरीके से रखे है, हो सकता है जीवन से उनके जो साक्षात्कार हुए हो, मेरे ना हुए हों। मेरा अब भी मानना है, आरक्षण सही नही है।जब आप उन्हे शिक्षा मे आरक्षण दे रहे है, नौकरियों मे आरक्षण दे रहे है तो पेन्शन भी शुरु करवा दीजिए, मै तो कहता हो, चमम्च से मूँह मे निवाला देने से तो अच्छा है उन्हे अपनी जीविका चलाने लायक बनाइये, जब तक आरक्षण रहेगा तब तक उन्हे प्रतियोगी नही बनाया जा सकता। हाँ यदि आरक्षण देना ही है तो सबसे आर्थिक स्थिति का आकलन करके आरक्षणं दीजिए, वो भी एक लिमिटेड समय तक।उसके बाद आरक्षण बन्द।लेकिन बदकिस्मती से अपने देश मे ऐसा होता नही है,वोट की क्षुद्र राजनीति की वजह से नेता आरक्षण हटाते नही।

सरकारी नीतियां कितनी नीचे के लेवल तक पहुँचती है, वो हम सभी जानते है, इस प्रोपोस्ड आरक्षण का भी क्रीमी लेयर ही फायदा उठाएगी, ये पक्का है।

स्रूजनशिल्पी जी,रहा सवाल परिचर्चा पर चर्चा का, मै स्वस्थ चर्चा मे विश्वास रखता हूँ, जो लोकतन्त्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, यदि उस पर भी आपको शिकायत है तो मै नही मानता है आप लोकतन्त्रीय परम्परा मे विश्वास रखते है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अनूप भाई के अपने विचार है, कोई जरुरी नही है कि हम एक दूसरे के विचारों से सहमत हों।अनूप भाई ने अपने विचार प्रभावशाली तरीके से रखे है, हो सकता है जीवन से उनके जो साक्षात्कार हुए हो, मेरे ना हुए हों। मेरा अब भी मानना है, आरक्षण सही नही है।जब आप उन्हे शिक्षा मे आरक्षण दे रहे है, नौकरियों मे आरक्षण दे रहे है तो पेन्शन भी शुरु करवा दीजिए, मै तो कहता हो, चमम्च से मूँह मे निवाला देने से तो अच्छा है उन्हे अपनी जीविका चलाने लायक बनाइये, जब तक आरक्षण रहेगा तब तक उन्हे प्रतियोगी नही बनाया जा सकता। हाँ यदि आरक्षण देना ही है तो सबसे आर्थिक स्थिति का आकलन करके आरक्षणं दीजिए, वो भी एक लिमिटेड समय तक।उसके बाद आरक्षण बन्द।लेकिन बदकिस्मती से अपने देश मे ऐसा होता नही है,वोट की क्षुद्र राजनीति की वजह से नेता आरक्षण हटाते नही।</p>
<p>सरकारी नीतियां कितनी नीचे के लेवल तक पहुँचती है, वो हम सभी जानते है, इस प्रोपोस्ड आरक्षण का भी क्रीमी लेयर ही फायदा उठाएगी, ये पक्का है।</p>
<p>स्रूजनशिल्पी जी,रहा सवाल परिचर्चा पर चर्चा का, मै स्वस्थ चर्चा मे विश्वास रखता हूँ, जो लोकतन्त्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, यदि उस पर भी आपको शिकायत है तो मै नही मानता है आप लोकतन्त्रीय परम्परा मे विश्वास रखते है।</p>
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