[आज अभिव्यक्ति का गुलमोहर विशेषांक देखा। इसमें
गुलमोहर के बारे में जानकारी है , कहानियां है,कवितायें हैं,पूर्णिमा वर्मन का ललित निबन्ध हैं,नाटक है और खुदा झूठ न बुलाये खाक़सार का लेख भी है। 'खाक़सार' उर्दू शब्द है जिसका हिंदी अनुवाद शायद 'माटीमिले' होता होगा। अगर यह सच है तो देखा जाय कि कितना दूरी तय कर लेता शब्द अनुवादित होते-होते। बहरहाल ,आप मेरा अभिव्यक्ति में प्रकाशित लेख पढ़िये। यह पूर्णिमा जी द्वारा सम्पादित लेख है। देखिये कि सम्पादन क्या होता है? इस बीच हम मौके का फायदा उठाकर अपना मूल लेख जो मैंने भेजा था अभिव्यक्ति के लिये वह यहाँ पेशकर रहा हूँ।बहाना यह है कि अभिव्यक्ति शुषा फान्ट में है जबकि हमें चाहिये यूनीकोड फान्ट। संपादित लेख आप अभिव्यक्ति में पढ़ सकते हैं।]
मैं गुलमोहर पर लेख का मजनून सोच रहा हूँ।
दिमाग में गाना बज रहा है-गुलमोहर गर तुम्हारा नाम होता…।
गाने की पहली लाइन सुनते ही मैं सोचने लगता हूँ कि किसका नाम गुलमोहर है- मेरी जानपहचान में। कोई चेहरा याद नहीं आता जिसका नाम गुलमोहर हो। मोहल्लों के नाम याद हैं जिनके नाम गुलमोहर के नाम पर रखें गये हैं-गुलमोहर पार्क,दिल्ली।
गुलमोहर के बारे में जानकारी के लिये किताबें टटोलता हूँ । हजारीप्रसाद द्विवेदी रचनावली देखता हूँ । ‘अशोक के फूल’ तथा ‘शिरीष के फूल’ के मिलते हैं। लेकिन गुलमोहर नदारद है।
कहाँ छिपे हो गुलमोहर के फूल!गुलमोहर गुमशुदा है।इसीलिये शायद गाना बना है-गुलमोहर गर तुम्हारा नाम होता…। तो कम से कम खोजना तो न पड़ता गुलमोहर को। तुम्हारे बारे में लिख देता। काम हो जाता।
गुमशुदा गुलमोहर की तलाश इन्टरनेट पर करता हूँ तो पूर्णिमा वर्मन जीकी कविता मिलती है:-
खिड़की के नीचे से प्यार गुनगुनाता है
गुच्छा गुलमोहर का हाथ यों हिलाता है
अभी नहीं अभी नहीं
कल आयेंगे
गांव तुम्हारे।
यहाँ भी गुलमोहर गच्चा दे गया। बोला कल आयेंगे, वो भी गाँव ।लगता है मुँह चुरा रहा है गुलमोहर।
लगा कि किसी का क्या भरोसा करना! खुद देखा जाय गुलमोहर को,कहाँ खिला है,कैसा लगताहै, क्यों टरका रहा है ,क्या गुल खिला रहा है,मुलाकात क्यों टाल रहा है!कल पड़े भरी दुपहरी में कैमरा लपेट के।
बाहर प्रचन्ड धूप खिली थी।लेकिन ज्यादा दूर नहीं जाना पड़ा। गुलमोहर का पेड़ सामनेखड़ा था। उसे देखते ही माज़रा समझ में आ गया। जनाब क्यों टरका रहे थे मुलाकात को। गुलमोहर का पेड़ बगल के अमलतास से बतिया रहा। दोनों को इकट्ठे देखकर लगा कि दो कामचोर कर्मचारी काम के घण्टों में लापरवाही से बतिया रहे हैं । लगा तो यह भी कि समलैंगिकता का फैशन पेडों ने भी अपना लिया है।लाल गुलमोहर को पीले अमलतास से बतियाते देख मेरा मन लाल-पीला होने को हुआ लेकिन जुगल-जोड़ी को देखकर मन हरा हो गया।कल्पना के घोड़े सरपट दौड़ने लगे।
गुलमोहर गर्मी में खिलता हैं । प्रचंड गर्मी में जब तमाम दूसरे फूल दुम दबा के फूट लेतेहैं तब गुलमोहर सर उठा के गर्मी का बहादुरी से मुकाबला करता है। गर्मी के प्रति गुस्से से लाल । गर्मी ने उसके साथियों को धरासायी जो कर दिया है ।
लगता तो मुझे यह भी है गुलमोहर शर्मीला होता है। उसका अपना कोई रंग नहीं होता। लेकिन जब अमलतास से गुपचुप गुफ्तगू करते पकडा़ जाता है तो मारे शरम के लाल हो जाता है। डर के अमलतास पीला पड़ जाता है।
मेरे कुछ जनवादी दोस्त कहते हैं कि गुलमोहर लाल फूल धारण करता है। क्रांति का प्रतीक होताहै। वहीं दूसरे जनवादी साथी बताते हैं कि गुलमोहर बेहया होता है। जब दूसरे फूल मुरझा रहे होते हैं तब खिलता है। शरम तक नहीं आती कि साथियों के जाने का दुख मनाये। बेहयासर उठाये हिलता -डुलता रहता है।
गुलमोहर समर्थक साथी बताते हैं कि यह बताता है कि कैसे भीषण गर्मी का सामना करतेहुये सर उठा के जिया जाता है। विरोधी दोस्त बताते हैं गुलमोहर को देखकर लगता है कि कोई लाल-लाल गाल वाला नेता सूखे मुँह वाले समर्थकों के बीच खड़ा भाषण दे रहा हो।
तमाम गुलमोहर के पेड़ तमाम प्रेम कथाओं के गवाह रहते हैं। लेकिन कोई गुलमोहर कापेड़ इतना छतनार नहीं होता कि अपनी छाँह में बैठे जोड़े को आसमान की बेधती निगाहोंसे बचा सके। गुलमोहर की छाँव प्रेमियों को अपने नीचे केवल खड़े होने की सुविधा देतीं है,लेटने का उपक्रम करते ही आसमान टोंक देता है।
फैशन के दौर में गारण्टी की अपेक्षा नहीं करनी चाहिये। गर्मी में खिला गुलमोहर खूबसूरततो दिखता है लेकिन जैसे सुन्दरता की सार्थकता छुई-मुई होने में होती है। गुलमोहर कापेड़ भी फुसफुसा होता है। इसके नीचे आप खड़े होकर कल्पना की पींगे तो मार सकते हैंलेकिन इसकी डालपर झूला डालकर नहीं झूल सकते।
देख रहा हूँ कि मौसम तथा गुलमोहर की जुगलबँदी सी हो रही है। दोनों आग उगल रहे हैं।संगति का असर हम पर भी पड़ रहा है। हम वापस घर लौटते हैं। गाना अभी भी बज रहा है-गुलमोहर गर तुम्हारा नाम होता…।
अब कारण समझ में आ रहा है लोग अपना नाम गुलमोहर रखने में किसलिये कतराते हैं। भयानक गर्मी में सर उठाकर खिले रहने का हौसला सबका नहीं होता। यह गुलमोहरही है जो जलते हुये भी खिलता रहता है। लाल गुलमोहर पीले अमलतास से बतियाता है। मनको हरा-हरा कर जाता है। रखोगे अपना नाम गुलमोहर!
मेरी पसंद
गर्म रेत पर चलकर आए
छाले पड़ गये पाँव में
आओ पल भर पास में बैठो
गुलमोहर की छांव में।
नयनों की मादकता देखो
गुलमोहर में छाई है
हरी पत्तियों की पलकों में
कलियाँ भी मुस्काई हैं।
बांहे फैला बुला रहे हैं
हम सबको हर ठांव में।
चार बरस पहले जब इनको
रोप-रोप हरसाये थे
कभी दीमक से कभी शीत से
कुछ पौधे मुरझाये थे
हर मौसम की मार झेल ये
बने बाराती गांव में।
सिर पर बांधे फूल मुरैठा
सज -धजकर ये आये हैं
मौसम के गर्म थपेड़ों में
जी भरकर मुस्काए हैं
आओ हम इन सबसे पूछे
कैसे हंसें अभाव में।
-रामेश्वर काम्बोज’हिमांशु’







अभिव्यक्ति पर जैसे तैसे मैं टिपियाया था-
आप तो किसी मुर्दा (व्यक्ति) पर भी धारदार व्यंग मार सकते हैं!
गुलमोहरी आलेख में गरमी और छांह दोनों ही मिले.
very interesting,as usual.
और मुझे अब समझ आया कि पुणे में आपने गुलमोहर के चित्र भला क्यों उतारे!
क्या बात है। समझा संपादन क्या है।
आपका लिखा पढ़ने की तो भूख लगती है। अद्वितीय भाव ।
प्रेमलता