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	<title>Comments on: अमेरिका-कुछ बेतरतीब विचार</title>
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	<description>हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै?</description>
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		<title>By: तेरे मैनर्स मेरे मैनर्स से सफ़ेद कैसे! at अक्षरग्राम</title>
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		<dc:creator>तेरे मैनर्स मेरे मैनर्स से सफ़ेद कैसे! at अक्षरग्राम</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 26 Jun 2006 01:24:09 +0000</pubDate>
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		<description>[...] (हिंदी चिट्ठामंडल में रीडर्स डाइजेस्ट के हालिया सर्वे से शुरू हुई एक बहस चल रही है, जो इस मुद्दे से कहीं आगे तक जाती है। मैं फिलहाल बस इस सर्वे के बारे में दो-चार बातें कहना चाहता था, जो टिप्पणियों के लिए बड़ी नज़र आती हैं। इसलिए यहाँ लिख रहा हूँ।) [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] (हिंदी चिट्ठामंडल में रीडर्स डाइजेस्ट के हालिया सर्वे से शुरू हुई एक बहस चल रही है, जो इस मुद्दे से कहीं आगे तक जाती है। मैं फिलहाल बस इस सर्वे के बारे में दो-चार बातें कहना चाहता था, जो टिप्पणियों के लिए बड़ी नज़र आती हैं। इसलिए यहाँ लिख रहा हूँ।) [...]</p>
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		<title>By: ई-स्वामी &#187; भाग-२:अमरीका-शमरीका!</title>
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		<dc:creator>ई-स्वामी &#187; भाग-२:अमरीका-शमरीका!</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 26 Jun 2006 00:20:50 +0000</pubDate>
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		<description>[...] फ़ुरसतियाजी के अमरीका पर बेतरतीब विचार पढे. एक बेतरतीब विचारों वाला लेख मेरी तरफ़ से भी - वादा रहा अगले लेख में हर बचे प्रश्न का तमीज़ से बिंदूवार जवाब देने की कोशिश करूंगा.  लेकिन उस के पहले कुछ - [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] फ़ुरसतियाजी के अमरीका पर बेतरतीब विचार पढे. एक बेतरतीब विचारों वाला लेख मेरी तरफ़ से भी &#8211; वादा रहा अगले लेख में हर बचे प्रश्न का तमीज़ से बिंदूवार जवाब देने की कोशिश करूंगा.  लेकिन उस के पहले कुछ &#8211; [...]</p>
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		<title>By: Hindi Blogger</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/148/comment-page-1#comment-1849</link>
		<dc:creator>Hindi Blogger</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 26 Jun 2006 00:09:45 +0000</pubDate>
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		<description>देर हो चुकी है, इसलिए रमन जी के ब्लॉग पर टंकित टिप्पणी को ही यहाँ चेंप रहा हूँ. धृष्टता के लिए माफ़ी चाहूँगा.

&#039;धन्यवाद, रीडर्स डाइजेस्ट के सर्वे के बहाने छिड़ी बहस को आगे बढ़ाने के लिए. 

हम सभी लोगों का यही मानना है कि हर देश, हर समाज, हर व्यक्ति में विशेषताएँ और कमियाँ दोनों होती हैं. इतना ज़रूर हो सकता है कि किसी मामले में अच्छाइयाँ ज़्यादा हों और किसी में कमियाँ. किसी देश को या फिर किसी धर्म को सर्वश्रेष्ठ ठहराने का कोई भी प्रयास निरर्थक ही कहा जाएगा. बात सम्यक दृष्टि की होनी चाहिए. 

मुझे अमरीका में रहने का सौभाग्य तो नहीं मिला, लेकिन पाँच वर्षों तक भारत से दूर एक विकसित माने जाने वाले समाज में रहा हूँ- अतिथि श्रमिक के तौर पर नहीं, बल्कि स्थाई निवासी के तौर पर यानि पूरे अधिकारों के साथ(वोट देने के अधिकार समेत). इसके अलावा घुमक्कड़ी के दिनों में, जबकि बुढ़ापे के लिए बचत करने की जरा भी चिंता नहीं थी, कुल 13 यूरोपीय देशों में सप्ताह से लेकर तीन सप्ताह तक रह कर उन्हें थोड़ा-बहुत जानने का भी मौक़ा मिला है. इनमें ब्रिटेन, फ़्रांस या इटली जैसे विकसित देश, रूस या जर्मनी जैसे कड़े क़ानूनों में बंधे देश, और नीदरलैंड्स, डेनमार्क या स्वीडन जैसे उन्मुक्त देश शामिल हैं. हमें ऐसी कोई जगह नहीं दिखी जहाँ कि अपनी स्थानीय समस्याएँ नहीं हों(छोटी भी और अत्यंत गंभीर भी), या जहाँ कि स्थितियों को आदर्श मान कर उन्हें भारत में हूबहू उतारने का सपना दिखा हो. 

हर समाज के अपने-अपने आदर्श और मानदंड होते हैं. इसलिए भारत और अमरीका की नख-शिख तुलना करना ही बेमानी है.
लेकिन ईस्वामी जी की दलीलों का क्या कहना! भावनाओं में बह कर न जाने कहाँ-कहाँ के तर्क दे बैठे. प्रस्तुत है एक नमूना- “जिस देश के लोगों ने … …, दुनिया को पीसी और इन्टरनेट जैसी चीज़ दे रखी है उसी इन्टरर्नेट पर उन्हें सीमित दायरे में जीने वाला कहा जा रहा है.”
भइये, इसका मतलब तो ये हुआ कि इंग्लैंड ने दुनिया को टेलीविज़न दिया इसलिए टेलीविज़न पर वहाँ की ‘गंदगी’ नहीं दिखाई जाए, या चीन में काग़ज़ का आविष्कार हुआ तो पत्र-पत्रिकाओं के ज़रिए वहाँ की सेंसरशिप पर सवाल नहीं उठाए जाएँ!
हमारे अमरीकावासी मित्र वहाँ के संविधान के पहले संशोधन को क्यों भूल जाते हैं?&#039;</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>देर हो चुकी है, इसलिए रमन जी के ब्लॉग पर टंकित टिप्पणी को ही यहाँ चेंप रहा हूँ. धृष्टता के लिए माफ़ी चाहूँगा.</p>
<p>&#8216;धन्यवाद, रीडर्स डाइजेस्ट के सर्वे के बहाने छिड़ी बहस को आगे बढ़ाने के लिए. </p>
<p>हम सभी लोगों का यही मानना है कि हर देश, हर समाज, हर व्यक्ति में विशेषताएँ और कमियाँ दोनों होती हैं. इतना ज़रूर हो सकता है कि किसी मामले में अच्छाइयाँ ज़्यादा हों और किसी में कमियाँ. किसी देश को या फिर किसी धर्म को सर्वश्रेष्ठ ठहराने का कोई भी प्रयास निरर्थक ही कहा जाएगा. बात सम्यक दृष्टि की होनी चाहिए. </p>
<p>मुझे अमरीका में रहने का सौभाग्य तो नहीं मिला, लेकिन पाँच वर्षों तक भारत से दूर एक विकसित माने जाने वाले समाज में रहा हूँ- अतिथि श्रमिक के तौर पर नहीं, बल्कि स्थाई निवासी के तौर पर यानि पूरे अधिकारों के साथ(वोट देने के अधिकार समेत). इसके अलावा घुमक्कड़ी के दिनों में, जबकि बुढ़ापे के लिए बचत करने की जरा भी चिंता नहीं थी, कुल 13 यूरोपीय देशों में सप्ताह से लेकर तीन सप्ताह तक रह कर उन्हें थोड़ा-बहुत जानने का भी मौक़ा मिला है. इनमें ब्रिटेन, फ़्रांस या इटली जैसे विकसित देश, रूस या जर्मनी जैसे कड़े क़ानूनों में बंधे देश, और नीदरलैंड्स, डेनमार्क या स्वीडन जैसे उन्मुक्त देश शामिल हैं. हमें ऐसी कोई जगह नहीं दिखी जहाँ कि अपनी स्थानीय समस्याएँ नहीं हों(छोटी भी और अत्यंत गंभीर भी), या जहाँ कि स्थितियों को आदर्श मान कर उन्हें भारत में हूबहू उतारने का सपना दिखा हो. </p>
<p>हर समाज के अपने-अपने आदर्श और मानदंड होते हैं. इसलिए भारत और अमरीका की नख-शिख तुलना करना ही बेमानी है.<br />
लेकिन ईस्वामी जी की दलीलों का क्या कहना! भावनाओं में बह कर न जाने कहाँ-कहाँ के तर्क दे बैठे. प्रस्तुत है एक नमूना- “जिस देश के लोगों ने … …, दुनिया को पीसी और इन्टरनेट जैसी चीज़ दे रखी है उसी इन्टरर्नेट पर उन्हें सीमित दायरे में जीने वाला कहा जा रहा है.”<br />
भइये, इसका मतलब तो ये हुआ कि इंग्लैंड ने दुनिया को टेलीविज़न दिया इसलिए टेलीविज़न पर वहाँ की ‘गंदगी’ नहीं दिखाई जाए, या चीन में काग़ज़ का आविष्कार हुआ तो पत्र-पत्रिकाओं के ज़रिए वहाँ की सेंसरशिप पर सवाल नहीं उठाए जाएँ!<br />
हमारे अमरीकावासी मित्र वहाँ के संविधान के पहले संशोधन को क्यों भूल जाते हैं?&#8217;</p>
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