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	<title>Comments on: देखा मैंने उसे कानपुर पथ पर-</title>
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	<description>हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै?</description>
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		<title>By: फ़ुरसतिया &#187; अनुगूंज २१-कुछ चुटकुले</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/157/comment-page-1#comment-2105</link>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया &#187; अनुगूंज २१-कुछ चुटकुले</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 16 Jul 2006 18:18:24 +0000</pubDate>
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		<description>[...] kali on धूमिल की कवितायेंजीतू on देखा मैंने उसे कानपुर पथ पर-नीरज त्रिपाठी on देखा मैंने उसे कानपुर पथ पर-अन्तर्मन on देखा मैंने उसे कानपुर पथ पर-मितुल on कन्हैयालाल नंदन- मेरे बंबई वाले मामा [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] kali on धूमिल की कवितायेंजीतू on देखा मैंने उसे कानपुर पथ पर-नीरज त्रिपाठी on देखा मैंने उसे कानपुर पथ पर-अन्तर्मन on देखा मैंने उसे कानपुर पथ पर-मितुल on कन्हैयालाल नंदन- मेरे बंबई वाले मामा [...]</p>
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		<title>By: जीतू</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/157/comment-page-1#comment-2097</link>
		<dc:creator>जीतू</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 16 Jul 2006 07:12:06 +0000</pubDate>
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		<description>अमां यार! मोपेड पर बैठने से पहले ये भी ना सोचा कि उस गरीब पर क्या बीतेगी।ईश्वर मोपेड की आत्मा को शान्ति प्रदान करें। मै शहीद मोपेड को श्रृद्दांजिली अर्पित करता हूँ।

अब रही बात कानपुर लखनऊ मार्ग की, सुने तो हम भी है चार लेन वाला हो गया है लेकिन पिछली बार जब गए थे, हर पाँच किलोमीटर पर दो लेन मे तब्दील हो जाता था।

लेख अच्छा लिखे हो टाइटिल होना चाहिए &quot; मोपेड की व्यथा कथा&quot;
बकिया चकाचक</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अमां यार! मोपेड पर बैठने से पहले ये भी ना सोचा कि उस गरीब पर क्या बीतेगी।ईश्वर मोपेड की आत्मा को शान्ति प्रदान करें। मै शहीद मोपेड को श्रृद्दांजिली अर्पित करता हूँ।</p>
<p>अब रही बात कानपुर लखनऊ मार्ग की, सुने तो हम भी है चार लेन वाला हो गया है लेकिन पिछली बार जब गए थे, हर पाँच किलोमीटर पर दो लेन मे तब्दील हो जाता था।</p>
<p>लेख अच्छा लिखे हो टाइटिल होना चाहिए &#8221; मोपेड की व्यथा कथा&#8221;<br />
बकिया चकाचक</p>
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		<title>By: नीरज त्रिपाठी</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/157/comment-page-1#comment-2096</link>
		<dc:creator>नीरज त्रिपाठी</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 16 Jul 2006 04:34:46 +0000</pubDate>
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		<description>अपने शहर के बारे में पढ़कर बहुत अच्छा लगा। 
कानपुर लखनऊ के रास्ते में लगभग बीच में जगज्जननी स्वीट हाउस पड़ता है।वहां के पेड़े बहुत प्रसिद्घ हैं। हमने वहाँ चाय पी। ये बात कुछ समझ में नहीं आयी कि जब पेड़े बहुत प्रसिद्घ थे तो वहां पेड़े की जगह चाय क्यों...... :-)

सैंडिल आदमी की चाँद पर बज रहा था। चाँद गंजी होने का नाम नहीं ले रही थी। 

अगर वह कुछ बोल भी रहा होगा तो चप्पलों की आवाज उसकी आवाज को दबा देती होगी। 

मोहे आई न जग से लाज
मैं इतना जोर से पीटी आज
कि सैंडिल टूट गये।

मुसाफिर हैं हम भी,मुसाफिर हो तुम भी
किसी मोड़ पर फिर मुलाकात होगी।

कपड़े के नाम पर उसके कमर पर जांघिया नुमा कुछ कपड़ा फंसा था। बाकी पूरा बदन दिगम्बर था। 

कुछ ही देर में हमने मेहनत करके अपने बारे में तमाम तारीफों के पुल तोड़ दिये हम लोग बीच के पंद्रह बीस सालों का हिसाब किताब बराबर करने लगे।

६३ के फूल ,३६ की माला
बुरी नजर वाले का मुंह काला।

मजा आ गया .....</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अपने शहर के बारे में पढ़कर बहुत अच्छा लगा।<br />
कानपुर लखनऊ के रास्ते में लगभग बीच में जगज्जननी स्वीट हाउस पड़ता है।वहां के पेड़े बहुत प्रसिद्घ हैं। हमने वहाँ चाय पी। ये बात कुछ समझ में नहीं आयी कि जब पेड़े बहुत प्रसिद्घ थे तो वहां पेड़े की जगह चाय क्यों&#8230;&#8230; <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':-)' class='wp-smiley' /> </p>
<p>सैंडिल आदमी की चाँद पर बज रहा था। चाँद गंजी होने का नाम नहीं ले रही थी। </p>
<p>अगर वह कुछ बोल भी रहा होगा तो चप्पलों की आवाज उसकी आवाज को दबा देती होगी। </p>
<p>मोहे आई न जग से लाज<br />
मैं इतना जोर से पीटी आज<br />
कि सैंडिल टूट गये।</p>
<p>मुसाफिर हैं हम भी,मुसाफिर हो तुम भी<br />
किसी मोड़ पर फिर मुलाकात होगी।</p>
<p>कपड़े के नाम पर उसके कमर पर जांघिया नुमा कुछ कपड़ा फंसा था। बाकी पूरा बदन दिगम्बर था। </p>
<p>कुछ ही देर में हमने मेहनत करके अपने बारे में तमाम तारीफों के पुल तोड़ दिये हम लोग बीच के पंद्रह बीस सालों का हिसाब किताब बराबर करने लगे।</p>
<p>६३ के फूल ,३६ की माला<br />
बुरी नजर वाले का मुंह काला।</p>
<p>मजा आ गया &#8230;..</p>
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	<item>
		<title>By: अन्तर्मन</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/157/comment-page-1#comment-2077</link>
		<dc:creator>अन्तर्मन</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 15 Jul 2006 04:22:41 +0000</pubDate>
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		<description>भाई क्या बढ़िया अनुभव है‍ और क्या वर्णन है! आप तो हिन्दी चिट्ठाकार-कम-रिपोर्टर हो गये! मन कर रहा है कि फ़्लाइट पकड़ कर लखनऊ पहुंचूं और लखनऊ-कानपुर मार्ग की सड़्कों पर बेफ़िक्री से टहलूं! दिल ढूंढ्ता है..फ़िर वही..फ़ुर्सत के रात दिन...!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>भाई क्या बढ़िया अनुभव है‍ और क्या वर्णन है! आप तो हिन्दी चिट्ठाकार-कम-रिपोर्टर हो गये! मन कर रहा है कि फ़्लाइट पकड़ कर लखनऊ पहुंचूं और लखनऊ-कानपुर मार्ग की सड़्कों पर बेफ़िक्री से टहलूं! दिल ढूंढ्ता है..फ़िर वही..फ़ुर्सत के रात दिन&#8230;!</p>
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		<title>By: अतुल</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/157/comment-page-1#comment-2048</link>
		<dc:creator>अतुल</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 12 Jul 2006 13:43:47 +0000</pubDate>
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		<description>कहिये तो घर का नं दुबारा भेजूँ ईमेलपर। 

वैसे मोपेड यात्रा ने बेफिक्र नौजवानी के दिन याद दिला दिये। ऐसे ही साईकिल स्कूटर पर दूर दूर निकल जाना , शहर की भीड़ भगदड़ से दूर। है बड़े सुकून की  चीज, यह आवारगी भी।  कहीं पढ़ा था, प्रसिद्ध पँजाबी गायक हँस राज हँस भी कुछ समय पहले ऐसे ही चट गये तेजरफ्ता जिंदगी से। महीनो तक मजारो, गाँवो घूमते रहे, बिना सेलफोन , घड़ी साथ रखे। उनका कहना था कि यह जिंदगी से जुड़ने का असली तरीका है। हमारे पिताजी का भी कहना है कि ड्राइंग रूम में बैठकर सूखी रोटी खाकर आप क्या खाक &quot;होरी&quot; लिखेंगे?</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>कहिये तो घर का नं दुबारा भेजूँ ईमेलपर। </p>
<p>वैसे मोपेड यात्रा ने बेफिक्र नौजवानी के दिन याद दिला दिये। ऐसे ही साईकिल स्कूटर पर दूर दूर निकल जाना , शहर की भीड़ भगदड़ से दूर। है बड़े सुकून की  चीज, यह आवारगी भी।  कहीं पढ़ा था, प्रसिद्ध पँजाबी गायक हँस राज हँस भी कुछ समय पहले ऐसे ही चट गये तेजरफ्ता जिंदगी से। महीनो तक मजारो, गाँवो घूमते रहे, बिना सेलफोन , घड़ी साथ रखे। उनका कहना था कि यह जिंदगी से जुड़ने का असली तरीका है। हमारे पिताजी का भी कहना है कि ड्राइंग रूम में बैठकर सूखी रोटी खाकर आप क्या खाक &#8220;होरी&#8221; लिखेंगे?</p>
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		<title>By: प्रेमलता पांडे</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/157/comment-page-1#comment-2047</link>
		<dc:creator>प्रेमलता पांडे</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 12 Jul 2006 09:24:38 +0000</pubDate>
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		<description>वर्णन बहुत बढ़िया। बच्चे की बात ने द्रवित किया।
-प्रेमलता पांडे</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>वर्णन बहुत बढ़िया। बच्चे की बात ने द्रवित किया।<br />
-प्रेमलता पांडे</p>
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		<title>By: ratna</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/157/comment-page-1#comment-2046</link>
		<dc:creator>ratna</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 12 Jul 2006 06:11:09 +0000</pubDate>
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		<description>सफ़र के दौरान कई रोचक किस्से होते है ।एक ऐसा ही किस्सा मैंने देखा इलाहाबाद-लखनऊ के पथ पर जो आम किस्सों से बहुत अलग,दिलचस्प और हैरान करने वाला था ,कुछ लम्बा है सो ब्लोग पर पेस्ट करूंगीं। कानपुर तक का सफ़र मज़ेदार रहा ।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सफ़र के दौरान कई रोचक किस्से होते है ।एक ऐसा ही किस्सा मैंने देखा इलाहाबाद-लखनऊ के पथ पर जो आम किस्सों से बहुत अलग,दिलचस्प और हैरान करने वाला था ,कुछ लम्बा है सो ब्लोग पर पेस्ट करूंगीं। कानपुर तक का सफ़र मज़ेदार रहा ।</p>
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		<title>By: प्रत्यक्षा</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/157/comment-page-1#comment-2044</link>
		<dc:creator>प्रत्यक्षा</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 12 Jul 2006 03:57:25 +0000</pubDate>
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		<description>क्वालिस से लौटते तो यह पोस्ट कैसे लिखते. मोपेड यात्रा में बहुत स्कोप है ये तो अब पता चल गया</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>क्वालिस से लौटते तो यह पोस्ट कैसे लिखते. मोपेड यात्रा में बहुत स्कोप है ये तो अब पता चल गया</p>
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		<title>By: आशीष</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/157/comment-page-1#comment-2043</link>
		<dc:creator>आशीष</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 12 Jul 2006 03:33:35 +0000</pubDate>
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		<description>&lt;blockquote&gt;
आशीष अभी अपनी बहन की शादी में व्यस्त हैं। उसे निपटा के काहे नहीं निकल लेते अपनी फटफटिया लेकर। 
&lt;/blockquote&gt;
हम्म ... आईडीया अच्छा है, सोचता हूं इस पर ! इरादा तो पक्का है, लेकिन कब ये थोडा &lt;del datetime=&quot;2006-07-12T05:48:10+00:00&quot;&gt;तेढा&lt;/del&gt; टेढ़ा सवाल है ? लेकिन ज्यादा दूर नही निकट भविष्य मे ही ।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p>
आशीष अभी अपनी बहन की शादी में व्यस्त हैं। उसे निपटा के काहे नहीं निकल लेते अपनी फटफटिया लेकर।
</p></blockquote>
<p>हम्म &#8230; आईडीया अच्छा है, सोचता हूं इस पर ! इरादा तो पक्का है, लेकिन कब ये थोडा <del datetime="2006-07-12T05:48:10+00:00">तेढा</del> टेढ़ा सवाल है ? लेकिन ज्यादा दूर नही निकट भविष्य मे ही ।</p>
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		<title>By: राम चन्द्र मिश्र</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/157/comment-page-1#comment-2042</link>
		<dc:creator>राम चन्द्र मिश्र</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 12 Jul 2006 02:44:22 +0000</pubDate>
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		<description>फ़ुरसतिया जी नमस्कार,
मज़ा आ गया...पूरे परिवार के साथ पढा़।
हम जब २ दिन  कान्पुर मे थे तो आपकी याद आयी थी, लेकिन जीतू जी ने आपका फोन नम्बर बताया नही और हम इतने आलसी कि कभी आपसे पूछ्ने की जहमत नही उठायी।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>फ़ुरसतिया जी नमस्कार,<br />
मज़ा आ गया&#8230;पूरे परिवार के साथ पढा़।<br />
हम जब २ दिन  कान्पुर मे थे तो आपकी याद आयी थी, लेकिन जीतू जी ने आपका फोन नम्बर बताया नही और हम इतने आलसी कि कभी आपसे पूछ्ने की जहमत नही उठायी।</p>
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