- ….जिंदगी का एक इतवार
- … बरसात, बिम्ब की तलाश और बेवकूफ़ी की बहस
- ….बरखा रानी जरा जम के बरसो
- …खोये आइडिये की तलाश में मगजमारी
- ….देश बड़ी इस्पीड में चल रहा है
- …एक घंटे की हवाई यात्रा
- यात्राओं में बेवकूफ़ियां चंद्रमा की कलाओं की तरह खिलती है
- …धरती को ठंडा रखने के कुछ अटपटे सुझाव
- ….दुनिया बड़ी डम्प्लाट है
- आपके विरोध में नियमित लिखने वाला ब्लागर आपके लिये बिना पैसे का प्रचारक है
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इससे बढिया भी कुछ मिला?
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मेरी टिप्पणी कि कडी!
[...] पाती फ़ुरसतिया जी की है. पहले तो वे चिट्ठी नाम की कहानी आपको पढ़वाते हैं, और फ [...]
[...] पाती फ़ुरसतिया जी की है. पहले तो वे चिट्ठी नाम की कहानी आपको पढ़वाते हैं, और फ [...]
इतनी अच्छी कहानी उपलब्ध कराने के लिए धन्यवाद देना भी बहुत छोटा लगता है। अगर परिप्रेक्ष्य बदल जाये तो कहानी आज के दौर पर भी लागू होती है।
पढने में बहुत आनन्द आया…अलग मनस्थितियों का बेहतरीन चित्रण…
[...] तियां-पांचा करते रहेंगे। बहरहाल! चिट्ठी कहानी मैंने कई बार पढ़ी थी। उसके पढ [...]
[...] त, मेरा पन्ना (पुराना), नुक्ताचीनी, फुरसतिया, हाँ भाई, आदि हैं। अंजन भूषण जी न [...]
चूतियापा है…खुद कुछ करना नहीं है….और रोजगार के नाम पर सरकार को कोसना है….तो कोसते रहिए…. हिन्दी वालों की मेन्टल बैंकरप्सी की तो
हद ही नहीं है…..
[...] [सुपरिचित कथाकार अखिलेश का नाम हिंदी कथा पाठकों के लिये जाना-पहचाना नाम है। उनकी कहानी चिट्ठी में देश के तमाम पढ़े-लिखे युवा अपने को या अपने परिवेश को किसी न किसी न रूप में मौजूद पाते हैं। अखिलेश का एक आत्मक्थ्य नुमा लेख मेरे पसंदीदा लेखों में हैं। प्रख्यात साहित्यिक कथापत्रिका, ‘कथादेश’, के फरवरी २००० के अंक में प्रकाशित यह लेख पत्रिका के नियमित स्तम्भ ‘मैं और मेरा समय’में छ्पा था। इस स्तम्भ के अंतर्गत प्रसिद्ध लेखकों के अपने समय के बारे में अनुभव व विचार प्रस्तुत किये जाते हैं। हिंदी ब्लाग जगत में जब सृजन शिल्पी के एक लेख पर संजय बेंगाणी पर की टिप्पणी पर लेख उस पर अमित का लेख और फिर नीरज दीवान का बड़ी मेहनत से लिखा विचारोत्तेजक लेख प्रकाशित हुआ तो मुझे एक बार फिर यह लेख बहुत याद आया। इसलिये मैं अखिलेशजी के इस लेख को यहां प्रस्तुत कर रहा हूं। आशा है कि लेख अपनी पर्याप्त लंबाई के बावजूद आपको पढ़ने और सोचने के लिये मजबूर करेगा] अखिलेश [...]
[...] लखनऊ में अखिलेश जी से भी मिलना हुआ। अखिलेश जी से मेरी पहली मुलाकात शाहजहांपुर में हुई थी। हृदयेशजी को पहल सम्मान मिला था। उसी सम्मान समारोह में शामिल होने वे शाहजहांपुर आये थे। कुछ ही दिन पहले मैंने उनकी कहानी चिट्ठी पढ़ी थी। इस कहानी के तमाम पात्र मुझे जाने-पहचाने लगे। जिस समय अखिलेश जी इलाहाबाद विश्वविद्यालय में थे उसी समय मैं वहां मोतीलाल नेहरू इंजीनियरिंग कालेज में था। लेकिन वहां मिलन-जुलन न हुआ। इलाहाबाद के पढ़े तमाम जो आजकल मुंबई में हैं उनमें से अधिकतर अखिलेश जी के बाद के हैं। इस कहानी में रघुराज का जिक्र भी आया है। अनिल भाई बतायें कि क्या उनसे कुछ लिंक है क्या इस कहानी का? [...]
[...] कथाकार अखिलेश का नाम हिंदी कथा पाठकों के लिये [...]
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me p jogarao apane pitaji ke kulpa ka chithi likhana chahata hu mere pithji shadhi shudha hote hu bhi dhusaru shadhi kar lee meri bhahan ke a/c me se pesee bhi nikal liya me chuch nahi kar pa raha hu aap hi chu bhataye