चिट्ठी

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

15 responses to “चिट्ठी”

  1. ई-स्वामी » यथार्थ का आक्रमण अचानक होता है!

    [...] ा यथार्थ का आक्रमण अचानक होता है! चिट्ठी, सचमुच अच्छी कहानी है! अखिलेशज [...]

  2. ई-स्वामी
  3. छींटे और बौछारें » 10 वीं अनुगूँज … आओ लिखें एक चिट्ठी…

    [...] पाती फ़ुरसतिया जी की है. पहले तो वे चिट्ठी नाम की कहानी आपको पढ़वाते हैं, और फ [...]

  4. अक्षरग्राम  » Blog Archive   » 10 वीं अनुगूँज … आओ लिखें एक चिट्ठी…

    [...] पाती फ़ुरसतिया जी की है. पहले तो वे चिट्ठी नाम की कहानी आपको पढ़वाते हैं, और फ [...]

  5. Atul

    इतनी अच्छी कहानी उपलब्ध कराने के लिए धन्यवाद देना भी बहुत छोटा लगता है। अगर परिप्रेक्ष्य बदल जाये तो कहानी आज के दौर पर भी लागू होती है।

  6. प्रत्यक्षा

    पढने में बहुत आनन्द आया…अलग मनस्थितियों का बेहतरीन चित्रण…

  7. फ़ुरसतिया » कहानी के आगे की कहानी

    [...] तियां-पांचा करते रहेंगे। बहरहाल! चिट्ठी कहानी मैंने कई बार पढ़ी थी। उसके पढ [...]

  8. इधर उधर की » आओ तो सही

    [...] त, मेरा पन्ना (पुराना), नुक्ताचीनी, फुरसतिया, हाँ भाई, आदि हैं। अंजन भूषण जी न [...]

  9. प्रत्यूष

    चूतियापा है…खुद कुछ करना नहीं है….और रोजगार के नाम पर सरकार को कोसना है….तो कोसते रहिए…. हिन्दी वालों की मेन्टल बैंकरप्सी की तो
    हद ही नहीं है…..

  10. फ़ुरसतिया » मनुष्य खत्म हो रहे हैं, वस्तुयें खिली हुई हैं

    [...] [सुपरिचित कथाकार अखिलेश का नाम हिंदी कथा पाठकों के लिये जाना-पहचाना नाम है। उनकी कहानी चिट्ठी में देश के तमाम पढ़े-लिखे युवा अपने को या अपने परिवेश को किसी न किसी न रूप में मौजूद पाते हैं। अखिलेश का एक आत्मक्थ्य नुमा लेख मेरे पसंदीदा लेखों में हैं। प्रख्यात साहित्यिक कथापत्रिका, ‘कथादेश’, के फरवरी २००० के अंक में प्रकाशित यह लेख पत्रिका के नियमित स्तम्भ ‘मैं और मेरा समय’में छ्पा था। इस स्तम्भ के अंतर्गत प्रसिद्ध लेखकों के अपने समय के बारे में अनुभव व विचार प्रस्तुत किये जाते हैं। हिंदी ब्लाग जगत में जब सृजन शिल्पी के एक लेख पर संजय बेंगाणी पर की टिप्पणी पर लेख उस पर अमित का लेख और फिर नीरज दीवान का बड़ी मेहनत से लिखा विचारोत्तेजक लेख प्रकाशित हुआ तो मुझे एक बार फिर यह लेख बहुत याद आया। इसलिये मैं अखिलेशजी के इस लेख को यहां प्रस्तुत कर रहा हूं। आशा है कि लेख अपनी पर्याप्त लंबाई के बावजूद आपको पढ़ने और सोचने के लिये मजबूर करेगा] अखिलेश [...]

  11. फुरसतिया » ब्लागिंग में अराजकता की सहज सम्भावनायें हैं

    [...] लखनऊ में अखिलेश जी से भी मिलना हुआ। अखिलेश जी से मेरी पहली मुलाकात शाहजहांपुर में हुई थी। हृदयेशजी को पहल सम्मान मिला था। उसी सम्मान समारोह में शामिल होने वे शाहजहांपुर आये थे। कुछ ही दिन पहले मैंने उनकी कहानी चिट्ठी पढ़ी थी। इस कहानी के तमाम पात्र मुझे जाने-पहचाने लगे। जिस समय अखिलेश जी इलाहाबाद विश्वविद्यालय में थे उसी समय मैं वहां मोतीलाल नेहरू इंजीनियरिंग कालेज में था। लेकिन वहां मिलन-जुलन न हुआ। इलाहाबाद के पढ़े तमाम जो आजकल मुंबई में हैं उनमें से अधिकतर अखिलेश जी के बाद के हैं। इस कहानी में रघुराज का जिक्र भी आया है। अनिल भाई बतायें कि क्या उनसे कुछ लिंक है क्या इस कहानी का? [...]

  12. मनुष्य खत्म हो रहे हैं, वस्तुयें खिली हुई हैं

    [...] कथाकार अखिलेश का नाम हिंदी कथा पाठकों के लिये [...]

  13. हम अपनी लड़ाईयां बिना लड़े हार रहे हैं

    [...] कथाकार अखिलेश का नाम हिंदी कथा पाठकों के लिये [...]

  14. मनुष्य खत्म हो रहे हैं, वस्तुयें खिली हुई हैं- अखिलेश

    [...] कथाकार अखिलेश का नाम हिंदी कथा पाठकों के लिये [...]

  15. jogarao

    me p jogarao apane pitaji ke kulpa ka chithi likhana chahata hu mere pithji shadhi shudha hote hu bhi dhusaru shadhi kar lee meri bhahan ke a/c me se pesee bhi nikal liya me chuch nahi kar pa raha hu aap hi chu bhataye

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