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	<title>Comments on: मेरे पिया गये रंगून</title>
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	<description>हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै?</description>
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		<title>By: फ़ुरसतिया-पुराने लेख</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/178/comment-page-1#comment-41687</link>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया-पुराने लेख</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 26 Jul 2009 07:32:26 +0000</pubDate>
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		<description>[...]  13. हरिशंकर परसाई- विनम्र श्रद्धांजलि 14. मेरे पिया गये रंगून  15. वो तो अपनी कहानी ले बैठा… [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...]  13. हरिशंकर परसाई- विनम्र श्रद्धांजलि 14. मेरे पिया गये रंगून  15. वो तो अपनी कहानी ले बैठा… [...]</p>
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		<title>By: भोला नाथ उपाध्याय</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/178/comment-page-1#comment-3541</link>
		<dc:creator>भोला नाथ उपाध्याय</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 26 Sep 2006 05:27:23 +0000</pubDate>
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		<description>विदेश प्रवास पर एक गम्भीर एवं विचार परक लेख लिखने के लिये कोटि कोटि साधुवाद स्वीकार करें ।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>विदेश प्रवास पर एक गम्भीर एवं विचार परक लेख लिखने के लिये कोटि कोटि साधुवाद स्वीकार करें ।</p>
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		<title>By: A beautiful hindi poem &#171; From Thoughts To Words</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/178/comment-page-1#comment-2941</link>
		<dc:creator>A beautiful hindi poem &#171; From Thoughts To Words</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 27 Aug 2006 21:37:51 +0000</pubDate>
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		<description>[...] courtsey : http://www.hindini.com/fursatiya/?p=178    &#160; [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] courtsey : <a href="http://www.hindini.com/fursatiya/?p=178" rel="nofollow">http://www.hindini.com/fursatiya/?p=178</a>    &nbsp; [...]</p>
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	<item>
		<title>By: फ़ुरसतिया &#187; अमरीका सुविधायें देकर हड्डियों में समा जाता है</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/178/comment-page-1#comment-2918</link>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया &#187; अमरीका सुविधायें देकर हड्डियों में समा जाता है</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 26 Aug 2006 19:56:27 +0000</pubDate>
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		<description>[...] [अतुल ने प्रवासी जीवन के बारे में लिखी मेरी पोस्ट में डा.अंजना संधीर की कविता ,अमरीका सुविधायें देकर हड्डियों में समा जाता है, का जिक्र किया था। इस कविता का अनुवाद अनेक भाषाओं में हो चुका है। अनूप भार्गव जी ने वह कविता मुझे भेजी है। मैं यहाँ पर डा. अंजना संधीर की कविता पोस्ट कर रहा हूँ-डा. अंजना संधीर तथा अनूप भार्गव जी को धन्यवाद देते हुये।] वे ऊँचे-ऊँचे खूबसूरत हाई-वे, जिन पर चलती हैं कारें, तेज रफ्तार से कतारबद्ध, चलती कार में चाय पीते-पीते, टेलीफोन करते, दूर-दूर कारों में रोमांस करते, अमरीका धीरे-धीरे सांसों में उतरने लगता है। [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] [अतुल ने प्रवासी जीवन के बारे में लिखी मेरी पोस्ट में डा.अंजना संधीर की कविता ,अमरीका सुविधायें देकर हड्डियों में समा जाता है, का जिक्र किया था। इस कविता का अनुवाद अनेक भाषाओं में हो चुका है। अनूप भार्गव जी ने वह कविता मुझे भेजी है। मैं यहाँ पर डा. अंजना संधीर की कविता पोस्ट कर रहा हूँ-डा. अंजना संधीर तथा अनूप भार्गव जी को धन्यवाद देते हुये।] वे ऊँचे-ऊँचे खूबसूरत हाई-वे, जिन पर चलती हैं कारें, तेज रफ्तार से कतारबद्ध, चलती कार में चाय पीते-पीते, टेलीफोन करते, दूर-दूर कारों में रोमांस करते, अमरीका धीरे-धीरे सांसों में उतरने लगता है। [...]</p>
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	<item>
		<title>By: अनूप भार्गव</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/178/comment-page-1#comment-2884</link>
		<dc:creator>अनूप भार्गव</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 24 Aug 2006 15:13:11 +0000</pubDate>
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		<description>एक संतुलित लेख के लिये बधाई । नन्दन जी की कविता बहुत गहराई लिये है । 
कुछ और विचार हैं इस विषय में, कभी फ़ुरसत से लिखेंगे। 

प्रवासी पीड़ा/दुविधा पर मेरी दो प्रिय कविताएं हैं । एक तो अंजना संधीर जी कि &quot; अमेरिका हड्डियों में जम जाता है&quot; जिस के विषय में अतुल और राकेश जी नें लिखा । दूसरी कविता डा. विनोद तिवारी जी की है जो आप काव्यालय पर पढ सकते हैं :
http://manaskriti.com/kaavyaalaya/pravaasee_geet.stm
मेरे पास ये दोनों कविताएं कवियों की स्वयं की आवाज़ में हैं (MP3 format) , अगर ज्ञानी जन मुझे बता सकें कि उसे किस तरह सब के साथ बाँटा जा सकता है तो मैं खुशी के साथ वह करनें को तैय्यार हूँ ।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>एक संतुलित लेख के लिये बधाई । नन्दन जी की कविता बहुत गहराई लिये है ।<br />
कुछ और विचार हैं इस विषय में, कभी फ़ुरसत से लिखेंगे। </p>
<p>प्रवासी पीड़ा/दुविधा पर मेरी दो प्रिय कविताएं हैं । एक तो अंजना संधीर जी कि &#8221; अमेरिका हड्डियों में जम जाता है&#8221; जिस के विषय में अतुल और राकेश जी नें लिखा । दूसरी कविता डा. विनोद तिवारी जी की है जो आप काव्यालय पर पढ सकते हैं :<br />
<a href="http://manaskriti.com/kaavyaalaya/pravaasee_geet.stm" rel="nofollow">http://manaskriti.com/kaavyaalaya/pravaasee_geet.stm</a><br />
मेरे पास ये दोनों कविताएं कवियों की स्वयं की आवाज़ में हैं (MP3 format) , अगर ज्ञानी जन मुझे बता सकें कि उसे किस तरह सब के साथ बाँटा जा सकता है तो मैं खुशी के साथ वह करनें को तैय्यार हूँ ।</p>
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	<item>
		<title>By: अतुल</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/178/comment-page-1#comment-2874</link>
		<dc:creator>अतुल</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 23 Aug 2006 20:01:19 +0000</pubDate>
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		<description>राकेश जी, नेकी और पूछ पूछ!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>राकेश जी, नेकी और पूछ पूछ!</p>
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	<item>
		<title>By: जीतू</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/178/comment-page-1#comment-2872</link>
		<dc:creator>जीतू</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 23 Aug 2006 16:06:31 +0000</pubDate>
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		<description>[blockquote]अतुलजी की टिप्पणी में जिस कविता का जिक्र है वह न्यूयार्क में रहने वाली डा० अंजना संधीर की लिखी हुई रचना है अगर आप चाहें तो यह आपको उपलब्ध कराई जा सकती है -राकेश खंडेलवाल [/blockquote]

राकेश भाई, नेकी और पूछ पूछ, यार चिपका दो, यहाँ या फिर अपने ब्लॉग पर। अतुल के साथ साथ बाकी लोग भी पढकर खुश हो लेंगे।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[blockquote]अतुलजी की टिप्पणी में जिस कविता का जिक्र है वह न्यूयार्क में रहने वाली डा० अंजना संधीर की लिखी हुई रचना है अगर आप चाहें तो यह आपको उपलब्ध कराई जा सकती है -राकेश खंडेलवाल [/blockquote]</p>
<p>राकेश भाई, नेकी और पूछ पूछ, यार चिपका दो, यहाँ या फिर अपने ब्लॉग पर। अतुल के साथ साथ बाकी लोग भी पढकर खुश हो लेंगे।</p>
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	<item>
		<title>By: राकेश खंडेलवाल</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/178/comment-page-1#comment-2871</link>
		<dc:creator>राकेश खंडेलवाल</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 23 Aug 2006 14:19:23 +0000</pubDate>
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		<description>अतुलजी की टिप्पणी में जिस कविता का जिक्र है वह न्यूयार्क में रहने वाली 
डा० अंजना संधीर की लिखी हुई  रचना है अगर आप चाहें तो यह आपको उपलब्ध कराई जा सकती है</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अतुलजी की टिप्पणी में जिस कविता का जिक्र है वह न्यूयार्क में रहने वाली<br />
डा० अंजना संधीर की लिखी हुई  रचना है अगर आप चाहें तो यह आपको उपलब्ध कराई जा सकती है</p>
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	<item>
		<title>By: राकेश खंडेलवाल</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/178/comment-page-1#comment-2870</link>
		<dc:creator>राकेश खंडेलवाल</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 23 Aug 2006 14:15:55 +0000</pubDate>
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		<description>याद है
तुमने कहा था
घाटियों के पार
सूरज की किरन का देश है
और मैं
रब से यह सोच रहा हूँ
कि मैं
घाटियों के
इस पार हूँ या उस पार</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>याद है<br />
तुमने कहा था<br />
घाटियों के पार<br />
सूरज की किरन का देश है<br />
और मैं<br />
रब से यह सोच रहा हूँ<br />
कि मैं<br />
घाटियों के<br />
इस पार हूँ या उस पार</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: हिमांशु</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/178/comment-page-1#comment-2869</link>
		<dc:creator>हिमांशु</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 23 Aug 2006 14:07:49 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://hindini.com/fursatiya/?p=178#comment-2869</guid>
		<description>हर व्यक्ति कुछ बेहतर की चाह में गाँव से छोटे शहर और फिर बडे शहर और फिर महानगर और फिर विदेश की और खिंचता रहता है। माँ-बाप इस चाह में बच्चों को ढकेलते रहते हैं कि जो वो ना कर पाये, बच्चे करें। बाकी सब शब्दों के खेल हैं और सब के पास इतना दिमाग है कि जब चाहा अपना नया &#039;सच&#039; बना लें। 
अब जब से दिमाग ने कुछ सोचना-समझना प्रारम्भ किया है मेरी सोच बदली है। आगे पढें...
मेरा ये सोचना है कि, अगर मैं जिस ज़मीं पर पैदा हुआ, पला-बढा पर उसे भूल जाऊं तो यह अहसान-फ़रमोशी होगी। मनुष्य भी किसी जगह के प्राकृतिक उत्पाद है, फल, अनाज, पानी, खनिज की तरह। मेरा अनुभव है कि उस जगह की प्रगति में योगदान आवश्यक ही नहीं वरन एक ऐसा कार्य है जो ऐकाकी/स्वार्थी जीवन की नीरसता को तोडता है और तनाव घटाता है। 

भारत पैसा भेजने के बारे में: हाँ, गत एक वर्ष से मैं जो भी पैसा-धेला कमाता हूं उसका २-३% नि:स्वार्थ समाज के लिये होता है, मुख्यत: भारत के उस स्थान के लिये जहाँ मैं पला-बढा। सर्वमान्य ग्रन्धों मे और सन्त-जनों/बुद्धिजीवियों की बातों में ऐसा करना जरूरी बताया गया है।
साथ ही मेरे समय का २-३% (जो हुआ १ घण्टा हर सप्ताह) भी सामजिक कार्यों को जाता है। अमरीका में साल में २००० घण्टों का कार्य समय माना जाता है। 

दूरी सिर्फ़ दिलों में होती है। &quot; वसुधैव कुटुम्बकम &quot; भूल गये? वेदों में मैंने पढा है कि शिक्षित लोगों को यात्राओं से परहेज नहीं करना चाहिये। मैं मानता हूं कि यात्रा और नई जगहों पर रहने के कारण मैंने बहुत कुछ सीखा है और अपने आप को कर्म-योगी बना पाने की दिशा में कुछ कर पाया हूँ जो मैं एक जगह पर रहकर कभी नहीं कर पाता।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>हर व्यक्ति कुछ बेहतर की चाह में गाँव से छोटे शहर और फिर बडे शहर और फिर महानगर और फिर विदेश की और खिंचता रहता है। माँ-बाप इस चाह में बच्चों को ढकेलते रहते हैं कि जो वो ना कर पाये, बच्चे करें। बाकी सब शब्दों के खेल हैं और सब के पास इतना दिमाग है कि जब चाहा अपना नया &#8216;सच&#8217; बना लें।<br />
अब जब से दिमाग ने कुछ सोचना-समझना प्रारम्भ किया है मेरी सोच बदली है। आगे पढें&#8230;<br />
मेरा ये सोचना है कि, अगर मैं जिस ज़मीं पर पैदा हुआ, पला-बढा पर उसे भूल जाऊं तो यह अहसान-फ़रमोशी होगी। मनुष्य भी किसी जगह के प्राकृतिक उत्पाद है, फल, अनाज, पानी, खनिज की तरह। मेरा अनुभव है कि उस जगह की प्रगति में योगदान आवश्यक ही नहीं वरन एक ऐसा कार्य है जो ऐकाकी/स्वार्थी जीवन की नीरसता को तोडता है और तनाव घटाता है। </p>
<p>भारत पैसा भेजने के बारे में: हाँ, गत एक वर्ष से मैं जो भी पैसा-धेला कमाता हूं उसका २-३% नि:स्वार्थ समाज के लिये होता है, मुख्यत: भारत के उस स्थान के लिये जहाँ मैं पला-बढा। सर्वमान्य ग्रन्धों मे और सन्त-जनों/बुद्धिजीवियों की बातों में ऐसा करना जरूरी बताया गया है।<br />
साथ ही मेरे समय का २-३% (जो हुआ १ घण्टा हर सप्ताह) भी सामजिक कार्यों को जाता है। अमरीका में साल में २००० घण्टों का कार्य समय माना जाता है। </p>
<p>दूरी सिर्फ़ दिलों में होती है। &#8221; वसुधैव कुटुम्बकम &#8221; भूल गये? वेदों में मैंने पढा है कि शिक्षित लोगों को यात्राओं से परहेज नहीं करना चाहिये। मैं मानता हूं कि यात्रा और नई जगहों पर रहने के कारण मैंने बहुत कुछ सीखा है और अपने आप को कर्म-योगी बना पाने की दिशा में कुछ कर पाया हूँ जो मैं एक जगह पर रहकर कभी नहीं कर पाता।</p>
]]></content:encoded>
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