मैं ,
अक्सर,
एक गौरैया के बारे में सोचता हूं,
वह कहाँ रहती है -कुछ पता नहीं।
खैर, कहीं सोच लें,
किसी पिजरें में-
या किसी घोसले में,
कुछ फर्क नहीं पड़ता।
गौरैया ,
अपनी बच्ची के साथ,
दूर-दूर तक फैले आसमान को,
टुकुर-टुकुर ताकती है।
कभी-कभी,
पिंजरे की तीली,
फैलाती,खींचती -
खटखटाती है ।
दाना-पानी के बाद,
चुपचाप सो जाती है -
तनाव ,चिन्ता ,खीझ से मुक्त,
सिर्फ एक थकन भरी नींद।
जब कभी मुनियाँ चिंचिंयाती है,
गौरैया -
उसे अपने आंचल में समेट लेती है,
प्यार से ,दुलार से।
कभी-कभी मुनिया गौरैया से कहती होगी -
अम्मा ये दरवाजा खुला है,
आओ इससे बाहर निकल चलें,
खुले आसमान में जी भर उड़ें।
इस पर गौरैया उसे,
झपटकर डपट देती होगी-
खबरदार, जो ऐसा फिर कभी सोचा,
ऐसा पहले कभी नहीं हुआ।
Popularity: 5% [?]





क
ringtone
ringtone And what a snow-pass vestures it, ringtone and secret-place to be target-shooting danger from frasers gray-stone people! It has
[...] आज मेरी पसंद में, महिला दिवस के अवसर पर, अपनी एक पुरानी कविता पोस्ट कर रहा हूं। यह कविता मैंने करीब बीस साल पहले लिखी थी लेकिन मुझे लगता है कि आज भी यह समाज के एक बड़े हिस्से का सच है। मेरी पसंद मैं , अक्सर, एक गौरैया के बारे में सोचता हूं, वह कहाँ रहती है -कुछ पता नहीं। [...]
प्रविष्टि की तारीख देखता हूँ, मई २००५….और फिर कविता पढ़ने लगता हूँ। वैसे आज मुझे पढ़ना नहीं चाहिये था इसे, क्योंकि अभी “ओस की बूंद” का जादू घेरे हुये है। लेकिन फुरसत से हूँ अभी “फुरसतिय” पे।
और अब इस कविता को पढ़कर सोच रहा हूँ कि हर हमेशा मौज लेने वाले, परसाई के व्यंग्य और हँसी-मजाक के जुमले बिखेरने वाले फुरसतिया के इस रूप की जानकारी जाने कितने लोगों को होगी…???
…वो अभी जो “पत्नि” वाला लिंक था, वो कोई दूसरा ब्लौग है क्या आपका? क्योंकि उसका ले-आउट कुछ दूसरा था
हाँ, आज भी यही सच है।
घुघूती बासूती
[...] इस पर गौरैया उसे, झपटकर डपट देती होगी- खबरदार, जो ऐसा फिर कभी सोचा, ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। अनूप शुक्ल [...]
[...] पति एक आइटम होता है 2. गुरु गुन लिखा न जाये… 3. मेरा पन्ना के [...]
‘ऐसा पहले कभी नहीं हुआ’–एक ब्रह्मवाक्य जो शताब्दियों से डुबाये रखने के लिए काफ़ी है…
चंदन कुमार मिश्र की हालिया प्रविष्टी..इधर से गुजरा था सोचा सलाम करता चलूँ…