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	<title>Comments on: गुरु गुन लिखा न जाये&#8230;</title>
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	<description>हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै?</description>
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		<title>By: फुरसतिया &#187; फ़ुरसतिया-पुराने लेख</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/185/comment-page-1#comment-9397</link>
		<dc:creator>फुरसतिया &#187; फ़ुरसतिया-पुराने लेख</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 12 May 2007 18:58:09 +0000</pubDate>
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		<description>[...] 1.  पति एक आइटम होता है 2.  गुरु गुन लिखा न जाये… 3.  मेरा पन्ना के दो साल-जियो मेरे लाल 4.  गालिब भी गये थे कलकत्ता… 5.  मजाक,मजाक में हिंदी दिवस 6.  अनूप भार्गव सम्मानित 7.  …अथ लखनऊ भेंटवार्ता कथा 8. फप्सी हाट में कविता का ठाठ  9.  चाह गयी चिंता मिटी… 10. चिट्ठा चर्चा के बहाने पुस्तक चर्चा [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] 1.  पति एक आइटम होता है 2.  गुरु गुन लिखा न जाये… 3.  मेरा पन्ना के दो साल-जियो मेरे लाल 4.  गालिब भी गये थे कलकत्ता… 5.  मजाक,मजाक में हिंदी दिवस 6.  अनूप भार्गव सम्मानित 7.  …अथ लखनऊ भेंटवार्ता कथा 8. फप्सी हाट में कविता का ठाठ  9.  चाह गयी चिंता मिटी… 10. चिट्ठा चर्चा के बहाने पुस्तक चर्चा [...]</p>
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		<title>By: अनिल शर्मा</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/185/comment-page-1#comment-3124</link>
		<dc:creator>अनिल शर्मा</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 06 Sep 2006 09:39:49 +0000</pubDate>
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		<description>अनुप शुक्ला जी का ये आलेख दिल को अहसास कराने बाला चित्रन है. आज न तो पह्ले जैसै गुरु जी है न वो आदर है.मै धन्यवाद देता हू इस सुन्दर आलेख पर.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अनुप शुक्ला जी का ये आलेख दिल को अहसास कराने बाला चित्रन है. आज न तो पह्ले जैसै गुरु जी है न वो आदर है.मै धन्यवाद देता हू इस सुन्दर आलेख पर.</p>
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		<title>By: DesiPundit &#187; Archives &#187; काके लागूँ पाय</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/185/comment-page-1#comment-3114</link>
		<dc:creator>DesiPundit &#187; Archives &#187; काके लागूँ पाय</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 05 Sep 2006 17:00:54 +0000</pubDate>
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		<description>[...] शिक्षक दिवस पर चिट्ठाजगत अपने गुरुओं को नमन कर रहा है. आशीष याद कर रहे हैं अपने टाटी गुरू को. प्रत्यक्षा अपने स्कूल को याद कर रही हैं. और फ़ुरसतिया का कहना है गुरु गुन लिखा न जाय. [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] शिक्षक दिवस पर चिट्ठाजगत अपने गुरुओं को नमन कर रहा है. आशीष याद कर रहे हैं अपने टाटी गुरू को. प्रत्यक्षा अपने स्कूल को याद कर रही हैं. और फ़ुरसतिया का कहना है गुरु गुन लिखा न जाय. [...]</p>
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		<title>By: प्रियंकर</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/185/comment-page-1#comment-3111</link>
		<dc:creator>प्रियंकर</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 05 Sep 2006 13:35:39 +0000</pubDate>
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		<description>वाह ! मुझे लगा मैं अपना लिखा पढ़ रहा हूं . वही भूगोल , वही सांस्कृतिक-सामाजिक पृष्ठभूमि , वही परिवेश और वही कस्बाई-जनपदीय जीवन . सिर्फ़ कुछ व्यक्तिवाचक संज्ञाएं बदल दें तो यही तो मेरा  भी बचपन है. तो &#039;गुरु गुन लिखा न जाए&#039; के जरिये अपना बचपन फ़िर से जिया . 
 फ़ुरसतिया पंडित , आभार !

 पुनश्च :  &#039;गुरु जी जहां बैठूं वहां छाया दे&#039;  
           --  कुमार गंधर्व का गाया कबीर का यह पद याद आ रहा है .</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>वाह ! मुझे लगा मैं अपना लिखा पढ़ रहा हूं . वही भूगोल , वही सांस्कृतिक-सामाजिक पृष्ठभूमि , वही परिवेश और वही कस्बाई-जनपदीय जीवन . सिर्फ़ कुछ व्यक्तिवाचक संज्ञाएं बदल दें तो यही तो मेरा  भी बचपन है. तो &#8216;गुरु गुन लिखा न जाए&#8217; के जरिये अपना बचपन फ़िर से जिया .<br />
 फ़ुरसतिया पंडित , आभार !</p>
<p> पुनश्च :  &#8216;गुरु जी जहां बैठूं वहां छाया दे&#8217;<br />
           &#8212;  कुमार गंधर्व का गाया कबीर का यह पद याद आ रहा है .</p>
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		<title>By: rachana</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/185/comment-page-1#comment-3107</link>
		<dc:creator>rachana</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 05 Sep 2006 09:28:45 +0000</pubDate>
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		<description>आप हिन्दी चिट्ठाकारोँ के गुरूदेव हैँ..हमारा भी प्रणाम स्वीकार कर लेँ.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आप हिन्दी चिट्ठाकारोँ के गुरूदेव हैँ..हमारा भी प्रणाम स्वीकार कर लेँ.</p>
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	<item>
		<title>By: प्रत्यक्षा</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/185/comment-page-1#comment-3103</link>
		<dc:creator>प्रत्यक्षा</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 05 Sep 2006 04:52:59 +0000</pubDate>
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		<description>संस्मरण बढिया लिखा । बचपन के दिन भी क्या दिन थे , ये बडे होने के बाद ही पता चलता है ।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>संस्मरण बढिया लिखा । बचपन के दिन भी क्या दिन थे , ये बडे होने के बाद ही पता चलता है ।</p>
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	<item>
		<title>By: आशीष</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/185/comment-page-1#comment-3101</link>
		<dc:creator>आशीष</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 05 Sep 2006 03:33:25 +0000</pubDate>
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		<description>मेरठ, उज्जैन जैसी घटनाओ के बारे मे जब मै पढता हूं , तो मै अपने अतीत की ओर देखता हूं। समझ नही पाता ऐसा क्या परिवर्तन आ गया है ?

प्राथमिक से लेकर १२ वी तक के मेरे जितने भी शिक्षक थे, उनके आज भी हम(ना केवल मै मेरे अधिकतर सहपाठी) चरण छुते है। जबकि ये वह शिक्षक थे, जो गलती करने पर घंटो मुर्गा बनाकर रखते थे, अधिकतर शिक्षको के पास एक रूल(लकडी का एक फुट का डंडा) होता था। सजा देने मे कोई कोताही नही बरती जाती थी।
लेकिन शिक्षको के सम्मान मे कोई कमी नही होती थी। 
उद्दंड से उद्दंड छात्रो को जो लडाई झगडो मे सबसे आगे रहते थे, किसी का सर फोड देना जिनके लिये आम बात होती थी, उन्हे भी मैने शिक्षको की दी सजा को सर झुका कर स्वीकार करते देखा है। मेरा ये अनुभव ज्यादा पूराना भी नही यही कोई दस साल पूराना है। मैने कालेज १९९७ मे खत्म किया है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मेरठ, उज्जैन जैसी घटनाओ के बारे मे जब मै पढता हूं , तो मै अपने अतीत की ओर देखता हूं। समझ नही पाता ऐसा क्या परिवर्तन आ गया है ?</p>
<p>प्राथमिक से लेकर १२ वी तक के मेरे जितने भी शिक्षक थे, उनके आज भी हम(ना केवल मै मेरे अधिकतर सहपाठी) चरण छुते है। जबकि ये वह शिक्षक थे, जो गलती करने पर घंटो मुर्गा बनाकर रखते थे, अधिकतर शिक्षको के पास एक रूल(लकडी का एक फुट का डंडा) होता था। सजा देने मे कोई कोताही नही बरती जाती थी।<br />
लेकिन शिक्षको के सम्मान मे कोई कमी नही होती थी।<br />
उद्दंड से उद्दंड छात्रो को जो लडाई झगडो मे सबसे आगे रहते थे, किसी का सर फोड देना जिनके लिये आम बात होती थी, उन्हे भी मैने शिक्षको की दी सजा को सर झुका कर स्वीकार करते देखा है। मेरा ये अनुभव ज्यादा पूराना भी नही यही कोई दस साल पूराना है। मैने कालेज १९९७ मे खत्म किया है।</p>
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		<title>By: प्रमेन्‍द्र प्रताप सिंह</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/185/comment-page-1#comment-3100</link>
		<dc:creator>प्रमेन्‍द्र प्रताप सिंह</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 05 Sep 2006 02:37:47 +0000</pubDate>
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		<description>आज शिक्षक दिवस है, यह लेख शिक्षको के प्रति विद्यार्थियो के सम्‍मान को दर्शाता है, मैने आपने जीवन मे कई विद्यालय शिक्षा प्राप्‍त की। कानपुर मे मैने कक्षा 3 तक की शिक्षा प्राप्‍त की तथा आज तक की शिक्षा मैने इलाहाबाद के विभिन्‍न स्‍कूलो मे पढा। मुझे कान पुर के कोई शिक्षक याद नही है उनको भी प्राणम हां मै जब से इला‍हाबाद मे पढ रहा हू तो कक्षा 4और5 मे शुष्‍मा,रूमा और ऊषा मिस याद आती है। सरस्‍वती विद्या मन्दिर जूनियर हाई तक मे मात्र चार अध्‍यापको को सनिघ्‍य मिला वे सभी वहुत अच्‍छे थे उनके नाम थे ब्रह्मदेव सिंह, भूपेन्‍द्र शुक्‍ल जी, हरेराम जी तथा ज्ञानेन्‍द्र पाडे जी है। हाईस्‍कूल मे स्‍तर मे विशेष्‍ा रूप से किसी शिक्षक का मुझे ज्‍यादा प्रिय नही रहे जो रहे उनके नाम है केदार नाथ जी, सुरेश जी, गुलाब जी, लक्ष्‍मी जी, जेपी सिंहजी तथा नागेन्‍द्र जी।
इण्‍टर मे मैने पहली बार किसी सरकारी स्‍कूल कलेज मे पाव रखा मगर यह मेरे जीवन को सबसे परिर्वतन भरा दो साल रहा मेरे तीन अध्‍यापक श्री जी0 पी0 सिंह जी नागरिक शास्‍त्र,शारदा प्रसाद जी अर्थशास्‍त्र तथा राजेन्‍द्र प्रसाद गौड जी संस्‍कृत का मेरे प्रिय अध्‍यापक रहे। जीपी सिंह जी बारे मे एक तथ्‍य पूरे स्‍कूल मे मुझे ही मालूम था यह कि उनका पूरा नाम क्‍या था घूर फेकन तिवारी मै दो साल तक विद्यालय मे रहा मगर मैने किसी भी मित्र को यह नही बताया कि उनका पूरा नाम क्‍या है तथा कई अध्‍यापक भी उनका नाम नही जानते थे। शारदा सर ये एक माली है शिक्षक होते हुये भी अपना पैत्रिक काम को नही छोडा आज भी शाम को ललिता देवी मन्दिर मे फूल बेचते दिखेगे पर पढाई के आगे कर्म तथा कर्म के आगे पढाई कभी आडे आने नही दिया। राजेन्‍द्र प्रसाद जी मेरे सबसे प्रिय ये भी पेशे से पडित है बहुत ही अच्‍छे है ये भी एक हमारे यहां 8 पीरियडमे से 5 सव्‍जेक्‍ट हो ने के कारण 5 ही चलते थे मेरे पहला तथा दूसरा पीरियड खाली रहता था जब भी मै जाता था तो वे मुझे एक्‍ट्रा पढते थे। एक बार की बात है मैने पएने के लिये गया शायद वे व्‍यक्ति गत कारण से परेशान थे और वे मुझसे बिगड गये मेरे पाय कोई काम नही है बस तुम्‍हारे लिये ही मै हू मै नही पढउगा। मेरे आख से आसू आगाये पर अगले दिन मै नही गया तो उन्‍होने मुझे बुला कर गले लगा लिया। शारदा जी और गौड जी के कारण मेरा स्‍नातक विषय अर्थशास्‍त्र और संस्‍कृत रहा।
स्‍नातक प्रतेयेक व्‍यकित्‍ा के लिये महत्‍वपूर्ण होता है हिन्‍दी तो मेरा प्रिय नही रहा पर मरे प्रिय अध्‍यपक रहे चन्‍दा देव संस्‍कृत के अध्‍यपक रहे विभागाघ्‍यक्ष मृदुला जी, केके श्रीवास्‍तव, एसडी द्विवेदी तथा अर्थशास्‍त्र के श्री मनमोहन कृष्‍ण, विभागाध्‍यक्ष पीएन मल्‍होत्रा, चतुवेदी सर, जैन सर और किरण सिंह।
कुछ खट्टी मीठी यादो के साथ सभी शिक्षको को नमन तथा सभी लोगो को इस दिवस की बधाई। 
चलते चलते उज्‍जैन की याद आगयी हम जैसे विद्यार्थियो के लिये इससे बडा राष्‍ट्रीय शर्म और क्‍या होगा कि एक शिक्षक को शिष्‍यो ने हि पीट पीट कर मार डाला। मृतक शिक्षक प्रो. हरभजन सिंह सभरवाल को श्रृद्धाजंली</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आज शिक्षक दिवस है, यह लेख शिक्षको के प्रति विद्यार्थियो के सम्‍मान को दर्शाता है, मैने आपने जीवन मे कई विद्यालय शिक्षा प्राप्‍त की। कानपुर मे मैने कक्षा 3 तक की शिक्षा प्राप्‍त की तथा आज तक की शिक्षा मैने इलाहाबाद के विभिन्‍न स्‍कूलो मे पढा। मुझे कान पुर के कोई शिक्षक याद नही है उनको भी प्राणम हां मै जब से इला‍हाबाद मे पढ रहा हू तो कक्षा 4और5 मे शुष्‍मा,रूमा और ऊषा मिस याद आती है। सरस्‍वती विद्या मन्दिर जूनियर हाई तक मे मात्र चार अध्‍यापको को सनिघ्‍य मिला वे सभी वहुत अच्‍छे थे उनके नाम थे ब्रह्मदेव सिंह, भूपेन्‍द्र शुक्‍ल जी, हरेराम जी तथा ज्ञानेन्‍द्र पाडे जी है। हाईस्‍कूल मे स्‍तर मे विशेष्‍ा रूप से किसी शिक्षक का मुझे ज्‍यादा प्रिय नही रहे जो रहे उनके नाम है केदार नाथ जी, सुरेश जी, गुलाब जी, लक्ष्‍मी जी, जेपी सिंहजी तथा नागेन्‍द्र जी।<br />
इण्‍टर मे मैने पहली बार किसी सरकारी स्‍कूल कलेज मे पाव रखा मगर यह मेरे जीवन को सबसे परिर्वतन भरा दो साल रहा मेरे तीन अध्‍यापक श्री जी0 पी0 सिंह जी नागरिक शास्‍त्र,शारदा प्रसाद जी अर्थशास्‍त्र तथा राजेन्‍द्र प्रसाद गौड जी संस्‍कृत का मेरे प्रिय अध्‍यापक रहे। जीपी सिंह जी बारे मे एक तथ्‍य पूरे स्‍कूल मे मुझे ही मालूम था यह कि उनका पूरा नाम क्‍या था घूर फेकन तिवारी मै दो साल तक विद्यालय मे रहा मगर मैने किसी भी मित्र को यह नही बताया कि उनका पूरा नाम क्‍या है तथा कई अध्‍यापक भी उनका नाम नही जानते थे। शारदा सर ये एक माली है शिक्षक होते हुये भी अपना पैत्रिक काम को नही छोडा आज भी शाम को ललिता देवी मन्दिर मे फूल बेचते दिखेगे पर पढाई के आगे कर्म तथा कर्म के आगे पढाई कभी आडे आने नही दिया। राजेन्‍द्र प्रसाद जी मेरे सबसे प्रिय ये भी पेशे से पडित है बहुत ही अच्‍छे है ये भी एक हमारे यहां 8 पीरियडमे से 5 सव्‍जेक्‍ट हो ने के कारण 5 ही चलते थे मेरे पहला तथा दूसरा पीरियड खाली रहता था जब भी मै जाता था तो वे मुझे एक्‍ट्रा पढते थे। एक बार की बात है मैने पएने के लिये गया शायद वे व्‍यक्ति गत कारण से परेशान थे और वे मुझसे बिगड गये मेरे पाय कोई काम नही है बस तुम्‍हारे लिये ही मै हू मै नही पढउगा। मेरे आख से आसू आगाये पर अगले दिन मै नही गया तो उन्‍होने मुझे बुला कर गले लगा लिया। शारदा जी और गौड जी के कारण मेरा स्‍नातक विषय अर्थशास्‍त्र और संस्‍कृत रहा।<br />
स्‍नातक प्रतेयेक व्‍यकित्‍ा के लिये महत्‍वपूर्ण होता है हिन्‍दी तो मेरा प्रिय नही रहा पर मरे प्रिय अध्‍यपक रहे चन्‍दा देव संस्‍कृत के अध्‍यपक रहे विभागाघ्‍यक्ष मृदुला जी, केके श्रीवास्‍तव, एसडी द्विवेदी तथा अर्थशास्‍त्र के श्री मनमोहन कृष्‍ण, विभागाध्‍यक्ष पीएन मल्‍होत्रा, चतुवेदी सर, जैन सर और किरण सिंह।<br />
कुछ खट्टी मीठी यादो के साथ सभी शिक्षको को नमन तथा सभी लोगो को इस दिवस की बधाई।<br />
चलते चलते उज्‍जैन की याद आगयी हम जैसे विद्यार्थियो के लिये इससे बडा राष्‍ट्रीय शर्म और क्‍या होगा कि एक शिक्षक को शिष्‍यो ने हि पीट पीट कर मार डाला। मृतक शिक्षक प्रो. हरभजन सिंह सभरवाल को श्रृद्धाजंली</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: ratna</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/185/comment-page-1#comment-3098</link>
		<dc:creator>ratna</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 05 Sep 2006 01:49:05 +0000</pubDate>
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		<description>गुरू गोबिन्द दोनों खड़े काके लागूं पाए
बलिहारी गुरू आपणे गोबिन्द दियो मिलाए</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>गुरू गोबिन्द दोनों खड़े काके लागूं पाए<br />
बलिहारी गुरू आपणे गोबिन्द दियो मिलाए</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: समीर लाल</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/185/comment-page-1#comment-3096</link>
		<dc:creator>समीर लाल</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 05 Sep 2006 01:30:07 +0000</pubDate>
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		<description>&quot;बीतते समय के साथ क्या बच्चों के प्रति प्यार,लगाव बढ़ गया है या आर्थिक बेहतरी का मानसिक असुरक्षा भावना से कुछ संबंध है?&quot; 

मेरे मत मे दोनो का ही योगदान कुछ आवश्यकता से अधिक मात्रा मे है.

शिक्षक दिवस के अवसर पर इतने सुंदर लेख के लिये बधाई एवं समस्त गुरुजनों को हार्दिक नमन.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>&#8220;बीतते समय के साथ क्या बच्चों के प्रति प्यार,लगाव बढ़ गया है या आर्थिक बेहतरी का मानसिक असुरक्षा भावना से कुछ संबंध है?&#8221; </p>
<p>मेरे मत मे दोनो का ही योगदान कुछ आवश्यकता से अधिक मात्रा मे है.</p>
<p>शिक्षक दिवस के अवसर पर इतने सुंदर लेख के लिये बधाई एवं समस्त गुरुजनों को हार्दिक नमन.</p>
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