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	<title>Comments on: मजाक,मजाक में हिंदी दिवस</title>
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	<description>हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै?</description>
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		<title>By: kali</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/188/comment-page-1#comment-3352</link>
		<dc:creator>kali</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 17 Sep 2006 11:50:24 +0000</pubDate>
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		<description>आप मजाक मजाक में सब कथा व्यथा बता गऍ. स्वामी बिना मजाक के उपाय गिना गऍ. हम भी मजाक मजाक में नारद से आषीष नारायण की शरण में चले गऍ.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आप मजाक मजाक में सब कथा व्यथा बता गऍ. स्वामी बिना मजाक के उपाय गिना गऍ. हम भी मजाक मजाक में नारद से आषीष नारायण की शरण में चले गऍ.</p>
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		<title>By: जीतू</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/188/comment-page-1#comment-3348</link>
		<dc:creator>जीतू</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 17 Sep 2006 06:49:23 +0000</pubDate>
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		<description>हिन्दी लेखन मे अपार सम्भावनाएं है, इन्टरनैट के आने से प्रकाशक वर्ग बीच से निकल गया इसलिए दोहन का भी खतरा नही।

आज जरुरत है तकनीक और लेखन के तालमेल की। जो लोग ब्लॉग लिखते है, लगभग सभी तकनीकी लोग है। जो लोग लेखन के क्षेत्र से आएं है उन्हे तकनीकी रुप से स्वावलम्बी होना ही पड़ेगा। ये वक्त की जरुरत है। 

रही बात पैसा कमाने की, विज्ञापनों को एक किनारे करिए, कन्टेन्ट से ही वारे न्यारे हो सकते है। बशर्ते लेखनी मे दम हो। सम्भावनाएं अपार है।

लेकिन हम लोग आपसे मे इतनी पिल्लम पिल्ली काहे कर रहे है? वक्त बदल रहा है, लोग भी बदलेंगे। समय के साथ साथ सब कुछ ठीक हो जाएगा।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>हिन्दी लेखन मे अपार सम्भावनाएं है, इन्टरनैट के आने से प्रकाशक वर्ग बीच से निकल गया इसलिए दोहन का भी खतरा नही।</p>
<p>आज जरुरत है तकनीक और लेखन के तालमेल की। जो लोग ब्लॉग लिखते है, लगभग सभी तकनीकी लोग है। जो लोग लेखन के क्षेत्र से आएं है उन्हे तकनीकी रुप से स्वावलम्बी होना ही पड़ेगा। ये वक्त की जरुरत है। </p>
<p>रही बात पैसा कमाने की, विज्ञापनों को एक किनारे करिए, कन्टेन्ट से ही वारे न्यारे हो सकते है। बशर्ते लेखनी मे दम हो। सम्भावनाएं अपार है।</p>
<p>लेकिन हम लोग आपसे मे इतनी पिल्लम पिल्ली काहे कर रहे है? वक्त बदल रहा है, लोग भी बदलेंगे। समय के साथ साथ सब कुछ ठीक हो जाएगा।</p>
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	<item>
		<title>By: रवि</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/188/comment-page-1#comment-3323</link>
		<dc:creator>रवि</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 15 Sep 2006 16:51:07 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://hindini.com/fursatiya/?p=188#comment-3323</guid>
		<description>...हिन्दी में लिखने वालों को इंटरनेट की संभावनाओं और ई-कॉमर्स की तरकीबों का दोहन करने की कला सीखनी पड़ेगी। आदर्शवाद और सेवा भावना के साथ-साथ व्यावहारिकता एवं व्यावसायिकता को अपनाना कोई ओझी बात नहीं है।...

यही तो मेरा भी कहना है. परंतु शायद मैं ठीक से नहीं कह पाया था. और शायद लोग भी इसी वजह से समझ नहीं पा रहे थे.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>&#8230;हिन्दी में लिखने वालों को इंटरनेट की संभावनाओं और ई-कॉमर्स की तरकीबों का दोहन करने की कला सीखनी पड़ेगी। आदर्शवाद और सेवा भावना के साथ-साथ व्यावहारिकता एवं व्यावसायिकता को अपनाना कोई ओझी बात नहीं है।&#8230;</p>
<p>यही तो मेरा भी कहना है. परंतु शायद मैं ठीक से नहीं कह पाया था. और शायद लोग भी इसी वजह से समझ नहीं पा रहे थे.</p>
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	<item>
		<title>By: सृजन शिल्पी</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/188/comment-page-1#comment-3304</link>
		<dc:creator>सृजन शिल्पी</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 15 Sep 2006 06:39:22 +0000</pubDate>
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		<description>&quot;नामवर जी....का कहना है कि मात्र हिंदी में लेखन करके जीविका नहीं कमाई जा सकती।&quot;
शायद इसीलिए नामवर जी ने पिछले बीस वर्षों से लिखना लगभग छोड़ ही दिया है और अध्यक्षीय भाषण देने का पेशा अपना लिया है। बोलने में लिखने की तुलना में कहीं ज्यादा और तत्काल नगद नारायण की प्राप्ति होती है। उनके पटु शिष्य पुरुषोत्तम अग्रवाल भी उन्हीं के नक्शेकदम पर तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। ख़ैर...

आप जो कह रहे हैं वह स्वतंत्र लेखन के संदर्भ में कुछ हद तक सही है। साहित्य अर्थात् कविता-कहानी-समीक्षा आदि लिखने में अधिक आमदनी की गुंजाइश शायद नहीं हो, लेकिन यदि पेशेवर कुशलता के साथ हिन्दी में तमाम प्रासंगिक विषयों पर लगातार स्तरीय लेखन किया जाए, तो आज भी हिन्दी में जीविका कमाई जा सकती है। ऐसे दर्जनों उदाहरण आज भी मौजूद हैं, लेकिन आप अंग्रेजी से उनकी तुलना करके नहीं चल सकते। यह सही है कि हिन्दी के प्रकाशकों और संपादकों द्वारा स्वतंत्र लेखकों का शोषण किया जाता है। 

हिन्दी में लिखने वालों को इंटरनेट की संभावनाओं और ई-कॉमर्स की तरकीबों का दोहन करने की कला सीखनी पड़ेगी। आदर्शवाद और सेवा भावना के साथ-साथ व्यावहारिकता एवं व्यावसायिकता को अपनाना कोई ओझी बात नहीं है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>&#8220;नामवर जी&#8230;.का कहना है कि मात्र हिंदी में लेखन करके जीविका नहीं कमाई जा सकती।&#8221;<br />
शायद इसीलिए नामवर जी ने पिछले बीस वर्षों से लिखना लगभग छोड़ ही दिया है और अध्यक्षीय भाषण देने का पेशा अपना लिया है। बोलने में लिखने की तुलना में कहीं ज्यादा और तत्काल नगद नारायण की प्राप्ति होती है। उनके पटु शिष्य पुरुषोत्तम अग्रवाल भी उन्हीं के नक्शेकदम पर तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। ख़ैर&#8230;</p>
<p>आप जो कह रहे हैं वह स्वतंत्र लेखन के संदर्भ में कुछ हद तक सही है। साहित्य अर्थात् कविता-कहानी-समीक्षा आदि लिखने में अधिक आमदनी की गुंजाइश शायद नहीं हो, लेकिन यदि पेशेवर कुशलता के साथ हिन्दी में तमाम प्रासंगिक विषयों पर लगातार स्तरीय लेखन किया जाए, तो आज भी हिन्दी में जीविका कमाई जा सकती है। ऐसे दर्जनों उदाहरण आज भी मौजूद हैं, लेकिन आप अंग्रेजी से उनकी तुलना करके नहीं चल सकते। यह सही है कि हिन्दी के प्रकाशकों और संपादकों द्वारा स्वतंत्र लेखकों का शोषण किया जाता है। </p>
<p>हिन्दी में लिखने वालों को इंटरनेट की संभावनाओं और ई-कॉमर्स की तरकीबों का दोहन करने की कला सीखनी पड़ेगी। आदर्शवाद और सेवा भावना के साथ-साथ व्यावहारिकता एवं व्यावसायिकता को अपनाना कोई ओझी बात नहीं है।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: Mitul</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/188/comment-page-1#comment-3292</link>
		<dc:creator>Mitul</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 14 Sep 2006 15:53:38 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://hindini.com/fursatiya/?p=188#comment-3292</guid>
		<description>अनूप, यह बताने के लिए कि आज हिंदी दिवस है काफी धन्यवाद। अन्य लेखो के जैसे ही हमे यह लेख भी काफी अच्छा लगा। मजाक मजाक मे ही आपने काफी सारी व्यावहारिक बाते कह दी।

हमे तो हिंदी दिवस का अस्तित्व याद करता है कि हिंदी के विकास के बारे मे और काम करना चाहिए। अब यह व्यक्तिगत सोच है कि आप इसको कैसे मानते है। कुछ तर्क है कि बाकि के दिनो का क्या? तो उनके लिए - आप बच्चो और अपने माता-पिता का जन्मदिन एक दिन मनाते है, शादी की सालगिरह एक दिन मनाते है। तो बाकी के दिनो का क्या?? उनको भूल जाते है?? 

शिकायते क्यों?? जब लोग शिकायत कर रहे है, तो हमे भी करनी है शिकायत। हमे शिकायतो से शिकायत है। नकारत्मक सोच को जन्म देती हुई शिकायते, आत्मविश्वास को डगमाती हुई शिकायते, कुछ न करने का बहाना देती शिकायते। 

मैने विकिपीडिया पे हिंदी के लेखो को एकत्रित करके विकिपोर्टल बनाया है: http://hi.wikipedia.org/wiki/Portal:हिंदी । वहाँ कुछ पसंद नही आए तो बद्ल दे या बदलने के लिए चर्चा करे। 

हमे भी समीर लाल जी के ही शब्द दोहराने है &quot;हिन्दी की उन्न्ती के लिये ढेरों शुभकामनाऎं…बस हम संकल्पित रहें कि हम अपना कार्य करते चलेंगे, देखिये कैसे कारवां बनता जायेगा…&quot;</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अनूप, यह बताने के लिए कि आज हिंदी दिवस है काफी धन्यवाद। अन्य लेखो के जैसे ही हमे यह लेख भी काफी अच्छा लगा। मजाक मजाक मे ही आपने काफी सारी व्यावहारिक बाते कह दी।</p>
<p>हमे तो हिंदी दिवस का अस्तित्व याद करता है कि हिंदी के विकास के बारे मे और काम करना चाहिए। अब यह व्यक्तिगत सोच है कि आप इसको कैसे मानते है। कुछ तर्क है कि बाकि के दिनो का क्या? तो उनके लिए &#8211; आप बच्चो और अपने माता-पिता का जन्मदिन एक दिन मनाते है, शादी की सालगिरह एक दिन मनाते है। तो बाकी के दिनो का क्या?? उनको भूल जाते है?? </p>
<p>शिकायते क्यों?? जब लोग शिकायत कर रहे है, तो हमे भी करनी है शिकायत। हमे शिकायतो से शिकायत है। नकारत्मक सोच को जन्म देती हुई शिकायते, आत्मविश्वास को डगमाती हुई शिकायते, कुछ न करने का बहाना देती शिकायते। </p>
<p>मैने विकिपीडिया पे हिंदी के लेखो को एकत्रित करके विकिपोर्टल बनाया है: <a href="http://hi.wikipedia.org/wiki/Portal:हिंदी" rel="nofollow">http://hi.wikipedia.org/wiki/Portal:हिंदी</a> । वहाँ कुछ पसंद नही आए तो बद्ल दे या बदलने के लिए चर्चा करे। </p>
<p>हमे भी समीर लाल जी के ही शब्द दोहराने है &#8220;हिन्दी की उन्न्ती के लिये ढेरों शुभकामनाऎं…बस हम संकल्पित रहें कि हम अपना कार्य करते चलेंगे, देखिये कैसे कारवां बनता जायेगा…&#8221;</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: समीर लाल</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/188/comment-page-1#comment-3290</link>
		<dc:creator>समीर लाल</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 14 Sep 2006 13:59:12 +0000</pubDate>
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		<description>मेरे काउंटर के हिसाब से मेरे ब्लाग पर अधिकतम हिट्स लगभग ३५० का रहा है। बाकी दिन आम तौर पर लगभग १०० रहता है &lt;b&gt;(जिसमें से १०% तो मेरे ही होंगे)।&lt;/b&gt;  अच्छा है, हम तो अभी इसकी भी राह तक रहे हैं. :)हमें तो यही १०००० का सा लग रहा है.

वैसे अन्य बातों को ध्यान मे ना रखा जाये तो हिन्दी चिठ्ठाकारी मे बढत देखते हुये भविष्य के प्रति आशस्वत रहा जा सकता है. वैसे अभी तो शुरुवात है, बहुत काम बाकी है...वक्त तो लगेगा..और वो तो हर अच्छे कार्य को उन्नत स्वरुप देने मे लगता है.कुछ भी सृजनात्मक तो रातों रात नही होता.

हिन्दी की उन्न्ती के लिये ढेरों शुभकामनाऎं...बस हम संकल्पित रहें कि हम अपना कार्य करते चलेंगे, देखिये कैसे कारवां बनता जायेगा...</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मेरे काउंटर के हिसाब से मेरे ब्लाग पर अधिकतम हिट्स लगभग ३५० का रहा है। बाकी दिन आम तौर पर लगभग १०० रहता है <b>(जिसमें से १०% तो मेरे ही होंगे)।</b>  अच्छा है, हम तो अभी इसकी भी राह तक रहे हैं. <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> हमें तो यही १०००० का सा लग रहा है.</p>
<p>वैसे अन्य बातों को ध्यान मे ना रखा जाये तो हिन्दी चिठ्ठाकारी मे बढत देखते हुये भविष्य के प्रति आशस्वत रहा जा सकता है. वैसे अभी तो शुरुवात है, बहुत काम बाकी है&#8230;वक्त तो लगेगा..और वो तो हर अच्छे कार्य को उन्नत स्वरुप देने मे लगता है.कुछ भी सृजनात्मक तो रातों रात नही होता.</p>
<p>हिन्दी की उन्न्ती के लिये ढेरों शुभकामनाऎं&#8230;बस हम संकल्पित रहें कि हम अपना कार्य करते चलेंगे, देखिये कैसे कारवां बनता जायेगा&#8230;</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: SHUAIB</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/188/comment-page-1#comment-3284</link>
		<dc:creator>SHUAIB</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 14 Sep 2006 11:27:25 +0000</pubDate>
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		<description>आपको बधाई और हिंदी दिवस पर भी बधाई।
आप भी मज़ाक मज़ाक मे बहुत कुछ लिख गए।
मुझ से एक गलत काम ये हुआ कि पहले तो मैं ने अपने चिट्ठे से दूसरे हिन्दी चिट्ठों के लिंक्स निकाल दिया था, क्योंकि नारद जी के ज़िनदा रहते सभी के ब्लॉग्स पर आना-जाना आसान था। दुआ है के नारद जी की थकावट खतम हो और फिर जवान जवान चलते रहें :)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आपको बधाई और हिंदी दिवस पर भी बधाई।<br />
आप भी मज़ाक मज़ाक मे बहुत कुछ लिख गए।<br />
मुझ से एक गलत काम ये हुआ कि पहले तो मैं ने अपने चिट्ठे से दूसरे हिन्दी चिट्ठों के लिंक्स निकाल दिया था, क्योंकि नारद जी के ज़िनदा रहते सभी के ब्लॉग्स पर आना-जाना आसान था। दुआ है के नारद जी की थकावट खतम हो और फिर जवान जवान चलते रहें <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: अफ़लातून</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/188/comment-page-1#comment-3283</link>
		<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 14 Sep 2006 11:02:51 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://hindini.com/fursatiya/?p=188#comment-3283</guid>
		<description>ई स्वामीजी महाराज ,
    उन्मुक्त  जी ने http://unmukts.wordpress.com/ पर नई प्रविष्टियों की फ़ीड का लिंक (http://hindi-b-h.blogspot.com/) भी दिया है  . Feedburner भी यह सेवा देता है .उन्मुक्त जी ने शुरु में गैर मशीनी मेहनत भी की जब सभी चिट्ठों का फ़ीड जुटाया . उन्हें यह आशा है कि ऐच्छिक दान के बावजूद नारद जब शुरु होगा तब बगैर पंजीकरण शुल्क के ही होगा .
चिट्ठाकार (गूगल समूह ) का सदस्य मैं भी हूं . मैं अनूप और उन्मुक्त की भांति आशा करता हूं कि नारद या उसके जैसी सेवा में पंजीकरण शुल्क नहीं होना चाहिये .हिन्दी चिट्ठेकारों के लिए यह और जरूरी है.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>ई स्वामीजी महाराज ,<br />
    उन्मुक्त  जी ने <a href="http://unmukts.wordpress.com/" rel="nofollow">http://unmukts.wordpress.com/</a> पर नई प्रविष्टियों की फ़ीड का लिंक (<a href="http://hindi-b-h.blogspot.com/" rel="nofollow">http://hindi-b-h.blogspot.com/</a>) भी दिया है  . Feedburner भी यह सेवा देता है .उन्मुक्त जी ने शुरु में गैर मशीनी मेहनत भी की जब सभी चिट्ठों का फ़ीड जुटाया . उन्हें यह आशा है कि ऐच्छिक दान के बावजूद नारद जब शुरु होगा तब बगैर पंजीकरण शुल्क के ही होगा .<br />
चिट्ठाकार (गूगल समूह ) का सदस्य मैं भी हूं . मैं अनूप और उन्मुक्त की भांति आशा करता हूं कि नारद या उसके जैसी सेवा में पंजीकरण शुल्क नहीं होना चाहिये .हिन्दी चिट्ठेकारों के लिए यह और जरूरी है.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: eswami</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/188/comment-page-1#comment-3281</link>
		<dc:creator>eswami</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 14 Sep 2006 08:10:20 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://hindini.com/fursatiya/?p=188#comment-3281</guid>
		<description>अफ़लातूनजी महाराज, 

नारद के अनेकों स्थायी, अस्थायी विकल्प जैसे http://feeder.amitgupta.in, चिट्ठा-विश्व मुफ़्त में मुहैया थे, हैं और रहेंगे! 

नारद की अनुपलब्धी की वजह तकनीकी है आर्थिक नहीं! वो छोटे सेट-अप पर चलने वाली जुगत थी - अब जरूरतें अधिक हैं. उन्मुक्त ने बस सक्रिय चिट्ठों की सूची दी है - नई प्रविष्ठियों की सूचना देने का प्रबंध नहीं. 

आपकी जानकारी के लिए बता दूं की पंजीकरण-शुल्क उन्मुक्त जी का ही आईडिया था (http://akshargram.com/paricharcha/viewtopic.php?pid=4818#p4818
) - वे शायद यह कहना चाहते थे की अगर नारद को बडे सेट-अप पर ले जाना है और हमनें अर्थदान का जिम्मा लोगों के स्वविवेक पर छोडा तो वे शायद ना ही करें - उनका भय भी अनुभवजन्य रहा होगा.  शायद वे चाहते होंगे की गंभीर ब्लागर्स ही जुडें समूह से या एक न्यायिक तरीका सबके जिम्मेदारी के निर्वाह का की कुछ ही सदस्यों पर आर्थिक जिम्मा ना आए- वे ही बेहतर बता सकते हैं अपने विचारों की वजह.

इस समूह में सभी ने अपने अपने तरीके से जनहित की बात ही की है. हमारी बढती जरूरतों को सलीके से पूरा करने के लिए हमें अव्यावसायिक सहकार करना ही होगा -शुल्क ही एक तरीका नही है आत्मानुशासित सक्रिय और उत्साही सदस्यों के रहते कोई समूह पीछे नही रहता! अधिक जानकारी के लिए परिचर्चा फ़ोरम पर पढते रहिए और चिट्ठाकार समूह की मेलें भी -  पूरी तरह सूचित रहेंगे समूह के क्रिया कलाप से.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अफ़लातूनजी महाराज, </p>
<p>नारद के अनेकों स्थायी, अस्थायी विकल्प जैसे <a href="http://feeder.amitgupta.in" rel="nofollow">http://feeder.amitgupta.in</a>, चिट्ठा-विश्व मुफ़्त में मुहैया थे, हैं और रहेंगे! </p>
<p>नारद की अनुपलब्धी की वजह तकनीकी है आर्थिक नहीं! वो छोटे सेट-अप पर चलने वाली जुगत थी &#8211; अब जरूरतें अधिक हैं. उन्मुक्त ने बस सक्रिय चिट्ठों की सूची दी है &#8211; नई प्रविष्ठियों की सूचना देने का प्रबंध नहीं. </p>
<p>आपकी जानकारी के लिए बता दूं की पंजीकरण-शुल्क उन्मुक्त जी का ही आईडिया था (<a href="http://akshargram.com/paricharcha/viewtopic.php?pid=4818#p4818" rel="nofollow">http://akshargram.com/paricharcha/viewtopic.php?pid=4818#p4818</a><br />
) &#8211; वे शायद यह कहना चाहते थे की अगर नारद को बडे सेट-अप पर ले जाना है और हमनें अर्थदान का जिम्मा लोगों के स्वविवेक पर छोडा तो वे शायद ना ही करें &#8211; उनका भय भी अनुभवजन्य रहा होगा.  शायद वे चाहते होंगे की गंभीर ब्लागर्स ही जुडें समूह से या एक न्यायिक तरीका सबके जिम्मेदारी के निर्वाह का की कुछ ही सदस्यों पर आर्थिक जिम्मा ना आए- वे ही बेहतर बता सकते हैं अपने विचारों की वजह.</p>
<p>इस समूह में सभी ने अपने अपने तरीके से जनहित की बात ही की है. हमारी बढती जरूरतों को सलीके से पूरा करने के लिए हमें अव्यावसायिक सहकार करना ही होगा -शुल्क ही एक तरीका नही है आत्मानुशासित सक्रिय और उत्साही सदस्यों के रहते कोई समूह पीछे नही रहता! अधिक जानकारी के लिए परिचर्चा फ़ोरम पर पढते रहिए और चिट्ठाकार समूह की मेलें भी &#8211;  पूरी तरह सूचित रहेंगे समूह के क्रिया कलाप से.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: अफ़लातून</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/188/comment-page-1#comment-3279</link>
		<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 14 Sep 2006 05:58:05 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://hindini.com/fursatiya/?p=188#comment-3279</guid>
		<description>उन्मुक्त ने नारद वाला  काम बिना धन के शुरु कर दिया है http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/09/blog-post_11.html पर .चन्दा भी नहीं मांग रहे ,न पंजीकरण -शुल्क की चर्चा है .हिन्दी दिवस पर अपने अपने चिट्ठों के प्रचार से अलग भी सोचें .
 क्या चिट्ठेबाज सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के प्रकाशन विभाग से सम्पूर्ण गांधी वाङमय हिन्दी में उपलब्ध कराने के लिये एक ई-अभियान छेड सकते हैं? अंग्रेजी में सभी १०० खण्ड जाल पर उपलब्ध हैं .</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>उन्मुक्त ने नारद वाला  काम बिना धन के शुरु कर दिया है <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/09/blog-post_11.html" rel="nofollow">http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/09/blog-post_11.html</a> पर .चन्दा भी नहीं मांग रहे ,न पंजीकरण -शुल्क की चर्चा है .हिन्दी दिवस पर अपने अपने चिट्ठों के प्रचार से अलग भी सोचें .<br />
 क्या चिट्ठेबाज सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के प्रकाशन विभाग से सम्पूर्ण गांधी वाङमय हिन्दी में उपलब्ध कराने के लिये एक ई-अभियान छेड सकते हैं? अंग्रेजी में सभी १०० खण्ड जाल पर उपलब्ध हैं .</p>
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