- ….जिंदगी का एक इतवार
- … बरसात, बिम्ब की तलाश और बेवकूफ़ी की बहस
- ….बरखा रानी जरा जम के बरसो
- …खोये आइडिये की तलाश में मगजमारी
- ….देश बड़ी इस्पीड में चल रहा है
- …एक घंटे की हवाई यात्रा
- यात्राओं में बेवकूफ़ियां चंद्रमा की कलाओं की तरह खिलती है
- …धरती को ठंडा रखने के कुछ अटपटे सुझाव
- ….दुनिया बड़ी डम्प्लाट है
- आपके विरोध में नियमित लिखने वाला ब्लागर आपके लिये बिना पैसे का प्रचारक है
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इससे बढिया भी कुछ मिला?
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अनूप जी बहुत बहुत धन्यवाद इतने अच्छे लेख को यहाँ प्रस्तुत करने के लिये.वैसे तो पूरा लेख ही बढिया है.लेकिन मुझे सबसे ज्यादा ये पन्क्तियाँ पसंद आईं–
/सिखाऒ कि ज्ञान का अर्थ, तमाम विषयों का अध्ययन और उनके अन्तरसम्बंधों की पड़ताल, व्याख्या नहीं, बल्कि प्रश्नोत्तरी है। सिखाऒ कि प्रतिभाशाली का अर्थ फिल्मी अंताक्षरी में अव्वल आना है। सिखाऒ कि कुछ करने के पहले ठिठककर सोचना पिछड़ापन और मूर्खता है। सिखाऒ कि पश्चाताप और प्रायश्चित कोई शब्द नहीं है। सिखाऒ कि मनुष्य कुछ भी नहीं, सबसे श्रेष्ठ मशीन है। सिखाऒ कि अंतरात्मा कुछ
नहीं होती, चेतना कुछ नहीं होती।/
वाक़ई अन्त:करण को झकझोरने वाला लेख है। इससे मुंह नहीं चुराया जा सकता कि आज महत्वाकांक्षा के बोझ तले सम्वेदना घुट रही है और बाज़ार का इसमें बहुत बड़ा हाथ है। लेकिन जहाँ लेखक ने सारा ठीकरा पूंजीवाद के सर फोड़ा है, वहीं यह सवाल भी मुंह बाए खड़ा है कि क्या वामपंथी देशों में इन समस्याओं का निदान हो गया था? क्या उत्तरीय कोरिया में अमरीका से ज़्यादा संवेदनशील लोग बसते हैं? मूल प्रश्न यह है कि इससे निकलने का मार्ग क्या है?
अनूप जी, कृपया एक शंका का समाधान करें। इससे लेखक किस घटना की ओर संकेत कर रहा है, यह मैं नहीं समझ सका – “किसी को अंदाजा नहीं था कि हत्यारा हजारों युवकों के सम्मुख डामर के ड्रम पर हमारे एक देसी कवि का सिर रखकर काट देगा। इस वध और वधिक के प्रतिरोध में वहां एक भी हाथ नहीं उठेगा, एक भी आवाज नहीं सुनाई पड़ेगी।” कृपया बताएँ।
ये अनूपजी की टिप्पणी है
रचनाजी,प्रतीकजी लेख पसंद करने के लिये शुक्रिया।
प्रतीकजी,जिस घटना की जिक्र ऊपर हुआ और जो सवाल किया आपने उसके बारे में मैंने अखिलेशजी से पूछा। उन्होंने बताया:-
“१९९६-९७ में सुल्तानपुर जिले के जनकवि मानबहादुर सिंह की हत्या तमाम भीड़ के सामने एक नवजवान विक्षिप्त ने कर दी। यह घटना उसने । अकेले सरअंजाम दी-लोकनिर्माण विभाग के दफ्तर के सामने। कोलतार के ड्रम पर उनका सर एक अकेले लड़के ने काट दिया और लोग देखते रहे, बिना किसी प्रतिरोध के। बाद में इस घटना का राष्ट्रव्यापी प्रतिरोध हुआ। मानबहादुर सिंह अग्रेजी के प्रवक्ता थे और सुल्तानपुर जिले के बिलेहरी में एक इंटर कालेज के प्रधानाचार्य थे। उनके तीन कविता संग्रह प्रकाशित हुये थे-‘बीड़ी बुझने के करीब’, ‘भूतग्रस्त’ और ‘मां जानती है’(ये तीसरा नाम याददाश्त से है)। घटना के पीछे तात्कालिक कारण एक साइकिल स्टैंड का ठेका था जिसे विद्यालय के प्रशासन ने किसी दूसरे को दे दिया था जिसमें मानबहादुर सिंह का कोई योगदान नहीं था| यह अलग बात है कि वह हत्यारा लड़का बाद में माफिया बनकर वसूली करने लगा और पांच साल बाद शायद वसूली विवाद में ही मारा गया|
दूसरी बात जो आपने लिखी है कि लेखक ने पूंजीवाद को कोसा है और मार्क्सवाद को अच्छा बताया है तो देखें कि लेखक ने अपनी बात कही है और उसमें आलोचना के घेरे में मार्क्सवादी भी हैं| मुझे जितना समझ में आया उसके अनुसार,लेखक की मूल चिंता हमारे समाज के संवेदनहीन और विवेकहीन होते जाने के बारे में है, न कि किसी वाद के समर्थन या विरोध में!
यथार्थ पर प्रकाश डालता हुआ बहुत ही बढ़िया लेख।
अखिलेश्जी को मेरी शुभकामनायें और लेख को प्रस्तुत करने का शुक्रिया…..
राग-दरबारी का ११वां भाग मैं मंगलवार शाम तक भेज दूंगा
चिकित्सा विज्ञान अधिकतर को मरने नहीं देगा और विकास उन्हें जीने नहीं देगा।
“मानसिक रोगियों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि होगी। अर्ध विकसित मस्तिष्क वाले बच्चे, तनावग्रस्त, पागल, सनकी बड़ी तादाद में पाये जायेंगे। ऐसा समाज लिये हुये इक्कीसवीं सदी में लोग किसी दूसरे ग्रह पर बसने की तैयारी करेंगे। मान लें कि उस ग्रह पर पहुंचने पर किसी कीमियागिरी के कारण सबके चेहरे थोड़े-थोड़े बदल जायें। तब निश्चय ही अधिसंख्य लोगों की शिनाख्त मुश्किल हो जायेगी। क्योंकि इस सभ्यता के अनुचरों के पास अपने चेहरे के अलावा कुछ भी मौलिक नहीं है।”
–यह पढ़ता हूँ और फिर परसों छपे आलेख को पढ़ता हूँ: रोमांचकारी होगा आने वाला कल. कितने विचार आये गये इस लेख को बांचते!!
बहुत ही प्रवाहयुक्त, बड़ा लम्बा होने के बावजूद, पूरे समय बांधे रहा. अखिलेश जी को बधाई. वैसे जिस घटना के विषय में प्रतीक जानना चाह रहे हैं, वो समाचार मुझे भी चुका हुआ प्रतीत होता है. अब चूँकि यह लेख सन २००० का है तो निश्चित उसके पहले की घटना ही होगी.
–आपका साधुवाद, जो नियमित इस तरह की जानकारी हम लोगों तक पहुँचाते रहते हैं।
अत्यंत जबरदस्त लेख है। बहुत गहनता से और भावावेग में लिखा गया है। काश कि अखिलेश जी के ये उदगार युवा पीढ़ी के मर्म तक पहुँच पाते! बाजार की चमक और सांप्रदायिकता की संकीर्णता ने इसकी संभावनाएँ धूमिल कर दी हैं। लेकिन नहीं, उम्मीद अभी खत्म नहीं हुई है। हमारी चेतना को झकझोरने के लिए किसी उत्प्रेरक की दरकार है। बाजार का नशा उतरेगा… जल्द ही….समय आ रहा है।
लेख बहुत अच्छा लगा। कल टिप्पणी नहीं कर पाये थे।
धन्यवाद लेख पेश करने के लिये।
अनूपजी,
अखिलेश जी के इतने सुंदर और सटीक लेख को हम तक पहुचाने के लिये धन्यवाद । ऐसे ही वैचारिक लेख हम विदेशों में बैठे लोगों तक पहुंचाते रहें । इससे दिमाग अपनी जगह पर बना रह्ता है । जीवन की प्राथमिकतायें न गडबडायें, उसके लिये साहित्य से अच्छा माध्यम नहीं ।
पुन: साधुवाद ।
दीपक
आभार ऐसे अच्छे लेख को हम तक पहुँचाने के लिए। लेख तो हमे मूक कर देता है।
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अति सुन्दर..,
बेहद विचारोत्तेजक और मन्थन योग्य आलेख प्रस्तुत करने का शुक्रिया।