लोग कहते हैं कि ‘असंभव’ शब्द मूर्खों के शब्दकोश में पाया जाता है। एक स्वयंभू ज्ञानी को अपने शब्दकोश में ‘असंभव’ दिख गया तो महीनों परेशान रहा। उसको समझ में नहीं आ रहा था कि इतने ज्ञानी होने के बावजूद उसके शब्दकोश में मूर्खता कैसे आ गयी!
किसी ने उसे समझाया भी कि ये उसी तरह है जैसे दिल्ली में विकास के साथ झोपड़पट्टियां भी बढ़ती चली गयीं। यह भी कहा कि विकास और झोपड़पट्टियों का जिस तरह चोली-दामन का साथ है उसी तरह ज्ञानी और मूर्खता का अटूट संबंध है। लेकिन ज्ञानी के दिमाग से नेपोलियन का कहा अमर वाक्य भारत में अंग्रेजी सा धंसा रहा- असंभव शब्द मूर्खों के शब्दकोश में पाया जाता है।
ज्ञानी ने सोचा दिल्ली की झोपड़पट्टियों से तो सरकार और सुप्रीमकोर्ट निपटेगी लेकिन मैं अपने शब्दकोश के ‘असंभव’ शब्द से कैसे छुटकारा पाऊं! बाद में अपनी बुद्धि का प्रयोग करके उसने शुरुआती आधा शब्दकोश रद्दी में बेच दिया और ‘असंभव’ शब्द से मुक्ति पा गया। रद्दी बेचने से मिले पैसे से चुटकुले की किताब खरीद लाया और अब हंसने का अभ्यास कर रहा है।
शायद ऐसे ही किसी ज्ञानी को हंसता देखकर पंडित गिरिराज जोशी ने सोचा होगा कि दुनिया में सब लोग हंसें तो कैसा रहे!
यह काम उनको थोड़ा मुश्किल लगा तो इसकी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। जोशीजी बहुत विद्वान, मेहनती और अपनी धुन के पक्के हैं। जो ठान लेते हैं उसे पूरा करके ही दम लेते हैं और ठने को पूरा करने तक सबको बेदम किये रहते हैं। इनकी क्षमताऒं का क्या कहना! कुंडलिया हो या हायकू , गज़ल हो या त्रिवेणी या साहित्य की कोई और विधा हर जगह इनके ‘चरण कमल’ वंदना-प्रस्तुत मिलेंगे। हर फटे में इनकी टांग दिखती है! या कहें जहां इनकी टांग दिखी वह जगह अपने को फटने के लिये प्रस्तुत कर देती है। या फिर यह कि किसी भी फटे को देख कर लोग अनायास पूछते हैं -जोशीजी यहां कब आये थे?
अब गिरिराज जोशी का नया शगल है भाई सागर चंद नाहर को हंसाना! गोया सागर कोई रोते हुये बच्चे हों और जोशी जी निदा फाजली जो कि कोई और काम न होने के कारण कह रहे हों:-
घर से मस्जिद बहुत दूर है चलो यूं कर लें
किसी रोते हुये बच्चे को हंसाया जाये।
कोई बच्चा रो रहा हो उसे तो हंसाना ठीक है लेकिन अपने हंसाने की जिद के कारण यह अच्छे खासे काम-काजी आदमी को रुलाना कहां तक जायज है? यह तो वैसे ही है जैसे परसाई जी लिखते हैं-
‘वन महोत्सव के उदघाटन के लिये जमीन तैयार करने के लिये सारे पेड़ काट दिये गये।’
पता चला कि सागर जी को गिरिराज जोशी जी कवितायें झेलाने का प्रयास कर रहे थे। सागरजी सीधे-साधे आदमी। सो सीधी-साधी भाषा में अनुरोध किया कि ये सुबुक-सुबुक वादी कवितायें मन सुनाया करो। इससे अच्छा कुछ ऐसा लिखो कि पढ़कर हंसी आये। बस इसी बात से गिरिराज जोशी ने एक और फटे में टांग फंसा ली और सागर भाई को हंसाने का ठेका ले लिया। अब खुद तो चूंकि वे कविता लिखने जैसा महान काम करते हैं। और महान व्यक्ति हंसाने जैसा ओछा काम कैसे कर सकता है।
लिहाजा गिरिराज जोशी ने इस काम के लिये मसखरे खोजना शुरू कर दिया। दो-तीन शो जोशीजी करा चुके हैं। उतने से सागर भाई को पता नहीं कैसा लगा लेकिन जोशी जी को मजा नहीं आया और वे कह रहे हैं-‘शो मस्ट गो आन।’ अभी हमें मजा नहीं आया। अभी सागर जी को और हंसाया जाये।
आजकल यह जोशीजी का पूर्णकालिक कार्यक्रम हो गया है। किसी भी तरह सागर भाई को हंसाया जाये। वे नेट पर मिले हर शक्स से रो-रोकर विनती करते हैं- बस किसी तरह सागर भाई को हंसा दीजिये। उनकी आंख से निकले आंसू सामने वाले के की-बोर्ड को गीला कर देते हैं। एक बारगी तो लगता है कि अगर जोशीजी के सागर हंसाऒ अभियान को कुछ व्यवधान पहुंचा तो ‘ग्लोबल वार्मिंग’ के कारण दुनिया के तमाम शहरों के डूब जाने की भविष्यवाणी सच साबित होने के पहले ही जोशीजी के नयन-नीर से जलप्रलय हो जायेगी ! वे सागर जी को हंसाने के लिये उससे कम परेशान नहीं हैं जितना कि अमेरिका जैसे अतिसभ्य देशों का जी दुनिया के तमाम असभ्य देशों को सभ्य बनाने के लिये हलकान हैं।
जैसे अमेरिका जैसे देश इराक जैसे देशों को सभ्य/लोकतांत्रिक देश बनाने के लिये उसकी हर तरह से बर्बादी कर रहे हैं उसी श्रद्धा से जोशीजी सागरजी को हंसाने में जुटे हैं। हर संभव उपाय कर रहे हैं। हर किसी आते-जाते को ठेका थमा रहे हैं कि सागरजी को हंसाऒ। अर्जुन को मछली की आंख की तरह उनकी आंखों के आगे केवल सागर चेहरा लहरा रहा है। वे सागर के सीने पर उठती हंसी की लहरों का प्रतिबिम्ब उनकें चेहरे पर देखना चाहते हैं।
अपने इस कार्य को वे युद्धस्तर पर करने का प्रयास कर रहे हैं। युद्धस्तर पर प्रयास करने के चलते वे अपने आप ‘प्रेम और युद्ध में सब जायज होता है’ की सुविधा का लाभ उठाने के अधिकारी हो गये हैं। कथनीय-अकथनीय, उचित-अनुचित की सांसारिक सीमाऒं से अपने आप को ऊपर उठाकर अपने दिमाग को अहमकपने की कक्षा में स्थापित कर लिया है। सागर को हंसाने के लिये वे दोस्त, साथी नहीं मसखरे खोज रहे हैं।
मसखरे का मतलब होता है भांड़, विदूषक, जोकर, हास्य पात्र। ये सारे कार्यकलाप आमने-सामने के होते हैं। चेहरे के हाव-भाव और शारीरिक क्रिया-कलापों के द्वारा जनसमुदाय को हंसाने का काम आमने-सामने का होता है। ब्लागिंग और भड़ैती में अंतर है। हम अभी ब्लागर की स्थिति से ऊपर नहीं उठ पाये हैं। भड़ैती करने में बहुत मेहनत लगती है। सारे शरीर की २०८ हड्डियों को हिलाना पड़ता है। इतनी मेहनत का न हमारे पास हुनर है न सामर्थ्य। न ही हमारे पास अभी इतनी सुविधायें हैं कि अपने चेहरे पर कुछ पोत-पात कर उछल-कूद करते हुये अपनी वीडियो कान्फ्रेंसिंग या यू-ट्यूब बनाकर दुनिया जहान को दिखायें जिसे देखकर सागर भाई को हंसी आये।
यह समस्या शायद सारे साथियों की रही होगी इसीलिये अभी तक जोशीजी को अपना अभियान अधूरा लग रहा है। हालांकि सागरजी ने लगभग हर पोस्ट में हंसने की बात कही लेकिन जोशी जी का दिल अभी भरा नहीं। वे कहते हैं अभी और हंसाऒ।
उनकी दिलचस्पी सागर चंद्र नाहर को हंसाने में कम मसखरेपन में ज्यादा है। लेकिन जैसा मैंने बताया कि मसखरापन आमने-सामने की चीज है। इसलिये यह इच्छा तो जोशीजी की पूरी होती नहीं दीखती। हमें इसका अफसोस है कि हम मसखरेपन की उनकी इच्छा पूरी करने की काबिलियत नहीं है।
हंसने की बात चली तो अपनी एक पुरानी कविता याद आई। यह मैंने हंसी के ऊपर लिखी थी। तमाम तरह की हंसियों की बात करते हुये लिखा था:-
हंसी की एक बच्ची है
जिसका नाम मुस्कान है
अब यह अलग बात है
कि उसमें
हंसी से कहीं ज्यादा जान है।
आगे लिखा है-
हंसी तो भयंकर छूत की बीमारी है
एक से सौ सौ से हजार तक फैली इसकी क्यारी है।
लोग अपनों को हंसाने के लिये क्या-क्या जतन करते हैं:-
अपनी खुशी के साथ मेरा गम भी निबाह दो
इतना हंसो कि आंख से आंसू छलक पड़े।
तो जोशी जी, अगर आप सागरजी को हंसाना चाहते हैं तो पहले खुद हंसना सीखिये। जब आप खुद हंसेंगे तो आपके साथ के लोग अपने-आप हंसेंगे। आप निर्मल मन से राजस्थान में हंसेंगे तो उसका ठहाका हैदराबाद में सागरजी के कंठ से फूटेगा।
लेकिन मुझे पता है कि जोशीजी मेरी बात मानेंगे नहीं। वे अपनी सागर जी को हंसाने के आयोजन में जुटे रहेंगे। जब तक वे खुद कोई नया शगूफा नहीं कर लेते तब तक इसी काम में दिल लगाये रहेंगे। वे अपनी कविताऒं की नोक पर सागर के भेजे से हंसी निकालने की कोशिश करते रहेंगे।
कल्पना कीजिये कि किसी दिन जोशीजी अपनी कविता के बारूदखाने के साथ सागरजी के पी.सी.ऒ. पर जाकर धमकाते हुये कहें-
जोशीजी:- सागर भाई, खबरदार! आप चारो तरफ़ हमारी कविताऒं से घिर चुके हैं। हिलने की कोशिश की मत करना।
सागरजी:- अगर हिले तो क्या कर लोगे?
जोशीजी:- अगर आपने हिलने की कोशिश की तो सारी की सारी कवितायें आपके भेजे में उतार दी जायेंगी और आपका सारा सुकून-चैन फोटोकापी मशीन से कापी हुये कागज फड़फड़ाता हुआ बाहर आ जायेगा।
सागरजी:-ये क्या मजाक है मेरे भाई? ये किस-किसको लेकर आये हो? जरा परिचय तो कराऒ।
जोशीजी:- हम मजाक करने नहीं आये हैं। हम आपको हंसाने आये हैं। ये हमारे साथ जो कवितायें आयी हैं उनके नाम हैं दोहा-चौपाई, सोरठा-कुंडलिया, हायकू-त्रिवेणी, गज़ल-शेर। एक से एक खतरनाक हथियार हैं मेरे साथ।
सागर:- जोशीजी , ये आप कवितायें लाये हैं या ‘नच-बलिये’कार्यक्रम की जोड़ियां! क्या सीटी बजाने के लिये सरोजखानजी और टांगे दिखाने के लिये मल्लिका सेहरावतजी को भी लाये हो?
जोशीजी:-सागरजी हम मजाक के मूड में नहीं हैं अभी। हम आपको हंसाने आये हैं। यह आपके हित में है कि आप तुरन्त हंसने लगें वर्ना अंजाम के आप खुद जिम्मेदार होंगे।
सागरजी:- जोशीजी हमने आप जैसे तमाम भांड़ देखें हैं। यहीं हैदराबाद की सड़क पर एक से एक विदूषक अपने तमाशे दिखाते रहते हैं। लेकिन हम चुपचाप अपनी फोटोकापी मशीन पर झुके सारा ध्यान इस बात पर लगाये रहते हैं कि कागज कहीं ड्रम में न फंस जाये। जब मुरैना वासी भुवनेश और आगरे वाले प्रतीक तक हमारे चेहरे की कोई शिकन तक नहीं हिला पाये आप क्या खाकर हमें हंसायेंगे। क्या सोचकर आये थे कि आपके आने से हम खुश होंगे, हंसने लगेंगे? बहुत बचकाना सोच है आपका।
जोशीजी:- अभी आपको हमारी ताकत का अन्दाजा नहीं है सागरजी! यहां से पचास-पचास ई-मेल दूर भी जब कोई ब्लागर चहकता है तो लोग कहते हैं बेटा, चहकना बंद करदे वरना गिरिराज आ जायेगा (और कविता की नोक पर टिप्पणियां ले जायेगा)। हमारे किसी भी मेसेंजर पर जाते ही लोग अपना शटर गिराकर आफलाइन हो जाते हैं। आप चुपचाप हंसने लगिये वर्ना हम कविता सुनाने लगेंगे।
सागरजी
अपने मस्तक पर टिप्पणियों की तरह चुहचुहा आये पसीने को पोछते हुये) ये कैसी जबरदस्ती है भाई! आज हमारा हंसने का मन नहीं है। हमारी फोटोकापी मशीन का टोनर अभी-अभी आपके भेजे की तरह साफ हो गया है और हमें नयी बोतल डालनी है। दिन भर का काम बाकी है। ऐसे में कोई कैसे हंस सकता है। आप ही बताइये।
जोशीजी:- यह सब हम नहीं जानते। आपको हंसना है। हम आपको हंसाने आये हैं। यह बताने के लिये नहीं कि हंसा कैसे जाये। हम हंसाना जानते होते तो ‘लाफ्टर चैलेंज’ सिद्धूपाजी के सामने पूरे देश को हंसा रहे होते। आप तुरंत हंसना शुरू करते हैं या शुरू करूं हायकू से!
सागर:- अच्छा एक मिनट मैं जरा मुंह साफ करके आता हूं। आप ज़रा यहां बैठो और जब तक मैं वापस आऊं तब तक आप ग्राहक निपटाते रहो। फोन का बिल लेते रहो। फोटोकापी का रेट पचास पैसे प्रति कापी है। अगर कोई ९०% प्रतिशत वाली मार्कशीट की फोटोकापी कराये तो मुफ्त। आप ज़रा बैठो गद्दी पर मैं अभी दो मिनट में आया।
बाद में पता लगा कि सागरजी पीछे के रास्ते से निकलकर अपनी दुकान के बगल के पीसीऒ से अंतर्राष्ट्रीय काल मिलाकर समीरलालजी उनके चेले की शिकायत करते हुये पाये गये। समीरलालजी ने पता नहीं क्या कहा लेकिन यह देखा गया कि सागरजी अपनी दुकान को जोशीजी के ही रहमोकरम पर छोड़कर अपने घर की तरफ़ लपकते हुये पाये गये। जोशीजी उनकी दुकान पर ग्राहकों से जूझते हुये सोच रहे थे ऐसे में सागर भाई से हंसने के लिये जबरदस्ती करना कहीं ज्यादती तो नहीं है।
बाद में पता चला कि कुछ दिन बाद सागरजी ने जोशी के हंसाने के अभियान से तंग आकर अदालत की शरण ली। सागरजी ने अपनी गुहार में अदालत को बताया कि जोशीजी उनको जबरदस्ती हंसाने की कोशिश करके उनके निजता के अधिकार का उल्लंघन कर रहे हैं। वकील के रूप में उन्होंने भुवनेश शर्मा और प्रतीक को चश्मदीद गवाह के रूप में चुना।
अदालत ने इसे निजता के अधिकार के साथ-साथ मानवाधिकार का उल्लंघन भी माना और तुरंत जोशी को अदालत मे हाजिर होने का सम्मन जारी कर दिया।
जिस समय जोशीजी को अदालत का सम्मन मिला उस समय वे गूगल टाक पर अपने किसी नये बने मित्र को आनलाइन हायकू लेखन सिखा रहे थे। पहली लाइन पूरी कर चुके थे। दूसरी के चार अक्षर टाइप कर चुके थे। हायकू पूरा करते ही संभावित वाह-वाह मात्र आठ अक्षर दूर थे। लेकिन कोर्ट का सम्मन पाते ही उनके चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं। अधलिखे हायकू को मानीटर पर अकेला छोड़कर वे उसी तरह बाहर की तरफ़ लपके जिस तरह चुनाव जीता हुआ नेता आम जनता को अकेला छोड़कर शपथ ग्रहण करने के लिये लपकता है। अधूरा हायकू सरकार बदल जाने के कारण अधबने पुल सा अभिशप्त पड़ा अपने पूरे होने की बाट जोह रहा है।
राजस्थान से दिल्ली जाते हुये जोशीजी मुंह से कविता पंक्तियां शेफाली के फूल सी झर रही हैं। कविता सुनते ही पर्वत, नदी, वन, कूप, तड़ाग उनके सम्मान में रास्ता देकर उनके आगे जाने का माध्यम बन रहे हैं। मुझे अनायास हनुमानजी की लंका यात्रा याद आती है जिसका वर्णन करते हुये गोस्वामीजी ने लिखा है:-
जेहि गिरि चरन देहिं हनुमंता
चलेहु सो गा पाताल तुरंता।
इसका अर्थ यह लगाया गया कि हनुमानजी जिस पर्वत पर पैर रखते हैं वह तुरंत पाताल चला जाता है। मैं अभी तक इसी पर विश्वास करता था लेकिन जोशीजी की यात्रा के बारे में जानकर मुझे लगा कि हो न हो हनुमानजी भी बहुत बड़े कवि रहे हों और लंका जाते समय कविता मंत्र फूंकते जा रहे हों जिससे सामने आने वाले सारे पहाड़ उनके सम्मान में रास्ता दे देते हों।
बहरहाल, जोशी जी जब राजस्थान से हैदराबाद की तरफ़ प्रस्थान कर रहे थे तब दिल्ली के नाके पर राजधानी के नाके पर किसी तेज चैनेल की तेज निगाह में आ गये और कालान्तर में उसके हत्थे चढ़ गये। चैनेल वालों की खोजी निगाहों को लगा कि हो न यही वह ‘मिसिंग लिंक’ जिसका मानव विज्ञानी सदियों से इंतजार कर रहे हों। चैनेल वालों से जोशी जी ने बहुत कहा, समझाया। भाटियाजी का हवाला दिया, नीरज दीवान का नाम लिया लेकिन यह विश्वास दिलाने में सर्वथा असफल रहे कि वे कोई अजूबा आइटम नहीं हैं, साधारण ब्लागर हैं।
किसी भी चैनेल वाले के हाथ जब भी कोई अजूबा लगता है तो वे सबसे पहले उसका इंटरव्यू ले लेते हैं। जोशी जी के इंटरव्यू की भी तैयारी होने लगी। जोशीजी, अपने चेहरे पर कैमरा फोकस करते हुये फोटोग्राफर से बोले-जरा नीरज दीवानजी से बात कराऒ। कैमरामैन बोला- मिलाते हैं पहले जरा मुस्कराऒ।
इसके बाद क्या हुआ हमें अभी तक इसकी कोई खबर नहीं मिली है। जैसे ही पता चला हम आपको बतायेंगे।
इस बीच सागरजी आप बतायें आप कैसा महसूस कर रहे हैं!
मेरी पसंद
जिंदगी में बिखर कर संवर जाओगे
आंख से जो गिरे तो किधर जाओगे।पानियों की कोई शक्ल होती नहीं
जिस भी बरतन में ढालेगा ढल जाओगे।तुम तो सिक्के हो बस उसकी टकसाल के,
वो उछालेगा और तुम उछल जाओगे।लाख बादल सही आसमानों के तुम,
जिंदगी की जमीं पे बिखर जाओगे।मैं तो गम में भी हंसकर निकल जाउंगा
तुम तो हंसने की कोशिश में मर जाओगे।मशवरा है कि डर छोड़ करके जियो
हर कदम मौत है तुम जो डर जाओगे।एक कोशिश करो उसके होकर जियो
उसके होकर जियोगे संवर जाओगे।
डा. कन्हैया लाल नंदन




“चैनेल वालों की खोजी निगाहों को लगा कि हो न यही वह ‘मिसिंग लिंक’ जिसका मानव विज्ञानी सदियों से इंतजार कर रहे हों।”
हा हा… बहुत ही ग़ज़ब लिखा है आपने। सभी चिट्ठाकारों की व्यथा मानो समवेत हो कर आपके मुख से निकल रही है। ख़ैर, लगता है कि आप ‘कविराज’ को शॉक ट्रीटमेंट दे रहे हैं।
बहुत खुब और सटीक लेखन. अब कोई हंसे न हंसे या कोई रोये न रोये, गिरिराज तो निश्चित ही आपका जयकारा लगायेंगे और बाकी ब्लागर भी अब (शायद) कुछ आराम पायेंगे.
प्रतीक का समर्थन करता हूँ:
सभी चिट्ठाकारों की व्यथा मानो समवेत हो कर आपके मुख से निकल रही है
हंसी की एक बच्ची है
जिसका नाम मुस्कान है
अब यह अलग बात है
कि उसमें
हंसी से कहीं ज्यादा जान है।
-बड़ी सुनहरी कविता है.बधाई.
अनूपचा अनुभवी किसान ,
इनकी बात का रखना ध्यान .
achachha kikha hai.
वैसे कवियों से सभी दुखी हैं – चिट्ठा चर्चा में भी कवितापाठ, टिप्पणियों मे भी कवितापाठ. हिंदी प्रेमियों को क्या कविताओं और भावनाओं की पेचिश के सिवा कुछ सूझता नहीं?
बहुत सही…
हंसा भी दिया और संदेश भी दे दिया
नंदन जी की कविता खूब रही।
जबरदस्त.
आपका लिखा पढ़ने वाला न रो सकता है न हँस सकता है.
सिर्फ पेट के किसी कोने में फूटती हँसी को दबा कर वाह वाह करता है…
बहुत खुब. अब आपके लेख लम्बे नहीं लगते.
हंसी की एक बच्ची है
जिसका नाम मुस्कान है
अब यह अलग बात है
कि उसमें
हंसी से कहीं ज्यादा जान है।
अतिसुन्दर पंक्तियाँ. मजा आ गया.
आपका बहुत-बहुत शुक्रिया. मैने केवल इन पंक्तियों पर ध्यान दिया -
1. जोशीजी बहुत विद्वान, मेहनती और अपनी धुन के पक्के हैं। जो ठान लेते हैं उसे पूरा करके ही दम लेते हैं
2. इनकी क्षमताऒं का क्या कहना! कुंडलिया हो या हायकू , गज़ल हो या त्रिवेणी या साहित्य की कोई और विधा हर जगह इनके ‘चरण कमल’ वंदना-प्रस्तुत मिलेंगे।
3. वे कविता लिखने जैसा महान काम करते हैं।
इन पंक्तियों को आत्मसात कर लिया -
जोशी जी, अगर आप सागरजी को हंसाना चाहते हैं तो पहले खुद हंसना सीखिये। जब आप खुद हंसेंगे तो आपके साथ के लोग अपने-आप हंसेंगे। आप निर्मल मन से राजस्थान में हंसेंगे तो उसका ठहाका हैदराबाद में सागरजी के कंठ से फूटेगा।
आपकी इस पंक्ति से मात्र असत्य झकलता है –
मुझे पता है कि जोशीजी मेरी बात मानेंगे नहीं।
कविता जानदार और लेख शानदार है। बधाई।
नंदन जी की कविता प्रस्तुत करने के लिए विशेष धन्यवाद!
जो काम आपके चेले नहीं कर पाये आज आपने कर दिया है, वाकई जिस तरह की हँसी मैं हँसना चाह रहा था, आपने हँसा ही दिया। यानि मसखरों की तरह मुँह फ़ाड़ कर नहीं ऐसी हँसी जिसमें भले ही होंठ ना हिलें पर मन में सुकून का अहसास हो, गुदगुदी हो।
मेरा साक्षात्कार भी बिल्कुल मेरे ही अंदाज में लिया है, यह अगर सत्य होता तो मैं वाकई यही करता, जिसका वर्णन आपने किया है।
गिरीराज जोशी, प्रतीक जी और भुवनेश जी को एक बार फ़िर से धन्यवाद, जिनके प्रयासों से चारे चिट्ठाकारों को एक उत्कृष्ट रचना पढ़नेको मिली।
पहले शक था अब यकिन है।
आपसे पंगा लेना ……. मतलब………….
[...] मार्च 2005 « इतना हंसो कि आंख से आंसू छलक पड़े [...]
भगवन् धन्य हैं आप, हमारी शुभकामनाएँ स्वीकारें।
फुरसतिया जी की हर पोस्ट में हास्य क्या सभी नौ रस आ जाते हैं। इनकी रचनाएं हँसने के साथ-साथ सोचने को भी बाध्य करती हैं।
bhai….yeh ‘tum toh hasney ki koshish mein mar jaogey” achcha laga….
baaki poori ki poori blog post…sar ke oopar se nikal gayi….
kaun si duniya ki bata kartey ho….
[...] चलताऊ चैनल चर्चा 2..जनकवि कैलाश गौतम 3..इतना हंसो कि आंख से आंसू छलक पड़े 4..हंसी तो भयंकर छूत की बीमारी है 5.देश [...]
[...] फ़िलहाल तो मुझे यह शेर याद आ रहा [...]