पुनि-पुनि मुनि उकसहिं अकुलाहीं

ये चुनाव जो न कराये सो कम है!

आजकल तरकश की तरफ़ से हिंदी और गुजराती के २००६ के उभरते हुये चिट्ठाकार का चुनाव चल रहा है। मजे की बात है जो साल खत्म हो रहा उसके आखिरी में उस साल का चिट्ठाकार उभर रहा है। यह कुछ ऐसा हुआ कि डूबते हुये सूरज की उभरती हुयी किरण का चुनाव! कुछ चिट्ठाकार तो चुनाव की घोषणा सुनते ही अचानक उभर आये और पहले से उभरे हुये लोगों के आगे खड़े हो गये ताकि लोग उनको देख सकें कि उभर रहे हैं। पहले से उभरे लोग इत्मिनान से खड़े थे आत्मविश्वास से कि यहां हम पहले से उभरे खड़े हैं तो दूसरे तो नहीं उभरेंगे। लेकिन लोग उनके देखते-देखते आये और उनके सामने उभर कर आगे चले गये। पहले से खड़े लोग अपने उभार में गुबार लादे फिर से उभरने का मन बना रहे हैं।

ये चुनाव भी अजीब चीज होती है। अच्छे खासे आदमी को जमूरा बना कर छोड़ती है। आदमी ऐसी-ऐसी हरकतें करने लगता है जिसके बारे में वो क्या उसके साथ वाले भी सोच तक नहीं सकते। अच्छा-खासा २४ साल का गबरू जवान चुनाव के चक्कर में पड़कर अपने मन को नालायक घोषित करके आध्यात्म की शरण में चला जाता है,समाज में मास्साब की सम्माननीय पदवी धारण करने वाले लोग बंदरों की हरकतें करने लगते हैं और अच्छे खासे उड़नतस्तरी के चालक जो कभी हवा से बातें करते समीरलाल थे वे धूनी रमा कर आशीर्वाद देने लगते हैं। स्वामी समीरानंद की हालत इस समय वैसी ही है जैसी नारद मोह के समय नारद की हो गयी थी और वे अपनी तारीफ़ में आत्मनिर्भरता की स्थिति को प्राप्त हो गये हैं। सारे सुधीजन उनको उकसा रहे हैं, उनकी तारीफ़ में कसीदे काढ़ रहे हैं और नेपथ्य से रामचरित मानस के अखंड पाठ की आवाजें आ रहीं हैं:-

पुनि-पुनि मुनि उकसहिं अकुलाहीं। देखि दशा हरि गन मुस्काहीं॥
(नारद मुनि बार-बार उचकते-अकुलाते हैं। यह देख-देखकर भगवान के गण(ब्लागर) मुस्करा रहे हैं।)

चुनाव वास्तव में क्या है? चुनाव आदमी को अपने लोगों के बीच से अलग करने की साजिश है। अच्छा-खासा सैकड़ों-हजारों के बीच सुरक्षित, अनजान मस्ती में डूबा शख्श उछालकर सामने धकेल दिया जाता है। जिस व्यक्ति ने मुंह खोलकर घर में कभी आपनी बीबी से पानी तक मांगने की हिम्मत वो व्यक्ति बीच चौराहे लाज-शरम से पल्ला झाड़कर वोट मांगने लगता है। जो जिंदगी भर अपनी सेवा तक नहीं कर पाया वह अचानक समाज सेवा की कसमें खाने लगता है। जैसे विश्व सुंदरियां दबे-कुचले,मैले-कुचैले लोगों के साथ फोटो खिंचाकर अपनी उदारता, परदुखकातरता का नगाड़ा पीटने लगती हैं वैसे ही हर चुनाव लड़ता व्यक्ति जनता से इतना सटने लगता है,इतना सटने लगता है कि जनता का जिया धड़कने लगता है- हाय, अब क्या होगा आगे! ये लगता है हमारी सेवा किये बिना मानेंगे नहीं!

चुनाव किसका होता है? अचानक फुरसतियाजी मंच पर उसी तरह टपक पड़े जिस तरह श्रीश और मनीषा-ब्लाग क्षितिज पर अचानक उभरे तथा गिरिराज और अन्य दूसरे ब्लागर्स के उभार वैसे ही ढंक गये जैसे कभी महाभारत के मैदान में भगवान वासुदेव के सुदर्शन चक्र से सूर्य का प्रकाश ढंक गया था।

जबसे सूचना का अधिकार लागू हुआ है तबसे हर सवाल का, चाहे वह कितना ही वाहियात क्यों न हो, जवाब देना कानूनी मजबूरी हो गयी है। जवाब न देने पर जुर्माना पड़ सकता है यह सोचकर शुकुलजी ने अनमने मन से जवाब दिया- चुनाव वह प्रक्रिया है जिसमें लोग अपना प्रतिनिधि चुनते हैं।

एक सवाल का जवाब देते ही शुकुलजी, फुरसतियाजी के सारे सवालों के जवाब देने के लिये बाध्य हो गये। फिर तो सवाल-जवाब ही हुये:-

फुरसतियाजी:प्रतिनिधि से क्या तात्पर्य होगा है?
शुकुलजी:प्रतिनिधि से मतलब समझ लो सैम्प्ल! बोले तो नमूने का आइटम! जो जितना बड़ा नमूना होगा उसे उतना अच्छा प्रतिनिधि माना जायेगा।

फुरसतियाजी:जरा विस्तार से समझाऒ न गुरू! समझ में नहीं आया।
शुकुलजी:तुमको कितनी बार समझाया कि ब्लागर साथियों से बात मत किया करो। सारे दिमाग का दही जम जाता है तुम्हारा। आज भी जरूर तुम किसी कवि-चिट्ठाकार से बतियाये होगे या ऐसे किसी से जो चुनाव लड़ रहा होगा। इसी से तुम्हारे दिमाग की वाट लग गयी और तुम्हें इतनी सी अखरोट भर की बात नहीं समझ आ रही है।

फुरसतियाजी:गुरू, देखो बताना हो बताओ इस तरह ऐंठो मत! एक तुम्ही अकेले गुरू नहीं हो यहां पर। जिसे देखो वही गंडा लिये बांधने के लिये बेचैन घूम रहा है। मैंने कोई तुम्हें आलतू-फालतू मेल नहीं लिखीं जो तुम मुझे इस तरह खुले आम खिल्ली उड़ाऒ।
शुकुलजी:तुमतो यार कभी-कभी ऐसी बातें करते हो कि मन करता है कि तुम्हारे समर्थन में बैठ जायें। प्रतिनिधि का मतलब यह होता है कि जैसे मान लो कुल तीन सौ लोग हैं तो इनमें से अगर कुछ ऐसे लोगों छांटे जा सकें जिनकी हरकतें सबकी हरकतों से मेल खा जायें तो ये जो कुछ लोग होंने वे सबके प्रतिनिधि माने जायेंगे। इनको झेलना सीख लिये, समझो सबसे निपट लिये।

फुरसतियाजी:चुनाव होते किस लिये हैं?
शुकुलजी:जैसे जब लोगों को कुछ नहीं समझ में आता कि क्या लिखें तब वे ब्लाग-पोस्ट लिखने लगते हैं। जब दिमाग काम नहीं करता तो लोग धूनी रमाकर बैठ जाते हैं वैसे ही जब लोगों को कुछ समझ में नहीं आता तो लोग चुनाव करने लगते हैं।

फुरसतियाजी:चुनाव में जीतता कौन है?
शुकुलजी:चुनाव में हमेशा जीत ‘छंटे हुये’ लोगों की होती है। बाकी लोग इस चुनाव प्रक्रिया में ‘छंट‘ जाते हैं। ‘छंटे हुये’ लोग हमेशा ‘छंट गये’ लोगों से कम होते हैं लेकिन हमेशा चलती छंटे हुये लोगों की ही है।

फुरसतियाजी:लोग छंट जाने पर दुखी क्यों हो जाते हैं?
शुकुलजी:छंट जाने का मतलब आपका आम लोगों में आ जाना होता है। यह आम बात है कि लोग आम में नहीं खास में शामिल होना चाहते हैं। वे छंटे हुये लोगों में शामिल होना चाहते हैं। छंट जाने पर लोगों के इस अभियान को धक्का पहुंचता है इसीलिये लोग दुख की शरण में अपने को समर्पित कर देते हैं। दुख शरणागतवत्सल होता है और वह लोगों को अपनी शरण में लेकर उनको आध्यात्म का प्रसाद बांटता है।

फुरसतियाजी:गिरिराज जोशी के नवीनतम दुख का कारण क्या है?
शुकुलजी:हर दुख का कारण मनुष्य स्वयं होता है। गिरिराज जोशीजी इस नश्वर संसार में अविश्वास के शिकार हो गये। उनको उनके गुरू समीरलाल जी ने आश्वासन दिया था कि चुनाव में हम तुम्हारे समर्थन में बैठ जायेंगे। तुम बस खड़े रहो यहां। आज समीरलाल जी स्वामी समीरानंद का बाना पहन के आये और चिमटा गाड़कर धूनी रमा ली। अब गिरिराज उनको वायदे की याद दिला रहे हैं तो वे इशारे कह रहे हैं- बेटा,पुराने जमाने में गुरुऒं का झोला-बस्ता उठाने का रिवाज था। जिसने जितने झोले ढोये वो उतना प्रतापी चेला कहलाता था। आज आधुनिक युग है। अब झोले के साथ लैपटाप भी उठाना पड़ेगा।

फुरसतियाजी:लेकिन समीरलाल जी ने ये साधू का बाना बनाया क्यों? किस लिये उन्होंने धूनी रमा ली?
शुकुलजी: आजकल जैसा तुम देखते हो कि सीधे आदमी की गुजर नहीं है। सीधा-सच्चा आदमी हमेशा पिट जाता है। सच्चाई हमेशा मुल्ल्मे से मार खाती है। अब समीरलाल जी सीधे-सच्चे आदमी हैं। कवि हैं, लेखक हैं, कुंडलिया लिखते हैं, हायकू हांकते हैं, त्रिवेणी रचते हैं, हंसी-मजाक करते हैं। लोगों का ख्याल रखते हैं। ब्लागर्स की पोस्ट पर टिप्पणी करके उनका हौसला बढ़ाते हैं। कई बार तो ऐसा होता है कि लोग अपनी पोस्ट प्रकाशित नहीं कर पाते इसके पहले ही समीरलालजी टिप्पणी कर देते हैं- बहुत अच्छा लिखा है। आगे भी इंतजार रहेगा आपके लेखन का। कुछ लोग बताते हैं कि अभी जब कवि सम्मेलन के लिये वासिंगटन गये तो इनकी कविताऒं से लोग बहुत प्रभावित हुये। एक प्रशंसक महिला ने इनका आटोग्राफ़ लेने के लिये किताब कोरे पन्नों की डायरी इनको दी तो इन्होंने मुस्कराते हुये खाली पन्ने पर लिखा -बहुत अच्छा लिखतीं हैं, लिखतीं रहें।

तो जब ऐसा आदमी किसी भी चुनाव में खड़ा होता है तो उसे लोग सीधा आदमी समझकर उससे कट लेते हैं। इसीलिये समीरलाल जी ने ये लटके-झटके किये ताकि लोगों को पता चले कि ये भी कोई कम ‘रागिया‘ नहीं हैं। छंटे हुये लोगों में सुमार किये जाने के लिये क्या-क्या पापड़ बेलने पड़ते हैं आदमी को! ऐसे मौसम में जब कनाड़ा में पेंग्विन तक कम्बल ओढ़ के बर्फ पर फुदकती हैं समीरानंदजी का धूनी रमाना चिमटा फटकारना यह बताने का प्रयास है कि उनको किसी से हल्का न आंका जाये। हर तरह की हरकत वे कर सकते हैं। वे मौन होकर मुखर संदेश दे रहे हैं- तुम मुझे वोट दो, मैं तुम्हें मनोरंजन दूंगा।

इतना कहते-कहते शुकुलजी सरपट निकल लिये। सरपटियाते हुये बोले, अभी हम वोट देने जा रहे हैं। फिलहाल इतना छाप दो , बाकी का बाद में छाप बतायेंगे। कामर्शियल ब्रेक के बाद!

मेरी पसंद

हंसी कम होती जा रही है धरती पर
अब तो नाटकों में विदूषक और सर्कसों में मसखरे भी
कभी कभार ही दिखते हैं
अपनी तमाम कोशिशों के बाद भी वे बामुश्किल हंसा पाते हैं
हमारे समय के बच्चों को।

हालांकि कारों की संख्या बढ़ रही है सड़कों पर
हालांकि आंखों के आसपास ज्यादा रंगीन द्र्श्य हैं इन दिनों
हालांकि प्रौद्यौगिकी ने पहले से कहीं ज्यादा आसान
बनाया है इस जीवन को
हालांकि चीजों से इतने लदे हुये हैं बाजार
कि एक चीज लेना चाहो तो दस चीजें
हमला बोल देती हैं जेब पर
हालांकि रोशनी ही रोशनी है चारों तरफ
इतनी रोशनी है कि कुछ भी देख पाना नामुमकिन है।

हालांकि इतना झूठ और इतना व्यभिचार और इतना कचरा इकट्ठा
हो गया है धरती पर
कि लगता है धरती एक तरफ़ झुकती जा रही है।

आकड़े कहते हैं उन्नीस सौ पचास में
जब भयानक मंदी का दौर था
तब भी आज से ज्यादा हंसने के पल थे आदमी के पास
हालांकि न उतनी भयानक मंदी है न उतनी निराशा
पर आत्महत्या के आंकड़े बढ़ते ही जाते हैं दिनों दिन।

अपराध बढ़ रहे हैं धरती पर
ज्यादा खूंखार और ताकतवर हो रहे हैं अपराधी।

ऒ मेरे समय के लोगों!
मैं अनुरोध करता हूं कि हंसो
शासक की अंधी ताकत से बचने के लिये डर कर नहीं
हंसो कि हंसने के पल कम होते जा रहे हैं हमारी धरती पर
हंसो कि विरोध करने की ताकत कम हो रही है
हमारे समाज में
हंसो कि स्वप्न देखने का रोमान चुक रहा है!
हंसो!!

राजेश जोशी
बया, दिसम्बर,२००६ अंक से साभार

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

13 Comments

  1. श्रीश । ई-पंडित

    हे हास्य रस के देवता, मैं आपकी स्तुति किस तरह करुँ। हास्य तो बहुत लोग लिखते हैं लेकिन उनमें और आपमें फर्क यह है कि बाकी लोग जहाँ हास्य के बारे में सोच कर लिखते हैं वहीं आप बिना यत्न के जो लिखते हैं वही हास्य बन जाता है। आपके हास्य में हरिशंकर परसाई जैसा पुट है। अब जाकर समझ आया कि लोग आपको व्यंग्यराज क्यों कहते हैं। कुछ हमें भी आशीर्वाद दो गुरुदेव आजकल हास्य वाले ही ब्लॉग हिट हो रहे हैं।

    कई बार तो ऐसा होता है कि लोग अपनी पोस्ट प्रकाशित नहीं कर पाते इसके पहले ही समीरलालजी टिप्पणी कर देते हैं- बहुत अच्छा लिखा है। आगे भी इंतजार रहेगा आपके लेखन का। कुछ लोग बताते हैं कि अभी जब कवि सम्मेलन के लिये वासिंगटन गये तो इनकी कविताऒं से लोग बहुत प्रभावित हुये। एक प्रशंसक महिला ने इनका आटोग्राफ़ लेने के लिये किताब इनको दी तो इन्होंने मुस्कराते हुये खाली पन्ने पर लिखा -बहुत अच्छा लिखतीं हैं, लिखतीं रहें।

    हँस-हँस कर…. (बोलने के लिए शब्द नहीं हैं)

  2. राकेश खंडेलवाल

    जाकी रही भावना जैसी
    प्रभु मूरत तिन देखी वैसी
    चेला हो या हो फिर गुरुवर
    सबकी होली ऐसी तैसी
    चक्कर में आकर चुनाव के
    हालत कोल्हू वाले जैसी.

    वैसे एक स्पष्टीकरण है. वाशिंगटन के कवि सम्मेलन में कुंडली नरेश को किताब समर्पित नहीं हुई थी , वह कोरे पन्नों की डायरी थी जिस पर उन्होने टिप्पणी लिखी कि ” कमाल का लिखती हैं आप. ऐसे ही लिखते रहिये”

  3. समीर लाल

    बहुत अच्छा लिखते हो, लिखते रहो…. हा हा :)

    अरे महाराज, काहे जान निकाल कर ही मानोगे क्या?

    सही लिखे हैम वैसे…यह नारा पहले देना था ना!!

    तुम मुझे वोट दो, मैं तुम्हें मनोरंजन दूंगा।

    वादा रहा ;)

    लिखे तो जबरदस्त हो!! बधाई.

  4. जगदीश भाटिया

    बहुत खूब, :)
    चिट्ठा जगत की ताजा घटनाओं के साथ साथ साहित्यिक जगत से भी कुछ नया पेश करते रहते हैं आप।
    अच्छी कविता राजेश जोशी की।

  5. संजय बेंगाणी

    हा हा हा
    तो इसबार समीरलालजी चपेट में आ गए. :)

  6. पंकज बेंगाणी

    मै सोच ही रहा था, कि आपने मास्साब की अभी तक खबर कैसे नही ली। हा हा हा हा

    द्रोण चाचा, आपकी उलाहना भी मिश्री सी मिठी है। :)

    वैसे मेरी बन्दर सिरीज जारी रहेगी…. आप पढते रहेंगे ऐसी आशा है।

    और मै अब मास्साब नही हुँ…. मैने त्यागपत्र दे दिया है। नए मास्साब श्रीश हैं। ;)

  7. तरूण

    जिस तरह आप के हाथ लंबी लंबी पोस्ट लिखने के लिये बेताब रहते हैं ठीक उसी तरह समीर जी के हाथ टिप्पणी करने के लिये। मुझे मेरी एक पोस्ट का पता तो उनकी टिप्पणी से चला, उसके बाद यही सोचता रहा कि आखिर मैने ये पोस्ट कब लिखी। समीर जी याद है वो टेस्ट वाली टिप्पणी….

    दरअसल ये पोस्ट श्रीश के बताये माइक्रोसोफ्ट टूल के उपयोग में लाने से आटोमैटिक डली थी। आप दोनों यानि फुरसतिया और समीरानंद दोनो के लिये यही कह सकते हैं कि ‘गुरू, गोविंद दोऊ खडे‌……..”

  8. ratna

    तुमको कितनी बार समझाया कि ब्लागर साथियों से बात मत किया करो। सारे दिमाग का दही जम जाता है तुम्हारा। आज भी जरूर तुम किसी कवि-चिट्ठाकार से बतियाये होगे या ऐसे किसी से जो चुनाव लड़ रहा होगा। इसी से तुम्हारे दिमाग की वाट लग गयी और तुम्हें इतनी सी अखरोट भर की बात नहीं समझ आ रही है।
    क्या बात कही है! पर दही की पौष्टिकता साफ़ नज़र आ रही है। ऐसे ही बतियाते रहे और बढ़िया लेख चिपकाते रहे।

  9. सृजन शिल्पी

    :-)

  10. गिरिराज जोशी "कविराज"

    लगता है आपको कविताएँ सुनानी पड़ेगी :-)

    आलेख हमेशा की तरह जानदार लगा.

  11. समीर लाल

    वैसे एक स्पष्टीकरण है. वाशिंगटन के कवि सम्मेलन में कुंडली नरेश को किताब समर्पित नहीं हुई थी , वह कोरे पन्नों की डायरी थी जिस पर उन्होने टिप्पणी लिखी कि ” कमाल का लिखती हैं आप. ऐसे ही लिखते रहिये”


    मै तो सोच रहा था, फुरसतियाजी ने किताब कह दिया है, बहुत बचे. भूल ही गया था राकेश भाई आते ही होंगे स्पष्टीकरण लेकर. :) :)
    खुब रही भाई…अब आदत ही ऐसी हो गई है कि कल रात खाने में सब्जी मैने बनाई. सबने चुपचाप खा ली. सोने जाते वक्त मैने मेडम से पूछा कि सब्जी बेकार बनीं थी क्या!! बोलीं, नहीं तो बहुत अच्छी बनी थी, ऐसा क्यूँ सोच रहे हैं. मैने कहा तुम्हारी कोई टिप्पणी नहीं आई, इसलिये…
    :) :)

  12. मनीष

    बहुत मजेदार रहा आपका ये लेख!

  13. विवेक सिंह

    आपको इतना रगड़ रगड़कर धोते देखकर लगता है कि आप बहुत सफ़ाई पसंद व्यक्ति होंगे :)

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