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	<title>Comments on: चिट्ठाकारी- पांच सवाल, पांच जवाब</title>
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	<description>हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै?</description>
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		<title>By: सीमा कुमार</title>
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		<dc:creator>सीमा कुमार</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 28 Feb 2007 08:17:49 +0000</pubDate>
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		<description>मैं भी पढ़ गई .. लभग पूरी पढ़ गई !

आप तो मुझे भी लिखवा कर छोड़ेंगे ;) !!

ये तो थी मजाक की बात । अपना कहा मुझे अच्छी तरह याद है । हाँ, लिखने की गति थोडी़ (या बहुत ) धीमी है । पर लिखूँगी जरूर । आजकल अपने एक सपने को पूरा करने की तरफ भी कुछ काम कर रही हूँ जिसमें काफी समय लग जाता है (यह देखें http://bluenblaze.com/ ) &#124; और भाई की शादी भी है अगले हफ्ते :) ।

वैसे याद दिलाने के लिए तथा प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद । आपके इस लंबे लेख को भी पढ़ कर काफी अच्छा लगा ।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मैं भी पढ़ गई .. लभग पूरी पढ़ गई !</p>
<p>आप तो मुझे भी लिखवा कर छोड़ेंगे <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_wink.gif' alt=';)' class='wp-smiley' />  !!</p>
<p>ये तो थी मजाक की बात । अपना कहा मुझे अच्छी तरह याद है । हाँ, लिखने की गति थोडी़ (या बहुत ) धीमी है । पर लिखूँगी जरूर । आजकल अपने एक सपने को पूरा करने की तरफ भी कुछ काम कर रही हूँ जिसमें काफी समय लग जाता है (यह देखें <a href="http://bluenblaze.com/" rel="nofollow">http://bluenblaze.com/</a> ) | और भाई की शादी भी है अगले हफ्ते <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' />  ।</p>
<p>वैसे याद दिलाने के लिए तथा प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद । आपके इस लंबे लेख को भी पढ़ कर काफी अच्छा लगा ।</p>
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	<item>
		<title>By: हरिराम</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/246/comment-page-1#comment-7274</link>
		<dc:creator>हरिराम</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 26 Feb 2007 09:48:05 +0000</pubDate>
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		<description>फलेंगे जब समग्र हिन्दी सेवियों के ये ऑन-लाइन विचार-विनिमय
एकदिन मिलेंगे 1 रुपये में 49 डॉलर, तब होगा भारतोदय चिन्मय</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>फलेंगे जब समग्र हिन्दी सेवियों के ये ऑन-लाइन विचार-विनिमय<br />
एकदिन मिलेंगे 1 रुपये में 49 डॉलर, तब होगा भारतोदय चिन्मय</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: फुरसतिया &#187; मेरी पसन्द की कुछ कवितायें</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/246/comment-page-1#comment-7260</link>
		<dc:creator>फुरसतिया &#187; मेरी पसन्द की कुछ कवितायें</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 25 Feb 2007 18:20:06 +0000</pubDate>
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		<description>[...] पिछ्ली पोस्ट में हिंदीब्लागर जी ने विष्णु खरे की कविता पसंद की। यह कविता तद्भव के नयें अंक १५ में आयी थी। तद्भभव तैमासिक पत्रिका है। कथाकार अखिलेश के संपादन में निकलने वाली यह पत्रिका मुझे समकालीन साहित्यिक पत्रिकाऒं में सबसे अच्छी लगती है। तद्भव के इसी अंक में कुछ और भी मजेदार कवितायें छपी हैं। इसमें आशीष त्रिपाठी ने समकालीन कवियों की कुछ कविताऒं की समीक्षा की है। मैं इनमें से कुछ कवितायें यहां पोस्ट कर रहा हूं, शायद साथियों को अच्छी लगें&#124; [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] पिछ्ली पोस्ट में हिंदीब्लागर जी ने विष्णु खरे की कविता पसंद की। यह कविता तद्भव के नयें अंक १५ में आयी थी। तद्भभव तैमासिक पत्रिका है। कथाकार अखिलेश के संपादन में निकलने वाली यह पत्रिका मुझे समकालीन साहित्यिक पत्रिकाऒं में सबसे अच्छी लगती है। तद्भव के इसी अंक में कुछ और भी मजेदार कवितायें छपी हैं। इसमें आशीष त्रिपाठी ने समकालीन कवियों की कुछ कविताऒं की समीक्षा की है। मैं इनमें से कुछ कवितायें यहां पोस्ट कर रहा हूं, शायद साथियों को अच्छी लगें| [...]</p>
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	<item>
		<title>By: फ़ुरसतिया</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/246/comment-page-1#comment-7225</link>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 22 Feb 2007 20:13:36 +0000</pubDate>
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		<description>@&lt;b&gt; &lt;/b&gt;
@&lt;b&gt; &lt;/b&gt;
@&lt;b&gt;रजनीजी&lt;/b&gt;, शुक्रिया। देखिये आप हमारे नामराशि से भी कहिये कि वे भी कुछ प्रभावित हॊं! :)
@&lt;b&gt;शुऐब&lt;/b&gt;, पसंद का शुक्रिया!
@&lt;b&gt;मृणाल, &lt;/b&gt; प्रभावित होने के लिये क्या कहें! घटनाऒं पर भी तो हमारा बस नहीं! :)
@&lt;b&gt;भुवनेश, &lt;/b&gt;इंतजार खत्म! अब का करोगे?
@&lt;b&gt; उन्मुक्तजी&lt;/b&gt; :)
@&lt;b&gt;बेजीजी,&lt;/b&gt;मैथिलीजी, जुर्म चाहे एक बार किया जाये या सौ बार, सजा ही मिलती है। आपने एक पोस्ट लिखी अब आप दीजिये जवाब!:)
@&lt;b&gt; समीरलालजी,&lt;/b&gt; धन्यवाद! पूछिये हम कोई डरते थोड़ी न हैं सवालों से।
@&lt;b&gt;अभिनव,&lt;/b&gt;गुरुजी वाली पोस्ट हमारी सबसे पसंदीदा पोस्ट लगती है। उनकी याद से ही आत्मविश्वास की अनुभूति होती है। किताब, सीडी के लिये अग्रिम शुक्रिया। ब्लागर चुनाव जीतना हमारा कभी ध्येय नहीं रहा। इसीलिये इसके लिये हमने वोट भी नहीं मांगे। हां, सबका परिचय दे दिया। इस उद्धेश्य से कि लोग अपनी उदासीनता त्यागकर शायद वोटिंग करने आयें। जहां तक सबसे बढ़िया ब्लागर के इनाम की बात तो वो हमें तुम्हारे टिप्पणी से ही मिल गया। शुक्रिया।:)
@&lt;b&gt;अंतर्मन,&lt;/b&gt;शुक्रिया!
@&lt;b&gt; अमित ,&lt;/b&gt;शुक्रिया!
@&lt;b&gt;स्वामी,&lt;/b&gt; यह सच है कि हमारे लेखन के जारी रहने में हिंदिनी पर लिखने का भी बहुत कुछ हाथ है। अब तुम जीनत समझो या कुछ भटकटैया,मजबूरी है!:) यह भी सच है कि समय के साथ नेट पर हिंदी की प्रगति के लिये प्रयास करने का मन बनता गया है!
@&lt;b&gt;नीरज दीवान, &lt;/b&gt; शुक्रिया, भारत भ्रमण पर जाने क्यों चलने  के पहले हम दिल्ली में तुमसे मुलाकात करने आयेंगे।
@&lt;b&gt;मानसी, &lt;/b&gt; शुक्रिया!:)
@&lt;b&gt; श्रीश,&lt;/b&gt;शुक्रिया। हम कहानी सुनाते रहेंगे!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>@<b> </b><br />
@<b> </b><br />
@<b>रजनीजी</b>, शुक्रिया। देखिये आप हमारे नामराशि से भी कहिये कि वे भी कुछ प्रभावित हॊं! <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /><br />
@<b>शुऐब</b>, पसंद का शुक्रिया!<br />
@<b>मृणाल, </b> प्रभावित होने के लिये क्या कहें! घटनाऒं पर भी तो हमारा बस नहीं! <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /><br />
@<b>भुवनेश, </b>इंतजार खत्म! अब का करोगे?<br />
@<b> उन्मुक्तजी</b> <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /><br />
@<b>बेजीजी,</b>मैथिलीजी, जुर्म चाहे एक बार किया जाये या सौ बार, सजा ही मिलती है। आपने एक पोस्ट लिखी अब आप दीजिये जवाब!:)<br />
@<b> समीरलालजी,</b> धन्यवाद! पूछिये हम कोई डरते थोड़ी न हैं सवालों से।<br />
@<b>अभिनव,</b>गुरुजी वाली पोस्ट हमारी सबसे पसंदीदा पोस्ट लगती है। उनकी याद से ही आत्मविश्वास की अनुभूति होती है। किताब, सीडी के लिये अग्रिम शुक्रिया। ब्लागर चुनाव जीतना हमारा कभी ध्येय नहीं रहा। इसीलिये इसके लिये हमने वोट भी नहीं मांगे। हां, सबका परिचय दे दिया। इस उद्धेश्य से कि लोग अपनी उदासीनता त्यागकर शायद वोटिंग करने आयें। जहां तक सबसे बढ़िया ब्लागर के इनाम की बात तो वो हमें तुम्हारे टिप्पणी से ही मिल गया। शुक्रिया।:)<br />
@<b>अंतर्मन,</b>शुक्रिया!<br />
@<b> अमित ,</b>शुक्रिया!<br />
@<b>स्वामी,</b> यह सच है कि हमारे लेखन के जारी रहने में हिंदिनी पर लिखने का भी बहुत कुछ हाथ है। अब तुम जीनत समझो या कुछ भटकटैया,मजबूरी है!:) यह भी सच है कि समय के साथ नेट पर हिंदी की प्रगति के लिये प्रयास करने का मन बनता गया है!<br />
@<b>नीरज दीवान, </b> शुक्रिया, भारत भ्रमण पर जाने क्यों चलने  के पहले हम दिल्ली में तुमसे मुलाकात करने आयेंगे।<br />
@<b>मानसी, </b> शुक्रिया!:)<br />
@<b> श्रीश,</b>शुक्रिया। हम कहानी सुनाते रहेंगे!</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: श्रीश शर्मा 'ई-पंडित'</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/246/comment-page-1#comment-7216</link>
		<dc:creator>श्रीश शर्मा 'ई-पंडित'</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 22 Feb 2007 00:12:48 +0000</pubDate>
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		<description>वाह वाह शुकुल जी, आपके संस्मरण पढ़कर आनन्द आ गया। आगे भी ऐसे ही नए लोगों को पुराने दिनों की कहानी सुनाते रहिएगा।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>वाह वाह शुकुल जी, आपके संस्मरण पढ़कर आनन्द आ गया। आगे भी ऐसे ही नए लोगों को पुराने दिनों की कहानी सुनाते रहिएगा।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: मानसी</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/246/comment-page-1#comment-7214</link>
		<dc:creator>मानसी</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 21 Feb 2007 21:36:41 +0000</pubDate>
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		<description>आपका एक और साबूनुमा लेख (बकौल नीरज दीवान) पढ़ कर और आपके बारे में और जान कर अच्छा लगा।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आपका एक और साबूनुमा लेख (बकौल नीरज दीवान) पढ़ कर और आपके बारे में और जान कर अच्छा लगा।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: नीरज दीवान</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/246/comment-page-1#comment-7211</link>
		<dc:creator>नीरज दीवान</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 21 Feb 2007 12:12:28 +0000</pubDate>
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		<description>‘अब कबतक ई होगा ई कौन जानता है&#039; कोई नहीं जानता था.. फुरसतिया जी. कल्पना से परे था.. मैं १९९९ से इंटरनेट पर विचरता रहा और मेरी बांछे तब खिली जब मैंने जीतू भाई, आपका और रतलामी जी का पन्ना देखा. ये खुशी गूंगे का गुड़ थी. पूरे पांच साल बाद मैने अपनी भाषा में लिखा अपनी कम्प्यूटर स्क्रीन पर देखा था. आप परसाई जी के महाविद्यालय के प्रोफ़ेसर बन चुके हैं. आपका लिखा लंबा हो या छोटा. अपने आप में पूर्णता लिए होता है. आपको ही पढ़-पढ़कर अपने भीतर भी लिखने की आकांक्षा हिलोरी मारती है. यह रिश्ता यूं ही बना रहे और हिन्दी ब्लॉगजगत का गुलशन खिला रहे. देर से अपनी बात कह रहा हूं क्योंकि इसे वाकयी मे फुरसत से पढ़ा जाता है. सरसरी निगाहों में ये छबि बसती नहीं.. खुदा ने फुरसत से बनाया है फुरसतिया के इस पन्ने को. तो पढ़ने वाले भी फुरसत में दिल लगाकर पढ़ा करते हैं. मेरी शुभकामनाएं स्वीकार करें. 
अब ये बताएं कि भारत भ्रमण पर निकल कब रहे हैं. कम से कम इतना तो मुमकिन हो कि दिल्ली प्रवास पर आएं और मुलाक़ात हो.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>‘अब कबतक ई होगा ई कौन जानता है&#8217; कोई नहीं जानता था.. फुरसतिया जी. कल्पना से परे था.. मैं १९९९ से इंटरनेट पर विचरता रहा और मेरी बांछे तब खिली जब मैंने जीतू भाई, आपका और रतलामी जी का पन्ना देखा. ये खुशी गूंगे का गुड़ थी. पूरे पांच साल बाद मैने अपनी भाषा में लिखा अपनी कम्प्यूटर स्क्रीन पर देखा था. आप परसाई जी के महाविद्यालय के प्रोफ़ेसर बन चुके हैं. आपका लिखा लंबा हो या छोटा. अपने आप में पूर्णता लिए होता है. आपको ही पढ़-पढ़कर अपने भीतर भी लिखने की आकांक्षा हिलोरी मारती है. यह रिश्ता यूं ही बना रहे और हिन्दी ब्लॉगजगत का गुलशन खिला रहे. देर से अपनी बात कह रहा हूं क्योंकि इसे वाकयी मे फुरसत से पढ़ा जाता है. सरसरी निगाहों में ये छबि बसती नहीं.. खुदा ने फुरसत से बनाया है फुरसतिया के इस पन्ने को. तो पढ़ने वाले भी फुरसत में दिल लगाकर पढ़ा करते हैं. मेरी शुभकामनाएं स्वीकार करें.<br />
अब ये बताएं कि भारत भ्रमण पर निकल कब रहे हैं. कम से कम इतना तो मुमकिन हो कि दिल्ली प्रवास पर आएं और मुलाक़ात हो.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: eswami</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/246/comment-page-1#comment-7207</link>
		<dc:creator>eswami</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 21 Feb 2007 05:54:36 +0000</pubDate>
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		<description>फ़ूल जो बाग की ज़ीनत ठहरा 
मेरी आंखों मे खिला था पहले 

आज इस बात पर गर्व महसूस होता है की आपका पहला लेख पढ कर ही मैने हिंदिनी बनाने की सोची थी. 

कुछ दिन पहले पंकज बैंगानी पूछ रहे थे की आपने और हमने हिंदिनी और तरकश को एक साथ जूमला पर लाने की बात की थी - आप हिंदिनी को जूमला पर कब ला रहे हैं? 
मैंने उन्हे बताया की भाई हिंदिनी को जूमला पर लाने का एकमात्र तरीका ये है की पूरी नई साईट हो उस पर पुराने लेख भी हों और साथ ही हमारे ब्लाग जैसे हैं वो भी वैसे के वैसे रहें. कारण ये है की फ़ुरसतियाजी के लेखों की इतनी ट्रेकबैक और कडियां सहेजी गई हैं की उन्हें हटा नही सकते. ऐसा है आपका लेखन - पाठकों ने कडियां तक सहेजी हुई हैं - खुद मैने भी.

इतना प्रेम मिला है की आज हिंदिनी पर ६०% लोग सीधे आते हैं. हिंदिनी नेटवर्क बढाने की चाह तो होती है लेकिन आपकी टक्कर के लिखने वाले और नियमित, अनुशासित ब्लागर्स कहां से लाऊं? अतुल व्यस्त है, गोविंदजी के पास हार्डवेयर की समस्या है, इंद्र अवस्थीजी तो धूमकेतू के समान बरसों में एक टिप्पणी कर के गायब हैं. 

इस स्थिती में सुधार जरूरी है. मैं एक लेख को चार साईट्स पर छाप कर हिंदी की सेवा करने में यकीन नही करता - नए कद्दावरों वाली नई साईट को देखने में जरूर करता हूं. दोहराव नहीं. 

आज हिंदिनी के काऊंटर नही देखते हैं हम वो गौण बात है, साईट पर परिचय के पन्ने जोडना बकाया हैं. लेकिन आज उससे अधिक विकिपीडिया के बारे में लेख सब तक पहुंचाना प्राथमिक हो जाता है - हमारी प्राथमिकताएं तो सुधरी हैं. 

आशा है की आपकी प्राथमिकताओं, लेखन और अनुशासन से वो हिंदी प्रेमी भी सीख लेंगे जिन्हे कई नए ब्लागर इस लिये नही पढ पाए की वे किन्ही कारणों से लिखना बंद कर चुके -और वे हिंदी को नेट पर लाने, बढानें में अपने योगदान का अंश जोडना भूल चुके. जिन्हें पढना और जिनके साथ काम करना आपको और मुझे प्रिय रहा है.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>फ़ूल जो बाग की ज़ीनत ठहरा<br />
मेरी आंखों मे खिला था पहले </p>
<p>आज इस बात पर गर्व महसूस होता है की आपका पहला लेख पढ कर ही मैने हिंदिनी बनाने की सोची थी. </p>
<p>कुछ दिन पहले पंकज बैंगानी पूछ रहे थे की आपने और हमने हिंदिनी और तरकश को एक साथ जूमला पर लाने की बात की थी &#8211; आप हिंदिनी को जूमला पर कब ला रहे हैं?<br />
मैंने उन्हे बताया की भाई हिंदिनी को जूमला पर लाने का एकमात्र तरीका ये है की पूरी नई साईट हो उस पर पुराने लेख भी हों और साथ ही हमारे ब्लाग जैसे हैं वो भी वैसे के वैसे रहें. कारण ये है की फ़ुरसतियाजी के लेखों की इतनी ट्रेकबैक और कडियां सहेजी गई हैं की उन्हें हटा नही सकते. ऐसा है आपका लेखन &#8211; पाठकों ने कडियां तक सहेजी हुई हैं &#8211; खुद मैने भी.</p>
<p>इतना प्रेम मिला है की आज हिंदिनी पर ६०% लोग सीधे आते हैं. हिंदिनी नेटवर्क बढाने की चाह तो होती है लेकिन आपकी टक्कर के लिखने वाले और नियमित, अनुशासित ब्लागर्स कहां से लाऊं? अतुल व्यस्त है, गोविंदजी के पास हार्डवेयर की समस्या है, इंद्र अवस्थीजी तो धूमकेतू के समान बरसों में एक टिप्पणी कर के गायब हैं. </p>
<p>इस स्थिती में सुधार जरूरी है. मैं एक लेख को चार साईट्स पर छाप कर हिंदी की सेवा करने में यकीन नही करता &#8211; नए कद्दावरों वाली नई साईट को देखने में जरूर करता हूं. दोहराव नहीं. </p>
<p>आज हिंदिनी के काऊंटर नही देखते हैं हम वो गौण बात है, साईट पर परिचय के पन्ने जोडना बकाया हैं. लेकिन आज उससे अधिक विकिपीडिया के बारे में लेख सब तक पहुंचाना प्राथमिक हो जाता है &#8211; हमारी प्राथमिकताएं तो सुधरी हैं. </p>
<p>आशा है की आपकी प्राथमिकताओं, लेखन और अनुशासन से वो हिंदी प्रेमी भी सीख लेंगे जिन्हे कई नए ब्लागर इस लिये नही पढ पाए की वे किन्ही कारणों से लिखना बंद कर चुके -और वे हिंदी को नेट पर लाने, बढानें में अपने योगदान का अंश जोडना भूल चुके. जिन्हें पढना और जिनके साथ काम करना आपको और मुझे प्रिय रहा है.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: Amit</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/246/comment-page-1#comment-7206</link>
		<dc:creator>Amit</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 21 Feb 2007 05:21:07 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://hindini.com/fursatiya/?p=246#comment-7206</guid>
		<description>वाह वाह, आज तो मैं भी पूरी पोस्ट पढ़ गया, वरना यदा कदा जब भी टिप्पणी होती थी तो फ़ुरसतिया जी इश्टाईल होती थी, यानि कि केवल टिप्पणियाँ पढ़कर टिप्पणी देना!! ;) :P</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>वाह वाह, आज तो मैं भी पूरी पोस्ट पढ़ गया, वरना यदा कदा जब भी टिप्पणी होती थी तो फ़ुरसतिया जी इश्टाईल होती थी, यानि कि केवल टिप्पणियाँ पढ़कर टिप्पणी देना!! <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_wink.gif' alt=';)' class='wp-smiley' />  <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_razz.gif' alt=':P' class='wp-smiley' /> </p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: अन्तर्मन</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/246/comment-page-1#comment-7202</link>
		<dc:creator>अन्तर्मन</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 21 Feb 2007 03:00:54 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://hindini.com/fursatiya/?p=246#comment-7202</guid>
		<description>हमेशा की तरह मज़ा आ गया पढ़ के!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>हमेशा की तरह मज़ा आ गया पढ़ के!</p>
]]></content:encoded>
	</item>
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