अपनी पिछली पोस्ट में मैंने इन सवालों के बारे में लिखने को कहा था-
नीलिमा का मन लिंकित क्यों है?
सृजन शिल्पी का मन चिंतित क्यों है?
आशीष अभी तक कुंवारा क्यों हैं?
गिरिराज अपने गुरु का इतना प्यारा क्यॊ है?
लेकिन जब तक हम इन पर पोस्ट लिखें तब तक लिखने के सारे बहाने हवा हो गये। एक तो होली बीत गयी। दूसरे नीचे के सारे सवाल अप्रासंगिक हो गये। समीरलाल जी ने संकेत दिया कि गिरिराज ने चूंकि उनकी ठीक तरह से टिप्पणी सेवा नहीं की दूसरे उनके इंटरव्यू में गिरिराज ने श्रद्धा कम गोलमोल शैतानी ज्यादा दिखायी थी लिहाजा अब वह प्यारा है लेकिन उतना प्यारा नहीं रहा।आशीष का कुंवारापन भी अब चंद दिनों का मेहमान है और संभव है कि साल के अंत में आशीष सपत्नीक आपको नये साल की शुभकामनायें निवेदित करें। सृजन शिल्पी ने भी सूचित किया कानपुर में हमारे और राजीव टंडन के दर्शन करते ही उनकी सारे चिंताऒं ने उनको तलाक दे दिया। अब इसके बाद केवल नीलिमा के लिंकिन मन के बारे में लिखने की बात बेवकूफी की बात लगी- वैसे भी आज महिला दिवस है।
जब उपरोक्त बात को बेवकूफी की बात मानकर मैंने लिखना स्थगित किया तो मुझे ब्लाग,ब्लागर,ब्लागिंग के अपनेसुभाषित याद आ गये। इसमें मैंने लिखा था- जब आप अपने किसी विचार को बेवकूफी की बात समझकर लिखने से बचते हैं तो अगली पोस्ट तभी लिख पायेंगे जब आप उससे बड़ी बेवकूफी की बात को लिखने की हिम्मत जुटा सकेंगे।
लिहाजा हमने और बड़ी बेवकूफी की बात लिखने के लिये अपने को तैयार किया और हिंदी ब्लाग जगत के में छिड़ी चर्चा के बारे में लिखने की हिम्मत जुटा ली।
आजकल ब्लाग जगत में मजेदार चर्चा छिड़ी है -साम्प्रदायिकता की। इस पर हमारे कानपुर के ही मेरे प्रिय गीतकार विनोद श्रीवास्तव का मुक्तक है:-
धर्म छोटे-बड़े नहीं होते ,
जानते तो लड़े नहीं होते.
चोट तो फूल से भी लगती है,
सिर्फ पत्थर कड़े नहीं होते.
संजय बेंगाणी का विचार है कि मोहल्ले वाले लोग उद्देश्यपूर्ण तरीके से साम्प्रदायिकता फैलाने की कोशिश कर रहे हैं इसलिये उनको नारद से हटा दिया जाये।
ज्यादातर लोग इससे सहमत नहीं हैं और मैं भी मोहल्ले वाले ब्लाग को नारद से हटाना ठीक नहीं मानता।
इसके पहले लोकमंच की श्रेणी बदली गयी। लोकमंच वाले साथी एक दिन में दस-दस तक पोस्टें समाचार प्रधान लिखते हैं इसलिये कुछ लोगों का विचार था कि इसकी कुछ व्यवस्था की जाये। वैसे एक तरह से देखा जाये तो यह अन्याय है कि ज्यादा पोस्ट करने का खामियाजा किसी को उसको किनारे होकर भुगतना पड़े। लेकिन बाद में शशि सिंह ने इस बात पर सहमति जाहिर की कि वे लोकमंच के दिन भर के लेखों की जानकारी एक पोस्ट में देंगे और वह पोस्ट नारद में आयेगी।
यह सुझाव देबाशीष ने दिया था। अब तो लोकमंच जल्दी ही जूमला पर प्रकाशित होगी जिसके चलते इस साइट की नारद पर निर्भरता खत्म हो जायेगी।
यह जानकारी उन लोगों के लिये है जिनके मन में यह भम है कि लोकमंच की कैटेगरी में बदलाव देबाशीष के कहने से हुआ या देबू लोकमंच के खिलाफ़ हैं। देबाशीष किसी भी तरह की पाबंदी के समर्थन में नहीं है।
यह संयोग है कि लोकमंच की श्रेणी बदलने का कार्यान्वयन, नारद की सीमाऒं के चलते, कुछ पाठकों की मांग पर जीतेंन्द्र ने किया जिनके बारे शुरुआती दिनों में हम लोग कहा करते थे कि जीतू के रहते हुये चिट्ठाविश्व पर और किसी ब्लाग के दिखने का खतरा मिट जाता है। वे धुआंधार लिखते थे और कभी-कभी तो चिट्ठाविश्व का अधिकांश हिस्सा वे घेरे लेते। अब यह बात अलग है कि चिट्ठाविश्व में पोस्ट आने तक अधिकांश लोग उसे पढ़कर टिपिया चुके होते थे!
मोहल्ला और लोकमंच भी एक तरह से समूह ब्लाग हैं। मोहल्ले वाले कुछ लेख मुझे अच्छे लगे। कुछ लेख एक खास अंदाज में लिखे गये जिससे लगता है कि वहां हिंदू-मुस्लिम मुद्दों पर अपना नजरिया पेश करना चाहते हैं। अब उनका नजरिया है वे पेश करें। मुझे उसमें कोई एतराज नहीं लगता। जिसको जो ठीक लगता है वह कहने के लिये स्वतंत्र है। अब हम कोई बबुआ नहीं रहे कि कोई कुछ कहेगा तो हम उससे अपने दिमाग में साम्प्रदायिकता भर लेंगे।
जहां तक लिखने में एक खास विचारधारा फैलाना का मसला है तो मुझे ई-स्वामी की एक पोस्ट बहुत अच्छी तरह से याद है - मैं चाहूं तो तू तोता पाल लें ! इसमें स्वामीजी ने लिखा था -चीजें अपना उपयोग कराती हैं। प्रवीन महाजन के पास पिस्तौल थी उसने उसका उपयोग अपने भाई प्रमोद महाजन पर किया। अगर पिस्तौल न होती तो वह उसका उपयोग न करता और किसी दूसरे तरीक से अपने गुस्से का इजहार कर लेता और वे शायद बच जाते।
इसी तरह से हर एक के पास जो जानकारी और ज्ञान होता है वह अपना उपयोग करवाता है। लोगों से लेख लिखवाता है। मोहल्ले वाले साथियों का ज्ञान भी उनसे अपना उपयोग करा रहा है।
लेकिन अभी तक मोहल्ला ब्लाग एक ब्लाग की तरह कम एक नोटिस बोर्ड की तरह ज्यादा लगता है।
मोहल्ला की ताकत यह है कि वहां तमाम पढ़े-लिखे, स्थापित लोग लिखते हैं। अपनी बात कहना जानते हैं। अपनी बात विचार के समर्थन में तमाम बेहतरीन तर्क, उद्धरण, कवितायें, गजलें पेश कर सकते हैं। वहीं उसकी सीमा है कि मोहल्ले के लेखक आम पाठक से जुड़े़ नहीं है। मोहल्ला ब्लाग की तरह कम एक नोटिस बोर्ड की तरह ज्यादा लगता है जहां अविनाश भाई ज्ञानी जनों के लेख चिपका देते हैं। अविनाश ,शायद समय की कमी के कारण, दूसरे लोगों के ब्लाग पढ़ नहीं पाते होंगे या पढ़ भी पाते होंगे तो प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त कर पाते होंगे।
लेकिन अविनाश जैसे प्रबुद्ध लोगों से यह अपेक्षा की जा सकती है कि वे टिप्पणी सोच-समझ कर करें। जब वे यह लिखते हैं कि आपने कहा कि मोहल्ले पर उद्देश्यपूर्ण तरीके से देशद्रोही सामग्रियां छप रही हैं। (देशद्रोही शब्द हटा दें, तो…) तो इसके पहले उनको देख लेना चाहिये कि संजय बेगाणी ने मोहल्ला के लिये देशद्रोही शब्द का इस्तेमाल नहीं किया। बल्कि संजय ने लिखा मोहल्ला नामक चिट्ठा उद्देश्यपूर्ण तरीके से साम्प्रदायिकता फैलाने की कोशिश कर रहा है।
यह अपने हिसाब से अपने खिलाफ़ आरोप तय करके उसका जवाब देने का अंदाज है जिससे बचने की सहज अपेक्षा एक प्रबुद्ध लेखक -पत्रकार से की जाती है।
इसके अलावा जब वे यह लिखते हैं कि दो महीनों में यहां एक भी मुझे मुसलमान साथी नहीं मिला। यही है हमारे हमारे समाज का भी सच। तो मुझे यह लगता है कि उनका हिंदी चिट्ठाजगत से संबंध सिर्फ अपने ब्लाग पर साथियों के लेख पोस्ट करने , उस पर आयी प्रतिक्रियाओं को लोगों को बताने तक ही है। न वे यह देख पाते हैं कि शुऐब के लेख यहां बड़े जोर शोर से पढ़े जाते हैं,न वे यह देख पाते हैं कि शुऐब तरकश द्वारा आयोजित प्रतियोगिता में पुरस्कृत होते हैं। न वे शुऐब के खुदा सीरीज वाले वे लेख देख पाते हैं जिनको अगर मुस्लिम समाज का कोई कट्टरपंथी पढ़ ले तो शुऐब के खिलाफ़ फतवा जारी कर दे।
अविनाश आपने भी अपना ब्लाग बनाया है। बताइये कि कितना मेहनत लगता है एक ब्लाग बनाने में? और अगर कोई मुस्लिम साथी ब्लाग बनाना चाहे तो उसे कोई भी कैसे रोक सकता है। इस तरह के आरोप लगाने के पहले आपको जानकारी रखनी चाहिये कि आप जो कह रहे हैं उसका मतलब क्या है?
वैसे तो आप कुछ भी लिखें लेकिन मुनव्वर राना ने तमाम बेहतरीन गजले लिखीं हैं। शायर हैं। मुस्लिम हैं। यह भी उनके लेखन का एक पहलू है कि उन्होंने इस तरह की गजल भी लिखीं। लेकिन जब आप उनकी तमाम दूसरे मूड की गजलें किनारे करके खोज करयह पोस्ट करेंगे तब अगर संजय बेंगाणी यह सोचते और कहते हैं कि मोहल्ले वाले एक खास विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिये लेख लिख रहे हैं तो उनका यह सोचना सहज, स्वाभाविक है-खासकर तब जब कुछ दिन पहले ही यहां आरिफ़ इरफान के बहाने तमाम गर्मागर्म लेख लिखे गये।
लेकिन हां, मैं मोहल्ले पर या किसी और भी ब्लाग पर बैन लगाने के एकदम खिलाफ़ हूं। मेरा यह मानना है कि अगर आपका लिखना लोगों को अच्छा लगेगा तो लोग पढ़ेंगे वर्ना अगला लेख देखेंगे। कुछ समय बाद हर ब्लाग की एक इमजे बन जाती है लोग उसके हिसाब से उसे पढ़ते या छोड़ देते हैं।
यही बात टिप्पणियों से भी सम्बन्धित है। यहां तो लेखन के अलावा व्यक्तिगत संबंध भी मायने रखते हैं। जरूरी नहीं कि तारीफ़ ही करें। नये लेखकों के हमारे कम से बीस-पचीस साथी ऐसे हैं जिनकी किसी भी पोस्ट पर कमेंट करना मुझे एक जरूरी काम सा लगता है। जैसे प्रियंकरजी की दो कवितायें मैंने पढ़ी हैं लेकिन अभी तक टिप्पणी नहीं की वह करना एक काम के रूप में मुझे याद है। सृजन शिल्पी के सुभाष बोस प्रकरण में मुझे बिल्कुल रुचि नहीं लेकिन लेख पढ़कर उस पर अपने विचार व्यक्त करना एक काम के तरह बकाया है।
यह बात मैं इसलिये नहीं बता रहा कि यहां कोई सांठ-गांठ है और आपको या किसी और को भी यही करना चाहिये। लेकिन यह मेरी जानकारी में हिंदी ब्लागिंग का चरित्र है अब तक का।
मोहल्ला हो या अन्य कोई ब्लाग-व्यक्तिगत या सामूहिक उसे पहले ब्लाग की प्रवृत्ति को समझना होगा। मुझे जितना समझ में आया इतने दिनों में उसके हिसाब से आपका अपने पाठक से संबंध एक-एक का होता है। वन टू वन। आम तौर पर यहां पाठक लेखक भी है। अगर आप चाहते हैं कि आपका लिखा लोग पढ़ें तो आपको भी दूसरे का लिखा बांचना पड़ेगा और इसका प्रमाण देना पड़ेगा। या तो आप ऐसा लिखें कि जैसा कि दुर्लभ हो।
जहां तक रही बात नारद की तो नारद पर जितना हक हमारा है उतना ही आज ही ब्लागिंग शुरु करने वाले किसी भी अन्य साथी का है। नारद के संचालकों से ही लड़ने-झगड़ने से ही ब्लागिंग शुरू करने वाले तमाम लोग धड़ल्ले से अब भी ब्लागिंग कर रहे हैं उनकी पोस्ट नारद में आ रही हैं।
मोहल्ले वाले साथियों से मैं यही कहना चाहता हूं कि उनको नारद से हटाने की बात से कोई सहमत नहीं है।
लेकिन जहां तक मोहल्ले में प्रकाशित लेखों की बात तो मैं उनका ब्लाग नियमित देखता-पढ़ता हूं। कहीं न कहीं मोहल्ले में छपे लेखों में अपने ज्ञान से आतंकित करने की भावना भी अन्तर्निहित रहती है। कुछ खास अंदाज , जिसकी मैं व्याख्या करने में फिलहाल अपने को असमर्थ पाता हूं सिर्फ महसूस कर सकता हूं, यहां प्रकाशित लेखों में रहता है। इसी में कुछ सनसनी वाली बात भी हो जाती है जैसे मुनव्वर राना की इस गजल में बताई गयी।
अविनाश भाई और मोहल्ले के दूसरे साथियों से अनुरोध है कि वे हिंदी ब्लागजगत को अपना समझें और इसकी प्रगति में और गर्मजोशी से शिरकत करें।
एक अनुरोध और मैं इस लेख के माध्यम से करना चाहता हूं कि चाहे वे शोध करने वाले हों या मोहल्ले वाले या अन्य कोई साथी अभी तक की हिंदी ब्लाग से जुड़ी गतिविधियों के बारे में कोई राय जाहिर करने से पहले वे कम से कम अक्षरग्राम से जुड़ी पोस्टें पढ़ने की जहमत उठा लें ताकि उनको इस बात की जानकारी हो सके कि पिछले तीन सालों का घटनाक्रम क्या रहा है।
बहरहाल , इस मामले में मुझे निठल्ले तरुण की पोस्ट बहुत मजेदार लगी। इसमें तरुण ने जगदीश भाटिया की अपना आईना नारद से हटाने की बात पर मौज लेते हुये लिखा- आईना मोहल्ले के साथ बंद होने की इजाजत मांगे गोया वह कहना चाह रहा हो हम तुम एक कमरे में बंद हो और चाभी खो जाये।
जब जगदीश भाटिया यह लिखते हैं कि आईना को भी नारद से हटा दिया जाये तो मुझे न कोई चिंता होती है न कोई घबराहट! मुझे हंसी आती है। मैं एक क्षण को भी यह कल्पना नहीं करता कि आईना नारद से हट जायेगा या बंद हो जायेगा। यह हमारा जगदीश भाटिया के ऊपर विश्वास है।
जब संजय बेंगाणी मोहल्ले पर बंदिश लगाने के लिये कहते हैं तो मैं एक मिनट के लिये भी यह नहीं सोचता कि ऐसा होगा। ऐसा इसलिये है कि मुझे हिंदी ब्लागिंग से जुड़े लोगों की प्रकृति का कुछ-कुछ अंदाजा है।
बावजूद तमाम वैचारिक मतभेद के मैं संजय बेंगाणी की ईमानदारी की कद्र करता हूं कि उन्होंने जो अपने हिसाब से ठीक समझा व्यक्त किया और लोगों के निर्णय को स्वीकार किया। उनके इस प्रयास को हिट्स बढा़ने के प्रयास के रूप में देखना उनके साथ अन्याय करना होगा।
आज मेरी पसंद में, महिला दिवस के अवसर पर, अपनी एक पुरानी कविता पोस्ट कर रहा हूं। यह कविता मैंने करीब बीस साल पहले लिखी थी लेकिन मुझे लगता है कि आज भी यह समाज के एक बड़े हिस्से का सच है।
मेरी पसंद
मैं ,
अक्सर,
एक गौरैया के बारे में सोचता हूं,
वह कहाँ रहती है -कुछ पता नहीं।खैर, कहीं सोच लें,
किसी पिजरें में-
या किसी घोसले में,
कुछ फर्क नहीं पड़ता।गौरैया ,
अपनी बच्ची के साथ,
दूर-दूर तक फैले आसमान को,
टुकुर-टुकुर ताकती है।कभी-कभी,
पिंजरे की तीली,
फैलाती,खींचती -
खटखटाती है ।दाना-पानी के बाद,
चुपचाप सो जाती है -
तनाव ,चिन्ता ,खीझ से मुक्त,
सिर्फ एक थकन भरी नींद।जब कभी मुनियाँ चिंचिंयाती है,
गौरैया -
उसे अपने आंचल में समेट लेती है,
प्यार से ,दुलार से।कभी-कभी मुनिया गौरैया से कहती होगी -
अम्मा ये दरवाजा खुला है,
आओ इससे बाहर निकल चलें,
खुले आसमान में जी भर उड़ें।इस पर गौरैया उसे,
झपटकर डपट देती होगी-
खबरदार, जो ऐसा फिर कभी सोचा,
ऐसा पहले कभी नहीं हुआ।
अनूप शुक्ला


इससे बेहतर इस बात को रखने का और कोई तरीका नहीं हो सकता. बहुत गहन और सधी हुई बात कहीं है आपने. कविता तो बहुत ही गहरी है, न जाने कितने दर्द लिये हुये..मान गये भाई फुरसतिया जी. आपकी लेखनी पर यूँ ही कायल थोड़े हैं.
जिस बात को लिखने से मैं बचना चाहता था और सोच रहा था कि अविनाश से आमने-सामने भेंट होने पर कहेंगे, उसे आज खुद आपने कहकर अच्छा किया। अविनाश से शायद इसी सप्ताहांत मुलाकात होने वाली है। आपने बातचीत की अच्छी भूमिका बना दी है।
लेख कुछ समझ आया कुछ नहीं क्योंकि मुझे इस मोहल्ले वाले विषय का पता नहीं है । किन्तु कविता बहुत अच्छी लगी ।
घुघूती बासूती
कविता बहुत ही सुंदर है।
आपने जो लिखा है उसके आगे मै क्या लिखूँ मुझे समझ मे नही आ रहा है, आपके इतना लिखने के बाद भी मेरा कुछ कहना शेष रहा जाता है तो यह मेरे नजरिये की कमी है।
मै मोहल्ले वालों से यही कहना चाहूँगा कि वे हिन्दू धर्म या संघ की बुराई करने के बजाये अपनी अच्छाई का बर्णन करे तो कोई उन्हे नारद से हटाने के बजाये सिंर आखों पर बैठाने की माँग करेगा।
आशीष का कुंवारापन भी अब चंद दिनों का मेहमान है और संभव है कि साल के अंत में आशीष सपत्नीक आपको नये साल की शुभकामनायें निवेदित करें।
ये ल्लो जी ! आपने टूटती खबर(ब्रेकींग न्युज) दे डाली। वह भी उसके नाम के साथ !
हे गुरूदेव! इतनी समग्रता में आप सोच कैसे पाते हो? हिंदी चिट्ठाकारिता में हमारे साथी होते हुये भी हमेशा से एक जागरूक अभिभावक से लगते हो… जब तक आपकी यह समग्र दृष्टि बनी रहेगी, तमाम झंझावतों के बावजुद हमारे इस संयुक्त परिवार को कोई खतरा नहीं है.
अच्छा लेख लिखा है, फुरसत निकाल कर। लेकिन ये आरोप ग़लत है कि मैं हिंदी चिट्ठाजगत के दूसरे लेख नहीं पढ़ता। पढ़ता हूं और कमेंट भी करता हूं। हां, ये सच है कि चिट्ठे भी अपनी रुचियों के हिसाब से पढ़ता हूं, और यथाशक्ति कमेंट भी करता हूं। वैसे ये भी सच है कि पढ़ाई-लिखाई में बचपन से ही कमज़ोर रहा। जहां तक मोहल्ले की छवि की बात है, वहां ज्ञान के आतंक का मसला मुझे समझ में नहीं आया। सांप्रदायिकता की बहस को मैं ज़रूरी मानता हूं। ठीक उसी तरह जैसे आने वाले दिनों में मोहल्ले पर दलित और विकास के सेज़ स्वरूप पर जम कर होने वाली बहस को मैं ज़रूरी मानूंगा। मुनव्वर साहब की ग़ज़लों से मैं इंतिहाई मोहब्बत करता हूं। लेकिन आपने कैसे ये आरोप लगा दिया कि उनकी एक ख़ास कैटोगरी की ग़ज़लें ही छापता हूं? क्या आपने नहीं पढ़ा- लिपट जाता हूं मां से और मौसी मुस्कराती है, मैं उर्दू में ग़ज़ल कहता हूं हिंदी मुस्कराती है। या यही कि- किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकां आयी, मैं घर में सबसे छोटा था मेरे हिस्से में मां आयी। और भाषा के मरने की चिंता करते हुए ये ग़ज़ल भी कि अभी तक कुछ नहीं बिगड़ा अभी बीमार ज़िन्दा है, अभी इस शहर में उर्दू का एक अख़बार ज़िन्दा है। आप स्मृतियों के मुनव्वर के स्केच मोहल्ले में पढ़िए, क्या वे किसी उद्देश्य से छापे गये लगते हैं। इरफान ने अपनी बेटी के अनुभव बांटे, और उस पर शोर होना शुरू हुआ, बल्कि वहीं से शोर की शुरुआत हुई। किसी एक आदमी के सच को एकांगी कह कर आप कैसे सामूहिक रूप से उन पर प्रहार कह सकते हैं? मैं दरअसल इसी मानसिकता की बात करना चाहता हूं। अल्पसंख्यक टोले का एक आदमी अगर अपनी बात रख रहा है, चाहे वह ग़लत ही क्यों न हो, तब भी उसकी बात ध्यान से सुन कर पूरी विनम्रता से उसका उत्तर दिया जाना चाहिए। लेकिन यहां तो गंडगोल मच गया कि ऐसा उसने कैसे कह दिया। यही है हमारी सहिष्णुता का सबसे वीभत्स उदाहरण। एक और बात, प्रतिबंध उतना बड़ा मसला नहीं है, जितना बड़ा मसला ये कि प्रतिबंध के डर से हम कुछ ज़रूरी सामाजिक मसले उठाना भूल जाएं। क्या इमर्जेंसी के बाद कांग्रेस को मिला सबक आप सब भूल गये? आरएसएस पर प्रतिबंध लगा, तो वो ज्यादा हिंसक हो गयी (सूचना के लिए: बाबरी मस्जिद गिरने से थोड़े दिनों पहले तक मैं आरएसएस का एक सक्रिय सदस्य रहा और उसकी सामाजिक गतिविधियों में पूरी तरह लिप्त भी)। मोहल्ले की चिंता न करें। वहां की सारी खिड़कियां खुली हुई हैं। हम किसी भी हवा को आने से रोकेंगे नहीं।
आपकी कविता वाकई बहुत अच्छी है। लेकिन इस कविता का अर्थ बहुत विस्तृत है, इसे किसी खास संदर्भ में प्रस्तुत करना इस कविता की महत्ता को छोटा करना है।
पढकर मै भावुक हो गया चाचु.
कितना अच्छा लिखते हैं आप. जब कहता हुँ आपसे सिखता हुँ तो एकदम सच कहता हुँ.
देखिए अविनाश व अज्ञात हमारे बारे में क्या विचार रखते हैं:
“आप चिंता मत करें और जो भी और जैसा भी आपको फ़ील होता है लिख दें . पंकज बेगाड़ी तो पागल है सो उकी बात के कोई मायने नहीं.”
“लेकिन यहां पंकज-संजय बेंगाणी, नाहर जैसे लोग एक वीभत्स और शर्मनाम (गोधरा) घटना की आड़ में हिंदू आतंकवाद का समर्थन कर रहे हैं। कितना हृदय विदारक है यह! मैं ऐसे लोगों से इस मुल्क को बचाने की गुज़ारिश करता हूं।“
“पंकज-संजय बेंगाणी, नाहर से एक सवाल और पूछना चाहूंगा- गुजरात दंगे में कितने मुसलमान मारे थे आपलोगों ने?”
“यार,
ढक्कनो की कमी थी क्या गुजरात मे जो एक तुम भी आ गये हो? तुम्हे और तुम्हारे जैसे लोगों को हर चीज़ उजली ही दिखाई देती है . क्योंकि तुम लोगो के पास दौलत है ,”
“बेवकूफ़ लोगों का कही गाँव या शहर नही बसा होता है , बस ऐसे ही हमारे आस पास ही पाए जाते हैं .. क्यो पंकज भाई , अपने बारे मे आपका क्या ख़्याल है ?”
मै आपके दरबार में फरियाद लेकर नहीं आया हुँ, चाचु, बस वाचकगण को बताना चाहता हुँ कि क्या स्तर है इनका!!
मेरे सीने से बोझ हटा. धन्यवाद.
एक बात और कहना चाहता हूँ, अविनाश से की मैनें कहीं भी लेख व टिप्पणी में उन पर व्यक्तिगत आक्षेप लगाएं है, हम आशा करते है हमारे बारे में भी आपका रवैया वैसा ही हो. आप नये है अनभिज्ञ है, मगर यहाँ शुरूआत से ही सभी चिट्ठाकार इसे मानते आए है.
रही बात मुसलमानो की तो चिट्ठा जगत में शुएब हमारे मित्र है, वास्तविक जिवन में भी कई मुस्लिम दोस्त है. हमारे एक अच्छे पड़ोसी के सम्बन्ध भी मुस्लिम से है. मगर कभी ढ़ोग नहीं किया की हम धर्मनिरपेक्ष है.
कृपया ठीक कर दें
एक बात और कहना चाहता हूँ, अविनाश से की मैनें कहीं भी लेख व टिप्पणी में उन पर व्यक्तिगत आक्षेप नहीं लगाएं है,
खूब अनूप चाचू ने अपनी बुजुर्ग भूमिका का बखूबी निर्वाह किया इस पोस्ट में।
अच्छा लिखा !
कविता की ये पंक्तियाँ ,
इस पर गौरैया उसे,
झपटकर डपट देती होगी-
खबरदार, जो ऐसा फिर कभी सोचा,
ऐसा पहले कभी नहीं हुआ।
अच्छी लगीं ।
हमेशा की तरह संतुलित विचार…
गर्मागर्म लेख आरिफ पर नही इरफान पर लिखे गये थे …(वैसे क्या फर्क पडता है..)
अनूप की कविता बहुत प्यारी है ।
विनोदजी से थोड़ा-ही अलग।धर्म को मानने वाले अन्य धर्मों से अपने धर्म को बराबर न भी माने ,फर्क १९-२० या १७-२० का माने तब भी कई बवालों की गुंजाइश नहीं रहेगी।’हम’ और ‘वे’ के चक्कर में दूसरे धर्मों के बारे में बहुत कम सूचनाएं जुटाते हैं हम सब ।
मेरी महाराष्ट्र की एक मुस्लिम साथी का कहना था कि यदि हम मुस्लिम कट्टरता की चर्चा नहीं करते तो मुसलमानों के बीच उदार धारा के लिए काम कर रहे लोगों को उससे नुकसान होता है।बनारस के मेरे साथी सैय्यद मक़सूद अली एक बार में तलाक के विरुद्ध शहर-मुफ़्ती से बहस कर लेते हैं । भारतीय मुस्लिम समाज में बहनों का हिस्सा जितनी न्यायपूर्ण तरीके से आम मुसलमान परिवार में मिलता है वह पूरे समाज के लिए अनुकरणीय है।
साम्प्रदायिकता का मूलाधार विद्वेष है धर्म नहीं।गोस्वामी तुलसीदास के सुन्दर शब्दों में
‘परहित सरिस धरम नहि भाई,
परपीड़ा सम नहि अधमाई’
सती-प्रथा,जाति-प्रथा का गुण-गान करने वाले बहुसंख्यक समाज को सही दिशा में नहीं ले जा सकते।
बहुत दिनों से चिट्ठाजगत की गतिविधियों की अधिक जानकारी नहीं हो पा रही है इसलिये आलेख पर व्यक्त करने के लिये तो कोई विचार है नहीं मेरे पास किंतु भैया,कविता बहुत ही सुंदर लगी. जीवन के इसी पहलू पर कई बार सोचती रह जाती हूँ. आपने इसे बहुत खूबी के साथ प्रस्तुत किया है. साधुवाद!
“अब हम कोई बबुआ नहीं रहे कि कोई कुछ कहेगा तो हम उससे अपने दिमाग में साम्प्रदायिकता भर लेंगे।
लेकिन हां, मैं मोहल्ले पर या किसी और भी ब्लाग पर बैन लगाने के एकदम खिलाफ़ हूं। मेरा यह मानना है कि अगर आपका लिखना लोगों को अच्छा लगेगा तो लोग पढ़ेंगे वर्ना अगला लेख देखेंगे।”
बहुत सटीक विचार।
लेकिन सबसे अच्छी लगी आपकी कविता। खासतौर पर “खबरदार, जो ऐसा फिर कभी सोचा,
ऐसा पहले कभी नहीं हुआ।” नहीं, पूरी की पूरी ही। अच्छी कविता पढ़ कर मुझे कुछ होने लगता है। बयान नही कर सकता, पर वही हो रहा है।
सुकुल भाई!
तुमाई पोस्ट पढी . कलम तोर कै धर दई तुमनै तौ. छाती जुड़ाय गई.
इयैं अबिनसवा के दद्दा की चिट्ठी आई रही. मोहल्ला के पता पैइ डारी हती . आजै मिली है. मार बमक रहे हते. हमनै कही धीरज धरौ . लड़का अबै नओ-नओ धर्मनिरपेक्ष भओ हैगो .होश कम है और जोश जादा. हथेली पै सरसों जमाओ चांहत है. ऊपर वानै खुदइ नै राज़ खोलो है कि ९२ के बैच को धर्मनिरपेक्ष है. तौ वाकी धर्मनिरपेक्षता की कुल उमर भई १५ साल. यानी वाकी धर्मनिरपेक्षता अपनी ‘टीन्स’में चल रही हैगी. तौ समझ लेओ कि ‘द एज ऑफ़ स्ट्रेस एण्ड स्ट्राइफ़’ ज़ारी है . थोड़ो समय और देओ. सब ठीक हुय जैहै . बाबरी मस्जिद न गिरी होती तो लड़कउ धर्मनिरपेक्ष न भओ होतो.अब गलत काम करे हैं तौ भुगतौ वाके फल . जनार्दन भैया ठहरे उमरदार आदमी उन्हें हम का कहते और का लिखते.बस जो लिखो सो दोहराय रए हैं. तुमाए भरोसे पै लिख डारो है. अब देखियो जनता दौड़ाय न लै. चिट्ठी नीचे है :
जनार्दन भइया,
तोहरा चिट्ठिया मिला रहा .बांच कर मन को तसल्ली हुआ . अब ई अबिनसवा का कारस्तानी सुनियेगा तो हाथ सीधा कपार पर ले जाइयेगा. दोस्त देखे न दुश्मन बस मरखना बैल की माफ़िक सींग लड़ाता घूमता है. जब पढ़ाई-लिखाई का, अउर कुछ बढियां करने का समय था तब तो कुछ उखाड़ किया नाहीं,अब टल्ले खाते-खाते हिलग गये है कौनो ठीक-ठिकाने पर तो ऐसा बुझाता है कि मानो ज्ञान का एजेन्सी ले लिए हैं. खुदाई-खिदमतगार की तरहां निकल पड़े हैं दुनिया बदलने. अब ई बात अलग है कि अभी खुद का सेंट सम्हलता नहीं है. रात को सोते हैं तो टिटिहरी की तरहां पंजे ऊपर करके सोते हैं कि कहीं आसमान गिर न पड़े .
अरे भाईसाहब तोहका ऊ बतराया नाहीं कि सबका बचावे की जिम्मेदारी उनहीं पर तो छोड़ कर गये हैं ऊपरवाले . ऊपरवाले मतबल ईश्वर, बोले तो भगवान. अरे आपन ई अबिनास उनका जबरन रिटायरमेंट दिलवा के उनका जिम्मेदारी खुद ले लिए हैं. आखिर ई ईश्वर ठहरा नश्वर प्राणी,पता नहीं ससुरा जन्मा भी था कि नहीं. बुड़बक लोगजन सब क्या तो बोलता रहता है जरा-मरण से परे –जाके मुंह माथा नहीं– अउर न जाने क्या-क्या. अब कबीरदास-तुलसीदास नाहीं रहे तो उदास होने का कौनो दरकार नाहीं है . अरे ई आपन अबिनसवा है ना. पट्ठा आसन जमाए बैठा है अउर सबको बांग सुना रहा है. झख मार कर सबई सुन भी रहा है. का हर्ज़ है. एतना लोग तो बोल रहा है . एक जन औरो सही. का बिगड़ता है.
अब बोलिये का जरूरत रहा यह परचार करने का कि हम नास्तिक हूं. ई सब तो उसका लच्छन से बुझाता है. फिर चोंच खोला तो बोला ‘कोई उम्मीद बर नहीं आती’. कइसे होगा उम्मीद . नास्तिक आदमी बोले तो नाशुक्रा अउर नाउम्मीद आदमी. नास्तिक आदमी को ईश्वर से ज्यादा भरोसा आपन जोग्यता पर अउर उससे भी ज्यादा भरोसा अपना खुद का प्रपंच पर होता है. प्रपंच नाहीं समझते हैं.प्रपंच माने छल-बल-कौशल से सेटिंग. अभियां काम ईश्वर नाहीं करते हैं. काम होता है सेटिंग से. जोग्गता कम भी हो तो चलेगा. सेटिंग पक्की चाहिए.एतना समझ लेंगे तो मंदिर की ओर ताकेंगे भी नहीं.
अब हम्में देखिये! एकदम बुड़बक की माफ़िक बइठे हैं. बाप-दादा का ‘ह्यूमनिस्ट’सिखावन पर चलते रहे अउर ‘बैकवार्ड’ कहलाते रहे. ई सब रंगी-बजरंगी भी हमको पानी पी-पी कर गरियाता रहा अउर ई अपना खून भी हमको गलतै समझता रहा . बोलिये एतना सब होने पर भी हम कहीं उम्मीद छोड़े? काहे कि हम मानते हैं ऊपरवाले को भी और जानते हैं नीचे वाले को भी. दोनों जन पर हमारा भरोसा है. काहे नाउम्मेद हों भाई.दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र में कबड्डी खेल रहा हूं. कभी जीतता हूं तो कभी हारता भी हूं. जीवन इसी तरह चल रहा है. दुःख कम नाहीं हैं पर नाउम्मीदी भी नाहीं है .
अब ई बताइयेगा कि अबिनसवा तोहार कहा सुनता है कि नाहीं. अगर सुनता हो तो समुझावन दीजिएगा कि बस अपना काम-काज ठीक से करे. जब आदमी आपन काम-काज ठीक से करता है तो यह दुनिया सुंदर और जीने लायक लगता है. अउर उम्मीद का किरन भी फूटता है . आस-पास के लोगजन का चेहरा खिला-खिला अउर सुंदर लगता है. इंसानियत पर भरोसा जागता है. गालिब का तो पेंशन बंद हो गया था.अबिनसवा का तो नौकरिया बचा हुआ है.महीना टाइम पर मिलता ही होगा. जनाना भी बराबर का कमा रहा है. यार-दोस्त का मंडली भी ठीकै-ठीक जुटा लिया है. तब काहे रोता है. फ़ैशन में?
लगता है छुटके का ई दुःख छायावादी है अउर गुस्सा हालावादी .
हमरा परनाम कुबूलिएगा.
तोहार
मंझलका
आपने नई नई शोधार्थी को बेकार ही बरज दिया।
वह तो दिल्ली की गली गली से हर संभावित लेखक को खींच खॉंचकर चिट्ठाकारी में लाने के लिए दिन रात एक कर रही हैं- और उनका संदेश भी यह ही था कि अपने भेजे के शोर को सुनें- बैन बून की फिकर ना करें। खैर वे खुद सुलटें मैं क्या वकील लगा हूँ।
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अधिक गंभीर नजरिए से सोचें तो भले ही मैं अविनाशजी की तरह एक (पूर्व)कारसेवक पत्रकार नहीं हँ पर उनसे यह कहने में संकोच नहीं कि वे सनसनीखेजता के पीछे अंधी दौड़ में जरूर है। और ये आतंकित करवा के पढ़वा लेंगे- ये दंभ भी है। जो शामिल नहीं उनकी हिमाकत पर हैरान होने वाले और घूरकर देखने वाले भी खूब थे।
समझना चाहें तो समझ लीजिए ब्लॉग केवल कागज से कीबोर्ड का बदलाव नहीं है ये अलग विधा है- कभी कभी थोड़ा पढ लेना ठीक होता है, फ़ुरसतिया लेखन और सुनीलजी भर को ही देख लें काफी सीख सकते हैं हम तो सीख रहे हैं।
लेकिन हॉं कोई आप पर बैन लगाने की बात करे तो यकीन जानिए हम आपके बात कहने, भले ही गलत बात कहने के अधिकार के बिना शर्त समर्थक हैं
sukul jee
bahut badhiya. mere khyal se aapne bahut si un baaton ko clear kar diya hai, jinke baare mein tamam log kuchh janana chahte the. ummid hai aapki ye bhumika aage bhi jaari rahegi.
@समीरजी, आप हमारे लेखन के कायल हैं यह पढ़कर हम घायल हो गये।


चिट्ठी बहुत अच्छी लगी खासकर ये लाइनें-
@सृजन शिल्पी, सही है। अब अविनाश से भेंट वार्ता का किस्सा लिखना।
@घुघूती बासूतीकविता पसन्द करने के लिये धन्यवाद! लेख से संबंधित कड़ियां देखती तो अच्छा रहता।समझ में आ जाता।
@मानोसी, कविता ही पसन्द करने के लिये शुक्रिया। लेख हमें पता है साबू टाइप का होने के कारण पढ़ा नहीं होगा।
@प्रेमेंन्द्र,तुम्हारे नजरिये में कोई कमी नहीं है।
@ शशि,भैये इतनी तारीफ़ मत किया करो। गड़बड़ा जायेगा दिमाग!
@अविनाश, हमने मोहल्ले की प्रकृति के बारे में अपनी राय जाहिर की। इसे किसी आरोप के रूप में मत लो भाई। अपना सच आप बेहतर जानते हैं। मैंने मोहल्ले में छपे सारे लेख देखें हैं और कुछ बहुत अच्छे भी लगे। मुनव्वर राना वाले सारे लेख भी हमने पढ़े हैं। बल्कि देखो तो चिट्ठाचर्चा में खास तौर से तारीफ़ भी की है। जब हिंदू-मुस्लिम मसले पर इतना गंडगोल (उधार दो भाई ये शब्द)मच चुका हो तब मुनव्वर राना की ये गजल पोस्ट करना, मुझे लगता है, बचाया जाना चाहिये था। बाकी आप लोगों की मर्जी। प्रतिबंध जैसी बात तो मैं मानता नहीं। मैंने टिप्प्णी के लिये जरूर कहा था कि सोच समझ कर करना चाहिये -खासकर बात जब आरोप-प्रत्यारोप की हो रही हो। ऊपर इसी लेख में मैंने लिखा कि आपने संजय बेंगाणी की बात को अपने हिसाब से उसका लंबा जवाब दे दिया। इस बारे में आपने कुछ कहना ठीक नहीं समझा! बहरहाल मैंने अपने नजरिये से आपको अवगत कराया। उसे मानना न मानना आपके ऊपर है। अपने बारे में सबसे बेहतर आप समझ सकते हैं। हर बात तर्क-तराजू पर नहीं तुला करती। आम आदमी की सहज-समझ भी कुछ होती है। मैंने जो बातें लिखीं वे अपनी सहज-समझ के अनुसार थीं। उसके हिसाब से अपने बारे में विचार करने न करने के लिये आप पूर्णतया स्वतंत्र हैं। कविता पसंद करने के लिये शुक्रिया।
@पंकज, पसंद करने का शुक्रिया। लेकिन यह बात तुमको समझनी चाहिये भाई कि किसी का अपराध इसलिये नहीं कम नहीं हो जाता कि दूसरे ने भी वैसा ही अपराध किया है। गुजरात में जो हुआ वह शर्मनाक था, बेहद शर्मनाक था। इसके लिये गुजरात की आम जनता का कोई दोष नहीं था। उस समय जो वहां किया वहां के प्रशासन ने वह नहीं करना चाहिये था। प्रशासन की ‘सक्रिय-निष्क्रियता’ के चलते जो हजारों लोग मरे वह अपने देश की एक बेहद शर्मनाक घटना है। यह काला धब्बा है। दूसरे लोगों के दाग दिखाने से यह धब्बा नहीं मिट जायेगा। ये कोई बुश के कान का तिल नहीं है जो पांच मिनट के आपरेशन से निकल जाये। बाकी आज गुजरात प्रगति कर रहा है, वहां सुशासन है, मोदीजी सक्षम मुख्यमंत्री हैं यह बहुत अच्छी बात है। इसकी भी तारीफ़ होनी चाहिये। गुजरात हमेशा से तमाम मामलों में आगे रहा है। लेकिन यह कोई ऐसा साबुन नहीं है जिससे वहां हुये सारे पाप , जिसको करने के लिये वहां की जनता नहीं प्रशासन जिम्मेदार है, नहीं धुल जाते। जो बातें वहां गलत हुयीं उनको तर्क-कुतर्क से सही ठहराने के बजाय बेहतर है कि वहां की अच्छी बातें लोगों को बताऒ। गुजरात में तमाम काम ऐसे हुये जो देश-दुनिया के लिये मिसाल हैं। उनके बारे लिखो।
@संजय, पसंद का शुक्रिया। हमने यह कभी नहीं माना कि संजय ढोंग करते हैं। हम तो तुम्हारी ईमानदारी की मिसाल देते हैं।
@ ई-पंडित, शुक्रिया। हमें बुजुर्ग काहे बना दिया। अभी तो हम जवान हैं।
@प्रत्यक्षाजी, पसंद का शुक्रिया। देखिये हम भी पुराना माल खपा लेते हैं। केवल एक आप ही नहीं हैं जो अपनी सालों पहले की कवितायें झिला दें।
@नितिन, तारीफ़ के लिये शुक्रिया। भूल सुधार कर लिया गया है। गलती बताने के लिये धन्यवाद!
@अफलातूनजी, आप भी शुक्रिया ग्रहण कर लो भाई। आपके विचार जानकर अच्छा लगा!
@निधि, कविता पसंद करने के लिये शुक्रिया। साधुवाद का धन्यवाद! अपने आलस्य को त्यागकर कब लिखना शुरू करोगी?
@मृणाल, शुक्रिया। यह बहुत अच्छी बात है कि अभी भी कुछ-कुछ होने की सम्भावनायें बाकी हैं।
@प्रियंकरजी,तारीफ़ सुन के तो हम शरमा गये।
१.चोंच खोला तो बोला ‘कोई उम्मीद बर नहीं आती’. कइसे होगा उम्मीद . नास्तिक आदमी बोले तो नाशुक्रा अउर नाउम्मीद आदमी. नास्तिक आदमी को ईश्वर से ज्यादा भरोसा आपन जोग्यता पर अउर उससे भी ज्यादा भरोसा अपना खुद का प्रपंच पर होता है. प्रपंच नाहीं समझते हैं.प्रपंच माने छल-बल-कौशल से सेटिंग. अभियां काम ईश्वर नाहीं करते हैं. काम होता है सेटिंग से. जोग्गता कम भी हो तो चलेगा. सेटिंग पक्की चाहिए.
२.दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र में कबड्डी खेल रहा हूं. कभी जीतता हूं तो कभी हारता भी हूं. जीवन इसी तरह चल रहा है. दुःख कम नाहीं हैं पर नाउम्मीदी भी नाहीं है .
३.जब आदमी आपन काम-काज ठीक से करता है तो यह दुनिया सुंदर और जीने लायक लगता है. अउर उम्मीद का किरन भी फूटता है . आस-पास के लोगजन का चेहरा खिला-खिला अउर सुंदर लगता है. इंसानियत पर भरोसा जागता है.
@मसिजीवीजी,आपकी टिप्पणी का शुक्रिया। हमने शोधार्थी को बरजा नहीं है, अनुरोध किया है कि खूब बढ़िया से शोध करें ताकि बहुत अच्छा शोधप्रबंध लिखें। हम लोग सलाह/सहयोग नहीं देंगे अपने शोधार्थियों को तो क्या होनोलूलू से आयेंगे। नीलिमाजी से हमारी सिफारिश करियेगा कि हमारी बात का अच्छे-अच्छे मूड में ग्रहण करें। अरे नीलिमाजी की वकालत आप नहीं करेंगे तो कौन करेगा आप ही ने बताया कि आप तो उनसे उधारी भी लिये हैं। उसका हिसाब तो चुकाना ही पड़ेगा। यह बहुत खुशनुमा बात है कि वे लोगों को लिखने के लिये उकसा रहीं हैं। आपने हमारे लेखन के बारे में जो धारणा बनायी वह आपकी जर्रा नवाजी है यह कहकर शरमाजाने के अलावा हमारे पास और कोई उपाय समझ में नहीं आता।
प्रियरंजन आपकी पसंद और टिप्पणी का शुक्रिया।
पिछले कुछ दिनों से मेरे( अगर केबीसी वाले शाहरूख के अन्दाज मे कहूँ तो!) “कम्प्यूटर भाई” की तबियत नासाज होने से चिट्ठा-जगत से कुछ दूर रही और यहाँ की गतिविधियों से अनजान भी.. लेख ज्यादा नही समझ पाई लेकिन बहुत अच्छी कविता के बारे मे कहना चाहती हूँ कि आपकी गौरैया अब (२० साल बाद)शायद ये कहेगी-
” मै तो ऐसा नही कर पाई,
लेकिन जाओ तुम खुले आसमान मे उडो!!”
@रचनाजी, धन्यवाद। कामना है कि आपकी इच्छा पूरी हो और आप अगली पीढ़ी को ऐसा कह सकें।
[...] यह भाषा का ही कौशल है कि बोल्ड अक्षरों में मेरे आरोप को नजर अंदाज करके अविनाशजी तमाम दूसरी बातों पर तर्क पूर्वक अपनी सोच को सही साबित करते हुये टहल लेते हैं। [...]
[...] मोहल्ले की प्रकृति और नारद [...]