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	<title>Comments on: मोहल्ले की प्रकृति और नारद</title>
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	<description>हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै?</description>
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		<title>By: फ़ुरसतिया-पुराने लेख</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/253/comment-page-1#comment-41680</link>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया-पुराने लेख</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 26 Jul 2009 07:30:31 +0000</pubDate>
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		<description>[...] मोहल्ले की प्रकृति और नारद  [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] मोहल्ले की प्रकृति और नारद  [...]</p>
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		<title>By: फुरसतिया &#187; पत्रकार ब्लागिंग काहे न करें, जम के करें!</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/253/comment-page-1#comment-7714</link>
		<dc:creator>फुरसतिया &#187; पत्रकार ब्लागिंग काहे न करें, जम के करें!</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 23 Mar 2007 21:38:17 +0000</pubDate>
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		<description>[...] यह भाषा का ही कौशल है कि बोल्ड अक्षरों में मेरे आरोप को नजर अंदाज करके अविनाशजी तमाम दूसरी बातों पर तर्क पूर्वक अपनी सोच को सही साबित करते हुये टहल लेते हैं। [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] यह भाषा का ही कौशल है कि बोल्ड अक्षरों में मेरे आरोप को नजर अंदाज करके अविनाशजी तमाम दूसरी बातों पर तर्क पूर्वक अपनी सोच को सही साबित करते हुये टहल लेते हैं। [...]</p>
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		<title>By: फ़ुरसतिया</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/253/comment-page-1#comment-7544</link>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 13 Mar 2007 14:13:59 +0000</pubDate>
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		<description>&lt;strong&gt;@रचनाजी, &lt;/strong&gt;धन्यवाद। कामना है कि आपकी इच्छा पूरी हो और आप अगली पीढ़ी को ऐसा कह सकें।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p><strong>@रचनाजी, </strong>धन्यवाद। कामना है कि आपकी इच्छा पूरी हो और आप अगली पीढ़ी को ऐसा कह सकें।</p>
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		<title>By: rachana</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/253/comment-page-1#comment-7517</link>
		<dc:creator>rachana</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 11 Mar 2007 17:42:42 +0000</pubDate>
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		<description>पिछले कुछ दिनों से मेरे( अगर केबीसी वाले शाहरूख के अन्दाज मे कहूँ तो!) &quot;कम्प्यूटर भाई&quot; की तबियत नासाज होने से चिट्ठा-जगत से कुछ दूर रही और यहाँ की गतिविधियों से अनजान भी.. लेख ज्यादा नही समझ पाई लेकिन बहुत अच्छी कविता के बारे मे कहना चाहती हूँ कि आपकी गौरैया अब (२० साल बाद)शायद ये कहेगी- 
&quot; मै तो ऐसा नही कर पाई,
लेकिन जाओ तुम खुले आसमान मे उडो!!&quot;</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>पिछले कुछ दिनों से मेरे( अगर केबीसी वाले शाहरूख के अन्दाज मे कहूँ तो!) &#8220;कम्प्यूटर भाई&#8221; की तबियत नासाज होने से चिट्ठा-जगत से कुछ दूर रही और यहाँ की गतिविधियों से अनजान भी.. लेख ज्यादा नही समझ पाई लेकिन बहुत अच्छी कविता के बारे मे कहना चाहती हूँ कि आपकी गौरैया अब (२० साल बाद)शायद ये कहेगी-<br />
&#8221; मै तो ऐसा नही कर पाई,<br />
लेकिन जाओ तुम खुले आसमान मे उडो!!&#8221;</p>
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		<title>By: फ़ुरसतिया</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/253/comment-page-1#comment-7501</link>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 10 Mar 2007 04:06:17 +0000</pubDate>
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		<description>&lt;strong&gt;@समीरजी,&lt;/strong&gt; आप हमारे लेखन के कायल हैं यह पढ़कर हम घायल हो गये। :)
&lt;strong&gt;@सृजन शिल्पी&lt;/strong&gt;, सही है। अब अविनाश से भेंट वार्ता का किस्सा लिखना।
&lt;strong&gt;@घुघूती बासूती&lt;/strong&gt;कविता पसन्द करने के लिये धन्यवाद! लेख से संबंधित कड़ियां देखती तो अच्छा रहता।समझ में आ जाता।
&lt;strong&gt;@मानोसी,&lt;/strong&gt; कविता ही पसन्द करने के लिये शुक्रिया। लेख हमें पता है साबू टाइप का होने के कारण पढ़ा नहीं होगा। :)
&lt;strong&gt;@प्रेमेंन्द्र,&lt;/strong&gt;तुम्हारे नजरिये में कोई कमी नहीं है।
&lt;strong&gt;@ शशि,&lt;/strong&gt;भैये इतनी तारीफ़ मत किया करो। गड़बड़ा जायेगा दिमाग! :)
&lt;strong&gt;@अविनाश, &lt;/strong&gt;हमने मोहल्ले की प्रकृति के बारे में अपनी राय जाहिर की। इसे किसी आरोप के रूप में मत लो भाई। अपना सच आप बेहतर जानते हैं। मैंने मोहल्ले में छपे सारे लेख देखें हैं और कुछ बहुत अच्छे भी लगे। मुनव्वर राना वाले सारे लेख भी हमने पढ़े हैं। बल्कि देखो तो चिट्ठाचर्चा में खास तौर से &lt;a href=&quot;http://chitthacharcha.blogspot.com/2007/02/blog-post_602.html&quot; rel=&quot;nofollow&quot;&gt; तारीफ़ &lt;/a&gt; भी की है। जब हिंदू-मुस्लिम मसले पर इतना &lt;strong&gt;गंडगोल&lt;/strong&gt; (उधार दो भाई ये शब्द)मच चुका हो तब मुनव्वर राना की ये &lt;a href=&quot;http://mohalla.blogspot.com/2007/03/blog-post_2719.html&quot;&gt;गजल&lt;/a&gt; पोस्ट करना, मुझे लगता है, बचाया जाना चाहिये था। बाकी आप लोगों की मर्जी। प्रतिबंध जैसी बात तो मैं मानता नहीं। मैंने टिप्प्णी के लिये जरूर कहा था कि सोच समझ कर करना चाहिये -खासकर बात जब आरोप-प्रत्यारोप की हो रही हो। ऊपर इसी लेख में मैंने लिखा कि आपने संजय बेंगाणी की बात को अपने हिसाब से उसका लंबा जवाब दे दिया। इस बारे में आपने कुछ कहना ठीक नहीं समझा! बहरहाल मैंने अपने नजरिये से आपको अवगत कराया। उसे मानना न मानना आपके ऊपर है। अपने बारे में सबसे बेहतर आप समझ सकते हैं। हर बात &lt;strong&gt;तर्क-तराजू &lt;/strong&gt;पर नहीं तुला करती। आम आदमी की सहज-समझ भी कुछ होती है। मैंने जो बातें लिखीं वे अपनी सहज-समझ के अनुसार थीं। उसके हिसाब से अपने बारे में विचार करने न करने के लिये आप पूर्णतया स्वतंत्र हैं। कविता पसंद करने के लिये शुक्रिया। 
&lt;strong&gt;@पंकज,&lt;/strong&gt; पसंद करने का शुक्रिया। लेकिन यह बात तुमको समझनी चाहिये भाई कि किसी का अपराध इसलिये नहीं कम नहीं हो जाता कि दूसरे ने भी वैसा ही अपराध किया है। गुजरात में जो हुआ वह शर्मनाक था, बेहद शर्मनाक था। इसके लिये गुजरात की आम जनता का कोई दोष नहीं था। उस समय जो वहां किया वहां के प्रशासन ने वह नहीं करना चाहिये था। प्रशासन की &lt;strong&gt;&#039;सक्रिय-निष्क्रियता&#039; &lt;/strong&gt;के चलते जो हजारों लोग मरे वह अपने देश की एक बेहद शर्मनाक घटना है। यह काला धब्बा है। दूसरे लोगों के दाग दिखाने से यह धब्बा नहीं मिट जायेगा। ये कोई बुश के कान का तिल नहीं है जो पांच मिनट के आपरेशन से निकल जाये। बाकी आज गुजरात प्रगति कर रहा है, वहां सुशासन है, मोदीजी सक्षम मुख्यमंत्री हैं यह बहुत अच्छी बात है। इसकी भी तारीफ़ होनी चाहिये। गुजरात हमेशा से तमाम मामलों में आगे रहा है। लेकिन यह कोई ऐसा साबुन नहीं है जिससे वहां हुये सारे पाप , जिसको करने के लिये वहां की जनता नहीं प्रशासन जिम्मेदार है, नहीं धुल जाते। जो बातें वहां गलत हुयीं उनको तर्क-कुतर्क से सही ठहराने के बजाय बेहतर है कि वहां की अच्छी बातें लोगों को बताऒ। गुजरात में तमाम काम ऐसे हुये जो देश-दुनिया के लिये मिसाल हैं। उनके बारे लिखो।
&lt;strong&gt;@संजय,&lt;/strong&gt; पसंद का शुक्रिया। हमने यह कभी नहीं माना कि संजय ढोंग करते हैं। हम तो तुम्हारी ईमानदारी की मिसाल देते हैं।
&lt;strong&gt;@ ई-पंडित,&lt;/strong&gt; शुक्रिया। हमें बुजुर्ग काहे बना दिया। अभी तो हम जवान हैं।
&lt;strong&gt;@प्रत्यक्षाजी,&lt;/strong&gt; पसंद का शुक्रिया। देखिये हम भी पुराना माल खपा लेते हैं। केवल एक आप ही नहीं हैं जो अपनी सालों पहले की कवितायें झिला दें।
&lt;strong&gt;@नितिन, &lt;/strong&gt;तारीफ़ के लिये शुक्रिया। भूल सुधार कर लिया गया है। गलती बताने के लिये धन्यवाद!
&lt;strong&gt;@अफलातूनजी, &lt;/strong&gt;आप भी शुक्रिया ग्रहण कर लो भाई। आपके विचार जानकर अच्छा लगा!
&lt;strong&gt;@निधि, &lt;/strong&gt; कविता पसंद करने के लिये शुक्रिया। साधुवाद का धन्यवाद! अपने आलस्य को त्यागकर कब लिखना शुरू करोगी?
&lt;strong&gt;@मृणाल, &lt;/strong&gt; शुक्रिया। यह बहुत अच्छी बात है कि अभी भी कुछ-कुछ होने की सम्भावनायें बाकी हैं।
&lt;strong&gt;@प्रियंकरजी,&lt;/strong&gt;तारीफ़ सुन के तो हम शरमा गये। :) चिट्ठी बहुत अच्छी लगी खासकर ये लाइनें-
&lt;strong&gt;१.चोंच &lt;/strong&gt;खोला तो बोला ‘कोई उम्मीद बर नहीं आती’. कइसे होगा उम्मीद . नास्तिक आदमी बोले तो नाशुक्रा अउर नाउम्मीद आदमी. नास्तिक आदमी को ईश्वर से ज्यादा भरोसा आपन जोग्यता पर अउर उससे भी ज्यादा भरोसा अपना खुद का प्रपंच पर होता है. प्रपंच नाहीं समझते हैं.प्रपंच माने छल-बल-कौशल से सेटिंग. अभियां काम ईश्वर नाहीं करते हैं. काम होता है सेटिंग से. जोग्गता कम भी हो तो चलेगा. सेटिंग पक्की चाहिए.
&lt;strong&gt;२.दुनिया &lt;/strong&gt;का सबसे बड़ा लोकतंत्र में कबड्डी खेल रहा हूं. कभी जीतता हूं तो कभी हारता भी हूं. जीवन इसी तरह चल रहा है. दुःख कम नाहीं हैं पर नाउम्मीदी भी नाहीं है .
&lt;strong&gt;३.जब आदमी &lt;/strong&gt;आपन काम-काज ठीक से करता है तो यह दुनिया सुंदर और जीने लायक लगता है. अउर उम्मीद का किरन भी फूटता है . आस-पास के लोगजन का चेहरा खिला-खिला अउर सुंदर लगता है. इंसानियत पर भरोसा जागता है.
&lt;strong&gt;@मसिजीवीजी,&lt;/strong&gt;आपकी टिप्पणी का शुक्रिया। हमने शोधार्थी को बरजा नहीं है, अनुरोध किया है कि खूब बढ़िया से शोध करें ताकि बहुत अच्छा शोधप्रबंध लिखें। हम लोग सलाह/सहयोग नहीं देंगे अपने शोधार्थियों को तो क्या होनोलूलू से आयेंगे। नीलिमाजी से हमारी सिफारिश करियेगा कि हमारी बात का अच्छे-अच्छे मूड में ग्रहण करें। अरे नीलिमाजी की वकालत आप नहीं करेंगे तो कौन करेगा आप ही ने बताया कि आप तो उनसे उधारी भी लिये हैं। उसका हिसाब तो चुकाना ही पड़ेगा। यह बहुत खुशनुमा बात है कि वे लोगों को लिखने के लिये उकसा रहीं हैं। आपने हमारे लेखन के बारे में जो धारणा बनायी वह आपकी जर्रा नवाजी है यह कहकर शरमाजाने के अलावा हमारे पास और कोई उपाय समझ में नहीं आता। :)
&lt;strong&gt;प्रियरंजन&lt;/strong&gt; आपकी पसंद और टिप्पणी का शुक्रिया।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p><strong>@समीरजी,</strong> आप हमारे लेखन के कायल हैं यह पढ़कर हम घायल हो गये। <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /><br />
<strong>@सृजन शिल्पी</strong>, सही है। अब अविनाश से भेंट वार्ता का किस्सा लिखना।<br />
<strong>@घुघूती बासूती</strong>कविता पसन्द करने के लिये धन्यवाद! लेख से संबंधित कड़ियां देखती तो अच्छा रहता।समझ में आ जाता।<br />
<strong>@मानोसी,</strong> कविता ही पसन्द करने के लिये शुक्रिया। लेख हमें पता है साबू टाइप का होने के कारण पढ़ा नहीं होगा। <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /><br />
<strong>@प्रेमेंन्द्र,</strong>तुम्हारे नजरिये में कोई कमी नहीं है।<br />
<strong>@ शशि,</strong>भैये इतनी तारीफ़ मत किया करो। गड़बड़ा जायेगा दिमाग! <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /><br />
<strong>@अविनाश, </strong>हमने मोहल्ले की प्रकृति के बारे में अपनी राय जाहिर की। इसे किसी आरोप के रूप में मत लो भाई। अपना सच आप बेहतर जानते हैं। मैंने मोहल्ले में छपे सारे लेख देखें हैं और कुछ बहुत अच्छे भी लगे। मुनव्वर राना वाले सारे लेख भी हमने पढ़े हैं। बल्कि देखो तो चिट्ठाचर्चा में खास तौर से <a href="http://chitthacharcha.blogspot.com/2007/02/blog-post_602.html" rel="nofollow"> तारीफ़ </a> भी की है। जब हिंदू-मुस्लिम मसले पर इतना <strong>गंडगोल</strong> (उधार दो भाई ये शब्द)मच चुका हो तब मुनव्वर राना की ये <a href="http://mohalla.blogspot.com/2007/03/blog-post_2719.html">गजल</a> पोस्ट करना, मुझे लगता है, बचाया जाना चाहिये था। बाकी आप लोगों की मर्जी। प्रतिबंध जैसी बात तो मैं मानता नहीं। मैंने टिप्प्णी के लिये जरूर कहा था कि सोच समझ कर करना चाहिये -खासकर बात जब आरोप-प्रत्यारोप की हो रही हो। ऊपर इसी लेख में मैंने लिखा कि आपने संजय बेंगाणी की बात को अपने हिसाब से उसका लंबा जवाब दे दिया। इस बारे में आपने कुछ कहना ठीक नहीं समझा! बहरहाल मैंने अपने नजरिये से आपको अवगत कराया। उसे मानना न मानना आपके ऊपर है। अपने बारे में सबसे बेहतर आप समझ सकते हैं। हर बात <strong>तर्क-तराजू </strong>पर नहीं तुला करती। आम आदमी की सहज-समझ भी कुछ होती है। मैंने जो बातें लिखीं वे अपनी सहज-समझ के अनुसार थीं। उसके हिसाब से अपने बारे में विचार करने न करने के लिये आप पूर्णतया स्वतंत्र हैं। कविता पसंद करने के लिये शुक्रिया।<br />
<strong>@पंकज,</strong> पसंद करने का शुक्रिया। लेकिन यह बात तुमको समझनी चाहिये भाई कि किसी का अपराध इसलिये नहीं कम नहीं हो जाता कि दूसरे ने भी वैसा ही अपराध किया है। गुजरात में जो हुआ वह शर्मनाक था, बेहद शर्मनाक था। इसके लिये गुजरात की आम जनता का कोई दोष नहीं था। उस समय जो वहां किया वहां के प्रशासन ने वह नहीं करना चाहिये था। प्रशासन की <strong>&#8216;सक्रिय-निष्क्रियता&#8217; </strong>के चलते जो हजारों लोग मरे वह अपने देश की एक बेहद शर्मनाक घटना है। यह काला धब्बा है। दूसरे लोगों के दाग दिखाने से यह धब्बा नहीं मिट जायेगा। ये कोई बुश के कान का तिल नहीं है जो पांच मिनट के आपरेशन से निकल जाये। बाकी आज गुजरात प्रगति कर रहा है, वहां सुशासन है, मोदीजी सक्षम मुख्यमंत्री हैं यह बहुत अच्छी बात है। इसकी भी तारीफ़ होनी चाहिये। गुजरात हमेशा से तमाम मामलों में आगे रहा है। लेकिन यह कोई ऐसा साबुन नहीं है जिससे वहां हुये सारे पाप , जिसको करने के लिये वहां की जनता नहीं प्रशासन जिम्मेदार है, नहीं धुल जाते। जो बातें वहां गलत हुयीं उनको तर्क-कुतर्क से सही ठहराने के बजाय बेहतर है कि वहां की अच्छी बातें लोगों को बताऒ। गुजरात में तमाम काम ऐसे हुये जो देश-दुनिया के लिये मिसाल हैं। उनके बारे लिखो।<br />
<strong>@संजय,</strong> पसंद का शुक्रिया। हमने यह कभी नहीं माना कि संजय ढोंग करते हैं। हम तो तुम्हारी ईमानदारी की मिसाल देते हैं।<br />
<strong>@ ई-पंडित,</strong> शुक्रिया। हमें बुजुर्ग काहे बना दिया। अभी तो हम जवान हैं।<br />
<strong>@प्रत्यक्षाजी,</strong> पसंद का शुक्रिया। देखिये हम भी पुराना माल खपा लेते हैं। केवल एक आप ही नहीं हैं जो अपनी सालों पहले की कवितायें झिला दें।<br />
<strong>@नितिन, </strong>तारीफ़ के लिये शुक्रिया। भूल सुधार कर लिया गया है। गलती बताने के लिये धन्यवाद!<br />
<strong>@अफलातूनजी, </strong>आप भी शुक्रिया ग्रहण कर लो भाई। आपके विचार जानकर अच्छा लगा!<br />
<strong>@निधि, </strong> कविता पसंद करने के लिये शुक्रिया। साधुवाद का धन्यवाद! अपने आलस्य को त्यागकर कब लिखना शुरू करोगी?<br />
<strong>@मृणाल, </strong> शुक्रिया। यह बहुत अच्छी बात है कि अभी भी कुछ-कुछ होने की सम्भावनायें बाकी हैं।<br />
<strong>@प्रियंकरजी,</strong>तारीफ़ सुन के तो हम शरमा गये। <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' />  चिट्ठी बहुत अच्छी लगी खासकर ये लाइनें-<br />
<strong>१.चोंच </strong>खोला तो बोला ‘कोई उम्मीद बर नहीं आती’. कइसे होगा उम्मीद . नास्तिक आदमी बोले तो नाशुक्रा अउर नाउम्मीद आदमी. नास्तिक आदमी को ईश्वर से ज्यादा भरोसा आपन जोग्यता पर अउर उससे भी ज्यादा भरोसा अपना खुद का प्रपंच पर होता है. प्रपंच नाहीं समझते हैं.प्रपंच माने छल-बल-कौशल से सेटिंग. अभियां काम ईश्वर नाहीं करते हैं. काम होता है सेटिंग से. जोग्गता कम भी हो तो चलेगा. सेटिंग पक्की चाहिए.<br />
<strong>२.दुनिया </strong>का सबसे बड़ा लोकतंत्र में कबड्डी खेल रहा हूं. कभी जीतता हूं तो कभी हारता भी हूं. जीवन इसी तरह चल रहा है. दुःख कम नाहीं हैं पर नाउम्मीदी भी नाहीं है .<br />
<strong>३.जब आदमी </strong>आपन काम-काज ठीक से करता है तो यह दुनिया सुंदर और जीने लायक लगता है. अउर उम्मीद का किरन भी फूटता है . आस-पास के लोगजन का चेहरा खिला-खिला अउर सुंदर लगता है. इंसानियत पर भरोसा जागता है.<br />
<strong>@मसिजीवीजी,</strong>आपकी टिप्पणी का शुक्रिया। हमने शोधार्थी को बरजा नहीं है, अनुरोध किया है कि खूब बढ़िया से शोध करें ताकि बहुत अच्छा शोधप्रबंध लिखें। हम लोग सलाह/सहयोग नहीं देंगे अपने शोधार्थियों को तो क्या होनोलूलू से आयेंगे। नीलिमाजी से हमारी सिफारिश करियेगा कि हमारी बात का अच्छे-अच्छे मूड में ग्रहण करें। अरे नीलिमाजी की वकालत आप नहीं करेंगे तो कौन करेगा आप ही ने बताया कि आप तो उनसे उधारी भी लिये हैं। उसका हिसाब तो चुकाना ही पड़ेगा। यह बहुत खुशनुमा बात है कि वे लोगों को लिखने के लिये उकसा रहीं हैं। आपने हमारे लेखन के बारे में जो धारणा बनायी वह आपकी जर्रा नवाजी है यह कहकर शरमाजाने के अलावा हमारे पास और कोई उपाय समझ में नहीं आता। <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /><br />
<strong>प्रियरंजन</strong> आपकी पसंद और टिप्पणी का शुक्रिया।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: P R Jha</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/253/comment-page-1#comment-7494</link>
		<dc:creator>P R Jha</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 09 Mar 2007 14:55:59 +0000</pubDate>
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		<description>sukul jee
  bahut badhiya. mere khyal se aapne bahut si un baaton ko clear kar diya hai, jinke baare mein tamam log kuchh janana chahte the. ummid hai aapki ye bhumika aage bhi jaari rahegi.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>sukul jee<br />
  bahut badhiya. mere khyal se aapne bahut si un baaton ko clear kar diya hai, jinke baare mein tamam log kuchh janana chahte the. ummid hai aapki ye bhumika aage bhi jaari rahegi.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: masijeevi</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/253/comment-page-1#comment-7488</link>
		<dc:creator>masijeevi</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 09 Mar 2007 11:19:59 +0000</pubDate>
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		<description>आपने नई नई शोधार्थी को बेकार ही बरज दिया। ;) वह तो दिल्‍ली की गली गली से हर संभावित लेखक को खींच खॉंचकर चिट्ठाकारी में लाने के लिए दिन रात एक कर रही हैं- और उनका संदेश भी यह ही था कि अपने भेजे के शोर को सुनें- बैन बून की फिकर ना करें। खैर वे खुद सुलटें मैं क्‍या वकील लगा हूँ।
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अधिक गंभीर नजरिए से सोचें तो भले ही मैं अविनाशजी की तरह एक (पूर्व)कारसेवक पत्रकार नहीं हँ पर उनसे यह कहने में संकोच नहीं कि वे सनसनीखेजता के पीछे अंधी दौड़ में जरूर है। और ये आतंकित करवा के पढ़वा लेंगे- ये दंभ भी है। जो शामिल नहीं उनकी हिमाकत पर हैरान होने वाले और घूरकर देखने वाले भी खूब थे। 
समझना चाहें तो समझ लीजिए ब्‍लॉग केवल कागज से कीबोर्ड का बदलाव नहीं है ये अलग विधा है- कभी कभी थोड़ा पढ लेना ठीक होता है, फ़ुरसतिया लेखन और सुनीलजी भर को ही देख लें काफी सीख सकते हैं हम तो सीख रहे हैं। 
लेकिन हॉं कोई आप पर बैन लगाने की बात करे तो यकीन जानिए हम आपके बात कहने, भले ही गलत बात कहने के अधिकार के बिना शर्त समर्थक हैं</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आपने नई नई शोधार्थी को बेकार ही बरज दिया। <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_wink.gif' alt=';)' class='wp-smiley' />  वह तो दिल्‍ली की गली गली से हर संभावित लेखक को खींच खॉंचकर चिट्ठाकारी में लाने के लिए दिन रात एक कर रही हैं- और उनका संदेश भी यह ही था कि अपने भेजे के शोर को सुनें- बैन बून की फिकर ना करें। खैर वे खुद सुलटें मैं क्‍या वकील लगा हूँ।<br />
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अधिक गंभीर नजरिए से सोचें तो भले ही मैं अविनाशजी की तरह एक (पूर्व)कारसेवक पत्रकार नहीं हँ पर उनसे यह कहने में संकोच नहीं कि वे सनसनीखेजता के पीछे अंधी दौड़ में जरूर है। और ये आतंकित करवा के पढ़वा लेंगे- ये दंभ भी है। जो शामिल नहीं उनकी हिमाकत पर हैरान होने वाले और घूरकर देखने वाले भी खूब थे।<br />
समझना चाहें तो समझ लीजिए ब्‍लॉग केवल कागज से कीबोर्ड का बदलाव नहीं है ये अलग विधा है- कभी कभी थोड़ा पढ लेना ठीक होता है, फ़ुरसतिया लेखन और सुनीलजी भर को ही देख लें काफी सीख सकते हैं हम तो सीख रहे हैं।<br />
लेकिन हॉं कोई आप पर बैन लगाने की बात करे तो यकीन जानिए हम आपके बात कहने, भले ही गलत बात कहने के अधिकार के बिना शर्त समर्थक हैं</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: प्रियंकर</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/253/comment-page-1#comment-7487</link>
		<dc:creator>प्रियंकर</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 09 Mar 2007 10:33:15 +0000</pubDate>
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		<description>सुकुल भाई! 
तुमाई पोस्ट पढी . कलम तोर कै धर दई तुमनै तौ. छाती जुड़ाय गई.
इयैं अबिनसवा के दद्दा की चिट्ठी आई रही. मोहल्ला के पता पैइ डारी हती . आजै मिली है. मार बमक रहे हते. हमनै कही धीरज धरौ . लड़का अबै नओ-नओ धर्मनिरपेक्ष भओ हैगो .होश कम है और जोश जादा. हथेली पै सरसों जमाओ चांहत है. ऊपर वानै खुदइ नै राज़ खोलो है कि ९२ के बैच को धर्मनिरपेक्ष है. तौ वाकी धर्मनिरपेक्षता की कुल उमर भई १५ साल. यानी वाकी धर्मनिरपेक्षता अपनी &#039;टीन्स&#039;में चल रही हैगी. तौ समझ लेओ कि &#039;द एज ऑफ़ स्ट्रेस एण्ड स्ट्राइफ़&#039; ज़ारी है . थोड़ो समय और देओ.  सब ठीक हुय जैहै . बाबरी मस्जिद न गिरी होती तो लड़कउ धर्मनिरपेक्ष न भओ होतो.अब गलत काम करे हैं तौ भुगतौ वाके फल . जनार्दन भैया ठहरे उमरदार आदमी  उन्हें हम का कहते और का लिखते.बस जो लिखो सो दोहराय रए हैं. तुमाए भरोसे पै लिख डारो है. अब देखियो जनता दौड़ाय न लै. चिट्ठी नीचे है :



जनार्दन भइया,
तोहरा चिट्ठिया मिला रहा .बांच कर मन को तसल्ली हुआ . अब ई अबिनसवा का कारस्तानी सुनियेगा तो हाथ सीधा कपार पर ले जाइयेगा. दोस्त देखे न दुश्मन बस मरखना बैल की माफ़िक सींग लड़ाता घूमता है. जब पढ़ाई-लिखाई का, अउर कुछ बढियां करने का समय था तब तो कुछ उखाड़ किया नाहीं,अब टल्ले खाते-खाते हिलग गये है कौनो ठीक-ठिकाने पर तो ऐसा बुझाता है कि मानो ज्ञान का एजेन्सी ले लिए हैं. खुदाई-खिदमतगार की तरहां निकल पड़े हैं दुनिया बदलने. अब ई बात अलग है कि अभी खुद का सेंट सम्हलता नहीं है. रात को सोते हैं तो टिटिहरी की तरहां पंजे ऊपर करके सोते हैं कि कहीं आसमान गिर न पड़े . 

अरे भाईसाहब तोहका ऊ बतराया नाहीं कि सबका बचावे की जिम्मेदारी उनहीं पर तो छोड़ कर गये हैं ऊपरवाले . ऊपरवाले मतबल ईश्वर, बोले तो भगवान. अरे आपन ई अबिनास उनका जबरन रिटायरमेंट दिलवा के उनका जिम्मेदारी खुद ले लिए हैं. आखिर ई ईश्वर ठहरा नश्वर प्राणी,पता नहीं ससुरा जन्मा भी था कि नहीं. बुड़बक लोगजन सब क्या तो बोलता रहता है जरा-मरण से परे --जाके मुंह माथा नहीं-- अउर न जाने क्या-क्या. अब कबीरदास-तुलसीदास नाहीं रहे तो उदास होने का कौनो दरकार नाहीं है . अरे ई आपन अबिनसवा है ना. पट्ठा आसन जमाए बैठा है अउर सबको बांग सुना रहा है. झख मार कर सबई सुन भी रहा है. का हर्ज़ है. एतना लोग तो बोल रहा है . एक जन औरो सही. का बिगड़ता है.

अब बोलिये का जरूरत रहा यह परचार करने का कि हम नास्तिक हूं. ई सब तो उसका लच्छन से बुझाता है. फिर चोंच खोला तो बोला &#039;कोई उम्मीद बर नहीं आती&#039;. कइसे होगा उम्मीद . नास्तिक आदमी बोले तो नाशुक्रा अउर नाउम्मीद आदमी. नास्तिक आदमी को ईश्वर से ज्यादा भरोसा आपन जोग्यता पर अउर उससे भी ज्यादा भरोसा अपना खुद का प्रपंच पर होता है. प्रपंच नाहीं समझते हैं.प्रपंच माने छल-बल-कौशल से सेटिंग. अभियां काम ईश्वर नाहीं करते हैं. काम होता है सेटिंग से. जोग्गता कम भी हो तो चलेगा. सेटिंग पक्की चाहिए.एतना समझ लेंगे तो मंदिर की ओर ताकेंगे भी नहीं.

अब हम्में देखिये! एकदम बुड़बक की माफ़िक बइठे हैं. बाप-दादा का &#039;ह्यूमनिस्ट&#039;सिखावन पर चलते रहे अउर &#039;बैकवार्ड&#039; कहलाते रहे. ई सब रंगी-बजरंगी भी हमको पानी पी-पी कर गरियाता रहा अउर ई अपना खून भी हमको गलतै समझता रहा . बोलिये एतना सब होने पर भी हम कहीं उम्मीद छोड़े? काहे कि हम मानते हैं ऊपरवाले को भी और जानते हैं नीचे वाले को भी. दोनों जन पर हमारा भरोसा है. काहे नाउम्मेद हों भाई.दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र में कबड्डी खेल रहा हूं. कभी जीतता हूं तो कभी हारता भी हूं. जीवन इसी तरह चल रहा है. दुःख कम नाहीं हैं पर नाउम्मीदी भी नाहीं है .

अब ई बताइयेगा कि अबिनसवा तोहार कहा सुनता है कि नाहीं. अगर सुनता हो तो समुझावन दीजिएगा कि बस अपना काम-काज ठीक से करे. जब आदमी आपन काम-काज ठीक से करता है तो यह दुनिया सुंदर और जीने लायक लगता है. अउर उम्मीद का किरन भी फूटता है . आस-पास के लोगजन का चेहरा खिला-खिला अउर सुंदर लगता है. इंसानियत पर भरोसा जागता है. गालिब का तो पेंशन बंद हो गया था.अबिनसवा का तो नौकरिया बचा हुआ है.महीना टाइम पर मिलता ही होगा. जनाना भी बराबर का कमा रहा है. यार-दोस्त का मंडली भी ठीकै-ठीक जुटा लिया है. तब काहे रोता है. फ़ैशन में? 

लगता है छुटके का ई दुःख छायावादी है अउर गुस्सा हालावादी .

हमरा परनाम कुबूलिएगा.
तोहार
मंझलका</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सुकुल भाई!<br />
तुमाई पोस्ट पढी . कलम तोर कै धर दई तुमनै तौ. छाती जुड़ाय गई.<br />
इयैं अबिनसवा के दद्दा की चिट्ठी आई रही. मोहल्ला के पता पैइ डारी हती . आजै मिली है. मार बमक रहे हते. हमनै कही धीरज धरौ . लड़का अबै नओ-नओ धर्मनिरपेक्ष भओ हैगो .होश कम है और जोश जादा. हथेली पै सरसों जमाओ चांहत है. ऊपर वानै खुदइ नै राज़ खोलो है कि ९२ के बैच को धर्मनिरपेक्ष है. तौ वाकी धर्मनिरपेक्षता की कुल उमर भई १५ साल. यानी वाकी धर्मनिरपेक्षता अपनी &#8216;टीन्स&#8217;में चल रही हैगी. तौ समझ लेओ कि &#8216;द एज ऑफ़ स्ट्रेस एण्ड स्ट्राइफ़&#8217; ज़ारी है . थोड़ो समय और देओ.  सब ठीक हुय जैहै . बाबरी मस्जिद न गिरी होती तो लड़कउ धर्मनिरपेक्ष न भओ होतो.अब गलत काम करे हैं तौ भुगतौ वाके फल . जनार्दन भैया ठहरे उमरदार आदमी  उन्हें हम का कहते और का लिखते.बस जो लिखो सो दोहराय रए हैं. तुमाए भरोसे पै लिख डारो है. अब देखियो जनता दौड़ाय न लै. चिट्ठी नीचे है :</p>
<p>जनार्दन भइया,<br />
तोहरा चिट्ठिया मिला रहा .बांच कर मन को तसल्ली हुआ . अब ई अबिनसवा का कारस्तानी सुनियेगा तो हाथ सीधा कपार पर ले जाइयेगा. दोस्त देखे न दुश्मन बस मरखना बैल की माफ़िक सींग लड़ाता घूमता है. जब पढ़ाई-लिखाई का, अउर कुछ बढियां करने का समय था तब तो कुछ उखाड़ किया नाहीं,अब टल्ले खाते-खाते हिलग गये है कौनो ठीक-ठिकाने पर तो ऐसा बुझाता है कि मानो ज्ञान का एजेन्सी ले लिए हैं. खुदाई-खिदमतगार की तरहां निकल पड़े हैं दुनिया बदलने. अब ई बात अलग है कि अभी खुद का सेंट सम्हलता नहीं है. रात को सोते हैं तो टिटिहरी की तरहां पंजे ऊपर करके सोते हैं कि कहीं आसमान गिर न पड़े . </p>
<p>अरे भाईसाहब तोहका ऊ बतराया नाहीं कि सबका बचावे की जिम्मेदारी उनहीं पर तो छोड़ कर गये हैं ऊपरवाले . ऊपरवाले मतबल ईश्वर, बोले तो भगवान. अरे आपन ई अबिनास उनका जबरन रिटायरमेंट दिलवा के उनका जिम्मेदारी खुद ले लिए हैं. आखिर ई ईश्वर ठहरा नश्वर प्राणी,पता नहीं ससुरा जन्मा भी था कि नहीं. बुड़बक लोगजन सब क्या तो बोलता रहता है जरा-मरण से परे &#8211;जाके मुंह माथा नहीं&#8211; अउर न जाने क्या-क्या. अब कबीरदास-तुलसीदास नाहीं रहे तो उदास होने का कौनो दरकार नाहीं है . अरे ई आपन अबिनसवा है ना. पट्ठा आसन जमाए बैठा है अउर सबको बांग सुना रहा है. झख मार कर सबई सुन भी रहा है. का हर्ज़ है. एतना लोग तो बोल रहा है . एक जन औरो सही. का बिगड़ता है.</p>
<p>अब बोलिये का जरूरत रहा यह परचार करने का कि हम नास्तिक हूं. ई सब तो उसका लच्छन से बुझाता है. फिर चोंच खोला तो बोला &#8216;कोई उम्मीद बर नहीं आती&#8217;. कइसे होगा उम्मीद . नास्तिक आदमी बोले तो नाशुक्रा अउर नाउम्मीद आदमी. नास्तिक आदमी को ईश्वर से ज्यादा भरोसा आपन जोग्यता पर अउर उससे भी ज्यादा भरोसा अपना खुद का प्रपंच पर होता है. प्रपंच नाहीं समझते हैं.प्रपंच माने छल-बल-कौशल से सेटिंग. अभियां काम ईश्वर नाहीं करते हैं. काम होता है सेटिंग से. जोग्गता कम भी हो तो चलेगा. सेटिंग पक्की चाहिए.एतना समझ लेंगे तो मंदिर की ओर ताकेंगे भी नहीं.</p>
<p>अब हम्में देखिये! एकदम बुड़बक की माफ़िक बइठे हैं. बाप-दादा का &#8216;ह्यूमनिस्ट&#8217;सिखावन पर चलते रहे अउर &#8216;बैकवार्ड&#8217; कहलाते रहे. ई सब रंगी-बजरंगी भी हमको पानी पी-पी कर गरियाता रहा अउर ई अपना खून भी हमको गलतै समझता रहा . बोलिये एतना सब होने पर भी हम कहीं उम्मीद छोड़े? काहे कि हम मानते हैं ऊपरवाले को भी और जानते हैं नीचे वाले को भी. दोनों जन पर हमारा भरोसा है. काहे नाउम्मेद हों भाई.दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र में कबड्डी खेल रहा हूं. कभी जीतता हूं तो कभी हारता भी हूं. जीवन इसी तरह चल रहा है. दुःख कम नाहीं हैं पर नाउम्मीदी भी नाहीं है .</p>
<p>अब ई बताइयेगा कि अबिनसवा तोहार कहा सुनता है कि नाहीं. अगर सुनता हो तो समुझावन दीजिएगा कि बस अपना काम-काज ठीक से करे. जब आदमी आपन काम-काज ठीक से करता है तो यह दुनिया सुंदर और जीने लायक लगता है. अउर उम्मीद का किरन भी फूटता है . आस-पास के लोगजन का चेहरा खिला-खिला अउर सुंदर लगता है. इंसानियत पर भरोसा जागता है. गालिब का तो पेंशन बंद हो गया था.अबिनसवा का तो नौकरिया बचा हुआ है.महीना टाइम पर मिलता ही होगा. जनाना भी बराबर का कमा रहा है. यार-दोस्त का मंडली भी ठीकै-ठीक जुटा लिया है. तब काहे रोता है. फ़ैशन में? </p>
<p>लगता है छुटके का ई दुःख छायावादी है अउर गुस्सा हालावादी .</p>
<p>हमरा परनाम कुबूलिएगा.<br />
तोहार<br />
मंझलका</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: mrinal kant</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/253/comment-page-1#comment-7486</link>
		<dc:creator>mrinal kant</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 09 Mar 2007 09:10:27 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://hindini.com/fursatiya/?p=253#comment-7486</guid>
		<description>&quot;अब हम कोई बबुआ नहीं रहे कि कोई कुछ कहेगा तो हम उससे अपने दिमाग में साम्प्रदायिकता भर लेंगे।

लेकिन हां, मैं मोहल्ले पर या किसी और भी ब्लाग पर बैन लगाने के एकदम खिलाफ़ हूं। मेरा यह मानना है कि अगर आपका लिखना लोगों को अच्छा लगेगा तो लोग पढ़ेंगे वर्ना अगला लेख देखेंगे।&quot;

बहुत सटीक विचार।

लेकिन सबसे अच्छी लगी आपकी कविता। खासतौर पर &quot;खबरदार, जो ऐसा फिर कभी सोचा,
ऐसा पहले कभी नहीं हुआ।&quot; नहीं, पूरी की पूरी ही। अच्छी कविता पढ़ कर मुझे कुछ होने लगता है। बयान नही कर सकता, पर वही हो रहा है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>&#8220;अब हम कोई बबुआ नहीं रहे कि कोई कुछ कहेगा तो हम उससे अपने दिमाग में साम्प्रदायिकता भर लेंगे।</p>
<p>लेकिन हां, मैं मोहल्ले पर या किसी और भी ब्लाग पर बैन लगाने के एकदम खिलाफ़ हूं। मेरा यह मानना है कि अगर आपका लिखना लोगों को अच्छा लगेगा तो लोग पढ़ेंगे वर्ना अगला लेख देखेंगे।&#8221;</p>
<p>बहुत सटीक विचार।</p>
<p>लेकिन सबसे अच्छी लगी आपकी कविता। खासतौर पर &#8220;खबरदार, जो ऐसा फिर कभी सोचा,<br />
ऐसा पहले कभी नहीं हुआ।&#8221; नहीं, पूरी की पूरी ही। अच्छी कविता पढ़ कर मुझे कुछ होने लगता है। बयान नही कर सकता, पर वही हो रहा है।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: Nidhi</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/253/comment-page-1#comment-7485</link>
		<dc:creator>Nidhi</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 09 Mar 2007 07:43:01 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://hindini.com/fursatiya/?p=253#comment-7485</guid>
		<description>बहुत दिनों से चिट्ठाजगत की गतिविधियों की अधिक जानकारी नहीं हो पा रही है इसलिये आलेख पर व्यक्त करने के लिये तो कोई विचार है नहीं मेरे पास किंतु भैया,कविता बहुत ही सुंदर लगी. जीवन के इसी पहलू पर कई बार सोचती रह जाती हूँ. आपने इसे बहुत खूबी के साथ प्रस्तुत किया है. साधुवाद!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत दिनों से चिट्ठाजगत की गतिविधियों की अधिक जानकारी नहीं हो पा रही है इसलिये आलेख पर व्यक्त करने के लिये तो कोई विचार है नहीं मेरे पास किंतु भैया,कविता बहुत ही सुंदर लगी. जीवन के इसी पहलू पर कई बार सोचती रह जाती हूँ. आपने इसे बहुत खूबी के साथ प्रस्तुत किया है. साधुवाद!</p>
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