फुरसतिया का इंटरव्यू

आज तरकश पर अपना इंटरव्यू सुना। मजा आया। सोचा आवाज कुछ और अच्छी होती। अफलातूनजी नाराज कि पसंदगी में मैंने उनकी जगह प्रत्यक्षाजी को तरजीह दी। लेकिन यह तो समझो भाई कि जब रैपिड फायरिंग हो रही हो तो दिमाग काम नहीं करता- सच ही बोलता है। उड़नतश्तरी और जो न कह सके में जो न कह सके मुझे कहना ही था काहे से ऐसा हम लिखित बयानी कर चुके हैं।

हमारे कुछ दोस्तों ने कहा कि हमारी श्रीमती जी ने हमें ‘आउटकास्ट’ कर दिया। यह तो सहज सामान्य क्रिया है। दिन-प्रतिदिन का अभ्यास फलीभूत हुआ इंटरव्यू में भी। जब हमारी श्रीमतीजी बतिया रहीं थीं खुशी से खुशी-खुशी तब हम दूसरे कमरे में चले गये। हमारे सामने वो झूठ नहीं बोल पातीं।

खुशी ने पूछा- हमारा ‘प्रेम-विवाह’ हुआ या ‘जुगाड-विवाह’(लव मैरिज या अरेंज्ड मैरिज)। पत्नी की चिंता थी कि कहीं हम भावविभोर होकर ‘प्रेम-विवाह’ न कह दें। उनकी चिंता वाजिब भी थी। जो आज तक न हुआ उससे शुरुआत को कोई कैसे सच मान ले। हमने जब जुगाड़-विवाह वाले आप्शन को लाक किया तो हमें लगा पत्नीश्री ने छ्ह लाख चालीस हजार का चेक काट के हमें थमा दिया- जाओ मौज करो टाइप। लगातार दस-बारह चैन की सांसे ले ली गयीं।

हमने अपने ब्लाग का नाम फुरसतिया कैसे रखा। इस पर मैंने बताया कि हमने ऐसे ही रैपिड फ़ायर टाइप सवाल की तरह नाम रखा। पहले एक ब्लाग बनाया था ठेलुहा नाम से। फिर उसका पासवर्ड खो गया। इसके बाद उसे इंद्र अवस्थी ने लूट लिया। फिर हम फुरसतिया को अंगीकार करके लिखा-पढ़ी के ब्लाग-समुद्र में कूद पड़े-छपाक। अभी तक तैर-उतरा रहे हैं।

एक सवाल जो हमसे पूछा गया कि हमारी भूमिका अभिभावक की है तो कैसा लगता है। हमारा जवाब था जो कि सच भी है -बहुत वाहियात लगता है। और यह सच है। अक्सर तो हंसी भी आती है कि भाई लोग कैसे-कैसे मामूली मसलों पर किड़बिड़-किड़बिड़ करने लगते हैं और बड़ी श्रद्धा पूर्वक मय तर्क-सबूत मोर्चा संभाल लेते हैं। अब यह बात अलग है कि जैसे ही बोरे हो जाते हैं, सफेद झंडा फहरा कर कुछ ब्रेक ले लेते हैं -अच्छा फिर लड़ते हैं ब्रेक के बाद टाइप!

मुझे लगता है कि लोग जब एक दूसरे से प्रत्यक्ष रूप से परिचित नहीं होते तो भ्रम फैलने की गुंजाइश कम रहती है। मिलने-जुलने, बोलने-बतियाने से संदेह-कटुता की धूल झड़ती रहती है। जिन लोगों से आप मिल चुके हैं उनके कहे-लिखे को आप बेहतर समझ सकते हैं। यह भी एक शोध का विषय है कि देखा जाये कि जो लोग आपस में मिले नहीं हैं वे कितना लड़ते/बहसते हैं, उन लोगों के मुकाबले जो मिल-मिला चुके हैं।

पिछ्ले दो-तीन दिन जब कुछ लोगों के तेवर बड़े तीखे थे ऐसे में खुशी के इस पाडकास्ट ने सारी कटुता सेना को तिड़ी-बिड़ी कर दिया। ऐसा नहीं कि इसमें कुछ ऐतिहासिक उपदेश प्रवचन है लेकिन जब कुतर्कों की मारा-मारी चल रही हो तो ऐसी खूबसूरत आवाज सुनकर लोग सोचेंगे कि कहां हम अपना समय बरबाद कर रहे थे।

रही-सही कसर कल दिल्ली में हुयी ब्लागर्स मीट ने पूरी कर दी। अब कुछ दिन सारे बहसिये शान्त रहेंगे।

भाई लोगों ने पिछली बहस का कूड़ा अपने-अपने ब्लाग से धो-पोंछ दिया। अच्छा है। लेकिन मुझे लगता है कि इस सब को हटाना नहीं चाहिये। दफ़्तरी आदमी हूं इसलिये मेरा मानना है कि खराब माने जाने वाले कामों का भी रिकार्ड मिटाना नहीं चाहिये। यह इसलिये भी जरूरी है ताकि आगे के लिये सनद रहे कि हम यह करतूते कर चुके हैं।

सागर की शिकायत थी कि कोई बुजुर्ग उनके बीच में नहीं आया जब उनके खिलाफ़ लिखा पढ़ी हो रही थी।

मैंने इस बारे में बहुत सोचा। मुझे लगता है ब्लाग की दुनिया आभासी दुनिया है। कौन किसका बुजुर्ग है यहां। अगर ब्लाग लेखन की बात करो तो हम दूसरे लोगों से मात्र एकाध साल सीनियर हैं। उम्र की बात करो तो जिन घुघूती बासती के ब्लाग पर आरोप-कबड्डी हो रही थी वे बुजुर्ग महिला हैं। उनको दुख देकर,वहां मारने-पीटने तक की बात करते हुये आप किससे अपेक्षा करते हैं कि वहां बीच-बचाव करे।

एक बात और समझनी चाहिये कि जितने भी ब्लागर हैं उनके नेट से जुड़ने के समय अलग-अलग हैं। कोई हमेशा नहीं जुड़ा रहता कि इधर आपने कुछ लिखा दन से उसने पढ़ लिया। और फिर यह कोई हाथापाई का भी मामला नहीं है आप अकेले पड़ गये तो मारे जायेंगे। टिप्पणियां हैं- हो रही हैं। आप भी करो। किसी ने आपके खिलाफ़ कुछ लिखा और आप वह नहीं हैं तो उससे आपको विचलित होने की क्या जरूरत? टिप्पणी कोई बंसती नहीं है जो कुछ देर रुक गयी, जवाब नहीं दिया गया तो वीरू मारा जायेगा। आप आराम से करें कमेंट। अपना नजरिया अच्छी तरह खुद समझकर पोस्ट लिखें। कौनौ हड़बड़ी तो है नहीं। न आप कहीं जा रहे हैं न हम।

मेरा सुझाव है कि किसी भी आक्रामक टिप्पणी जवाब तुरन्त देने की बजाय एक दिन बाद दिया जाये। आत्म संयम कोई कमजोरी की निशानी नहीं है। मानोसी की हाइपर तकनीक बच्चों पर ही नहीं सब पर लागू होती है।

नेट एक क्लिक पर आपको पोस्ट करने की सुविधा देता है। यह इसकी सामर्थ्य है। हर सामर्थ्य के साथ उसकी सीमा भी जुड़ी होती है। सो नेट की भी सीमा है। जहां आपने किसी दूसरे के ब्लाग पर कुछ कमेंट किया तो फिर उससे आपका अधिकार गया। फिर उसे हटाना न हटाना उस ब्लाग मालिक के हाथ में होता है। आपकी कोई फूहड़ टिप्पणी अनन्तकाल तक आपका मुंह बिराती रहेगी। बाद में आपके अफसोस का तिरपाल उसे चाहे जितना ढंके लेकिन जिसको मन आयेगा दूसरों को दिखायेगा -ई देखो फलाने कहिन रहैं।

बहरहाल, देखिये हम कहां से कहां पहुंच गये। खुशी के इस पाडकास्टिंग से हम खुश हो गये। इसका विधा का व्यापक उपयोग होना चाहिये। जैसा साथियों ने बताया कि अगर हो सके तो हर हफ़्ते लोगों के इंटरव्यू लिये जायें। इससे तरकश की लोकप्रियता में इजाफ़ा होगा और हम दूसरे लोगों के बारे में जानेंगे।

मेरी पसंद में आज एक कविता की कानपुर के प्रसिद्ध गीतकार उपेन्द्र जी के एक प्रसिद्ध गीत की कुछ पंक्तियां जो हमें पिछले हफ्ते विनोद श्रीवास्तव नें सुनाईं। वे हमारे घर आये थे। हमने उनके दो गीत रिकार्ड भी किये।
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३.फुरसतिया बनाम फोकटिया
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५. दिल्ली हिंदी ब्लागर्स भेंटवार्ता विवरण
मेरी पसंद

प्यार एक राजा है
जिसका बहुत बड़ा दरबार है
पीड़ा जिसकी पटरानी है
आंसू राजकुमार है।

-उपेन्द्र, कानपुर

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

13 responses to “फुरसतिया का इंटरव्यू”

  1. Pankaj Bengani

    चाचु आपको पॉडकास्ट पसन्द आया, इसके लिए बहुत धन्यवाद. खुशी को मै बता दुंगा.

    हालाँकि यह और बेहतर हो सकता था, हम पुरा संतुष्ट नहीं है. फिर भी सिख रहे हैं।
    हाँ इस विधा का व्यापक प्रयोग होना चाहिए. और भविष्य मे होगा भी.

    हम सब कई प्रयोग करते रहते हैं, कई बार असफलता हाथ लगती कई बार सफलता हाथ लगती है।
    तरकश के बारे में कह सकता हुँ कि, कई बार पता चल जाता है कि यह प्रयोग नही चल रहा है, तो उसे धीरे से बन्द कर दिया जाता है। 
    और कई बार शुरूआती असफलता मिलने पर भी यकीन हो जाता है कि यह प्रयोग चलेगा ही चलेगा, तरकश पॉडकास्ट ऐसा ही प्रयोग था।

    ऑडियो मिक्सींग और रिकोर्डिंग में हमारा अनुभव काम आ रहा है. खुशी बहुत मेहनत करती है, यह भी सच है. पर यह एक टीमवर्क है, जिसमें समीरजी से लेकर संजयभाई तथा अन्य भी बहुत से लोग जुडते हैं।

    खुशी अपने ब्लोग पर “कैसे होता है तरकश पॉडकास्ट” यह लिखने वाली है, उम्मीद है इससे अन्य लोगों को मदद मिलेगी.

  2. राजीव

    चलो अच्छा किया जो इंटरव्यू के बाद तुरत-फुरत स्पष्टीकरण भी पेश कर दिया गया।

    कुछ वाक्यांश अधिक प्रभावशाली/विचारणीय हैं -

    लेकिन यह तो समझो भाई कि जब रैपिड फायरिंग हो रही हो तो दिमाग काम नहीं करता- सच ही बोलता है। – स्वीकरोक्ति।

    हमारे सामने वो झूठ नहीं बोल पातीं – तो आपने उनकी बातों को झूठ साबित करने में कोई कसर नहीँ छोड़ी।
    जो आज तक न हुआ उससे शुरुआत को कोई कैसे सच मान ल – रहस्योद् घाटन ।

    बहरहाल इंटरव्यू अच्छा था और प्रस्तुति भी शानदार!

  3. अफ़लातून

    मेरे प्यारे भाई,
    नाराजगी का प्रश्न नहीं उठता। किसी प्रिय ने किसी को पसन्द किया तो उसमें अप्रिय तो कुछ हो ही नहीं सकता। हमे प्रत्यक्षा से ‘अदेखाई’ हो रही थी। अदेखाई का मतलब खुशी से पूछिए-यह शब्द हिन्दी वाले समझ तो रहे होंगे लेकिन गुजराती में प्रचलित शब्द है,इसलिए खुशी से पूछिए । एक और सवाल(रैपिड फ़ायर) जो आप आधा समझे और खुशी तो पूरा नहीं समझ रही थी – उस पर कभी और।

  4. जीतू

    अबे तुम तो सैंटिआ गए। सागर भाई मोस्ट सैंटी है, तुम तो उनसे भी आगे निकल गए। पथ से मत भटको। पॉडकास्ट वाली बात पर रहो।

    cucool वाला मामला तो तुम पूरी तरह पचा गए, (अच्छा भौजी बगल मे थी, तभी)

    वैसे एक बात कहूं, तुम तो ‘आउटडेटेड’ हो गए अब, अब लोग तुम्हारे ब्लॉग पर आएंगे सिर्फ़ भौजी का पॉडकास्ट सुनने। बकिया का हमे नही पता, हम तो ऐसा ही करिबै।

    बहुत अच्छा पॉडकास्ट था, बहुत मजा आया। इससे चिट्ठाकार परिवार के सदस्यों को और जानने का मौका मिलेगा।

  5. प्रियंकर

    अच्छा साक्षात्कार !

    सुकुलाइन ने समां बांध दिया. क्या सह्ज-स्वाभाविक और उत्फ़ुल्ल अंदाज़. क्या आवाज़ और क्या डिक्शन की क्लैरिटी . ऊपर से सुंदर साहित्यिक गीत का गायन. सब कुछ फ़र्स्ट क्लास फ़र्स्ट .

    सुकुल जी लगता है टेन्शनिया गये. जवाब अच्छे दिये पर किसी नवोढ़ा की तरह लजाते हुए. ऊपर से हस्की-सी आवाज़ उनकी प्रिय हीरोइन रानी मुखर्जी जैसी . दो बार सुना पूरे कन्सन्ट्रेशन के साथ तब पूरी बात समझ में आई.

    पूरा साक्षात्कार बहुत अच्छा लगा. खुशी को बहुत-बहुत साधुवाद और बधाई!

  6. उन्मुक्त

    आवाज बहुत मीठी थी, सच कहा कि ‘ऐसी खूबसूरत आवाज सुनकर लोग सोचेंगे कि कहां हम अपना समय बरबाद कर रहे थे।”

  7. समीर लाल

    अगर आप उड़न तश्तरी कह देते तब तो आप हमारा विश्वास ही खो देते…अरे, सुनील जी के साथ नाम आया वही सम्मान था…वो प्रश्न तो खुशी हमसे भी करती कि उड़न तश्तरी या जो न कह सके… तो हमारा जवाब भी यही रहता—”"जो न कह सके”…

    -बाकि तो पॉडकास्ट बहुत मस्त रहा, आनन्द आ गया.

  8. Jagdish Bhatia

    बहुत अच्छा रहा इंटरव्यू।

  9. श्रीश शर्मा 'ई-पंडित'

    हूँ तो ओरिजिनल ठलुआ आप थे। खैर आप मानें न मानें हम सब ने आपको अपना बुजुर्ग मान लिया है।

  10. Ashish

    भाई, क्या इन्टरव्यू था, मज़ा आ गया सच में। सही में, शुक्ला जी की लेखनी का जबाब नहीं है।

    आशीष गर्ग

  11. प्रत्यक्षा

    ये टिप्पणी सुमन जी तक पहुँचाई जाय
    आपका गुनगुनाना , भई मज़ा आ गया । अब एक फुल लेंग्थ गीत हो जाय आपकी मधुर आवाज़ में। हम इंतज़ार में हैं ।

    और अफलातून जी ‘अदेखाई ‘ क्या होता है , वैसे हमारा नाम , बकौल समीर जी , आपके साथ लिया गया यही बहुत है हमारे लिये ।

  12. VINODVYAS

    जय श्री श्याम
    मिलकर खोशी हेई

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