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	<title>Comments on: पत्रकार ब्लागिंग काहे न करें, जम के करें!</title>
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	<description>हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै?</description>
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		<title>By: sanjeev</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/261/comment-page-1#comment-23653</link>
		<dc:creator>sanjeev</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 11 Jun 2008 21:06:10 +0000</pubDate>
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		<description>ptrkar he ak aisa prani hai jo kaphi had tak duniya ko sach se srabor karati hai kalpna kao yadi samachar ptra aur ptrakar n hote to sayd bhrastachar charm per hota neta des bech dete janta ko pta bhi nahi chalta  esliye ptrakar dalali jrur karte hai phir bhi bhagwan ka roop hote hai.jivit rahe ptrakr aur jivit rahe enki ptrakarita</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>ptrkar he ak aisa prani hai jo kaphi had tak duniya ko sach se srabor karati hai kalpna kao yadi samachar ptra aur ptrakar n hote to sayd bhrastachar charm per hota neta des bech dete janta ko pta bhi nahi chalta  esliye ptrakar dalali jrur karte hai phir bhi bhagwan ka roop hote hai.jivit rahe ptrakr aur jivit rahe enki ptrakarita</p>
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		<title>By: इंटरनेट, चिट्ठाकारी, पत्रकारिता और क़ानून &#171; चिट्ठाकारी</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/261/comment-page-1#comment-18098</link>
		<dc:creator>इंटरनेट, चिट्ठाकारी, पत्रकारिता और क़ानून &#171; चिट्ठाकारी</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 07 Jan 2008 17:51:58 +0000</pubDate>
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		<description>[...] इंटरनेट, चिट्ठाकारी, पत्रकारिता और&#160;क़ानून    Posted January 7, 2008    पिछले दिनों पत्रकारिता बनाम चिट्ठाकारिता पर अच्छी बहस हुई। यहां तक कि देबाशीष जी द्वारा चिट्ठा चर्चा पर इस बहस के पटाक्षेप की घोषणा कर दिए जाने के बाद भी वह जारी रही। डॉ. बेजी ने इस बहस को लेकर कुछ ऐसा राग छेड़ा कि अपनी तरफ से निष्कर्ष निकाल देने के बाद भी उसके सुर  मंद नहीं पड़ सके। हालांकि हिन्दी चिट्ठा जगत में कई पत्रकार पहले से ही सक्रिय रहे हैं और इस विषय पर चर्चा पहले भी होती रही है, लेकिन इस तरह की श्रृंखलाबद्ध बहस इस विषय पर पहली बार हुई। इस बहस के दौरान पत्रकार और चिट्ठाकार, दोनों के नजरिए से बहुत-सी महत्वपूर्ण बातें सामने आईं। अनूप जी, प्रमोद जी, अभय जी, अनामदास जी और काकेश जी जैसे कई साथियों ने इस विषय पर बहुत अच्छा लिखा। [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] इंटरनेट, चिट्ठाकारी, पत्रकारिता और&nbsp;क़ानून    Posted January 7, 2008    पिछले दिनों पत्रकारिता बनाम चिट्ठाकारिता पर अच्छी बहस हुई। यहां तक कि देबाशीष जी द्वारा चिट्ठा चर्चा पर इस बहस के पटाक्षेप की घोषणा कर दिए जाने के बाद भी वह जारी रही। डॉ. बेजी ने इस बहस को लेकर कुछ ऐसा राग छेड़ा कि अपनी तरफ से निष्कर्ष निकाल देने के बाद भी उसके सुर  मंद नहीं पड़ सके। हालांकि हिन्दी चिट्ठा जगत में कई पत्रकार पहले से ही सक्रिय रहे हैं और इस विषय पर चर्चा पहले भी होती रही है, लेकिन इस तरह की श्रृंखलाबद्ध बहस इस विषय पर पहली बार हुई। इस बहस के दौरान पत्रकार और चिट्ठाकार, दोनों के नजरिए से बहुत-सी महत्वपूर्ण बातें सामने आईं। अनूप जी, प्रमोद जी, अभय जी, अनामदास जी और काकेश जी जैसे कई साथियों ने इस विषय पर बहुत अच्छा लिखा। [...]</p>
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		<title>By: &#187; इंटरनेट, चिट्ठाकारी, पत्रकारिता और क़ानून पत्रिका: हिन्दी चिट्ठों की इंद्रधनुषी छटा</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/261/comment-page-1#comment-15216</link>
		<dc:creator>&#187; इंटरनेट, चिट्ठाकारी, पत्रकारिता और क़ानून पत्रिका: हिन्दी चिट्ठों की इंद्रधनुषी छटा</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 26 Sep 2007 06:49:40 +0000</pubDate>
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		<description>[...] चिट्ठा जगत में पत्रकारिता बनाम चिट्ठाकारिता पर बहस अक्सर चलती ही रहती है। देबाशीष जी द्वारा एक बार चिट्ठा चर्चा पर इस बहस के पटाक्षेप की घोषणा कर दिए जाने के बाद भी वह जारी है। डॉ. बेजी ने इस बहस को लेकर पिछली बार कुछ ऐसा राग छेड़ा कि अपनी तरफ से निष्कर्ष निकाल देने के बाद भी उसके सुर मंद नहीं पड़ सके। हालांकि हिन्दी चिट्ठा जगत में कई पत्रकार पहले से ही सक्रिय रहे हैं और इस विषय पर चर्चा पहले भी होती रही है, लेकिन इस तरह की श्रृंखलाबद्ध बहस इस विषय पर पहली बार हुई। इस बहस के दौरान पत्रकार और चिट्ठाकार, दोनों के नजरिए से बहुत-सी महत्वपूर्ण बातें सामने आईं। अनूप जी, प्रमोद जी, अभय जी, अनामदास जी और काकेश जी जैसे कई साथियों ने इस विषय पर बहुत अच्छा लिखा। [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] चिट्ठा जगत में पत्रकारिता बनाम चिट्ठाकारिता पर बहस अक्सर चलती ही रहती है। देबाशीष जी द्वारा एक बार चिट्ठा चर्चा पर इस बहस के पटाक्षेप की घोषणा कर दिए जाने के बाद भी वह जारी है। डॉ. बेजी ने इस बहस को लेकर पिछली बार कुछ ऐसा राग छेड़ा कि अपनी तरफ से निष्कर्ष निकाल देने के बाद भी उसके सुर मंद नहीं पड़ सके। हालांकि हिन्दी चिट्ठा जगत में कई पत्रकार पहले से ही सक्रिय रहे हैं और इस विषय पर चर्चा पहले भी होती रही है, लेकिन इस तरह की श्रृंखलाबद्ध बहस इस विषय पर पहली बार हुई। इस बहस के दौरान पत्रकार और चिट्ठाकार, दोनों के नजरिए से बहुत-सी महत्वपूर्ण बातें सामने आईं। अनूप जी, प्रमोद जी, अभय जी, अनामदास जी और काकेश जी जैसे कई साथियों ने इस विषय पर बहुत अच्छा लिखा। [...]</p>
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	<item>
		<title>By: पत्रिका &#124; इंटरनेट, चिट्ठाकारी, पत्रकारिता और क़ानून</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/261/comment-page-1#comment-15171</link>
		<dc:creator>पत्रिका &#124; इंटरनेट, चिट्ठाकारी, पत्रकारिता और क़ानून</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 24 Sep 2007 18:20:45 +0000</pubDate>
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		<description>[...] चिट्ठा जगत में पत्रकारिता बनाम चिट्ठाकारिता पर बहस अक्सर चलती ही रहती है। देबाशीष जी द्वारा एक बार चिट्ठा चर्चा  पर इस बहस के पटाक्षेप की घोषणा कर दिए जाने के बाद भी वह जारी है। डॉ. बेजी ने इस बहस को लेकर पिछली बार कुछ ऐसा राग छेड़ा कि अपनी तरफ से निष्कर्ष निकाल देने के बाद भी उसके सुर मंद नहीं पड़ सके। हालांकि हिन्दी चिट्ठा जगत में कई पत्रकार पहले से ही सक्रिय रहे हैं और इस विषय पर चर्चा पहले भी होती रही है, लेकिन इस तरह की श्रृंखलाबद्ध बहस इस विषय पर पहली बार हुई। इस बहस के दौरान पत्रकार और चिट्ठाकार, दोनों के नजरिए से बहुत-सी महत्वपूर्ण बातें सामने आईं। अनूप जी, प्रमोद जी, अभय जी, अनामदास जी और काकेश जी जैसे कई साथियों ने इस विषय पर बहुत अच्छा लिखा। [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] चिट्ठा जगत में पत्रकारिता बनाम चिट्ठाकारिता पर बहस अक्सर चलती ही रहती है। देबाशीष जी द्वारा एक बार चिट्ठा चर्चा  पर इस बहस के पटाक्षेप की घोषणा कर दिए जाने के बाद भी वह जारी है। डॉ. बेजी ने इस बहस को लेकर पिछली बार कुछ ऐसा राग छेड़ा कि अपनी तरफ से निष्कर्ष निकाल देने के बाद भी उसके सुर मंद नहीं पड़ सके। हालांकि हिन्दी चिट्ठा जगत में कई पत्रकार पहले से ही सक्रिय रहे हैं और इस विषय पर चर्चा पहले भी होती रही है, लेकिन इस तरह की श्रृंखलाबद्ध बहस इस विषय पर पहली बार हुई। इस बहस के दौरान पत्रकार और चिट्ठाकार, दोनों के नजरिए से बहुत-सी महत्वपूर्ण बातें सामने आईं। अनूप जी, प्रमोद जी, अभय जी, अनामदास जी और काकेश जी जैसे कई साथियों ने इस विषय पर बहुत अच्छा लिखा। [...]</p>
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		<title>By: तनवीर अहमद राणा,दिल्ली</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/261/comment-page-1#comment-8069</link>
		<dc:creator>तनवीर अहमद राणा,दिल्ली</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 12 Apr 2007 23:34:22 +0000</pubDate>
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		<description>ब्लागिंग के ज़रिये अपने विचारो को व्याक्त करना मेरी समझ से एक काफी अच्छा ज़रिया..इस ज़्यादा से ज़्यादा लोगों इस सुविधा को उपयोग करना चाहिए।
तनवीर अहमद राणा,दिल्ली</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>ब्लागिंग के ज़रिये अपने विचारो को व्याक्त करना मेरी समझ से एक काफी अच्छा ज़रिया..इस ज़्यादा से ज़्यादा लोगों इस सुविधा को उपयोग करना चाहिए।<br />
तनवीर अहमद राणा,दिल्ली</p>
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	<item>
		<title>By: Srijan Shilpi &#187; Blog Archive &#187; इंटरनेट, ब्लॉगिंग और क़ानून - भाग एक</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/261/comment-page-1#comment-7981</link>
		<dc:creator>Srijan Shilpi &#187; Blog Archive &#187; इंटरनेट, ब्लॉगिंग और क़ानून - भाग एक</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 06 Apr 2007 10:34:42 +0000</pubDate>
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		<description>[...] पिछले दिनों पत्रकारिता बनाम चिट्ठाकारिता पर अच्छी बहस हुई। यहां तक कि देबाशीष जी द्वारा चिट्ठा चर्चा पर इस बहस के पटाक्षेप की घोषणा कर दिए जाने के बाद भी जारी रही। डॉ. बेजी ने इस बहस को लेकर कुछ ऐसा राग छेड़ा कि अपनी तरफ से निष्कर्ष निकाल देने के बाद भी उसके सुर  मंद नहीं पड़ सके। हालांकि हिन्दी चिट्ठा जगत में कई पत्रकार पहले से ही सक्रिय हैं और इस विषय पर चर्चा पहले भी होती रही है, लेकिन इस तरह की श्रृंखलाबद्ध बहस इस विषय पर पहली बार हुई। इस बहस के दौरान पत्रकार और चिट्ठाकार, दोनों नजरिए से बहुत-सी महत्वपूर्ण बातें सामने आईं। अनूप जी, प्रमोद जी, अभय जी, अनामदास जी और काकेश जी जैसे कई साथियों ने इस विषय पर बहुत अच्छा लिखा। [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] पिछले दिनों पत्रकारिता बनाम चिट्ठाकारिता पर अच्छी बहस हुई। यहां तक कि देबाशीष जी द्वारा चिट्ठा चर्चा पर इस बहस के पटाक्षेप की घोषणा कर दिए जाने के बाद भी जारी रही। डॉ. बेजी ने इस बहस को लेकर कुछ ऐसा राग छेड़ा कि अपनी तरफ से निष्कर्ष निकाल देने के बाद भी उसके सुर  मंद नहीं पड़ सके। हालांकि हिन्दी चिट्ठा जगत में कई पत्रकार पहले से ही सक्रिय हैं और इस विषय पर चर्चा पहले भी होती रही है, लेकिन इस तरह की श्रृंखलाबद्ध बहस इस विषय पर पहली बार हुई। इस बहस के दौरान पत्रकार और चिट्ठाकार, दोनों नजरिए से बहुत-सी महत्वपूर्ण बातें सामने आईं। अनूप जी, प्रमोद जी, अभय जी, अनामदास जी और काकेश जी जैसे कई साथियों ने इस विषय पर बहुत अच्छा लिखा। [...]</p>
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		<title>By: ज्ञानदत्त पाण्डेय</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/261/comment-page-1#comment-7833</link>
		<dc:creator>ज्ञानदत्त पाण्डेय</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 29 Mar 2007 07:12:12 +0000</pubDate>
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		<description>आप पत्रकार बिरादरी को लपेट-लपेट कर शूगर कोटेड जवाब भले दे लें. पर चक्कर इन की गुटबाजी का जरूर है. एक को कुछ बोलो तो गोल का कोई दूसरा उसके पक्ष में चिपट लेता है. मैने टाटा को लेकर एक को कुछ कहा तो दूसरे सज्जन भगवान में मेरी आस्था को ले कर ही ललकारने लगे.
खैर चिठेरी का मंच फ्री फण्ड का है. सब जबरिया लिखिहीं - के का करे!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आप पत्रकार बिरादरी को लपेट-लपेट कर शूगर कोटेड जवाब भले दे लें. पर चक्कर इन की गुटबाजी का जरूर है. एक को कुछ बोलो तो गोल का कोई दूसरा उसके पक्ष में चिपट लेता है. मैने टाटा को लेकर एक को कुछ कहा तो दूसरे सज्जन भगवान में मेरी आस्था को ले कर ही ललकारने लगे.<br />
खैर चिठेरी का मंच फ्री फण्ड का है. सब जबरिया लिखिहीं &#8211; के का करे!</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: प्रियंकर</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/261/comment-page-1#comment-7800</link>
		<dc:creator>प्रियंकर</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 27 Mar 2007 08:42:43 +0000</pubDate>
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		<description>हमेशा की तरह बहुत सधा हुआ,संतुलित और समन्वयकारी लेख .</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>हमेशा की तरह बहुत सधा हुआ,संतुलित और समन्वयकारी लेख .</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: क्या होगा आपका पत्रकार महोदय ?? &#171; हम भी हैं लाइन में</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/261/comment-page-1#comment-7799</link>
		<dc:creator>क्या होगा आपका पत्रकार महोदय ?? &#171; हम भी हैं लाइन में</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 27 Mar 2007 07:05:50 +0000</pubDate>
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		<description>[...] बहस का प्रारम्भ तो हुआ था एक बहुत ही मासूम से सवाल से कि “पत्रकार क्यूं बने ब्लौगर” पर बहस बढ़ती गयी “दर्द बढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा की” की तर्ज पर .इसी विषय पर बहुत लोगों के विचार आये . मैने भी एक &#8216;मौजिया&#8217; (बकौल फुरसतिया जी ) चिट्ठा लिख डाला. वो बात तो मजाक की थी लेकिन आज पत्रकारिता का भविष्य क्या है .. आज के नये चिट्ठाकारिता के युग मे यह सवाल अब प्रासंगिक हो चला है. फुरसतिया जी ने अपने लेख में कहा कि पत्रकारों को ब्लौगिंग जम के करनी चाहिये लेकिन यदि हम इस पर गहराई से विचार करें तो प्रश्न उठेगा कि कितने पत्रकार आज ब्लौगिंग से परिचित भी हैं ? [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] बहस का प्रारम्भ तो हुआ था एक बहुत ही मासूम से सवाल से कि “पत्रकार क्यूं बने ब्लौगर” पर बहस बढ़ती गयी “दर्द बढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा की” की तर्ज पर .इसी विषय पर बहुत लोगों के विचार आये . मैने भी एक &#8216;मौजिया&#8217; (बकौल फुरसतिया जी ) चिट्ठा लिख डाला. वो बात तो मजाक की थी लेकिन आज पत्रकारिता का भविष्य क्या है .. आज के नये चिट्ठाकारिता के युग मे यह सवाल अब प्रासंगिक हो चला है. फुरसतिया जी ने अपने लेख में कहा कि पत्रकारों को ब्लौगिंग जम के करनी चाहिये लेकिन यदि हम इस पर गहराई से विचार करें तो प्रश्न उठेगा कि कितने पत्रकार आज ब्लौगिंग से परिचित भी हैं ? [...]</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: क्या होगा आपका पत्रकार महोदय ?? &#171; हम भी हैं लाइन में</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/261/comment-page-1#comment-7797</link>
		<dc:creator>क्या होगा आपका पत्रकार महोदय ?? &#171; हम भी हैं लाइन में</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 27 Mar 2007 06:52:05 +0000</pubDate>
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		<description>[...] बहस का प्रारम्भ तो हुआ था एक बहुत ही मासूम से सवाल से कि “पत्रकार क्यूं बने ब्लौगर” पर बहस बढ़ती गयी “दर्द बढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा की” की तर्ज पर .इसी विषय पर बहुत लोगों के विचार आये . मैने भी एक मौजिया (बकौल फुरसतिया जी ) चिट्ठा लिख डाला. वो बात तो थी मजाक की थी लेकिन पत्रकारिता का भविष्य क्या है ? आज के नये चिट्ठाकारिता के युग मे यह सवाल अब प्रासंगिक हो चला है. फुरसतिया जी ने अपने लेख में कहा कि पत्रकारों को ब्लौगिंग जम के करनी चाहिये लेकिन यदि हम इस पर गहराई से विचार करें तो प्रश्न उठेगा कि कितने पत्रकार आज ब्लौगिंग से परिचित भी हैं ? [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] बहस का प्रारम्भ तो हुआ था एक बहुत ही मासूम से सवाल से कि “पत्रकार क्यूं बने ब्लौगर” पर बहस बढ़ती गयी “दर्द बढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा की” की तर्ज पर .इसी विषय पर बहुत लोगों के विचार आये . मैने भी एक मौजिया (बकौल फुरसतिया जी ) चिट्ठा लिख डाला. वो बात तो थी मजाक की थी लेकिन पत्रकारिता का भविष्य क्या है ? आज के नये चिट्ठाकारिता के युग मे यह सवाल अब प्रासंगिक हो चला है. फुरसतिया जी ने अपने लेख में कहा कि पत्रकारों को ब्लौगिंग जम के करनी चाहिये लेकिन यदि हम इस पर गहराई से विचार करें तो प्रश्न उठेगा कि कितने पत्रकार आज ब्लौगिंग से परिचित भी हैं ? [...]</p>
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