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	<title>Comments on: जूते का चरित्र साम्यवादी होता है</title>
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	<description>हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै?</description>
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		<title>By: Deepak Dubey</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/265/comment-page-1#comment-36821</link>
		<dc:creator>Deepak Dubey</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 18 Feb 2009 12:37:43 +0000</pubDate>
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		<description>fursatiyaji kya aap antaryami hain jo aapne BUSH ko padne wale jute se kaphi pahle Jooton par likh diya..... khair jo likha achcha likha ,padhne me deri ki iski kshamayachna sahit.--- Deepak Dubey (would be blogger)Bhopal(m.p.)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>fursatiyaji kya aap antaryami hain jo aapne BUSH ko padne wale jute se kaphi pahle Jooton par likh diya&#8230;.. khair jo likha achcha likha ,padhne me deri ki iski kshamayachna sahit.&#8212; Deepak Dubey (would be blogger)Bhopal(m.p.)</p>
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		<title>By: deepak dubey</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/265/comment-page-1#comment-36819</link>
		<dc:creator>deepak dubey</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 18 Feb 2009 12:20:56 +0000</pubDate>
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		<description>fursatiyaji kya aap antaryami hain jo aapne BUSH ko padne wale jute se kaphi pahle Jooton par likh diya..... khair jo likha achcha likha ,padhne me deri ki iski kshamayachna ahit.--- Deepak Dubey (would be blogger)Bhopal(m.p.)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>fursatiyaji kya aap antaryami hain jo aapne BUSH ko padne wale jute se kaphi pahle Jooton par likh diya&#8230;.. khair jo likha achcha likha ,padhne me deri ki iski kshamayachna ahit.&#8212; Deepak Dubey (would be blogger)Bhopal(m.p.)</p>
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		<title>By: ताऊ रामपुरिया</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/265/comment-page-1#comment-34515</link>
		<dc:creator>ताऊ रामपुरिया</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 17 Dec 2008 04:18:02 +0000</pubDate>
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		<description>कल इस पस्त का लिंक हमारे हाथ लग गया था ! बहुत शान्दार अचना ! लगता है आ ज्योतिषी भी हो तभी तो इतना एडवांस में ये  लिख दिए रहे ! शुकल जे के साथ साथ  ज्योतिषी  जी को भी प्रणाम !

राम राम !</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>कल इस पस्त का लिंक हमारे हाथ लग गया था ! बहुत शान्दार अचना ! लगता है आ ज्योतिषी भी हो तभी तो इतना एडवांस में ये  लिख दिए रहे ! शुकल जे के साथ साथ  ज्योतिषी  जी को भी प्रणाम !</p>
<p>राम राम !</p>
]]></content:encoded>
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	<item>
		<title>By: nahimaloom</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/265/comment-page-1#comment-8229</link>
		<dc:creator>nahimaloom</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 23 Apr 2007 19:42:41 +0000</pubDate>
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		<description>बेहद भोंडी और विकृत सर्जनात्मकता का प्रदर्शन.एकदम घटिया... 




</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बेहद भोंडी और विकृत सर्जनात्मकता का प्रदर्शन.एकदम घटिया&#8230;</p>
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		<title>By: ई-स्वामी &#187; ब्लाग मस्ती - दूसरों का माल कैसे चुराएं - २</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/265/comment-page-1#comment-8038</link>
		<dc:creator>ई-स्वामी &#187; ब्लाग मस्ती - दूसरों का माल कैसे चुराएं - २</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 08 Apr 2007 23:37:27 +0000</pubDate>
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		<description>[...] पिटोगे बबुआ, पिटोगे! सच ऐसे बयान नहीं किये जाते! वैसे एक बात काबिले संशोधन है। हम जो लिखते हैं वह बताकर लिखते हैं कि ये फलाने का है वो अलाने का है। ऐसा करना चोरी में तो नहीं आना चाहिये। ये डकैती हो सकती है चोरी नहीं। हम तो इस्टाइल तक बताके लिखते हैं। पिछले लेख में तकनीक पालकी लिखा तो बताया कि ये शब्द राकेश खंडेलवाल की इस्टाइल का है। बाकयदे आभार व्यक्त किया है। ये चोरी नहीं है, डकैती मान सकते हैं। वैसे तुमको बतायें कमलेश्वर कहा करते थे- मेरी उमर ५५५० साल है। इसमें ५० साल उनकी उमर ५५०० साल उनके पूर्वज लेखकों की उमर। अपने पूर्वजों का माल हमारे बाप का माल है। उसमें कैसी चोरी। भाई हमे चोरी के आरोप से बरी करो,भले ही डकैती का मुकदमा चलाओ। वैसे लेख चौकस है। आगे का इंतजार है। बहुत दिन बाद मौज-मजे के मूड में आये हो। इसे बनाये रखो। दुनिया में कुछ और है नहीं बस कुछ दिन की मौज है। ले लो! [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] पिटोगे बबुआ, पिटोगे! सच ऐसे बयान नहीं किये जाते! वैसे एक बात काबिले संशोधन है। हम जो लिखते हैं वह बताकर लिखते हैं कि ये फलाने का है वो अलाने का है। ऐसा करना चोरी में तो नहीं आना चाहिये। ये डकैती हो सकती है चोरी नहीं। हम तो इस्टाइल तक बताके लिखते हैं। पिछले लेख में तकनीक पालकी लिखा तो बताया कि ये शब्द राकेश खंडेलवाल की इस्टाइल का है। बाकयदे आभार व्यक्त किया है। ये चोरी नहीं है, डकैती मान सकते हैं। वैसे तुमको बतायें कमलेश्वर कहा करते थे- मेरी उमर ५५५० साल है। इसमें ५० साल उनकी उमर ५५०० साल उनके पूर्वज लेखकों की उमर। अपने पूर्वजों का माल हमारे बाप का माल है। उसमें कैसी चोरी। भाई हमे चोरी के आरोप से बरी करो,भले ही डकैती का मुकदमा चलाओ। वैसे लेख चौकस है। आगे का इंतजार है। बहुत दिन बाद मौज-मजे के मूड में आये हो। इसे बनाये रखो। दुनिया में कुछ और है नहीं बस कुछ दिन की मौज है। ले लो! [...]</p>
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	<item>
		<title>By: फ़ुरसतिया</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/265/comment-page-1#comment-8030</link>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 08 Apr 2007 06:10:45 +0000</pubDate>
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		<description>&lt;strong&gt;@रिपुदमनजी&lt;/strong&gt;, लेख पसंद करने का शुक्रिया!
&lt;strong&gt;@मसिजीवीजी,&lt;/strong&gt; आपकी टिप्पणी के लिय्रे शुक्रिया! सृजन के मन में आपके लिये क्या है यह आप उनकी टिप्पणी में देख लें! 
&lt;strong&gt;@सृजनशिल्पी&lt;/strong&gt;, कुछ इसी तरह की तार्किक टिप्पणी की अपेक्षा मुझे थी। तुम्हारी टिप्पणी से मेरे विश्वास की रक्षा हुई। अपने बारे में व्यक्ति स्वंय जितना समझ सकता है उतना दुनिया का कोई सर्वेक्षण नही समझ/समझा सकता। तुम्हारे बारे में पोल कराने में मुझे कोई रुचि नहीं है। तुम स्वयं अपने बारे में बेहतर समझ सकते हो, अगर समझना चाहते हो। तुम्हारे बारे में जो मैं सोचता,समझता हूं वह मैंने बिना किसी लाग-लपेट के बताया। अब तुम इससे सहमत नहीं और इसे गलत मानते हो तो यह तुम्हारी मर्जी। संभव है मैं ही गलत होऊं! बाकी तुलना/उपमा पर बहुत कुछ कहा/लिखा जा सकता है लेकिन मैं जबरदस्ती अनावश्यक बहस में समय नहीं बर्बाद करना चाहता- न अपना न तुम्हारा। मेरी शुभकामनायें!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p><strong>@रिपुदमनजी</strong>, लेख पसंद करने का शुक्रिया!<br />
<strong>@मसिजीवीजी,</strong> आपकी टिप्पणी के लिय्रे शुक्रिया! सृजन के मन में आपके लिये क्या है यह आप उनकी टिप्पणी में देख लें!<br />
<strong>@सृजनशिल्पी</strong>, कुछ इसी तरह की तार्किक टिप्पणी की अपेक्षा मुझे थी। तुम्हारी टिप्पणी से मेरे विश्वास की रक्षा हुई। अपने बारे में व्यक्ति स्वंय जितना समझ सकता है उतना दुनिया का कोई सर्वेक्षण नही समझ/समझा सकता। तुम्हारे बारे में पोल कराने में मुझे कोई रुचि नहीं है। तुम स्वयं अपने बारे में बेहतर समझ सकते हो, अगर समझना चाहते हो। तुम्हारे बारे में जो मैं सोचता,समझता हूं वह मैंने बिना किसी लाग-लपेट के बताया। अब तुम इससे सहमत नहीं और इसे गलत मानते हो तो यह तुम्हारी मर्जी। संभव है मैं ही गलत होऊं! बाकी तुलना/उपमा पर बहुत कुछ कहा/लिखा जा सकता है लेकिन मैं जबरदस्ती अनावश्यक बहस में समय नहीं बर्बाद करना चाहता- न अपना न तुम्हारा। मेरी शुभकामनायें!</p>
]]></content:encoded>
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	<item>
		<title>By: सृजन शिल्पी</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/265/comment-page-1#comment-8026</link>
		<dc:creator>सृजन शिल्पी</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 08 Apr 2007 04:42:08 +0000</pubDate>
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		<description>1. यह साफगोई अच्छी लगी कि आपने जो लिखा वह मौज-मजे के लिए नहीं, जान-बूझकर लिखा। 
2. बातों के अर्थ को संदर्भ से काटकर देखने और दिखाने की कला आपमें पाई जाती है, यह भी पता चला। मेरे हवाले से जो तीन वाक्य आपने उद्धृत किए हैं उनमें पहले दो वाक्य का संदर्भ मेरे चिट्ठे पर यथावत मौजूद है। वे दोनों वाक्य मेरी एक पोस्ट में, एक व्यक्ति विशेष की बातों पर उसी की भाषा और शैली में की गई प्रतिक्रिया मात्र थी। मेरी वैसी प्रतिक्रिया भी शांत मन से और जान-बूझकर व्यक्त की गई थी, किसी आवेश, उत्तेजना और उत्साह में नहीं। 
3. आपके इस आरोप की पुष्टि तो मेरे नियमित पाठकों का बहुमत ही कर सकता है कि मेरी पोस्टों में उपर्युक्त किस्म के डायलाग &#039;अक्सर&#039; पाए जाते हैं या नहीं। क्या इसके लिए एक सर्वेक्षण (poll) करा लें?
4. &lt;blockquote&gt;हमें शिवजी के बराबर खड़ा करके उस देवता की तौहीन कर रहे हो। दूसरी तरफ़ कह रहे हो कि शंकरजी के सर्प प्रेम के बनिस्बत गरुड़ की सांपों के शिकार करने बात का उदाहरण देते हुये गरुड़ को शिवजी से बेहतर बता रहे हो।&lt;/blockquote&gt;
शिव तो गरुड़ के स्वामी के भी स्वामी हैं, गरुड़ कभी शिव की तौहीन करने की सोच भी नहीं सकता। गरुड़, साँप और शिव की उपमाएँ कहीं से भी &#039;हाईटेक&#039; श्रेणी की नहीं हैं। इन्हें पौराणिक आख्यानों के संदर्भ में समझें तभी स्पष्ट रूप से समझ में आएगा। आप तो जानते ही होंगे कि आख्यानों में गरुड़ और सांप सौतेले भाई और शाश्वत दुश्मन माने जाते हैं और त्रिलोक में केवल दो ही स्थल ऐसे हैं जहां सांप गरुड़ से महफूज़ रह सकता है, एक तो क्षीरसागर में विष्णुशय्या बनकर और दूसरा कैलाश पर महादेव की गले की शोभा बनकर। 
4. यहां भी एक प्रति-टिप्पणीकर्ता इसलिए महफूज़ है, क्योंकि उसने आपकी प्रति-टिप्पणी की आड़ ले ली है। 
5. मेरे प्रति कटुता का भाव नहीं रखने और शुभकामनाएँ व्यक्त करने की आपकी उदारता के सम्मुख नतमस्तक हूं। मेरी प्रतिकूल टिप्पणियाँ संदर्भ के अनुरूप थीं, लेकिन आपके प्रति मेरे मन में आदर-सम्मान का भाव हमेशा अक्षुण्ण रहा है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>1. यह साफगोई अच्छी लगी कि आपने जो लिखा वह मौज-मजे के लिए नहीं, जान-बूझकर लिखा।<br />
2. बातों के अर्थ को संदर्भ से काटकर देखने और दिखाने की कला आपमें पाई जाती है, यह भी पता चला। मेरे हवाले से जो तीन वाक्य आपने उद्धृत किए हैं उनमें पहले दो वाक्य का संदर्भ मेरे चिट्ठे पर यथावत मौजूद है। वे दोनों वाक्य मेरी एक पोस्ट में, एक व्यक्ति विशेष की बातों पर उसी की भाषा और शैली में की गई प्रतिक्रिया मात्र थी। मेरी वैसी प्रतिक्रिया भी शांत मन से और जान-बूझकर व्यक्त की गई थी, किसी आवेश, उत्तेजना और उत्साह में नहीं।<br />
3. आपके इस आरोप की पुष्टि तो मेरे नियमित पाठकों का बहुमत ही कर सकता है कि मेरी पोस्टों में उपर्युक्त किस्म के डायलाग &#8216;अक्सर&#8217; पाए जाते हैं या नहीं। क्या इसके लिए एक सर्वेक्षण (poll) करा लें?<br />
4.<br />
<blockquote>हमें शिवजी के बराबर खड़ा करके उस देवता की तौहीन कर रहे हो। दूसरी तरफ़ कह रहे हो कि शंकरजी के सर्प प्रेम के बनिस्बत गरुड़ की सांपों के शिकार करने बात का उदाहरण देते हुये गरुड़ को शिवजी से बेहतर बता रहे हो।</p></blockquote>
<p>शिव तो गरुड़ के स्वामी के भी स्वामी हैं, गरुड़ कभी शिव की तौहीन करने की सोच भी नहीं सकता। गरुड़, साँप और शिव की उपमाएँ कहीं से भी &#8216;हाईटेक&#8217; श्रेणी की नहीं हैं। इन्हें पौराणिक आख्यानों के संदर्भ में समझें तभी स्पष्ट रूप से समझ में आएगा। आप तो जानते ही होंगे कि आख्यानों में गरुड़ और सांप सौतेले भाई और शाश्वत दुश्मन माने जाते हैं और त्रिलोक में केवल दो ही स्थल ऐसे हैं जहां सांप गरुड़ से महफूज़ रह सकता है, एक तो क्षीरसागर में विष्णुशय्या बनकर और दूसरा कैलाश पर महादेव की गले की शोभा बनकर।<br />
4. यहां भी एक प्रति-टिप्पणीकर्ता इसलिए महफूज़ है, क्योंकि उसने आपकी प्रति-टिप्पणी की आड़ ले ली है।<br />
5. मेरे प्रति कटुता का भाव नहीं रखने और शुभकामनाएँ व्यक्त करने की आपकी उदारता के सम्मुख नतमस्तक हूं। मेरी प्रतिकूल टिप्पणियाँ संदर्भ के अनुरूप थीं, लेकिन आपके प्रति मेरे मन में आदर-सम्मान का भाव हमेशा अक्षुण्ण रहा है।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: masijeevi</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/265/comment-page-1#comment-7995</link>
		<dc:creator>masijeevi</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 07 Apr 2007 06:07:33 +0000</pubDate>
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		<description>सीधे और संयम से खरी बात यही तो बात हे जो आप को फुरसतिया बनाती है वरना ऐसा कहते हुए हम इतना संयम नहीं रख पाते हैं। सृजन से सीधे व परोक्ष संदेशों से यही सब कहने का प्रयास हम कर चुके हैं पर वे अपने &#039;ज्ञान&#039; का भार संभाल नहीं पा रहे हैं, खैर मेरी सदा शुभकांक्षाएं रही हैं उनके लिए और दुर्भाव कभी नहीं रहा। आगे भी नहीं रहेगा। मुझे एक क्षण के लिए नहीं लगा कि अभय के यहॉं टिप्‍पणी सृजन ने की थी यह अलग बात है कि वह चिंतन के स्‍तर पर &#039;सृजनवाद&#039; से ऊर्जा प्राप्‍त करती थी। 
आशा हे आपसे ऊपर व्‍यक्‍त स्‍नेह पाकर सृजन के मन से हमारे लिए जमा मैल मिट गया होगा।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सीधे और संयम से खरी बात यही तो बात हे जो आप को फुरसतिया बनाती है वरना ऐसा कहते हुए हम इतना संयम नहीं रख पाते हैं। सृजन से सीधे व परोक्ष संदेशों से यही सब कहने का प्रयास हम कर चुके हैं पर वे अपने &#8216;ज्ञान&#8217; का भार संभाल नहीं पा रहे हैं, खैर मेरी सदा शुभकांक्षाएं रही हैं उनके लिए और दुर्भाव कभी नहीं रहा। आगे भी नहीं रहेगा। मुझे एक क्षण के लिए नहीं लगा कि अभय के यहॉं टिप्‍पणी सृजन ने की थी यह अलग बात है कि वह चिंतन के स्‍तर पर &#8216;सृजनवाद&#8217; से ऊर्जा प्राप्‍त करती थी।<br />
आशा हे आपसे ऊपर व्‍यक्‍त स्‍नेह पाकर सृजन के मन से हमारे लिए जमा मैल मिट गया होगा।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: Ripudaman Pachauri</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/265/comment-page-1#comment-7989</link>
		<dc:creator>Ripudaman Pachauri</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 06 Apr 2007 20:05:25 +0000</pubDate>
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		<description>मन्त्र मुग्ध कर देने वाला लेख है, गुरु देव ! बहुत आनन्द आया&#124;

रिपुदमन पचौरी</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मन्त्र मुग्ध कर देने वाला लेख है, गुरु देव ! बहुत आनन्द आया|</p>
<p>रिपुदमन पचौरी</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: फ़ुरसतिया</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/265/comment-page-1#comment-7987</link>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 06 Apr 2007 14:58:05 +0000</pubDate>
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		<description>&lt;strong&gt;सृजन शिल्पी&lt;/strong&gt;, सबसे पहले तो लेख की तारीफ़ के शुक्रिया।
सच तो यह है कि हमें अपना औकात अच्छी तरह पता। परसाई जी जैसी सामाजिक, राजनैतिक समझ विरले लोगों की ही होती है। हम लोग उनके अनुसरण से ही अपने गौरवान्वित समझते हैं। 

जहां तक तुम्हारे बारे में इस लेख में जो मैंने लिखा वह केवल मौज मजे के लिये नहीं जानबूझकर लिखा था। वह पोस्ट हालांकि अभयजी ने मिटा दी है लेकिन उसमें टिप्पणी में तुमने कुछ ऐसा लिखा था-&lt;b&gt; होंगे अनूपजी महादेव जो सांपों को अपने गले में लिपटाये घूमते हैं लेकिन ऐसे दुष्टों  (अनाम टिप्पणी कारों )के संहार के लिये विष्णुवाहन (गरुड़) की जरूरत होती है &lt;/b&gt; इस टिप्पणी को गौर करो। एक तरफ़ तुम बता रहे हो कि अनूप महादेव हैं जो सांपों को गले में लिपटाये घूमते रहते हैं। मतलब हम सारे जहरीले, खुराफ़ातियों को पालते हैं, प्यार करते हैं। हमें शिवजी के बराबर खड़ा करके उस देवता की तौहीन कर रहे हो। दूसरी तरफ़ कह रहे हो कि शंकरजी के सर्प प्रेम के बनिस्बत गरुड़ की सांपों के शिकार करने बात का उदाहरण देते हुये गरुड़ को शिवजी से बेहतर बता रहे हो। यही हमारे लिये &#039;हाईटेक जूता&#039; है कि हम शंकरजी के समान भोले हैं लेकिन औकात और उपयोगिता के मामले में हम गरुड़ के सामने कहीं नहीं ठहरते। इसमें कोई मजाक की बात नहीं है यह सच है। इसके आगे इसीलिये फिर लेख लिखने का मन नहीं किया। 

लोग शायद तुमसे कहने में हिचकते हैं लेकिन यह सच है कि तुममे अपनी आलोचना और बुराई झेलने का माद्धा बहुत कम है। अपने ज्ञान से और तर्क अपनी बात को हर तरह से सही साबित करने का प्रयास तुम्हारा रहता है। पता नहीं कौन सी शंकाये हैं जो तुमको यह सोचने को विवश करती हैं सारी दुनिया तुम्हारे खिलाफ़ है। लोग तुम्हारी पोस्ट की चर्चा जानबूझकर नहीं करते, हम गम की बजाय वहम में शरीक हो गये। हमारे बारे में तुम टिप्पणी कर रहे हो (शंकर/गरुड़), हम उसका उल्लेख करते हुये लिख रहे हैं यह भी हमारा वहम है। वाह! 

तुम्हें लड़ने-भिड़ने में मजा आये या न आये लेकिन इस तरह के डायलाग अक्सर तुम्हारी पोस्ट में रहते हैं जिनसे तुम्हारे उत्साह का पता चलता है-&lt;b&gt;
१.गदा का स्वाद चखने का मन कर रहा है क्या?
२.सृजन शिल्पी जो सज्जनों के लिए जितना सृजनकारी है, दुष्टों के लिए उतना ही संहारकारी भी हो सकता है। 
३.होंगे अनूपजी महादेव जो सांपों को अपने गले में लिपटाये घूमते हैं लेकिन ऐसे दुष्टों  (अनाम टिप्पणी कारों )के संहार के लिये विष्णुवाहन (गरुड़) की जरूरत होती है &lt;/b&gt;
इन बातों के तमाम  तर्कपूर्ण जवाब होंगे उनसे तुम अपने को और दूसरों को भी अपनी बात समझाने का प्रयास कर सकते हो लेकिन मुझे लगता है इस &lt;b&gt;वर्जुअल पहलवानी &lt;/b&gt; का कोई मतलब नहीं।
यह तुम्हारे बारे में मेरे विचार हैं। मुझे पता नहीं कि इसे तुम किस तरह लेते हो। लेकिन यह सच है कि इस पोस्ट में मैंने जो लिखा था (हाईटेक जूता) वह बिल्कुल मौज मजे में नहीं था। जो मैंने महसूस किया वह लिखा। दूसरी बात यह कि यह लिखते समय मेरा मन बिल्कुल शांत है। यह तुम्हारे बारे में अपनी सोच बताने का मन था सो बता दी। अगर तुम मुझे गलत समझते हो तो मेरी समझ पर झींक लेना या और कोई तुलनात्मक वार कर लेना! पर तुम्हारे प्रति मेरे मन में कोई कटुता नहीं है। तुम्हारे प्रति शुभकामनाऒं व्यक्त करता हूं।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p><strong>सृजन शिल्पी</strong>, सबसे पहले तो लेख की तारीफ़ के शुक्रिया।<br />
सच तो यह है कि हमें अपना औकात अच्छी तरह पता। परसाई जी जैसी सामाजिक, राजनैतिक समझ विरले लोगों की ही होती है। हम लोग उनके अनुसरण से ही अपने गौरवान्वित समझते हैं। </p>
<p>जहां तक तुम्हारे बारे में इस लेख में जो मैंने लिखा वह केवल मौज मजे के लिये नहीं जानबूझकर लिखा था। वह पोस्ट हालांकि अभयजी ने मिटा दी है लेकिन उसमें टिप्पणी में तुमने कुछ ऐसा लिखा था-<b> होंगे अनूपजी महादेव जो सांपों को अपने गले में लिपटाये घूमते हैं लेकिन ऐसे दुष्टों  (अनाम टिप्पणी कारों )के संहार के लिये विष्णुवाहन (गरुड़) की जरूरत होती है </b> इस टिप्पणी को गौर करो। एक तरफ़ तुम बता रहे हो कि अनूप महादेव हैं जो सांपों को गले में लिपटाये घूमते रहते हैं। मतलब हम सारे जहरीले, खुराफ़ातियों को पालते हैं, प्यार करते हैं। हमें शिवजी के बराबर खड़ा करके उस देवता की तौहीन कर रहे हो। दूसरी तरफ़ कह रहे हो कि शंकरजी के सर्प प्रेम के बनिस्बत गरुड़ की सांपों के शिकार करने बात का उदाहरण देते हुये गरुड़ को शिवजी से बेहतर बता रहे हो। यही हमारे लिये &#8216;हाईटेक जूता&#8217; है कि हम शंकरजी के समान भोले हैं लेकिन औकात और उपयोगिता के मामले में हम गरुड़ के सामने कहीं नहीं ठहरते। इसमें कोई मजाक की बात नहीं है यह सच है। इसके आगे इसीलिये फिर लेख लिखने का मन नहीं किया। </p>
<p>लोग शायद तुमसे कहने में हिचकते हैं लेकिन यह सच है कि तुममे अपनी आलोचना और बुराई झेलने का माद्धा बहुत कम है। अपने ज्ञान से और तर्क अपनी बात को हर तरह से सही साबित करने का प्रयास तुम्हारा रहता है। पता नहीं कौन सी शंकाये हैं जो तुमको यह सोचने को विवश करती हैं सारी दुनिया तुम्हारे खिलाफ़ है। लोग तुम्हारी पोस्ट की चर्चा जानबूझकर नहीं करते, हम गम की बजाय वहम में शरीक हो गये। हमारे बारे में तुम टिप्पणी कर रहे हो (शंकर/गरुड़), हम उसका उल्लेख करते हुये लिख रहे हैं यह भी हमारा वहम है। वाह! </p>
<p>तुम्हें लड़ने-भिड़ने में मजा आये या न आये लेकिन इस तरह के डायलाग अक्सर तुम्हारी पोस्ट में रहते हैं जिनसे तुम्हारे उत्साह का पता चलता है-<b><br />
१.गदा का स्वाद चखने का मन कर रहा है क्या?<br />
२.सृजन शिल्पी जो सज्जनों के लिए जितना सृजनकारी है, दुष्टों के लिए उतना ही संहारकारी भी हो सकता है।<br />
३.होंगे अनूपजी महादेव जो सांपों को अपने गले में लिपटाये घूमते हैं लेकिन ऐसे दुष्टों  (अनाम टिप्पणी कारों )के संहार के लिये विष्णुवाहन (गरुड़) की जरूरत होती है </b><br />
इन बातों के तमाम  तर्कपूर्ण जवाब होंगे उनसे तुम अपने को और दूसरों को भी अपनी बात समझाने का प्रयास कर सकते हो लेकिन मुझे लगता है इस <b>वर्जुअल पहलवानी </b> का कोई मतलब नहीं।<br />
यह तुम्हारे बारे में मेरे विचार हैं। मुझे पता नहीं कि इसे तुम किस तरह लेते हो। लेकिन यह सच है कि इस पोस्ट में मैंने जो लिखा था (हाईटेक जूता) वह बिल्कुल मौज मजे में नहीं था। जो मैंने महसूस किया वह लिखा। दूसरी बात यह कि यह लिखते समय मेरा मन बिल्कुल शांत है। यह तुम्हारे बारे में अपनी सोच बताने का मन था सो बता दी। अगर तुम मुझे गलत समझते हो तो मेरी समझ पर झींक लेना या और कोई तुलनात्मक वार कर लेना! पर तुम्हारे प्रति मेरे मन में कोई कटुता नहीं है। तुम्हारे प्रति शुभकामनाऒं व्यक्त करता हूं।</p>
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