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	<title>Comments on: कानपुर में ब्लागर मिलन</title>
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	<description>हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै?</description>
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		<title>By: प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/274/comment-page-1#comment-43924</link>
		<dc:creator>प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 12 Nov 2009 02:52:19 +0000</pubDate>
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		<description>पता नहीं नीचे आते आते कहाँ से कहाँ पहुँच गए ?


सो पहले भतीजी की शादी की  ढाई साल बाद डेरी से ही सही बधाई स्वीकार करें!

वैसे मसिजीवी जी हमारी भी आशाओं के विपरीत निकले ?(इलाहाबाद में मिलने के बाद और वहां उनका सबसे व्यवस्थित प्रस्तुतीकरण देखकर )



बकिया एक खतरा तो इसी पोस्ट में दिख गया कि &quot; जाना था जापान पहुँच गए चीन &quot;
समझ गए न?</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>पता नहीं नीचे आते आते कहाँ से कहाँ पहुँच गए ?</p>
<p>सो पहले भतीजी की शादी की  ढाई साल बाद डेरी से ही सही बधाई स्वीकार करें!</p>
<p>वैसे मसिजीवी जी हमारी भी आशाओं के विपरीत निकले ?(इलाहाबाद में मिलने के बाद और वहां उनका सबसे व्यवस्थित प्रस्तुतीकरण देखकर )</p>
<p>बकिया एक खतरा तो इसी पोस्ट में दिख गया कि &#8221; जाना था जापान पहुँच गए चीन &#8221;<br />
समझ गए न?</p>
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	<item>
		<title>By: राजीव</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/274/comment-page-1#comment-9766</link>
		<dc:creator>राजीव</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 15 May 2007 18:51:43 +0000</pubDate>
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		<description>वो... क्या कहते हैं कि समझदार को इशारा काफी! अब मौज के मसाले को तो आप समझ ही गये, मेरी कोई विशेष मंशा किसी को चौंकाने की नहीं थी वरना तो इतने क्षीण संकेत से क्या होता, एक पूरी पोस्ट जायज़ थी (नहीँ क्या?), बस चुटकी थी जिसने इशारा भाँपा उसने समझा! जो न समझे... परीक्षण पूरा! 

ऊपर से हुआ ये कि इन व्यंजन टाईप की चीजोँ को विवादों ने ढक दिया। खुशकिस्मती है...</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>वो&#8230; क्या कहते हैं कि समझदार को इशारा काफी! अब मौज के मसाले को तो आप समझ ही गये, मेरी कोई विशेष मंशा किसी को चौंकाने की नहीं थी वरना तो इतने क्षीण संकेत से क्या होता, एक पूरी पोस्ट जायज़ थी (नहीँ क्या?), बस चुटकी थी जिसने इशारा भाँपा उसने समझा! जो न समझे&#8230; परीक्षण पूरा! </p>
<p>ऊपर से हुआ ये कि इन व्यंजन टाईप की चीजोँ को विवादों ने ढक दिया। खुशकिस्मती है&#8230;</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: अतुल</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/274/comment-page-1#comment-9745</link>
		<dc:creator>अतुल</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 15 May 2007 14:36:37 +0000</pubDate>
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		<description>कोई लौटा दे वो बीते दिन।

पिछले कुछ महीनो से अब विवादग्रस्सतता हावी हो रही है ब्लाग लेखन पर, सर्वत्र। साईकिल कहानी के दिन याद आते हैं। दो मुलाकाते पढ़ी थीं देवाशीष और जीतू वाली और एक यह मसिजीवी वाली। उन दोनो के मुकाबले इस तीसरी का स्तर विवादो ने ढांप लिया। यह मसिजीवी और हम सबके  के साथ घोर अन्याय है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>कोई लौटा दे वो बीते दिन।</p>
<p>पिछले कुछ महीनो से अब विवादग्रस्सतता हावी हो रही है ब्लाग लेखन पर, सर्वत्र। साईकिल कहानी के दिन याद आते हैं। दो मुलाकाते पढ़ी थीं देवाशीष और जीतू वाली और एक यह मसिजीवी वाली। उन दोनो के मुकाबले इस तीसरी का स्तर विवादो ने ढांप लिया। यह मसिजीवी और हम सबके  के साथ घोर अन्याय है।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: फ़ुरसतिया</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/274/comment-page-1#comment-9726</link>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 15 May 2007 11:31:15 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://hindini.com/fursatiya/?p=274#comment-9726</guid>
		<description>सृजन शिल्पी, अमिधा/लक्षणा ले लिया। मेरा बीच-बचाव का कोई  प्रयास नहीं था। न है। मे्रे चौपटस्वामीजी की पोस्ट पर कुछ एतराज थे। वे मैंने जाहिर किये। उस पर विचार करना न करना उनपर निर्भर करता है। किसी के बीच मध्यध्यथता की मेरी कोई मंशा न थी, न है। मेरा मत था मैंने जाहिर किया।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सृजन शिल्पी, अमिधा/लक्षणा ले लिया। मेरा बीच-बचाव का कोई  प्रयास नहीं था। न है। मे्रे चौपटस्वामीजी की पोस्ट पर कुछ एतराज थे। वे मैंने जाहिर किये। उस पर विचार करना न करना उनपर निर्भर करता है। किसी के बीच मध्यध्यथता की मेरी कोई मंशा न थी, न है। मेरा मत था मैंने जाहिर किया।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: सृजन शिल्पी</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/274/comment-page-1#comment-9680</link>
		<dc:creator>सृजन शिल्पी</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 15 May 2007 08:36:35 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://hindini.com/fursatiya/?p=274#comment-9680</guid>
		<description>&lt;blockquote&gt;वैसे मैं दुविधा में हूं कि मैं किस बात को सच मानूं ताज़ा विवाद में बुजुर्गाना हस्तक्षेप करने पर बधाई की बात को जो तुमने यहां लिखी या इसे गैर-जरूरी और स्तरहीन कार्य मानूं जो तुमने सुजाताजी की बात का जवाब देते हुये चौपटस्वामीजी के चिट्ठे पर लिखा!&lt;/blockquote&gt;

मेरी दोनों ही बातों को सच मान सकते हैं, पहली वाली को व्यंजना में लीजिए और दूसरी को अभिधा में। मेरे कहने का आशय यह है कि दुनिया भर में हमेशा से यह मान्य परंपरा रही है कि यदि किसी विवाद में कोई व्यक्ति खुद एक पार्टी हो या किसी भी रूप में उस पार्टी का पक्षधर होने का आरोपी हो, तो ऐसे व्यक्ति को उस विवाद के मामले में मध्यस्थ या निर्णायक की भूमिका नहीं निभानी चाहिए, अन्यथा उसका हस्तक्षेप या निर्णय विश्वसनीय नहीं रह जाता और उसे वैध भी नहीं माना जाता, चाहे वह व्यक्ति शपथ पत्र दायर करके कहे कि उसके निर्णय पर उस पार्टी के साथ व्यक्तिगत संबंधों के कारण कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। 

चौपटस्वामी-मसिजीवी विवाद पहले ही शांत हो चुका था और अब आपके हस्तक्षेप के कारण यह अनपेक्षित रूप से फिर बढ़ गया है। इसलिए मैंने कहा कि यह गैर-जरूरी था और आपके स्तर के अनुरूप मुझे यह नहीं लगता कि आप इस तरह के द्विपक्षीय मसलों पर बीच-बचाव करें। क्योंकि जब आप ऐसा करते हैं तो आप किसी एक पार्टी का पक्ष लेते दिखाई देते हैं। मध्यस्थता ऐसी होनी चाहिए जिससे दोनों पक्ष सहमत हों, तभी वह मान्य होती है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p>वैसे मैं दुविधा में हूं कि मैं किस बात को सच मानूं ताज़ा विवाद में बुजुर्गाना हस्तक्षेप करने पर बधाई की बात को जो तुमने यहां लिखी या इसे गैर-जरूरी और स्तरहीन कार्य मानूं जो तुमने सुजाताजी की बात का जवाब देते हुये चौपटस्वामीजी के चिट्ठे पर लिखा!</p></blockquote>
<p>मेरी दोनों ही बातों को सच मान सकते हैं, पहली वाली को व्यंजना में लीजिए और दूसरी को अभिधा में। मेरे कहने का आशय यह है कि दुनिया भर में हमेशा से यह मान्य परंपरा रही है कि यदि किसी विवाद में कोई व्यक्ति खुद एक पार्टी हो या किसी भी रूप में उस पार्टी का पक्षधर होने का आरोपी हो, तो ऐसे व्यक्ति को उस विवाद के मामले में मध्यस्थ या निर्णायक की भूमिका नहीं निभानी चाहिए, अन्यथा उसका हस्तक्षेप या निर्णय विश्वसनीय नहीं रह जाता और उसे वैध भी नहीं माना जाता, चाहे वह व्यक्ति शपथ पत्र दायर करके कहे कि उसके निर्णय पर उस पार्टी के साथ व्यक्तिगत संबंधों के कारण कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। </p>
<p>चौपटस्वामी-मसिजीवी विवाद पहले ही शांत हो चुका था और अब आपके हस्तक्षेप के कारण यह अनपेक्षित रूप से फिर बढ़ गया है। इसलिए मैंने कहा कि यह गैर-जरूरी था और आपके स्तर के अनुरूप मुझे यह नहीं लगता कि आप इस तरह के द्विपक्षीय मसलों पर बीच-बचाव करें। क्योंकि जब आप ऐसा करते हैं तो आप किसी एक पार्टी का पक्ष लेते दिखाई देते हैं। मध्यस्थता ऐसी होनी चाहिए जिससे दोनों पक्ष सहमत हों, तभी वह मान्य होती है।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: फ़ुरसतिया</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/274/comment-page-1#comment-9669</link>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 15 May 2007 07:53:45 +0000</pubDate>
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		<description>चौपटस्वामीजी,
मुझे जो कहना था कह चुका। अब और कुछ कहने को नहीं है। हां, मैंने जो लिखा वह सुनी-सुनाई बातों के आधार पर नहीं बल्कि आपकी पोस्ट पढ़कर लिखा वह मेरी कल्पना नहीं है!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>चौपटस्वामीजी,<br />
मुझे जो कहना था कह चुका। अब और कुछ कहने को नहीं है। हां, मैंने जो लिखा वह सुनी-सुनाई बातों के आधार पर नहीं बल्कि आपकी पोस्ट पढ़कर लिखा वह मेरी कल्पना नहीं है!</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: चौपटस्वामी</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/274/comment-page-1#comment-9638</link>
		<dc:creator>चौपटस्वामी</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 15 May 2007 05:35:27 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://hindini.com/fursatiya/?p=274#comment-9638</guid>
		<description>कुछ स्पष्टीकरण :

१. मसिजीवी से मेरा कभी कोई वार्तालाप नहीं हुआ . उनके चिट्ठे पर की गई किसी टिप्पणी को वे वार्तालाप मान रहे हों तो अलग बात है . वरना बातों के काल्पनिक होने की उम्मीद ज्यादा है .

२. नहीं हुज़ूर! इतनी अक्किल है .  चिट्ठा चर्चा और नारद दोनों का अंतर समझता हूं . होता ये है कि चूंकि वही लोग दोनों ओर रहते हैं तो वैसा कोई भेद व्यवहारिक स्तर पर रहता नहीं है . जो आप सैद्धांतिक तौर पर बता रहे हैं . &#039;अगुनहिं सगुनहिं नहिं कछु भेदा&#039; की तरह .

३.मसिजीवी से मेरा कोई संबंध नहीं था इसलिए कोई हिसाब-किताब भी नहीं था . वे गलती भी कर रहे थे और धमकी भी दे रहे थे. इसलिए उन्हें सिर्फ़ यह कहा था कि भैया थान पर रहो .

४. मुझे लगता है यह उपयुक्त समय है जब सृजनशिल्पी की सामूहिकता और लोकतांत्रीकरण की मांग पर ध्यान देना चाहिए . संस्थाओं को ज्यादा दिन तक व्यक्तिकेन्द्रित और तदर्थवादी ढंग से नहीं चलाया जा सकता .

५. आपका ऐतराज़ और मेरा विरोध आस-पास खड़े हैं. तथ्यों में कोई गलतबयानी हो तो ज़रूर बताइएगा . बाकी व्याख्याएं भिन्न हो सकती हैं .

६. तर्क से साबित करना गलत हो सकता है पर सुनी-सुनाई बातों और कल्पना से साबित करना और भी खतरनाक है .</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>कुछ स्पष्टीकरण :</p>
<p>१. मसिजीवी से मेरा कभी कोई वार्तालाप नहीं हुआ . उनके चिट्ठे पर की गई किसी टिप्पणी को वे वार्तालाप मान रहे हों तो अलग बात है . वरना बातों के काल्पनिक होने की उम्मीद ज्यादा है .</p>
<p>२. नहीं हुज़ूर! इतनी अक्किल है .  चिट्ठा चर्चा और नारद दोनों का अंतर समझता हूं . होता ये है कि चूंकि वही लोग दोनों ओर रहते हैं तो वैसा कोई भेद व्यवहारिक स्तर पर रहता नहीं है . जो आप सैद्धांतिक तौर पर बता रहे हैं . &#8216;अगुनहिं सगुनहिं नहिं कछु भेदा&#8217; की तरह .</p>
<p>३.मसिजीवी से मेरा कोई संबंध नहीं था इसलिए कोई हिसाब-किताब भी नहीं था . वे गलती भी कर रहे थे और धमकी भी दे रहे थे. इसलिए उन्हें सिर्फ़ यह कहा था कि भैया थान पर रहो .</p>
<p>४. मुझे लगता है यह उपयुक्त समय है जब सृजनशिल्पी की सामूहिकता और लोकतांत्रीकरण की मांग पर ध्यान देना चाहिए . संस्थाओं को ज्यादा दिन तक व्यक्तिकेन्द्रित और तदर्थवादी ढंग से नहीं चलाया जा सकता .</p>
<p>५. आपका ऐतराज़ और मेरा विरोध आस-पास खड़े हैं. तथ्यों में कोई गलतबयानी हो तो ज़रूर बताइएगा . बाकी व्याख्याएं भिन्न हो सकती हैं .</p>
<p>६. तर्क से साबित करना गलत हो सकता है पर सुनी-सुनाई बातों और कल्पना से साबित करना और भी खतरनाक है .</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: अनूप शुक्ल</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/274/comment-page-1#comment-9561</link>
		<dc:creator>अनूप शुक्ल</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 14 May 2007 17:48:17 +0000</pubDate>
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		<description>@&lt;strong&gt;समीरजी&lt;/strong&gt;, शुभकामनाऒं एवं तारीफ़ के लिये शुक्रिया!:)
@&lt;strong&gt;अरुणजी&lt;/strong&gt;, फुरसत मिली होगी पोस्ट पढ़ने की। आदमी जो था उसी के हाथ मिठाई भेजी गयी थी। आप देर से बताये कि वो गलत आदमी है!:)
@&lt;strong&gt;मैथिलीजी&lt;/strong&gt;, आपकी शुभकामनाऒं एवं प्रशंसा के लिये शुक्रिया!
@&lt;strong&gt;तरुण&lt;/strong&gt;, शुक्रिया बधाई के लिये!
@&lt;strong&gt;सुजाताजी&lt;/strong&gt;, शुभकामनाओं, बधाई एवं टिप्पणी के लिये शुक्रिया!
@&lt;strong&gt;पंकज&lt;/strong&gt;, शुभकामनाऒं के लिये धन्यवाद!
@ &lt;strong&gt;संजय&lt;/strong&gt;, शुक्रिया! ये बताओ दिन कैसा गुजरा था? :)
@ &lt;strong&gt;धुरविरोधीजी&lt;/strong&gt;, आप स्वंय समर्थ लेखक हैं। मिठाई आप जरूर मांगे मसिजीवी से। चौपटस्वामीजी की भलमनसाहत पर हमें कोई शक नहीं है। लेकिन उनके लेख पर जो एतराज था वह मैंने दर्ज कराया! :)
@ &lt;strong&gt;संजीत त्रिपाठी&lt;/strong&gt;, बधाई के लिये शुक्रिया! तान के सोने के बाद उठने पर ही यह लेख लिखा गया था! 
@&lt;strong&gt;झाजी&lt;/strong&gt;, शुक्रिया। मसिजीवी की ये बात बहुत खराब है कि खुद मिठाई हजम कर गये! कुछ करना पड़ेगा :)
@&lt;strong&gt;मनीषजी&lt;/strong&gt;, आपकी बधाई ,शुभकामनाऒं एवं तारीफ़ का  शुक्रिया। मैंने मसिजीवी के बारे में कुछ नहीं लिखा। मेरा एतराज जिन बातों पर था उस पर लिखना जरूरी समझा मैंने !
@&lt;strong&gt;श्रीश,&lt;/strong&gt; मुबारकबाद के लिये धन्यवाद! हां मुझे यही लगा कि चौपटस्वामी जी को यह लिखने से बचना चाहिये लेकिन उनका मत है कि यह सही था। बहरहाल मैंने अपनी बात कही! सहमत होना न होना उनपर है!
@ &lt;strong&gt;सृजन शिल्पी&lt;/strong&gt;, टिप्पणी और बधाई के लिये शुक्रिया!वैसे मैं दुविधा में हूं कि मैं किस बात को सच मानूं &lt;b&gt;ताज़ा विवाद में बुजुर्गाना हस्तक्षेप करने पर बधाई की बात को &lt;/b&gt; जो तुमने यहां लिखी या इसे &lt;b&gt;गैर-जरूरी और स्तरहीन कार्य &lt;/b&gt; मानूं जो तुमने सुजाताजी की बात का जवाब देते हुये चौपटस्वामीजी के चिट्ठे पर लिखा! मिठाई खाने आने के लिये सदैव स्वागत है। 
@&lt;strong&gt;जीतू&lt;/strong&gt;, शुक्रिया। लगा देंगे वहां भी यार विवरण काहे परेशान हो!:)
@&lt;strong&gt;घुघुतीबासुतीजी&lt;/strong&gt;, आपकी शुभकामनाऒं के लिये धन्यवाद! 
@ &lt;strong&gt;राजीवजी&lt;/strong&gt;, आपने बहुत अच्छा लिखा! लेकिन लोग आपके मन मुताबिक चौंके नहीं! :)
@ &lt;strong&gt;अभय तिवारीजी&lt;/strong&gt;, आपकी शुभकामनाऒं के लिये शुक्रिया। वैसे यह कोई विवाद नहीं था। चौपटस्वामीजी की कुछ बात पर मेरा एतराज था। वह मैंने जाहिर किया। कानपुर आने पर मुलाकात अवश्य होगी। 
@ &lt;strong&gt;काकेशजी&lt;/strong&gt;, शुक्रिया। आइये कानपुर में मुलाकात होगी।  
@ &lt;strong&gt;चौपटस्वामीजी&lt;/strong&gt;, यह लेख हमने बिटिया को विदा करने के तीन दिन बाद लिखा आराम करके। बधाई के लिये शुक्रिया। मसिजीवी आये इसके लिये मैं उनका आभारी हूं। लेकिन इसके चलते उनके प्रति &#039;साफ़्ट कार्नर&#039; वाली बात आपकी अपनी सोच है। मसिजीवी ने जो बातें बतायीं वे आपके और उनके बीच के कुछ पुराने किस्से, वार्तालाप थे। उनको पेश करने की न मेरी मंशा है न मन ! वे आप दोनों के बीच की बाते हैं। आप जाने। अफसोस है कि आप अभी तक यह नहीं समझ पाये कि नारद और चिट्ठाचर्चा अलग-अलग हैं। चिट्ठाचर्चा से नारद का सिर्फ़ एक ब्लाग और एग्रीगेटर का संबंध है। आप सीधी-साधी बात को गड़बड़झाला मानना चाहते हैं तो माने भाई आपकी मर्जी। मैंने जवाब देने के पहले आपकी पोस्ट कई बार पढ़ी। मेरा स्पष्ट मानना है कि जिस तरह से आपने अपनी पोस्ट में सुजाताजी/नीलिमाजी के बारे में लिखा वह लिखे बिना भी आप मसिजीवी से अपना जो भी हिसाब बराबर करना हो कर सकते थे। यही मेरा एतराज था। अभी भी है। आप इसे मानना चाहें तो मानें न मानना चा्हें तो न मानें। तर्क से तो न जाने क्या-क्या साबित किया जा सकता है। :)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>@<strong>समीरजी</strong>, शुभकामनाऒं एवं तारीफ़ के लिये शुक्रिया!:)<br />
@<strong>अरुणजी</strong>, फुरसत मिली होगी पोस्ट पढ़ने की। आदमी जो था उसी के हाथ मिठाई भेजी गयी थी। आप देर से बताये कि वो गलत आदमी है!:)<br />
@<strong>मैथिलीजी</strong>, आपकी शुभकामनाऒं एवं प्रशंसा के लिये शुक्रिया!<br />
@<strong>तरुण</strong>, शुक्रिया बधाई के लिये!<br />
@<strong>सुजाताजी</strong>, शुभकामनाओं, बधाई एवं टिप्पणी के लिये शुक्रिया!<br />
@<strong>पंकज</strong>, शुभकामनाऒं के लिये धन्यवाद!<br />
@ <strong>संजय</strong>, शुक्रिया! ये बताओ दिन कैसा गुजरा था? <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /><br />
@ <strong>धुरविरोधीजी</strong>, आप स्वंय समर्थ लेखक हैं। मिठाई आप जरूर मांगे मसिजीवी से। चौपटस्वामीजी की भलमनसाहत पर हमें कोई शक नहीं है। लेकिन उनके लेख पर जो एतराज था वह मैंने दर्ज कराया! <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /><br />
@ <strong>संजीत त्रिपाठी</strong>, बधाई के लिये शुक्रिया! तान के सोने के बाद उठने पर ही यह लेख लिखा गया था!<br />
@<strong>झाजी</strong>, शुक्रिया। मसिजीवी की ये बात बहुत खराब है कि खुद मिठाई हजम कर गये! कुछ करना पड़ेगा <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /><br />
@<strong>मनीषजी</strong>, आपकी बधाई ,शुभकामनाऒं एवं तारीफ़ का  शुक्रिया। मैंने मसिजीवी के बारे में कुछ नहीं लिखा। मेरा एतराज जिन बातों पर था उस पर लिखना जरूरी समझा मैंने !<br />
@<strong>श्रीश,</strong> मुबारकबाद के लिये धन्यवाद! हां मुझे यही लगा कि चौपटस्वामी जी को यह लिखने से बचना चाहिये लेकिन उनका मत है कि यह सही था। बहरहाल मैंने अपनी बात कही! सहमत होना न होना उनपर है!<br />
@ <strong>सृजन शिल्पी</strong>, टिप्पणी और बधाई के लिये शुक्रिया!वैसे मैं दुविधा में हूं कि मैं किस बात को सच मानूं <b>ताज़ा विवाद में बुजुर्गाना हस्तक्षेप करने पर बधाई की बात को </b> जो तुमने यहां लिखी या इसे <b>गैर-जरूरी और स्तरहीन कार्य </b> मानूं जो तुमने सुजाताजी की बात का जवाब देते हुये चौपटस्वामीजी के चिट्ठे पर लिखा! मिठाई खाने आने के लिये सदैव स्वागत है।<br />
@<strong>जीतू</strong>, शुक्रिया। लगा देंगे वहां भी यार विवरण काहे परेशान हो!:)<br />
@<strong>घुघुतीबासुतीजी</strong>, आपकी शुभकामनाऒं के लिये धन्यवाद!<br />
@ <strong>राजीवजी</strong>, आपने बहुत अच्छा लिखा! लेकिन लोग आपके मन मुताबिक चौंके नहीं! <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /><br />
@ <strong>अभय तिवारीजी</strong>, आपकी शुभकामनाऒं के लिये शुक्रिया। वैसे यह कोई विवाद नहीं था। चौपटस्वामीजी की कुछ बात पर मेरा एतराज था। वह मैंने जाहिर किया। कानपुर आने पर मुलाकात अवश्य होगी।<br />
@ <strong>काकेशजी</strong>, शुक्रिया। आइये कानपुर में मुलाकात होगी।<br />
@ <strong>चौपटस्वामीजी</strong>, यह लेख हमने बिटिया को विदा करने के तीन दिन बाद लिखा आराम करके। बधाई के लिये शुक्रिया। मसिजीवी आये इसके लिये मैं उनका आभारी हूं। लेकिन इसके चलते उनके प्रति &#8216;साफ़्ट कार्नर&#8217; वाली बात आपकी अपनी सोच है। मसिजीवी ने जो बातें बतायीं वे आपके और उनके बीच के कुछ पुराने किस्से, वार्तालाप थे। उनको पेश करने की न मेरी मंशा है न मन ! वे आप दोनों के बीच की बाते हैं। आप जाने। अफसोस है कि आप अभी तक यह नहीं समझ पाये कि नारद और चिट्ठाचर्चा अलग-अलग हैं। चिट्ठाचर्चा से नारद का सिर्फ़ एक ब्लाग और एग्रीगेटर का संबंध है। आप सीधी-साधी बात को गड़बड़झाला मानना चाहते हैं तो माने भाई आपकी मर्जी। मैंने जवाब देने के पहले आपकी पोस्ट कई बार पढ़ी। मेरा स्पष्ट मानना है कि जिस तरह से आपने अपनी पोस्ट में सुजाताजी/नीलिमाजी के बारे में लिखा वह लिखे बिना भी आप मसिजीवी से अपना जो भी हिसाब बराबर करना हो कर सकते थे। यही मेरा एतराज था। अभी भी है। आप इसे मानना चाहें तो मानें न मानना चा्हें तो न मानें। तर्क से तो न जाने क्या-क्या साबित किया जा सकता है। <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: चौपटस्वामी</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/274/comment-page-1#comment-9526</link>
		<dc:creator>चौपटस्वामी</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 14 May 2007 09:09:39 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://hindini.com/fursatiya/?p=274#comment-9526</guid>
		<description>क्या पंडिज्जी !
          हल्दी-कुंकुम और केसर-केवड़े के माहौल से सीधे चौपटस्वामी-मसिजीवी विवाद के कीचड़ में . अरे इतनी भी क्या &#039;अरजेंसी&#039; थी . थोड़ा बहुत थकान उतार लेते तब आराम से और बेहतर तथा और वस्तुनिष्ठ ढंग से लिखते .

सबसे पहले तो बिटिया का विवाह सुचारु रूप से हर्षोल्लास के साथ सम्पन्न हो गया और आप कन्यादान के पुण्य के भागी बने इसके लिए बधाई(अगर नारीवादी इस &#039;कन्यादान&#039; शब्द पर आपत्ति न उठाएं तो) . बिटिया और जंवाई को पहले ही धारासार आशीष दे चुका हूं . वे हमेशा उनके साथ रहेंगे .

मसिजीवी इस अवसर पर पहुंच पाए और मैं नहीं , सो मसिजीवी अवसर पर साथ खड़े होने वाले असली भाई हुए . अतः उनके प्रति &#039;सॉफ़्ट कॉर्नर&#039; अनिवार्य है . मैं बुरा नहीं मानूंगा .

मसिजीवी पर मेरी मेहरबानी के कारण जगजाहिर हैं . पर पंडित अनूप सुकुल की यह बात कुछ खुलासा मांगती है कि : &quot;इस पर उन्होंने(मसिजीवी ने) कुछ बातें बतायीं जिनके बारे में मुझे(अनूप शुक्ल को) जानकारी नहीं थी।&quot;  अनूप भाई एक जिम्मेदार आदमी हैं . अतः यह आशा बनती है कि देर-सवेर वे इसका खुलासा ज़रूर करेंगे कि क्या बातें हुईं ताकि सच बाहर आ सके .

आपको मेरी पोस्ट की मात्र दो बातें ही बुरी लगीं इसके लिए मैं आभारी हूं . वरना तो पूरी पोस्ट ही बुरा लगाने के लिए थी .अब ऐसी पोस्ट मनोरंजन और दिलबहलाव के लिए तो लिखी नहीं जाती . 

आपने लिखा है कि &quot;सुजाताजी को चिट्ठाचर्चा दल में शामिल करने का निर्णय मेरा सिर्फ़ मेरा है।&quot; . यहां &#039;मेरा,सिर्फ़ मेरा&#039; निर्णय पर दिया गया आपका &#039;स्ट्रैस&#039; ध्यान खींचता है . मुझे लगता कि यह &#039;मैं-मेरा&#039; ही वह गड़बड़झाला है जिसकी ओर सृजनशिल्पी बार-बार इशारा कर रहे हैं . नारद अब एक संस्था है और अब इसके लोकतांत्रिक चरित्र को अधिक मज़बूत किया जाना चाहिए . निर्णय सामूहिक हों तो ज्यादा अच्छा है .

चूंकि जवाब देने की जल्दी थी अतः आप मेरी पोस्ट ध्यान से नहीं पढ पाए . सागर और सृजनशिल्पी के हटाने की बात नहीं लिखी है . हटने-हटाने की लिखी है . किन्हीं स्थितियों की वजह से सागर और सृजनशिल्पी ने खुद के नारद से हटने की बात कही थी . 

यह जानकर अच्छा लगा कि आपके विचार आपके अपने हैं .</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>क्या पंडिज्जी !<br />
          हल्दी-कुंकुम और केसर-केवड़े के माहौल से सीधे चौपटस्वामी-मसिजीवी विवाद के कीचड़ में . अरे इतनी भी क्या &#8216;अरजेंसी&#8217; थी . थोड़ा बहुत थकान उतार लेते तब आराम से और बेहतर तथा और वस्तुनिष्ठ ढंग से लिखते .</p>
<p>सबसे पहले तो बिटिया का विवाह सुचारु रूप से हर्षोल्लास के साथ सम्पन्न हो गया और आप कन्यादान के पुण्य के भागी बने इसके लिए बधाई(अगर नारीवादी इस &#8216;कन्यादान&#8217; शब्द पर आपत्ति न उठाएं तो) . बिटिया और जंवाई को पहले ही धारासार आशीष दे चुका हूं . वे हमेशा उनके साथ रहेंगे .</p>
<p>मसिजीवी इस अवसर पर पहुंच पाए और मैं नहीं , सो मसिजीवी अवसर पर साथ खड़े होने वाले असली भाई हुए . अतः उनके प्रति &#8216;सॉफ़्ट कॉर्नर&#8217; अनिवार्य है . मैं बुरा नहीं मानूंगा .</p>
<p>मसिजीवी पर मेरी मेहरबानी के कारण जगजाहिर हैं . पर पंडित अनूप सुकुल की यह बात कुछ खुलासा मांगती है कि : &#8220;इस पर उन्होंने(मसिजीवी ने) कुछ बातें बतायीं जिनके बारे में मुझे(अनूप शुक्ल को) जानकारी नहीं थी।&#8221;  अनूप भाई एक जिम्मेदार आदमी हैं . अतः यह आशा बनती है कि देर-सवेर वे इसका खुलासा ज़रूर करेंगे कि क्या बातें हुईं ताकि सच बाहर आ सके .</p>
<p>आपको मेरी पोस्ट की मात्र दो बातें ही बुरी लगीं इसके लिए मैं आभारी हूं . वरना तो पूरी पोस्ट ही बुरा लगाने के लिए थी .अब ऐसी पोस्ट मनोरंजन और दिलबहलाव के लिए तो लिखी नहीं जाती . </p>
<p>आपने लिखा है कि &#8220;सुजाताजी को चिट्ठाचर्चा दल में शामिल करने का निर्णय मेरा सिर्फ़ मेरा है।&#8221; . यहां &#8216;मेरा,सिर्फ़ मेरा&#8217; निर्णय पर दिया गया आपका &#8216;स्ट्रैस&#8217; ध्यान खींचता है . मुझे लगता कि यह &#8216;मैं-मेरा&#8217; ही वह गड़बड़झाला है जिसकी ओर सृजनशिल्पी बार-बार इशारा कर रहे हैं . नारद अब एक संस्था है और अब इसके लोकतांत्रिक चरित्र को अधिक मज़बूत किया जाना चाहिए . निर्णय सामूहिक हों तो ज्यादा अच्छा है .</p>
<p>चूंकि जवाब देने की जल्दी थी अतः आप मेरी पोस्ट ध्यान से नहीं पढ पाए . सागर और सृजनशिल्पी के हटाने की बात नहीं लिखी है . हटने-हटाने की लिखी है . किन्हीं स्थितियों की वजह से सागर और सृजनशिल्पी ने खुद के नारद से हटने की बात कही थी . </p>
<p>यह जानकर अच्छा लगा कि आपके विचार आपके अपने हैं .</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: kakesh</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/274/comment-page-1#comment-9470</link>
		<dc:creator>kakesh</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 14 May 2007 00:44:02 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://hindini.com/fursatiya/?p=274#comment-9470</guid>
		<description>अरे बहुत से लोग टिपिया गये.हम तो पीछे ही रह गये.आपकी लंबी पोस्ट दिल को सुकुन दे गयी.सोचे तो हम भी हैं कि इस बार कानपुर आये तो मिलेंगे आपसे. इसी बहाने अपना भी बंटाधार हो जायेगा.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अरे बहुत से लोग टिपिया गये.हम तो पीछे ही रह गये.आपकी लंबी पोस्ट दिल को सुकुन दे गयी.सोचे तो हम भी हैं कि इस बार कानपुर आये तो मिलेंगे आपसे. इसी बहाने अपना भी बंटाधार हो जायेगा.</p>
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