{अगर मुझसे पूछो तो तो मैं हर पत्नी को एक सलाह दे सकती हूं। वह अपने पति को अपने से बाहर-घर से बाहर अगर वह पति का प्यार पाना चाहती है तो- घर से बाहर प्रेम करने की छूट दे; उकसाये उसके लिये! क्योंकि वह कहीं किसी और को प्यार करेगा तो, उसके अन्दर का कड़वापन रूखपन भरता रहेगा और इसका लाभ उसकी बीबी को भी मिलता रहेगा! बीबी को ही नहीं बच्चों को भी मिलेगा। समझा!
“और पत्नी भी ऐसा करे तो?”
“तो जीवन भर नर्क भोगने को तैयार रहे! पति तो पति, बच्चे तक माफ़ नहीं करेंगे इसके लिये!”}
[पेज 39 रेहन पर रग्घू- लेखक काशी नाथ सिंह]
काशी नाथ सिंह जी का यह उपन्यास मैं दुबारा पढ़ रहा हूं। इसके पहले इसे तद्भव में पढ़ चुका था। आज सुबह ही उपरोक्त प्रसंग पढ़ा। चाय पीते हुये समाचार सुनने के लिये टीवी खोला। एन डी टीवी खुला।
टेलीविजन में एक समाचार दिखाया गया। किसी गांव का किस्सा था। एक नवविवाहित पुरुष की पत्नी अपने प्रेमी के साथ चली गयी। फ़िर प्रेमी जोड़ा पकड़ा गया। पुलिस के पास मामला गया। ऐसे में आमतौर पर औरत को कुल्टा-कुलच्छिनी कहकर उसकी भर्त्सना करते हैं लोग और प्रेमी को मारपीट कर अधमरा। लेकिन इस घटना में पति ने ऐसा कुछ नहीं किया। उसने अपनी पत्नी का विवाह उसके प्रेमी से करा दिया।
आज जब अपने जीवन साथी द्वारा बेवबाई करने पर सभ्य माने जाने वाले लोग तक जान लेने में नहीं हिचकते तो ऐसी घटना एक आम इंसान की उदारता की मिशाल है। अभी हाल ही में भोपाल में एक हत्याकाण्ड हुआ। उसमें एक हाईप्रोफ़ाइल महिला द्वारा अपनी सहेली की पैसे देकर हत्या करवा दी गयी क्योंकि उसकी सहेली के संबंध उस व्यक्ति से नजदीकी होने लगे थे जिससे कि उसके खुद के “इंटीमेट संबंध” थे।
वह पति जिसने अपनी पत्नी की प्रेमी के साथ चले जाने पर उसकी लानत-मलानत करने की बजाय उसकी शादी उसके प्रेमी से करा दी वह जरूर बेहद समझदार उदार मनोवृत्ति का होगा। देखने में किसी तथाकथित पिछड़े इलाके का लग रहा वह व्यक्ति वास्तव में बधाई का पात्र है जिसने अपनी पत्नी को मात्र एक सामान न समझकर उसके प्रेमी से उसका मिलन कराया।
क्या पता उसके समाज में उसको धिक्कारने वाले भी लोग हों। वे कहते हों कैसा मर्द है जो अपनी बीबी को भगा ले जाने वाले के साथ उसका विवाह करा रहा है। उसकी जगह वे होते काट डालते। ऐसे मामलों में खून- खराबा, मार पीट, सामाजिक बहिष्कार तो आम व्यवहार है। ऐसे समाज में ऐसी उदार सोच रख पाना और उस पर अमल कर पाना वाकई काबिले तारीफ़ और बहादुरी का काम है।
यह समाचार मैं सिर्फ़ एक बार देख पाया। इसके बाद दुबारा दिखा नहीं समाचार। कई बार खोला टेलिविजन लेकिन उसमें पाकिस्तानी क्रिकेटर शाहिद आफ़रीदी की अपने प्रशंसको को पीटने की घटना बार-बार दोहराई जा रही थी। यह तो अक्सर होता है। पर पता नहीं क्यों यह सूचना सिर्फ़ एक बार फ़्लैश करके दुबारा नहीं दिखाई गयी। किसी समाचार पत्र में भी इसका जिक्र नहीं है। मीडिया सिर्फ़ सेलिब्रिटी लोगों के चोंचले दिखाने में जुटा रहता है।
चलते-चलते
आम तौर पर प्रेमी-प्रेमिका के घर छोड़कर चले के लिये समाचार पत्रों की भाषा होती है- नवविवाहिता अपने प्रेमी के संग फ़रार। फ़रार पर विचार किया तो लगा कि जेल से भागे कैदी को फ़रार होना कहते हैं। इससे क्या यह निष्कर्ष लगाया जाये कि समाचार पत्र गृहस्थ जीवन को जेल मानते हैं और वहां से भाग निकलने वाले के साथ उनकी सहज सहानुभूति होती है।
ऊपर की फोटो फ़्लिकर से साभार!




छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिये…
किस के लिये! कोई मिल गया क्या?
एक तू न मिला सारी दुनिया मिले तो भी क्या है.
भारतीय नागरिक की हालिया प्रविष्टी..क्या ऐसा भी संभव है.?
मिलेगा वो भी मिलेगा
आपने बासु भट्टाचार्य की फिल्म आस्था शायद देखी हो…फिल्म में ओम पुरी प्रोफेसर बने थे, रेखा उनकी पत्नी…नवीन निश्चल धनवान प्लेबाय बने थे…जिसकी नज़र शादीशुदा औरतों पर रहती थी…रेखा भी अपनी सहेली के ज़रिए नवीन के जाल में फंस जाती है…पहले हिचक लेकिन फिर मर्जी से नवीन के साथ संबंध बना लेती है…पैसे का भी फैक्टर काम करता है…लड़के को ब्रांडेड शू चाहिए…जो रेखा उसी पैसे से लाकर देती है…दिलचस्प बात ये थी कि रेखा को यही लगता है कि ओम पुरी को कुछ नहीं पता…अपराधबोध से ग्रस्त रेखा पति को सब बताना चाहती है…लेकिन ओम को सब पता होता है…क्लाइमेक्स बड़ा ज़बरदस्त था…जिसमें ओम अपने स्टूडेंट्स को कहानी के माध्यम से सब कह जाते हैं…
एक बात और…
अनूप जी, आप घर से जबलपुर आकर कैसा भी महसूस कर रहे हों, लेकिन आपके पाठकों को ज़रूर फायदा हुआ है…आपकी पोस्ट की फ्रीक्वेंसी बढ़ने से…
जय हिंद…
पिक्चर देखी तो नहीं है सुना है। अब एक बार फ़िर जान लिया।
पोस्ट की फ़्रीक्वेन्सी फ़िर पंक्चर हो गयी न! पर कुछ दिन बाद नियमित हो जायें शायद!
@”समाचार पत्र गृहस्थ जीवन को जेल मानते हैं” ..यही तो हम भी मानते हैं कई और लोग भी तस्दीक कर दिए है फेसबुक पर ….:)
मुझे भी यही लगता है जोर जबरदस्ती ,समाज दुनिया के भय से लोगों को आजीवन न चाहते हुए भी साथ रहने को अभिशप्त नहीं होना चाहिए …
मगर शुभस्य शीघ्रम …नहीं तो बहुत देर हो जाती है ..
इस पोस्ट पर आपकी लानत मलामत तय है -ब्लॉग ठेकेदार ठेकेदारिने आ रहे होंगे …
मगर मुद्दा आपने अच्छा कैच किया है -सचिन की प्रेरणा है क्या ?
arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..चिट्ठाकार चर्चा की नीरवता को तोड़तीं अमृता तन्मय!
ज्यादा लातन वगैरह तो हुई नहीं। बच गये
रंग जीवन के अजब गज़ब…
सत्यवचन!
बहुत समझदारी का काम किया। लड़की का और अपना जीवन सुधार लिया।
समझदारी तो है! परिणाम तो कुछ दिन बाद पता चलेगा
महाराज…बाकी तो ठीक है,जो किसी के साथ प्यार से अपनपौ से नहीं रह सकता,जबरिया रखने का क्या फायदा पर गृहस्थ-जीवन को जेल मानना ठीक नय है.एक परंपरा,संस्कृति और रिश्तों का जुड़ाव होता है यह जीवन !ऐसे ‘छुट्टा-संस्कृति’ की वकालत हम निजी और क्षुद्र स्वार्थों के लिए कर तो सकते हैं पर जल्द ही इसके ‘साइड-इफेक्ट’ सारी व्यवस्था को तार-तार कर देंगे.
…दर-असल अधिकांश घटनाओं में प्यार का मामला कम वासना का अधिक होता है जो कुछ समय बाद हवा हो जाता है तब सम्बंधित पार्टी कहीं की नहीं रहती !!
संतोष त्रिवेदी की हालिया प्रविष्टी..मददगार ब्लॉगर :अविनाश वाचस्पति !
बड़ी ऊंची अनुभवी बात कह दी सिरीमानजी ने तो!
हम तो समझे थे, की हम अकेले अनाड़ी हैं, जो हर बार बेनामी कमेन्ट की गलती कर बैठते हैं….मगर इहाँ तो और भी हैं

संतोष जी की बात पते की है, लेकिन शत-प्रतिशत ऐसा नहीं होता.
अब आपके और सन्तोष की के बीच की बात में हम क्या कहें जी।
ही ही हा हा हू हू ..चलते चलते पंचलाइन मार दी आपने !!!!
रापचिक !!!!
देवांशु निगम की हालिया प्रविष्टी..हाँ!!!वही देश, जहाँ गंगा बहा करती थी…
पता नहीं कौन पंच है कौन लाइन और कैसे मर गयी। आई प्लीड नाट गिल्टी!
जब जेलें नहीं होती थी तब फरार का क्या मतलब होता था

:)
वैसे हमारी शुभकामनाये उस पति के साथ है भगवान् करे उसे और अच्छी लड़की मिले (और पति या पत्नी किसी को फरार न होना पड़े )
आशीष श्रीवास्तव
आपकी दुआयें असरकारी हों !
एक पुरानी कहावत याद आ गयी… अगर कोई तुम्हें छोड़ के जाए तो जाने दो, अगर तुम्हारा हुआ तो लौट आएगा.. ना लौटा तो वो तुम्हारा कभी था ही नहीं… अब बहाना चाहे प्रेमी से शादी करवाने का हो या और कुछ.. हरिशंकर परसाई जी ने कहा भी है कि तुमसे मज़बूत आदमी तुम्हारा सामान छीन ले तो खबर फैला दो कि तुमने दान कर दिया है..
रही बात “फरार” होने की.. तो यह पत्रकारिता की टर्मीनोलॉजी है.. एक बन्दा समाचार लिख कर ले गया कि भारत के प्रधानमंत्री श्री अमुक अपनी पत्नी के साथ आज दिल्ली के इंडिया गेट पर एक कार्यक्रम के उदघाटन में पहुंचे.
संपादक ने रिपोर्ट उसके मुंह पर दे मारी.. बाद में समाचार इस प्रकार छापा:
भारत के तथाकथित प्रधानमंत्री श्री अमुक, इंडिया गेट पर एक कार्यक्रम में पहुंचे. विश्वस्त सूत्रों से पता चला है कि यह स्थान दिल्ली में है.. उनके साथ एक स्त्री भी देखी गयी, जिसे वे अपनी पत्नी बताते हैं.
अब ऐसे में फरार, तथाकथित, सनसनीखेज, संगीन जैसे शब्द उद्वेलित नहीं करते!!
जबलपुर रास आ रहा है सुकुल जी को!!
सलिल वर्मा की हालिया प्रविष्टी..सम्बोधि के क्षण
क्या जलवेदार बात कही है।
बढ़िया मिलवाए………..पति से……………..
अच्छा लगा तद्भव पे जाना………..
बकिया २ दिन सबर रखने का कोई फैदा नै हुआ…………
प्रणाम
सबर और रखा जाये। फ़ल मीठी ही होगा।
जहॉ प्रेम नहीं, वहॉं शाति नहीं हो सकती। जहॉं पवित्रता नही, वहॉं प्रेम नहीं हो सकता।
सही ही है लेकिन मानते कहां हैं लोग!
बहुत सही !
[...] एक पति ऐसा भी [...]