By फ़ुरसतिया on May 19, 2007
Posted in इंक-ब्लागिंग
अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।
वाह दादा टिपयाने को भी इंक से ही मन कर रहा है इसका भी कुछ जुगाड सोचना,मजा आ गया,ये समीर भाइ बहुत उछल रहे थे कविता सुनाने कॊ अब चार छै दिन नींद नही आयेगी,तो यहा पढायेगे ही मजबूरी मे क्या खयाल है,
आपकी और समीर भाई की फ़ोटो यहा भी है देखे http://images.google.co.in/images?q=गदहे&svnum=10&um=1&hl=en&start=18&sa=N&filter=0&ndsp=18
वाह। क्या कहने।
आपकी इंक ब्लागिग बहुत अच्छी लगी.
बहुत अच्छा लगा। शुकुल तुम्हारी हैंडराइटिंग देखकर पंडित गिरिजाशकर की याद आ गयी, बचपन में, वो हमें पंचाग लिखकर देते है, घर घर पहुँचाने के लिए। हम उसमे गोले (Circles) लगाया करते थे। बहुत मजा आता था, इच्छा तो हो रही है इसमे भी गोले, वर्गाकार खाने बनाए, एक सिरे से दूसरे सिरे को जोड़े, कार्टून बनाने, लेकिन तकनीक ने हाथ बांध दिए, उस जमाने मे पीडीएफ़ होती तो हम शरारत ना कर सकते।
अच्छा प्रयास है, राइटिंग भी काफी अच्छी है। लगे रहो……
अच्छा लिखा है बधाई
हस्तलेख देख कर प्रसन्नता हो रही है. मन कर रहा है अभी कुछ लिख कर चिपका दूँ, मगर हमारी लिखावट जरा….
हाथे से लिखने के कारण लेख की लम्बाई कंट्रोल में रही.
मजा आ गया लेख पढ़कर, वाकई हाथ से लिखे की बात ही कुछ अलग है। लेख के साथ बनाए कार्टून ने लेख का आनंद बढ़ा दिया।
आपकी पहली इंकब्लॉगिंग एक लिए शुभकामनाएं, आगे भी लिखते रहिए, हम इंतजार कर रहे हैं।
बहुत सही, महाराज. क्या लिखाई है भाई, वाह!! ये जो हमारी तस्वीर बनाई गई है..आपके मुँह में घी-शक्कर. क्या दुबला किया है भाई!!! साधुवाद.
आप अब फिल्मों में गाने लिखना शुरु हो ही जायें. अच्छा लिखे हैं…श्याम पैंय्या पडूँ !!!
सारा कुछ पढ़ने के बाद शराफत मोड में आ कर टिपिया रहा हीँ…हा हा!!!
अच्छी वाली ही तो कविताऐं छापी हैं…अब और कहाँ से लाऊँ.
एक बार शायद देबू दा ने टिप्पणी की थी कि आपको हाथ से लिखेने की क्या जरूरत है आप तो लिखने से ज्यादा स्पीड से टाईप कर लेते हैं।
मगर यहां देख कर कहना पड़ रहा है कि आपको टाईप करने की क्या जरूरत है आप तो टाईप से ज्यादा सुंदर लिख लेते हैं।
अच्छा है, कभी कभी हर तरह के बदलाव और प्रयोग होते रहने चाहियें।
मज़ा आया पढकर. ह्स्तलेख तो अच्छा है ही.. और भी अच्छा हो जयेगा.. आपकी लेखन शैली गुदगुदा जाती है हर बार..
बढ़िया है, लेख भी ,इंक ब्लोगिग भी औऱ हस्तलिपी भी।
आपका यह प्रथम, किन्तु अन्तिम नही, प्रयास बहुत अच्छा लगा..आप आगे भी इसी तरह सफ़ल प्रयास करते रहे..:)
आपका तो बिल्कुल एक नंबर का मामला है। इंकियाने का मजा ही कुछ अऊर है, हमरी भी आदत छूट गई है पर कोशिश अवश्य करेंगे। कभी न कभी। बाकी समीरजी तो अच्छा लिखते ही हैं इस पर कुछ अधिक बात नहीं हो सकती। हाँ वे कविताएँ ज्यादा अच्छी लिखते हैं या व्यंग्य यह विवाद का विषय हो सकता है।
इंक ब्लोगिग अच्छी लगी। बहुत ही रोचक अंदाज मे लिखा है।
बहुत खूब। जितना सुन्दर लेखन, उतनी ही सुन्दर लेखनी। कौन सी चक्की का पिसा खाते हैं, शुक्ल जी?
अब इमेज मैप भी बढ़िया बन गया है। फ्लिकर का लिंक हटा दें।
बहुत खूब!!
ये तकनीक के मारे तो नाक में दम है. यहां अच्छा भला लेख पढ़ने आये थे पर क्यूरियॉसिटी चालू हो गयी इंक-ब्लॉगिंग की. एक तकनीक सीखो; तब तक वो कन्डम हो जाती है. फिर नया नाम/नयी तकनीक.
ये कविता सुनाओ, सुनैबे करो;
नयी तकनीक न चमकाओ श्याम पैंया पड़ूं.
बहुत बढिया जनाब । हाथ के लेख मे अपनापन होता है । लेख मे व्यक्तित्व झलकता है टाइप मे ऐसा कहाँ । अतिउत्तम !
अरे वाह! आपकी हैंडराईटिंग तो सचमुच सुंदर है!
इंक-ब्लागिंग पसंद करने और तारीफ़/प्रतिक्रिया देने के लिये सभी पाठकों का शुक्रिया।
इंक-ब्लागिंग शुरू करो! जल्द ही।
@अरुणजी, आपको न जाने गधों से क्या अपनापा लगता है। सब दोस्तों को भी उसी अवतार में देखना चाहते हो। समीरलाल जी भी अभी देखना आयेंगे इंक-ब्लागिंग में।
@आलोक, शुक्रिया! इसी बहाने बहुत दिन टिप्पणी मिली आपकी!:)
@मैथिलीजी, शुक्रिया!
@जीतू, शुक्रिया। लगे हैं, लगे रहेंगे। कभी-कभी हाथ से लिखते रहेंगे।
@प्रेमेन्द्र, शुक्रिया!
@संजय बेंगाणी,हाथ से चिपकाना था न इसे। इस खुशफ़हमी में मत रहो कि हाथ से लिखने से पोस्ट की लंबाई कम हो जायेगी।
@श्रीश, शुक्रिया, लिखना जारी रहेगा।
@समीरजी, आपकी तो सभी कवितायें अच्छी हैं। फिर छांटते क्यों हैं? ये दुबली वाली फोटो उस समय की है जिस समय रमन कौल आपके पास से बिना कविता सुने चले गये थे। यकीनन आप इतने ही दुबले लग रहे थे। न मानते हो तो घर में भाभी से पूछ लो।:)
@जगदीश भाटिया, आप सच कह रहे हैं। नये प्रयास करते रहने चाहिये।
@मान्या, शुक्रिया!
@रत्नाजी, शुक्रिया!
@रचनाजी, शुक्रिया! आगे भी प्रयास जारी रहेंगे!
@अभिनव, भैया समीरजी के कविता-व्यंग्य के विवाद में न पड़ो।
@ममताजी. धन्यवाद!
@रमनजी, आओगे अबकी बार कानपुर तब चक्की भी दिखा देंगे। वैसे इंक-ब्लागिंग तो अभी सीख रहे हैं। आगे कुछ और करेंगे।:)
@नितिन, शुक्रिया!
@पाण्डेयजी, नयी तकनीक से घबरायें न! आप तो स्वयं नव्यतम तकनीक के वाहक और प्रयोगकर्ता हैं। कुछ कन्डम न होगा। सब प्रयोग होगा। देखते जाइये।
@सुजाताजी, शुक्रिया। आपको नियमित अपनेपन का एहसास कराते रहेंगे!
@स्वामीजी, शुक्रिया।
बहुत ख़ूब।
चलिए इस नई तकनीक के बहाने आपका हस्तलेख देखने का मौका मिला . वरना अब सम्पादक के पास भी टाइप या शब्द-संयोजित लेख-कविताऎ ही आते हैं . अच्छे और विद्वान लोगों का सुंदर हस्तलेख देखने के लिए आंखें तरस जाती हैं . सुलेखन-खुशखत-कैलीग्राफी तो अब बीते जमाने की बात हो चली है .
भई वाह।।।
पर एक चेतावनी आपने समीर जी कि कविताई को कूड़ा कहा…हम नहीं जानते कि वह कूड़ा है कि नहीं पर तुलसी और पंत के काव्य को कूड़ा कहे जाने पर आप के प्रदेश में खूब उफनाई हो रही है। जेल और अदालत का चक्कर चल रहा है…संभल कर रहें।
इंक ब्लॉगिंग या मसिचिट्ठाकारी का जिक्र हो और स्वामी देवाशीष के (ना)लायक शिष्य सागर का जिक्र ना हो तो यह तो बहुत बड़ा जुल्म होगा।
संजय जी का कहना भी सही है।
बहुत सुन्दर हस्तलिपी और उतना ही सुन्दर लेख। अगले लेख का इंतजार है।
[...] हमारी इंक-ब्लागिंग और फिर फ़ुरसतिया टाइम्स को साथियों ने कुछ ज्यादा ही पसंद कर लिया। अखबार निकालने की तो ऐसी मांग हुयी कि हम अखबार के लिये आफिस, प्रिंटिंग प्रेस, कम्पोजीटर, प्रूफरीडर जुटाने की सोचने लगे। आखिर सोचने में कौन पैसा लगता है। जब प्रमोदजी बीस साल बाद रवीश कुमार के हाल सोच सकते हैं तो हम अपने अखबार के काहे न सोंचें! [...]