अगर इरादा पक्का है तो दुनिया में कुछ भी असंभव नहीं है। अगर आप अपने लक्ष्य के प्रति पूर्ण समर्पित हैं तो शारीरिक अक्षमतायें कभी भी आपके रास्ते का रोड़ा नहीं बन सकतीं।
बनारस से ३२ किमी दूर दल्लीपुर गांव की बिटिया रानी वर्मा के बारे में ये बातें एकदम सच उतरती हैं। रानी वर्मा के दोनों हाथ नहीं हैं। नौ साल की उम्र में एक दुर्घटना में रानी के दोनों हाथ कट गये थे। इसके बावजूद उसने इस साल हाईस्कूल की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की।
शारीरिक रूप से अक्षम लोगों के लिये परीक्षाओं में लिखने के लिये सहायता मिल सकती है। लेकिन रानी ने किसी की सहायता लेने की बजाय अपने पैरों से लिखने का हुनर सीखा। अपने खोये हुये हाथों की कमी अपने पैरों से पूरी की।
लोगों को आश्चर्य हो सकता है कि कटे हुये हाथों वाली ये लड़की अपने पैरों से लिखने के अलावा ड्राइंग भी बना लेती है। अपने बायें पैर से कागज या कापी को पकड़ कर अपने दायें पैर की दो उंगलियों में पेन या पेंसिल पकड़कर रानी आराम से लिख लेती है और फटाफट स्केच भी बना लेती है।
यही नहीं अपने पैरों की सहायता से वह घर के कुछ छोटे-मोटे काम भी कर लेती है।
रानी ने उत्तर प्रदेश की हाई स्कूल परीक्षा में ६१ प्रतिशत अंक प्राप्त किये।
रानी जब कक्षा पांच में पढ़ती थी तब एक पम्पिंग सेट में फंसकर उसके हाथ कट गये। वह कहती है- मैं आगे भी पढ़ना चाहती हूं और इंजीनियर बनना चाहती हूं।
जब उससे पूछा गया कि इंजीनियर ही क्यों और कोई पेशा क्यों नहीं तो उसका जवाब था-इंजीनियर इसलिये बनना चाहती हूं ताकि मैं ऐसी मशीने और औजार बना सकूं जो किसी को अपाहिज न बनायें।
छह बच्चों के बाप रानी के पिता रमेश चन्द्र वर्मा अपनी बेटी की इस उपलब्धि से खुश हैं। अपनी किस्मत खुद लिखने का प्रयास करने वाली बेटी के बारे में बात करते हुये वे कहते हैं-यह उसकी संकल्पशक्ति है जिसने उसको इतना मजबूत बनाया कि उसने हादसे/हकीकत का सामना किया और लिखने का हुनर विकसित किया।
रानी के पिता ने आगे बताया- हमें अखबारों से पता चला कि प्रधानमंत्री ने रानी को एक लाख रुपये देने की घोषणा की है। इससे उसके सपने पूरे होने में सहायता मिलेगी। लेकिन इस बारे में कोई लिखित सूचना नहीं मिली है।
जिला अधिकारी वीणा कुमारी मीणा ने जानकारी दी कि- स्थानीय प्रशासन को भी अभी तक इस तरह की कोई सूचना नहीं मिली है।
रानी हालांकि अपने नंबरों से संतुष्ट है लेकिन अगर परीक्षाऒं के दौरान उसकी मां का निधन न होता तो वह और अच्छे अंक ला सकती थी। रानी की मां का निधन परीक्षाऒं के दौरान ही २४ मार्च को हो गया था।
रानी अपनी सफलता का सारा श्रेय अपनी मां को देती है। उसने बताया कि- मेरी मां ने ही मुझे हाथ कट जाने पर पैरों से लिखने के लिये प्रोत्साहित किया।
इसके बाद उसने पैर से लिखने का अभ्यास शुरू किया और धीरे-धीरे पैर से लिखने में गति हासिल कर ली। जब कक्षा आठ में थी तब भी उसने परीक्षाऒं के लिये लिखने वाले का सहयोग नहीं लिया।
यहां तक कि उसके अध्यापक भी उसके इस निर्णय पर चकित हुये। बोर्ड परीक्षाऒं के दौरान उसके लिये लिखने वाले का इंतजाम किया गया था लेकिन उसने अपने आप ही लिखने का निर्णय लिया।
केवल घर परिवार और गांव वाले ही नहीं वरन अध्यापकों को भी रानी पर गर्व है।
श्री भागीरथी महाराज इंटर कालेज नयेपुर वर्जी ,जहां से रानी ने पढ़ाई की, के प्रधानाचार्य रामचरित प्रसाद ने उसकी सफ़लता पर सन्तोष जाहिर किया और राने के भविष्य के लिये शुभकामनायें दीं।
विनोद कुमार जो कि रानी को ट्यूशन पढ़ाते ने कहा- रानी के दृण निश्चय को देख कर मैं स्वयं अपने जीवन के लिये प्रेरणा प्राप्त हुयी।
मैं दुआ करता हूं कि ये बच्ची आगे भी पढ़ सके, आगे भी बढ़ सके।
मेरी कामना है रानी अपने जीवन में अपनी संकल्प शक्ति से अपनी प्रगति के रास्ते में आने वाली हर बाधा को पार करके तमाम लोगों के लिये प्रेरणा का स्रोत बने।
आभार:यह लेख पिछ्ले सप्ताह टाइम्स आफ़ इंडिया में अंग्रेजी में छपा था। इसके लेखक छपे श्री बिनय सिंह हैं। मैं उनके प्रति आभार व्यक्त करता हूं।
मेरी पसन्द
आज की मेरी पसन्द में इस बच्ची के लिये कुछ पंक्तियां जो मुझे रचनाजी ने मेरी भतीजी के विवाह के अवसर पर लिखकर भेजीं थी।
My beloved daughter, Oh! dear you!
May your wishes all come true!!May you be free from all the fears!
May this world be all yours!!May you never be in the tears!
May you have all the cheers!!May you win all the fight!
May you shine bright, bright and bright!!!!!






बहुत आभार इस जानकारी को हिन्दी में पेश करने के लिये. रानी, न जाने कितने अपाहिजों के लिये प्रेरणा का स्त्रोत होगी. यह सब उसकी अदम्य इच्छा शक्ति और आत्मविश्वास के कारण ही संभव हुआ होगा. मेरी शुभकामनायें कि वो उस हर मुकाम को हासिल हो जिन्हें उसने सोचा है.
रचना जी की कविता बहुत हृदय स्पर्शी है. आपका साधुवाद.
वाह इस बच्ची की जीवटता तारीफे काबिल है। सफलता ऐसे ही कर्मठ लोगों के कदम चूमती है।
वाह शाबास रानी!
ऐसी ही लगन चाहिए… बस फिर तो कोई राह मुश्किल नहीं.. वाह.
यही बात बताती है की “लोग मन से अपाहिज होते है,तन से नही”
जिनके दिल मे चाह होती है वो खुद रास्ता और दूसरो के लिये मंजिल बन जाते है
इस बच्ची की प्रेरणादायक कहानी को हमारे साथ बाँटने के लिये आप धन्यवाद के पात्र हैं।
रानी अपाहिज तो कतई नहीं है.
न तन से, न मन से.
शख्स जो बाँध राखी समय के करों में
दिया साधना का जलाते रहे हैं
उठा कर भुजा भाल पर ज़िन्दगी के
नया रोज टीका लगाते रहे हैं
कदम पर चढ़ें हैं सदा फूल उनके
पूज्य हैं मंदिरों से कहीं और ज्यादा
यही दीप हैं जो अंधेरे ह्रदय को
नई ज्योति से जगमगाते रहे हैं
रानी बिटिया को बहुत बधाई। आपकी इस कर्मठता के आगे मैं नतमस्तक हूँ। मैं तो यहाँ टिप्प्णी करने के लायक भी नहीं हूँ, पर आपकी हिम्मत को देखकर मन बहुत कुछ कहने लगा है कि रानी बिना हाथों के कर सकती है तो तू क्यों नहीं।
धन्यवाद रानी और
अनूपदा ।
इस प्रेरणादायक कहानी को हमारे साथ बाँटने के लिये आपको धन्यवाद.
रानी का यह साहस और दृढ़ता देखकर विकलांगता भी बौनी हो गयी। लगभग एक ऐसा ही उदाहरण मेरे एक मुंहबोले भांजे के साथ है, कभी अवसर मिला तो उसके बारे में विस्तार से बताऊंगा।
रानी की माँ , रानी , विनयजी और आप – सभी बधाई ग्रहण करें । विनयजी को आपका संक्षिप्त परिचय और चिट्ठे की कड़ी भेजी । विनयजी को या पर लिखा जा सकता है ।
रानी को बधाई, शुभकामनाएं। नया उदाहरण रखा है सबके सामने। ग्रेट। यह कहानी बच्चों की टेक्स्ट बुक में शामिल होनी चाहिए। वे बहुत कुछ सीखेंगे,मैनेजमेंट के छात्रों को एटिट्यूड विषय पढ़ाने के लिए इसे केस स्टडी के तौर पर भी पेश किया जा सकता है। रानी ने एक बार फिर साबित कर दिया है मेरी प्रिय पंक्तियों को(मतलब ये पंक्तियां मैंने लिखी नहीं हैं, पर मुझे बहुत प्रिय हैं)
मंजिल उन्हे ही मिलती है, जिनके सपनों में जान होती है
सिर्फ पंखों से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है।
आलोक पुराणिक
वाकई एस लड़की का जज्बा हम जैसे लोगों को मात करता है. जानकारी का शुक्रिया……
इस लेख के लिए आपका व विनयजी का शुक्रिया
रानी का जीवट, उसकी लगन और उपलब्धि काबिलेतारीफ है। इस लेख को हिन्दी में प्रस्तुत करने के लिए आभार।
वर्षों पहले मैंने एक अख़बार के लिए हिन्दी के प्रख्यात विद्वान डॉ. रघुवंश का साक्षात्कार लिया था। वह भी दोनों हाथों से विकलांग हैं। वह पैर से लिखते हैं। लेकिन उन्होंने पीएच.डी तक की पढ़ाई की थी। हिन्दी भाषा एवं साहित्य सहित तमाम विषयों पर उनकी बहुत-सी पुस्तकें हैं। कुछ पत्रिकाओं का संपादन भी उन्होंने किया है।
उनकी एक पुस्तक मेरे पास अब भी है, जिसपर उनके द्वारा पैर से कलम पकड़कर लिखा मेरे नाम सप्रेम भेंट उनके हस्ताक्षर सहित मौजूद है। अपने साक्षात्कार में उन्होंने अपनी विकलांगता के बावजूद पढ़ने की अदम्य लालसा के पूरा होने की कहानी बयान की है। आपके इस लेख से प्रेरित होकर मैं एक-दो दिन में उस साक्षात्कार को अपने ब्लॉग पर पुनर्प्रकाशित करूंगा।
लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती
हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती।
यह भी देखीये ! एक और महारथी
http://www.bbc.co.uk/hindi/regionalnews/story/2007/06/070613_bhushan_marks.shtml
कभी कभी कुछ घटनाएं और कहानियां ज़िन्दगी के प्रति एक नया विश्वास जगा देती हैं । एक ऐसी ही सच्ची कहानी को हमारे साथ बाँटनें के लिये धन्यवाद ।
[...] कतिपय कारणों से कुछ अरसे से चिट्ठे पर लिखना संभव नहीं हो सका। कुछेक दिनों से तबियत भी कुछ नासाज चल रही है। लेकिन आज अपने जन्म-दिन के अवसर पर सोचा कि महीने भर से लेखन के थम-से गए इस सिलसिले को एक बार फिर से गति देने की कोशिश की जाए। अनामदास जी का कल ही ई-मेल मिला था, जिसमें उन्होंने मुझे अपनी अन्य व्यस्तताओं के साथ संतुलन साधते हुए बीच-बीच में लेखन को भी जारी रखने का भ्रातृभाव से परामर्श दिया था और मैंने भी उन्हें भरोसा दिलाया था कि लेखन की गति थमने नहीं दी जाएगी। गुरुदेव की प्रेरणा से सृजन शिल्पी जैसा नाम संकल्पपूर्वक अपनाया है तो उसका मान भी रखना पड़ेगा। बुखार और कमजोरी के कमजोरी के कारण इस पोस्ट के लिए ज्यादा टाइप कर पाना संभव नहीं लगता, लेकिन अनूप शुक्ला जी की पोस्ट पढ़ते समय डॉ. रघुवंश के साथ हुई एक पुरानी मुलाकात की याद ताजा हो आई और उनके साक्षात्कार के कुछ अंश यहाँ पुनर्प्रकाशित करना समीचीन लगा। फुरसतिया जी की पिछली पोस्ट में बनारस के समीपवर्ती गांव दल्लीपुर की एक बालिका रानी वर्मा के जीवट, उत्साह, पढ़ने की लगन और हाई स्कूल की परीक्षा में उसकी गौरवपूर्ण उपलब्धि के बारे में पढ़ते हुए अनायास मुझे हिन्दी साहित्य के मूर्धन्य विद्वान डॉ. रघुवंश से हुई मुलाकात की याद हो आई। पम्पिंग सेट में फंसकर हाथ कट जाने के बाद रानी ने भी लिखने के लिए पैरों का उपयोग करने का वही तरीका अभ्यासपूर्वक अपनाया है जिसे डॉ. रघुवंश ने तकरीबन आठ दशक पहले अपनाकर पठन-पाठन के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल करके सबको चौंका दिया था। डॉ. रघुवंश सहाय वर्मा इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष तथा इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज, शिमला के फेलो रहे थे। उन्होंने उसी विश्वविद्यालय से 1948 में हिन्दी साहित्य के ‘भक्तिकाल और रीतिकाल में प्रकृति और काव्य’ विषय पर पी.एचडी. की थी। दो दर्जन से भी अधिक पुस्तकों के लेखन और कुछ महत्वपूर्ण साहित्यिक ग्रंथावलियों के संपादन के अलावा भारतीय हिन्दी परिषद् के मुखपत्र अनुशीलन के भी वह संपादक रहे थे। भारत-भारती, भगवानदास तथा शंकर सम्मान सहित कई पुरस्कारों से भी उन्हें सम्मानित किया गया। समस्त लेखन कार्य के अलावा रोजमर्रा के अपने सारे कार्य वह पैर से ही करते थे। [...]
ऐसे ही लोगों के पीछे इतिहास चला करता है. शरीर में अंग कम या ज्यादा हो सकते है. उसे विकलांग कहना गलत है. ऐसा कहने पर तो चार, आठ दस, बीस या हजार हांथों वाले, दो, चार, पांच, दस सिर वाले देवी-देवता दानव भी विकलांग श्रेंणी में ही आ जाएंगे.
अतुल