बरसात का मौसम आ गया। हम गाहे-ब-गाहे गाने की सोचने लगे- आइये बारिसों का मौसम है।
बारिश भी छुआछुऔव्वल खेलने लगी है। घर से जब यह सोच के इन्तजाम सहित निकलतें हैं कि बारिश होगी तो बूंद तक नहीं टपकती। जब यह सोचते हैं कि बिना भीगे आफ़िस पहुंच जायेंगे झमाझम पानी बरस जाता है। हम एक बार फ़िर अपने कोसते हैं कि बादल का रंग देखकर उसको पहचानना हमें नहीं आता- करिया बादर जी डरवावै, भूरा बादर पानी लावै। सच तो है कि हम विश्चास से यह भी नहीं कह सकते कि ये बादल काला है कि भूरा। सच्ची आप मानिये न मेरी बात। धूसर,मट्मैला,भूरा,काला-स्लेटी रंग के बारे में फ़र्क करने की मेरी समझ उतनी ही जितनी बबूल और कीकर के पेड़ में फ़र्क कर पाने की।
पहले तो मेरा मन हुआ कि बरसात में कुछ हायकू की बौछार कर दी जाये-
पानी बरसा,
छत टपक गई
अरे बाप रे!
मिट्टी थी जो,
कीचड़ बन गई,
अरे बाप रे!
सड़कें जाम,
स्कूल बंद हुये,
मज़ा आ गया!
पानी भी क्या,
हचक के बरसा
सब हैरान!
लेकिन हमने सोचा कि इत्ता जुलुम ठीक नहीं। आजकल वैसे ही कवि लोग मन-मयूर नचा रहे हैं। हम कविता लिखेंगे तो टिप्पणी में भी कवितागीरी करने लगेंगे। बेकार में लोग बुरा मान जायेंगे। इससे अच्छा बारिश के मिजाज के अनुसार प्रेम-प्यार की बातें की जायें।
वैसे भी बरसात में जिसको देखो वही प्रेम,प्यार, इश्क के मूड में आ जाता है। हमारा मन भी पूरा का पूरा इलू-इलू टाइप भावनाऒं से पट जाता है।हमारा पूरा का पूरा मन भारत का बाजार हो जाता है जो चीनी माल से पटा पड़ा है। हम अपनी हर प्रेम भावना को तवज्जो देकर शब्द देने की कोशिश करते हैं लेकिन जब तक अहसास को शब्द के कपड़े पहनाकर सजा-संवार कर सामने लाया जाये तब तक चीनी झालरों की तरह उनका फ़्यूज उड़ जाता है।
ऐसा सिर्फ़ मेरे साथ ही होता हो ऐसा नहीं है। जिसे देखो वही प्रेम की बात करते मिलता है। जो मसिजीवी पूरी गर्मी भर दुनिया भर की खुराफ़ाती, गीक टाइप बातें करते रहे वे तक पहली फ़ुहार पड़ते ही किसी से कहता है आज इश्क पर लिखा जाए। न जाने किसको यह निमंत्रण दिया गया और उसने इसे स्वीकार किया या नहीं लेकिन यह तय है कि कुछ तुम कहो, कुछ हम कहें का मंच बनाने के लिये मेहनत कर रहा था। अंतत: यह रहस्य बना रहा। मसिजीवी के रहस्य वादी प्रयास के एकदम उलट उनके ही घर की मालकिन धड़ल्ले से आवाहन करती हैंखुल्लम-खुल्ला प्यार करेंगे हम दोनों।
हमें कोई एतराज नहीं हैं। ये जो मन आये करें। बलभर करें। दुनिया के सामने नजीर पेश करें। लेकिन यही लगता है कि ये नयी उमर के (नये ही हैं अभी कौन उमर हो गयी। अभी तो कायदे से जवान भी नहीं हुये
) लोगों ने अपनी छुट्टी बरबाद कर दी बेफ़ालतू के कामों में। अब जब स्कूल खुले और अलग-अलग शिफ़्ट में नौकरी बजा रहे हैं तब इश्क का बिगुल बजाया। लोग समय का सदुपयोग करना न जाने कब सीखेंगे। अभी नहीं सीखे तो कब सीखेंगे। उमर बीत जायेगी तब इसके-उसके प्रेमपत्र लिख-लिखाकर पतनशील सुकून तलाशेंगे।
इसके अलावा हम एक बात और बताना चाहते हैं कि जब प्रेम-प्यार की बात चले तो दो रहते ही नहीं हैं। पता नहीं हिंदी के अध्यापक होने के बाद भी खुल्लम-खुल्ला प्यार करेंगे हम दोनों क्यों लिखा नीलिमाजी ने। ये तो प्रेम के सार्वभौमिक सिद्धान्त -प्रेम गली अति सांकरी जामे दुइ न समाय का सरासर उल्लघंन है। वैसे हमारे एक बहुत महान अधिकारी कहा करते थे-रूल्स आर फ़ार फूल्स, बेटर यू ब्रेक द रूल।
पुराने जमाने में लोग ले-देकर एकाध प्यार ही कर पाते थे। प्रेम पकने में इतना समय लग जाता कि आदमी की उमर पक जाती लेकिन प्रेम जे हे न से कि बीरबल की खिचड़ी ही बना रहता। पकता ही नहीं। बड़ी धीमी प्रगति रहती थी उन दिनों। बाद में आदमी प्रेम-प्यार कुछ साइड में करके शादी कर लेता था। बाद में शादी-फ़ादी के बाद जब मन बहकता तो अपने पुराने दिन की याद फ़िर से करने लगता और घर भी चलता रहता। कानपुर का आदमी अपने गूगल अर्थ के सहारे रतलाम की गलियों में भटकता रहता।
जैसे-जैसे दुनिया की तरक्की हुई आदमी प्रेम के साथ-साथ विवाह भी करने लगा। अभी हाल ही तक भारतीय आदमी जिससे प्यार करे उससे ही शादी कर ले यह सबसे बड़ा पराक्रम माना जाता था। यह आधुनिक युग की दिग्विजय मानी जाती थी। लोग अपने चाहने वाले से शादी कर लें इससे बड़ा पराक्रम हाल के वर्षों तक कोई नहीं माना जाता था। जिसने प्रेम-विवाह कर लिया उसको अपनी वीरता साबित करने के लिये कुछ और साबित करने की जरूरत नहीं पड़ती थी। मेरठ, हरियाणा के जाट बहुल इलाके में तो आज भी यह सबसे बड़ा पराक्रम है।
वैसे तो गालिब जैसे महान व्यक्ति ने बताया कि उनको इश्क ने निकम्मा कर दिना वर्ना वे भी बड़ी काम के आदमी थे। जब इश्क करने पर ये हाल तो इशक के बाद शादी का करने वालों का क्या हाल होता होगा। बहुत जिगर का काम है भाई, बड़ा पराक्रमी व्यक्ति ही इस काम को अंजाम दे पाता है।
इसीलिये आप ध्यान से देखें तो पायेंगे कि ज्यादातर लोग जिन्होंने प्रेम करने के बाद विवाह करने में पसीना बहाया वो विवाह के बाद निठल्ला हो जाता है क्योंकि उसको लगता है दुनिया में सबसे बड़ा पराक्रम तो उसने कर लिया अब करने को बचा ही क्या है।
क्या नारद पर या अन्य किसी साइट पर इस तथ्य की पुष्टि के बारे में सर्वे कराया जा सकता है?
जैसे हर थीसिस की एंटीथीसिस होती है वैसे ही इस बात को गलत ठहराने वाले लोग कहते हैं- क्या बेवकूफ़ आदमी है जिससे प्यार करता है उसी से शादी कर ली। जिंदगी में कुछ तो खुशनुमा यादें रखनी चाहिये थीं। कुछ लोग तो यहां तक कहते हैं और डंके की चोटपर कहते हैं कि विवाह प्रेम की अगली कड़ी है। जैसे ही प्रेम समाप्त हो जाता है आदमी शादी कर लेता है।
प्रेम समाप्त होते ही शादी करने की बात के समर्थन में कोई आंकड़े नहीं है। सिर्फ़ एक नजीर है जिसमें अपने बड़े भाई को बात में अपना आदर्श मानने वालेछोटे भाई ने अपने भैया के प्रेम विवाह की बात को आदर्श नहीं माना। उसने पहले विवाह किया तब फिर प्रेम कहानी शुरू की। अब इस उदाहरण से आप अपने निष्कर्ष खुद निकाल लो। कुछ तो सच रहा होगा बात में। क्या छोटा शादी के पहले प्रेम करने की हिम्मत नहीं रखता था या उसने देख लिया था शादी के बाद और सब कुछ हो सकता लेकिन प्रेम नहीं हो सकता है।
बहरहाल, समय बदलने के साथ प्रेम के पकने की अवधि में क्रांतिकारी सुधार हुआ है। अब प्रेम एक दम प्रेशर कुकर टाइप तुरन्त सीटी देने लगता है। आप थोड़ा सा पैसे की आंच बढ़ाऒ, उपहार की लौ तेज करो, आपका चेहरा-चूल्हा थोड़ा नया-नया सा, हैंडसम टाइप का हुआ तो आपके प्यार की तुरंत सीटी बचने लगती है। लोग तो इतना एक्सपर्ट हो गये हैं कि एक साथ तमाम सीटी बजाते रहते हैं। एकदम प्रेम की फ़ैक्टरी जैसी लगा लेते हैं। दिन में कई-कई प्रेम निकालके बाहर कर देते हैं। इसी आजिज आकर नंदनजी कहने लगे-
अभी मुझसे, फिर उससे फिर किसी और से
मियां यह मोहब्बत है या कारखाना।
प्रेम जब इतनी जल्दी-जल्दी होने लगा तो लोग स्वाभाविक है कि बोर होने लगे। और फिर क्या है कि प्रेम में टाइम-पैसा बहुत सारा खर्चा हो जाता है। आप देखिये रवीश कुमार जी ने बताया है कि दिल्ली की लड़कियों से प्रेम के झमेले में कितना टाइमबरबाद होता था- यूपीएससी के युद्ध में लगे योद्धाओं का।
अभी कुछ दिन पहले युवा पीढी के संग रहकर हमें एक और बात पता चला कि प्रेम जैसी विलासितापूर्ण हरकत में पैसा और समय बरबाद करने के बजाय आजकल कालेजों में बच्चे प्रेम के जगह क्रश कोर्स करते हैं। पहले तो हम समझे कि यह कृष१, कृष-२ के आगे की कोई फिल्म होगी जिसमें थोड़ा और खुलापन होगा। लेकिन जब पता चला कि यह तो प्यार का क्रैश कोर्स टाइप की चीज है तो बड़ा ताज्जुब हुआ।
इस मैगी-नूडलनुमा प्यार के बारे में हमने जितना सुना है वह ऐसा है कि अचानक किसी की किसी अदा पर कोई इतना फ़िदा हो जाये कि उसके बिना जिंदगी फिजूल सी लगने लगती है। इस जिंदगी के फिजूल लगने के एहसास की अवधि अगर लंबी हो गयी तो आप उसके इश्क में गिरफ़्तार माने जायेंगे। लेकिन जिसके बिना जिंदगी फ़िजूल लग रही थी अगर उसी के कुछ ऐसे पहलू आपके सामने उजागर हो जायें जिनके बारे में सोचते हुये आप सोचें कि इसके साथ रहे तो जिंदगी नरक हो जायेगी। आप जिसके पहलू में बैठे रहने (यूं पहलू में बैठे रहो, आज जाने की जिद न करो) की कल्पना में कुछ दिन टाइम बरबाद करते रहे उसी के बारे में सोचना भी आपको समय की बरबादी लगने लगती है। एक बरबादी से दूसरी बरबादी के इसी अहसास को लोग आधुनिक युग में क्रश के नाम से जाना जाता है।
अब इस शब्द के उत्स के बारे में तो अभयतिवारीजी या अजित वडनेरकरजी बतायेंगे लेकिन हमें लगता है कि ये शब्द क्रश माने अंग्रेजी के चकनाचूर से लिया गया है। अंग्रेजी अदा है कि दिल में कोई कुछ दिन रहा फिर दिल से निकल गया तो दिल चकनाचूर हो गया। या शायद ऐसा हो कि वहां हर चीज में यूज एन्ड थ्रो का चलन है तो इधर उसको दिल से निकाला उधर दिल को चकनाचूर घोषित कर दिया ताकि प्यार का प्रदूषण न बढ़े।
क्रश में सुविधा यह है कि इसमें संख्या की कोई बंदिश नहीं है। न उमर की। सच तो यह है न उम्र की सीमा हो न जन्म का हो बंधन गाना इसी क्रश के लिये बनाया गया लगता है। लोग पन्द्रह-पन्द्रह ,बीस-बीस बार अपने दिल को चकनाचूर करते रहते हैं। हमें एक ने जानकारी दी कि पिछले तीन सालों में यह मेरा सत्रहवां क्रश था। हमने उसे शुभकामनायें दीं जल्दी ही तुम्हारी उमर के वर्ष और दिल के चकनाचूर होने की संख्या में बराबरी हासिल हो सके ताकि तुम पहले प्यार की तरफ़ अग्रसर हो सको।
क्रश का भावानुवाद किया जाये तो मतलब होता है -अल्पसमय के लिये प्रेमांधता।अब लोग प्यार के बारे में पहले ही बता चुके हैं कि प्यार अंधा होता है। फिर क्रश यानि अल्पसमय के लिये अंधे होने का क्या मतलब! कई-कई बार होने का क्या मतलब? जब होना है तो एक बार कायदे से हों।
इसी समय मुझे यह लगता है कि प्यार करने के पहले क्रश जैसी आइटम उसी तरह हैं जैसे पहली कक्षा के पहले प्रि-नर्सरी, नर्सरी, लोअर केजी, केजी,अपर केजी, कक्षायें समय बिताने के लिये होती हैं वैसे ही प्यार के पहले ये दिल को चकनाचूर करने की कक्षायें चलती रहती हैं। इनमें पढ़ने वाले ही आगे जाते हैं।
आप शायद यह समझ रहे हों कि मैं प्रेम करने वालों का मजाक उड़ा रहा हूं। ऐसा कतई नहीं है। सच तो यह है कि बावजूद यह मानने के कि सच यह है कि जब आदमी के पास कुछ करने को नहीं होता तो प्यार करने लगता है.इसका उल्टा भी सही है-जब आदमी प्यार करने लगता है तो कुछ और करने लायक नहीं रहता .प्यार एक आग है.इस आग का त्रिभुज तीन भुजाओं से मुकम्मल होता है. जलने के लिये पदार्थ (प्रेमीजीव), जलने के लिये न्यूनतम तापमान(उमर, अहमकपना) तथा आक्सीजन(वातावरण,मौका,साथ) किसी भी एक तत्व के हट जाने पर यह आग बुझ जाती है।यही अफ़सोस करते रहे कि हम इस सुखद अहसास से वंचित रह गये। सिर्फ़ यह जलन है कि यार देखो हम एक प्यार के लिये तरस गये और यहां लोग सैकडों बार अपना दिल चकनाचूर करवाते घूमते हैं।
प्रेम-प्यार अच्छी बात है लेकिन ऐसा लगता है प्यार मे एक बार हमेशा के लिये अंधा होना अच्छी बात है बजाय बार-बार कम समय के लिये अंधा होना। ये कोई टीवी सीरियल तो है नहीं जहां हर बार अंधे होने के बाद एक कामर्शियल ब्रेक का जुगाड़ हो। प्रेम-प्यार की खूबसूरती टेस्ट मैच बने रहने में ही है। २०-२० ओवर में ये चकनाचूर ही हुआ समझो।
लेकिन हमारे कहने से क्या होता है। ये तो ऐसी आग है जिसमें जो जले वही इसके ताप को महसूस कर सकता है। है कि नहीं।
मेरी पसंद
मेघ आये बड़े बन-ठन के, संवर के।
आगे-आगे नाचती-गाती बयार चली
दरवाजे-खिड़कियां खुलने लगीं गली-गली
पाहुन ज्यों आये हों गांव में शहर के।
पेड़ झुक झांकने लगे गरदन उचकाये
आंधी चली, धूल भागी घांघरा उठाये
बांकी चितवन उठा नदी ठिठकी, घूंघट सरके।
बूढ़े पीपल ने आगे बढ़ कर जुहार की
‘बरस-बाद सुधि लीन्ही’
बोली अकुलायी लता ओट हो किवार की
हरषाया ताल लाया पानी परात भर के।
क्षितिज अटारी गदरायी दामिनि दमकी
‘क्षमा करो गांठ खुल गयी भरम की’
बांध टूटा झर-झर मिलन अश्रु ढरके
मेघ आये बड़े बन-ठन के संवर के।




यहाँ वर्षा मुँह चिढ़ा रही है. बिजली चमक-चमक जा रही है. उसके अनुपात में वर्षा है ही नहीँ:
दामिनि दमक रहीं घन माहीँ. खल कई प्रीति जथा थिर नाहीँ.
कुछ और दिन इंतजार कर आपकी पोस्ट पर फिर आयेंगे; तब शायद मजा आये. अभी तो बारिश फुरसतिया की पोस्ट जैसी नहीं हायकू जैसी है!
[...] अनूप शुक्ल बरसात की झमाझम में हायकू की बौछार भी कर रहे हैं आइये बारिशों का मौसम है… पढि़ये, [...]
ह्म्म, ऐसी पोस्टन पढ़कर ही तो हमें अफ़सोस होता है कि हाय रे जीव तूने प्यार काहे न किया, पर ऐसी ही पोस्ट पढ़-पढ़ कर प्रोत्साहन भी मिलता है कि बेट्टा लगे रहो मैदान में आज नई तो कल प्यार हो ही जाएगा!
बिन बारिश में इश्क की टमटम हम भी दौडाये थे भाई अभी रिसेन्टली.
बेहतरीन फुरसतिया अंदाज रहा-हाईकु तो खैर बढ़िया जम ही गये. सक्सेना जी की कविता अच्छी लगी. बधाई.
बढ़िया है जी।
अभी मुझसे, फिर उससे फिर किसी और से
मियां यह मोहब्बत है या कारखाना।
बहुत सुन्दर…मुझे तो कारखाना ही नजर आता है…तभी तो लोग अपना प्यार आये दिन छिपाते है और कहते है हमने तो प्यार नही किया…हा हा हा….आपकी पोस्ट बहुत अच्छी लगी…
सुनीता(शानू)
दिल्ली में तो सूखा पड़ा है.
प्रेम व शादी के अंतर्संबंधों पर अच्छा ज्ञान (या पता नहीं अनुभव) बघारा आपने।
ये नयी उमर के (नये ही हैं अभी कौन उमर हो गयी। अभी तो कायदे से जवान भी नहीं हुये ) ….
नई सर, नई उमर के बच्चे कोन होते हैं जानने के लिए या तो कॉलेजवा आना पड़ेगा या स्वर्ण जयंती पार्क। हम सीधे साधे ‘देखा-प्यार-शादी-बच्चे-ब्लॉगिगं’ की बाईनरी वाले आशिक हैं भई