बचपन से हम सरिता/मुक्ता में छपे विज्ञापनी आवाहन पढ़ते आये हैं- क्या आप मांग कर खाते हैं, मांगकर पढ़ते हैं। यदि नहीं तो मांगकर पढ़ते क्यों हैं?
हम मारे डर के किताबें खरीद के पढ़ने लगे।
आज हमारे पास काफ़ी किताबें जमा हो गयीं। उनमें से तमाम अभी पढ़ी जानी हैं।
किताबें हम अक्सर यात्रा के दौरान रेलवे स्टेशन से खरीदते हैं या फिर किसी पुस्तक मेले से। शहर के माल रोड पर स्थित करेंट बुक डिपो हमारे शहर का एक मात्र ऐसा स्थान है जहां लगभग हर जरूरी किताब मिल जाती है।
अक्सर मुझसे कई बार कुछ मित्रों ने पूछा है कि हिंदी की फ़लानी किताब कहां मिलेगी? कैसे मंगायें? कितने की है।
उन मित्रों की जानकारी के लिये बताना चाहता हूं कि राजकमल प्रकाशन की पुस्तक मित्र योजना एक योजना है जिसके माध्यम से आप सस्ते में किताबें प्राप्त कर सकते हैं।
इस योजना में आपको एक बार धरोहर के रूप में १००० रुपये राजकमल प्रकाशन के पास जमा करने होते हैं। राशि मिलते ही वहां से आपको राशि का प्रमाणपत्र और २०० मूल्य की किताबें उपहार स्वरूप मिल जायेंगी। इस योजना में आपको हर साल २०० मूल्य की किताबें उपहार स्वरूप मिल जायेंगी चाहे आप किताबें खरींदे या न खरीदें। मतलब जमा राशि के बीस प्रतिशत का ब्याज हर वर्ष आपको मिल जायेगा।
जब तक आपकी सदस्यता रहेगी, आपको हर वर्ष २०० रुपये की उपहार पुस्तकें मिलती रहेंगी। तीन साल के बाद अगर आप चाहें तो अपनी सद्स्यता समाप्त करके अपनी धरोहर राशि वापस पा सकते हैं। पूरी की पूरी १००० रुपये।
पुस्तक मित्र योजना का सदस्य बनने पर आप किताबों के दामों में आकर्षक छूट भी प्राप्त कर सकते हैं। सामान्यत: पाठ्कों को पुस्तकों पर १० प्रतिशत की छूट दी जाती है। लेकिन पुस्तक मित्र योजना की सदस्यता प्राप्त कर लेने पर सदस्यों को राजकमल प्रकाशन से संबद्ध सभी पुस्तकें २५ प्रतिशत छूट पर उपलब्ध कराई जाती हैं। राजकमल प्रकाशन के सहयोगी प्रकाशन हैं राधाकृष्ण प्रकाशन और अब इलाहाबास स्थित लोकभारती प्रकाशन भी इनके साथ जुड़ गया है।
इसके अतिरिक्त लाभ यह भी कि छूट के बाद २०० रुपये या इससे अधिक का आदेश भिजवाने पर पुस्तकों पर आने वाला डाक व्यय भी आपसे नहीं लिया जाता। वह प्रकाशक स्वयं वहन करता है।
इसके अतिरिक्त अन्य कई लाभ और सुविधायें भी हैं जो आप सदस्यता ग्रहण करते ही प्राप्त करने लगेंगे।
हर दो माह में पुस्तक मित्र योजना के सदस्यों को राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित होने वाला प्रकाशन समाचार भी भेजा जाता है। इसमें आपको पुस्तक प्रकाशन से संबद्ध समाचार भेजे जाते हैं। प्रकाशनों में उपलब्ध पुस्तकों की सूची ,दाम -सूचना सहित, भी प्रदान की जाती है।
जैसे इसी बार बताया गया है -वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी १५ जुलाई को ७१ वें साल में प्रवेश कर गये। आज भी वे लगभग २००० शब्द प्रतिदिन अपने हाथ से लिखते हैं।
कुछ रचनावलियां जो राजकमल प्रकाशन में उपलब्ध हैं वे निम्न हैं-
१. निराला रचनावली(आठ खण्ड) सजिल्द मूल्य ३६००/-, पेपरबैक मूल्य १०००/-
२. हजारी प्रसाद द्विवेदी रचनावली(ग्यारह खण्ड) सजिल्द मूल्य ५५००/-, पेपरबैक मूल्य २०००/-
३. मुक्तिबोध रचनावली(छ्ह खण्ड) सजिल्द मूल्य ३०००/-, पेपरबैक मूल्य ९००/-
४. नागार्जुन रचनावली(सात खण्ड) सजिल्द मूल्य ४१००/-, पेपरबैक मूल्य १४००/-
५. रेणु रचनावली(सात खण्ड) सजिल्द मूल्य ३०००/-, पेपरबैक मूल्य १०००/-
६. परसाई रचनावली(आठ खण्ड) सजिल्द मूल्य २४००/-, पेपरबैक मूल्य ९००/-
७. दस्तावेज मंटो (पांच खण्ड) सजिल्द मूल्य २५००/-, पेपरबैक मूल्य १०००/-
८. बेदी समग्र (दो खण्ड) सजिल्द मूल्य ७००/-, पेपरबैक मूल्य २००/-
९. महात्मा ज्योतिबा फ़ुले रचनावली(दो खण्ड) पेपरबैक मूल्य २५०/-
१०. बच्चन रचनावली (नौ खण्ड) सजिल्द मूल्य ६३००/-
११. सुमित्रानन्दन पंत रचनावली (सात खण्ड) सजिल्द मूल्य ४२००/-
१२. रघुवीर सहाय रचनावली (छह खण्ड) मूल्य ४२००/-
१३. श्रीकांत वर्मा रचनावली (चार खण्ड) सजिल्द मूल्य २०००/-
१४. बेनीपुरी रचनावली (आठ खण्ड) सजिल्द मूल्य ४०००/-
इसके अलावा तमाम प्रसिद्ध लेखक/कवि की किताबें राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुई हैं। ये सभी आपको पुस्तक मित्र योजना के अंतर्गत मिल सकती हैं। श्रीलाल शुक्ल, राही मासूम रजा, मनोहर श्याम जोशी, शिवानी, महाश्वेता देवी और अन्य तमाम लेखको कवियों की रचनायें यहां से प्रकाशित हैं। ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित कृतियां भी राधाकृष्ण प्रकाशन से मिल जायेंगी।
आज जब किताबों के मंहगे होने का रोना रोया जाता है। लेकिन इस योजना के पेपरबैक किताबों का दाम देखकर लगता है कि किताबें उतनी मंहगी नहीं हैं जितना हम उनको बनाकर उनसे दूर रह लेने में सफ़ल हो जाते हैं। रागदरबारी( श्रीलाल शुक्ल), आधा गांव (राही मासूम रजा) ,कसप( मनोहर श्याम जोशी), झीनी-झीनी बीनी चदरिया( अब्दुल बिस्मिलाह) ऐसी किताबें हैं जिनको अगर आप एक बार पढ़ते हैं तो जिंदगी भर याद रखते हैं। जितनी बार पढ़ते हैं, हर बार नया मजा आता है। ये सारी की सारी किताबें सौ रुपए से कम में उपलब्ध हैं। छूट के बाद जिस दाम में पड़ेंगी उतने में आप अपने दोस्त के साथ किसी कायदे के
होटल में एक चाय भी शायद न पी पायें।
तो क्या विचार है? बनेंगे पुस्तक मित्र योजना के सद्स्य? बनिये या न बनिये, सोच लेने में क्या हर्ज है।
राजकमल प्रकाशन योजना का पता है:
राजकमल प्रकाशन लिमिटेड,
1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग,दरियागंज- दिल्ली- 110 002
फोन -011-2327 4463, 2328 8769 , 2324 0464 फ़ैक्स-011- 2327 8144
website:http://www.rajkamalprakashan.com, email:info@rajkamalprakashan.com/
शाखायें: अशोक राजपथ, साइंस कालेज के सामने, पटना (बिहार) , फोन: 0612- 2672280
पहली मंजिल, दरबारी बिल्डिंग, महात्मा गांधी मार्ग, इलाहाबाद-1 , फोन: 0532- 3293838, 242 7274
मेरी पसंद
क्या खाकर बौराये बादल?
झुग्गी-झोपड़ियां उजाड़ दीं
कंचन-महल नहाये बादल!
दूने सूने हुये घर
लाल लुटे दृग में मोती भर
निर्मलता नीलाम हो गयी
घेर अंधेर मचाये बादल!
जब धरती कांपी, बड़ बोले-
नभ उलीचने चढ़े हिंडोले,
पेंगे भर-भर ऊपर-नीचे
मियां मल्हार गुंजाए बादल!
काली रात, नखत की पातें-
आपस में करती हैं बातें
नई रोशनी कब फूटेगी?
बदल-बदल दल छाए बादल!
कंचन महल नहाए बादल!
जानकीवल्लभ शास्त्री




भईया परनाम,
दुई दिन से बाहर रहा आपको नहीं पर पाया,
धन्यवाद अच्छी जानकारी देने के लिए, सचमुच में राजकमल प्रकाशन में साहित्य का ल्रभग संपूर्ण खजाना है इस सुविधा का लाभ उठाना चाहिए ।
“आरंभ” संजीव का हिन्दी चिट्ठा
ये तो बहुत ही काम की जानकारी आपने दी है सबेरे सबेरे । अचानक राजकमल वालों को ये सदबुद्धि कहां से आ गयी
किसी जमाने में – तीस साल पहले राजकमल की पुस्तकें इस तरह खरीदते थे. अब इण्टरनेट पर खरीद लेते हैं – पर वहां हिन्दी पुस्तकें कम बिकती हैं. राजकमल वाले अगर नेट पर बेचें और पुस्तकें डाक से नहीं, कोरियर से भेजें तो मजा है.
अब डिटेल पढ़ते हैं कि विदेश में रहने वालों के लिये क्या योजना है..फिर खबर करेंगे. भारत में रहते होते तो आज ही सदस्य बने होते. आभार जानकारी के लिये.
आज भी वे लगभग २००० शब्द अपने हाथ से लिखते हैं।
कितने अंतराल में? प्रतिदिन? हर हफ़्ते? हर महीने?
अच्छी जानकारी.
अच्छी बात बताई
भई ये तो बहुत अच्छी बात बतायी, लगे हाथों ये भी बता दो कि
विदेशो मे रहने वाले कैसे सदस्य बनें और किताबे भेजने का क्या तरीका रहेगा।
क्या विदेशो मे रहने वाले, भारत मे रह रहे किसी व्यक्ति को सदस्यता उपहार मे दे सकते है? यदि हाँ तो कैसे?
मतलब दादा पैसे खर्च कराकर ही मानोगे..?ये आपने इतनी सरी किताबे जो इक्कठा की हुई है क्या आप सारी एक साथ पढते हो..भाइ दोस्तो को उधार भी दिया करो,२५/५० किताबे तो हम कानपुर आयेगे तो उठा लायेगे बाद मे अगले फ़ेरे मे जितनी पढली होगी लौटा देगे..जरा भारतीय बने.यहा चाय की पत्ती चीनी दूध, और सुबह का अखबार तथा पत्रिकाये मांग कर ही पढी जाती है,और हम अपना ये भारतीयपन भुलने को राजी नही जी…:)
जानकारी के लिए धन्यवाद !
विचार तो बहुत अच्छा है…! जीतू भाई वाला प्रश्न फिर पूछ्ता हूँ…विदेशों में रहने वाले कैसे सस्य बनें!
इस योजना के बारे में पढ कर अच्छा लगा। मैं इस योजना का पहले से सदस्य हूं। वैसे इस तरह की योजनाएं कई प्रकाशक चला रहे हैं।
वाह इतनी अच्छी जानकारी…हम तो आज ही बनते है सदस्य…मगर आप भी न इतनी देर बाद मतलब इतने दिनो बाद जानकारी दे रहे है…खैर कोई बात नही…देर से ही सही…शुक्रिया अनूप जी आपका…
सुनीता(शानू)
शुक्रिया इस बढ़िया जानकारी के लिए!!
ज्ञानपीठ प्रकाशन के पाठक समुदाय के तो हम सदस्य हैं तो हर महीने न्यूज़ लेटर डाक से मिल जाता है, साथ ही खरीदी पर छूट भी!!
ये राजकमल प्रकाशन की इस योजना की जानकारी नही थी, ये योजना तो और बढ़िया लग रही है!!
सच मे शुक्रिया!!
विचार बढ़िया है पर २००/- में ये क्या भेजेंगे?
बहुत ही अच्छी जानकारी आपने साहित्य प्रमियों को दे दी है। एक एेसा रास्ता सुझा दिया है जिस पर वो आराज से बिना पूछे चल सकते हैं। भई हम तो परसों ही मेम्बरशिप हेतु आवेदन करने जा रहे हैं। आप क्या सोच रहे हैं
हम ने ही टिपेरा है ऊपर – “राजकमल वाले अगर नेट पर बेचें और पुस्तकें डाक से नहीं, कोरियर से भेजें तो मजा है.”
आज फिर देखा तो राजकमल का पता इलाहाबाद का है! सच में कम्प्यूटर में सिर घुसाये रहने से – छोरा बगल में ढ़िंढ़ोरा शहर में वाली बात हो गयी!
देखना है कि २००/ मे expiry वाला माल तो नही भेजते हैं
वैसे विचार बुरा नही है , शायद दिल्ली प्रकाशन केन्द्र ने भी कुछ इसी तरह की योजना चलाई थी , एक बार पैसे जमा करो और जिन्दगी भर सरिता ,और शायद चंपक का लुत्फ़ उठाते रहो
पता नही अब चल रही है या नहीं ?
Kafi achha hai pustako ka prasaar jaroori hai hindi saahitya ke liya bhi thik saabit hoga
Dhanyawad
bhai mere
aap sabhi ko fursatiya page me dekh/padh kar achcha laga
aise hi hum achchi kitaaben read karen aur achchi baaten karen to ho na jaayegi duniya kitti sunder, ekdum adbhut!
such-much
anwar suhail
pustak mitra banenge? ye poochhna to aisa hi hai jaise bhookhe se poochhen- bhojan karenge????
bhai, pustak mitra banane ke liye kya karna hoga ye to batayen….
sab hindi lipi mein likhte hain….main kaise likhoon????madad karenge???
आपने मदद क्या की,लगा ज़िन्दगी वापस मिल गयी.अंग्रेज़ी में अपनी बात तो कम से कम नहीं ही लिखी जा सकती..लग रहा है जैसे बिछडा हुआ दोस्त मिल गया…
आपके चरण कहाँ है…आपने मुझ गरीब की नैय्या पार लगा दी…यहाँ बंगलोर में बैठे बैठे रोज हिंदी किताबें न मिलने का रोना रोते थे….इन प्रकाशनों के बारे में दिल्ली में तो पता चल भी जाता यहाँ तो हिंदी किताब कहीं मिलेगी पूछने पर लोग ऐसे घूर के देखते हैं मानो टिम्बकटू का पता पूछ रहे हो. औ हमारा पढ़े बिन खाना हज़म नहीं होता… जानकारी के लिए बहुत बहुत धन्यवाद.
I have some script and written items…, i want to publish through you….
MY FIRST SCRIPT IS….
प्यार_The Ultimate Choice
I want to publish this through you please……!
my mail id… helomartin@yahoo.com
I need your prompt comments…..please.
badhiya hai…………..
achha hai. badhiya knowledge pustako ke bare mein.people prabhavith hote hai.. nice information..keep it up .
dhanyavad,best of luck..