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	<title>Comments on: किलक-किलक उठने वाला सम्पादक और समकालीन सृजन</title>
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	<description>हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै?</description>
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		<title>By: उन दुआओं का मुझपे असर चाहिए</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/352/comment-page-1#comment-40924</link>
		<dc:creator>उन दुआओं का मुझपे असर चाहिए</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 01 Jul 2009 03:13:01 +0000</pubDate>
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		<description>[...] संबंधित कड़ियां: १.  प्रियंकर- एक प्रीतिकर मुलाकात २. किलक-किलक उठने वाला सम्पादक और समकाली... [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] संबंधित कड़ियां: १.  प्रियंकर- एक प्रीतिकर मुलाकात २. किलक-किलक उठने वाला सम्पादक और समकाली&#8230; [...]</p>
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		<title>By: Devi Nangrani</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/352/comment-page-1#comment-17776</link>
		<dc:creator>Devi Nangrani</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 16 Dec 2007 03:33:52 +0000</pubDate>
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		<description>Waah Bahut hi acha laga aapke blog par aakar jahaan is silsile ko padne aur jaankari hasil paane ka saubhagya raha

Devi</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>Waah Bahut hi acha laga aapke blog par aakar jahaan is silsile ko padne aur jaankari hasil paane ka saubhagya raha</p>
<p>Devi</p>
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		<title>By: फुरसतिया &#187; आतंक के असली अर्थ- भगतसिंह</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/352/comment-page-1#comment-16622</link>
		<dc:creator>फुरसतिया &#187; आतंक के असली अर्थ- भगतसिंह</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 02 Nov 2007 18:19:12 +0000</pubDate>
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		<description>[...] [आज महेंद्र मिश्र का लिखा लेख ,क्या सरदार भगतसिह आतंकवादी थे ?  पढ़कर मुझे भगतसिंह लिखा लेख आतंक के असली अर्थ याद आया। यह लेख मैंने समकालीन जनमत  के प्रियंकरजी द्वारा सम्पादित धर्म, आतंकवाद और आजादी पर केंद्रित अंक में पढ़ा था। इसे पोस्ट करने का पहली बार विचार तब आया था जब संजय बेंगाणी ने शहीदे आजम भगतसिंह को याद करते हुये चिट्ठाचर्चा की थी। [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] [आज महेंद्र मिश्र का लिखा लेख ,क्या सरदार भगतसिह आतंकवादी थे ?  पढ़कर मुझे भगतसिंह लिखा लेख आतंक के असली अर्थ याद आया। यह लेख मैंने समकालीन जनमत  के प्रियंकरजी द्वारा सम्पादित धर्म, आतंकवाद और आजादी पर केंद्रित अंक में पढ़ा था। इसे पोस्ट करने का पहली बार विचार तब आया था जब संजय बेंगाणी ने शहीदे आजम भगतसिंह को याद करते हुये चिट्ठाचर्चा की थी। [...]</p>
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	<item>
		<title>By: प्रियंकर</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/352/comment-page-1#comment-16191</link>
		<dc:creator>प्रियंकर</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 24 Oct 2007 08:31:52 +0000</pubDate>
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		<description>आभार व्यक्त करने के अलावा और क्या कर सकता हूं!

जिन चिट्ठाकारों को आप मुग्ध होकर पढते हों, वे आपको अच्छा बताएं तो आत्मविश्वास वैसे ही आसमान छूने लगता है (ध्यानाकर्षण जीतू). ज्ञान जी धीर-गंभीर व्यक्ति हैं पर उनकी अतिशयोक्तिपूर्ण प्रशंसा (जिसका आपने जिक्र किया है)को ज्यादा गंभीरता से न लेने का स्थाई अनुरोध है . 

ब्लॉग जगत में आने पर इतने कम समय में इतने अधिक और इतने अच्छे मित्र मिले कि अपने सौभाग्य पर इठलाने का मन होता है .लिख-बोल तो और माध्यमों पर भी रहा हूं पर इस माध्यम का जवाब नहीं है .

पिछले पखवाड़े कुछ दिन बाहर था . उसके बाद एक पारिवारिक उत्सव की व्यस्तता थी . पत्रिका के नए अंक का काम भी अन्तिम चरण में है . अब पुनः कमर कस कर लगूंगा .

एक बार पुनः आप सभी के प्रति आभार,विशेषकर अनूप भाई के प्रति . इतना सदय होने के लिए,अपना वादा याद रखने के लिए और अन्ततः उसे निभाने के लिए .</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आभार व्यक्त करने के अलावा और क्या कर सकता हूं!</p>
<p>जिन चिट्ठाकारों को आप मुग्ध होकर पढते हों, वे आपको अच्छा बताएं तो आत्मविश्वास वैसे ही आसमान छूने लगता है (ध्यानाकर्षण जीतू). ज्ञान जी धीर-गंभीर व्यक्ति हैं पर उनकी अतिशयोक्तिपूर्ण प्रशंसा (जिसका आपने जिक्र किया है)को ज्यादा गंभीरता से न लेने का स्थाई अनुरोध है . </p>
<p>ब्लॉग जगत में आने पर इतने कम समय में इतने अधिक और इतने अच्छे मित्र मिले कि अपने सौभाग्य पर इठलाने का मन होता है .लिख-बोल तो और माध्यमों पर भी रहा हूं पर इस माध्यम का जवाब नहीं है .</p>
<p>पिछले पखवाड़े कुछ दिन बाहर था . उसके बाद एक पारिवारिक उत्सव की व्यस्तता थी . पत्रिका के नए अंक का काम भी अन्तिम चरण में है . अब पुनः कमर कस कर लगूंगा .</p>
<p>एक बार पुनः आप सभी के प्रति आभार,विशेषकर अनूप भाई के प्रति . इतना सदय होने के लिए,अपना वादा याद रखने के लिए और अन्ततः उसे निभाने के लिए .</p>
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	<item>
		<title>By: सृजन शिल्पी</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/352/comment-page-1#comment-16089</link>
		<dc:creator>सृजन शिल्पी</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 22 Oct 2007 02:51:08 +0000</pubDate>
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		<description>प्रियंकर जी को कुछ और जानने को मिला। पत्रिका के अंकों की इतनी बेहतरीन समीक्षा के बाद निश्चय ही उसके नियमित ग्राहक बढ़ेंगे। टिप्पणियों में ही पाठकों ने बुकिंग शुरु कर दी है। 

सत्य के भीतरी तहों तक झाँकने वाला सटीक विचारशील लेखन प्रियंकर जी की खासियत है, जो उन्हें दूसरों से अलग करता है। अपने मंतव्य को बेलाग व्यक्त करने की कशिश उनकी भाषा में एक विशेष प्रकार का कसाव लाती है, जिनके सहारे पूरी बात तक पहुँचने के लिए पाठक को आखिर तक सावधानी से आगे बढ़ना होता है। उनके लेखन को सरसरी निगाह से पढ़कर कहीं किनारे सरकाया नहीं जा सकता।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>प्रियंकर जी को कुछ और जानने को मिला। पत्रिका के अंकों की इतनी बेहतरीन समीक्षा के बाद निश्चय ही उसके नियमित ग्राहक बढ़ेंगे। टिप्पणियों में ही पाठकों ने बुकिंग शुरु कर दी है। </p>
<p>सत्य के भीतरी तहों तक झाँकने वाला सटीक विचारशील लेखन प्रियंकर जी की खासियत है, जो उन्हें दूसरों से अलग करता है। अपने मंतव्य को बेलाग व्यक्त करने की कशिश उनकी भाषा में एक विशेष प्रकार का कसाव लाती है, जिनके सहारे पूरी बात तक पहुँचने के लिए पाठक को आखिर तक सावधानी से आगे बढ़ना होता है। उनके लेखन को सरसरी निगाह से पढ़कर कहीं किनारे सरकाया नहीं जा सकता।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: जीतू</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/352/comment-page-1#comment-16054</link>
		<dc:creator>जीतू</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 21 Oct 2007 05:33:35 +0000</pubDate>
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		<description>हमारे प्रियंकरभाई भी विलुप्त प्रजाति के अनमोल और नायाब प्राणी है। प्रियंकरजी से हमारा वास्ता एक टिप्पणी युद्द पर पड़ा था, जिसमे हम लोग किसी विषय विशेष पर भिड़े थे। इतिहास गवाह है जिस बन्दे से हम कभी भिड़े तो, वो हमारा जिगरी ही हुआ। ऐसा ही प्रियंकरभाई के साथ भी हुआ। आज प्रियंकर हमारे बड़े भाई की तरह है। आत्मविश्वास से लबालब भरे, प्रियंकर बहुत ही आत्मीय चिट्ठाकार है। जब कभी भी हमारे पास आत्मविश्वास की कमी होती है, हम प्रियंकर भाई से उधार ले लेते है, सचमुच इस चिट्ठाकारी संसार मे प्रियंकर भाई जैसे बहुत कम लोग है। 

पहले पहले ये जनाब कविता लिखते थे, जिसमे हमारा हाथ थोड़ा तंग है, हमे भी कभी कभी (जबरन) पढाते थे, लेकिन ये जानते थे कि हम इसमे इंटरेस्ट कम लेते है तो जनाब ने गद्य लेखन मे हाथ चलाए, चलाए क्या जी, दौड़ाए, जितनी अच्छी ये कविता लिखते है, उससे भी अच्छा ये गद्य लिखते है।  प्रियंकर के रुप मे हिन्दी चिट्ठा संसार को एक जबरदस्त लेखक मिला है। मां सरस्वती इन पर कृपा बनाए रखे।

इन्ही शुभकामनाओं के साथ.....</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>हमारे प्रियंकरभाई भी विलुप्त प्रजाति के अनमोल और नायाब प्राणी है। प्रियंकरजी से हमारा वास्ता एक टिप्पणी युद्द पर पड़ा था, जिसमे हम लोग किसी विषय विशेष पर भिड़े थे। इतिहास गवाह है जिस बन्दे से हम कभी भिड़े तो, वो हमारा जिगरी ही हुआ। ऐसा ही प्रियंकरभाई के साथ भी हुआ। आज प्रियंकर हमारे बड़े भाई की तरह है। आत्मविश्वास से लबालब भरे, प्रियंकर बहुत ही आत्मीय चिट्ठाकार है। जब कभी भी हमारे पास आत्मविश्वास की कमी होती है, हम प्रियंकर भाई से उधार ले लेते है, सचमुच इस चिट्ठाकारी संसार मे प्रियंकर भाई जैसे बहुत कम लोग है। </p>
<p>पहले पहले ये जनाब कविता लिखते थे, जिसमे हमारा हाथ थोड़ा तंग है, हमे भी कभी कभी (जबरन) पढाते थे, लेकिन ये जानते थे कि हम इसमे इंटरेस्ट कम लेते है तो जनाब ने गद्य लेखन मे हाथ चलाए, चलाए क्या जी, दौड़ाए, जितनी अच्छी ये कविता लिखते है, उससे भी अच्छा ये गद्य लिखते है।  प्रियंकर के रुप मे हिन्दी चिट्ठा संसार को एक जबरदस्त लेखक मिला है। मां सरस्वती इन पर कृपा बनाए रखे।</p>
<p>इन्ही शुभकामनाओं के साथ&#8230;..</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: anita kumar</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/352/comment-page-1#comment-16028</link>
		<dc:creator>anita kumar</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 20 Oct 2007 17:36:57 +0000</pubDate>
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		<description>हम तो अनूप जी ब्लोगरी की दुनिया में बस आखें खोल रहे है, इस लिए हम तो  आप जैसे सब वरिष्तम ब्लोगरो को मिल नही जी देख कर अपने सितारों को सराह रहे हैं। इस पत्रिका के बारे में बम्बई में भी पता करेंगे और जरुर पढ़ेगे। वैसे सच है आप की लेखन शैली बहुत मोहक है।
 मुझे अभी भी आप का ई-मेल पता नही मिल पाया है इस लिए इस बार भी यहीं आप का धन्यवाद कर रही हूँ। अपना ई-मेल पता देंगे तो मुझे अच्छा लगेगा।

&lt;strong&gt;अनीताजी,&lt;/strong&gt; मेरा ईमेल पता है anupkidak@gmail.com अफ़सोस कि पहले भेजना याद न रहा। आपकी टिप्पणियों और तारीफ़ का शुक्रिया। :)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>हम तो अनूप जी ब्लोगरी की दुनिया में बस आखें खोल रहे है, इस लिए हम तो  आप जैसे सब वरिष्तम ब्लोगरो को मिल नही जी देख कर अपने सितारों को सराह रहे हैं। इस पत्रिका के बारे में बम्बई में भी पता करेंगे और जरुर पढ़ेगे। वैसे सच है आप की लेखन शैली बहुत मोहक है।<br />
 मुझे अभी भी आप का ई-मेल पता नही मिल पाया है इस लिए इस बार भी यहीं आप का धन्यवाद कर रही हूँ। अपना ई-मेल पता देंगे तो मुझे अच्छा लगेगा।</p>
<p><strong>अनीताजी,</strong> मेरा ईमेल पता है <a href="mailto:anupkidak@gmail.com">anupkidak@gmail.com</a> अफ़सोस कि पहले भेजना याद न रहा। आपकी टिप्पणियों और तारीफ़ का शुक्रिया। <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: आलोक पुराणिक</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/352/comment-page-1#comment-16012</link>
		<dc:creator>आलोक पुराणिक</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 20 Oct 2007 11:08:35 +0000</pubDate>
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		<description>बेहतरीन,
आप लगता है कि फुरसत में कम हैं। वो वनलाइनर की परियोजना भी ठप सी हो गयी है। किसी लंबे गुंताड़ें में हैं क्या।
और ज्ञानजी की शिकायत भी सुन लीजिये, सबको धमका वमका दीजिये।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बेहतरीन,<br />
आप लगता है कि फुरसत में कम हैं। वो वनलाइनर की परियोजना भी ठप सी हो गयी है। किसी लंबे गुंताड़ें में हैं क्या।<br />
और ज्ञानजी की शिकायत भी सुन लीजिये, सबको धमका वमका दीजिये।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: Sanjeet Tripathi</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/352/comment-page-1#comment-16005</link>
		<dc:creator>Sanjeet Tripathi</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 20 Oct 2007 09:44:02 +0000</pubDate>
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		<description>बहुत ही बढ़िया!!!

आप ऐसे वादे न भूला करें तो ही बेहतर ताकि हमे ऐसा पढ़ने को मिलता रहे!!

दर-असल आपकी खालिस फ़ुरसतिया स्टाइल की पोस्ट हमें बहुत सी और भी बातों, जानकारियों से परिचित करा जाती है

प्रियंकर जी के पद्य से ज्यादा उनके गद्य का कायल हूं मै, 
शब्द और भाषा का जो बहाव वो बनाते चलते है बहुत कम देखने को मिलता है॥


वैसे ज्ञान दद्दा ने अपने कमेंट के आखिरी लाईन मे ब्रैकेट एक अंदर जो लिखा है मुझे आशा है कि आप को वो नही दिखाई देगा!!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत ही बढ़िया!!!</p>
<p>आप ऐसे वादे न भूला करें तो ही बेहतर ताकि हमे ऐसा पढ़ने को मिलता रहे!!</p>
<p>दर-असल आपकी खालिस फ़ुरसतिया स्टाइल की पोस्ट हमें बहुत सी और भी बातों, जानकारियों से परिचित करा जाती है</p>
<p>प्रियंकर जी के पद्य से ज्यादा उनके गद्य का कायल हूं मै,<br />
शब्द और भाषा का जो बहाव वो बनाते चलते है बहुत कम देखने को मिलता है॥</p>
<p>वैसे ज्ञान दद्दा ने अपने कमेंट के आखिरी लाईन मे ब्रैकेट एक अंदर जो लिखा है मुझे आशा है कि आप को वो नही दिखाई देगा!!</p>
]]></content:encoded>
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	<item>
		<title>By: संजय बेंगाणी</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/352/comment-page-1#comment-15996</link>
		<dc:creator>संजय बेंगाणी</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 20 Oct 2007 07:22:26 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://hindini.com/fursatiya/?p=352#comment-15996</guid>
		<description>अक्छी जानकारी मिली. कुछ कविताएं भी पढ़ने को मिली. साधूवाद.

&quot;महासागर में गोते लगाती नौजवानों की ‘एक्जीक्यूटिव क्लास’ मिलती है जो सेक्स को ब्रेड-आमलेट से ज्यादा कुछ नहीं समझती।&quot;

देश की आबादी को 30 से 100 करोड़ तक पहूँचाने में नौजवानों की इस ‘एक्जीक्यूटिव क्लास’ का क्या योगदान है बताया जाय :)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अक्छी जानकारी मिली. कुछ कविताएं भी पढ़ने को मिली. साधूवाद.</p>
<p>&#8220;महासागर में गोते लगाती नौजवानों की ‘एक्जीक्यूटिव क्लास’ मिलती है जो सेक्स को ब्रेड-आमलेट से ज्यादा कुछ नहीं समझती।&#8221;</p>
<p>देश की आबादी को 30 से 100 करोड़ तक पहूँचाने में नौजवानों की इस ‘एक्जीक्यूटिव क्लास’ का क्या योगदान है बताया जाय <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
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