प्रमोद तिवारी कविता सुनवाने के बाद मुझे लगा कि कुछ और कवितायें आपको सुनवायी जायें। इसी कड़ी में अगली कविता कानपुर के हमारे पसंदीदा गीतकारविनोद श्रीवास्तव की प्रसिद्ध कविता जैसे तुम सोच रहे साथी पेश कर रहा हूं। यह कविता विनोद जी ने कानपुर में दो साल पहले हुये उसी कवि सम्मेलन में सुनायी थी जिसमें मैंने प्रमोद तिवारी जी की कविता पहली बार सुनी थी।
विनोदजी की कविता सुनकर कविसम्मेलन की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ गीतकार सोमठाकुर इतना प्रभावित हुये कि उन्होंने विनोदजी की तारीफ़ करते हुये कहा-
मैं पिछले काफी समय से युवा पीढ़ी से निराश सा हो रहा था.कुछ नया ऐसा देखने में नहीं आ रहा था कि मैं आगे गीत के प्रति आश्वस्त हो सकूं.पर आज इस नौजवान गीतकार को सुनकर मुझे आश्वस्ति हुयी कि हिंदी गीत का भविष्य उज्जवल है।
सोमजी आगे बोले -
-मैं विनोद की कविता से अविभूत हूं।मैं ५२ वर्षों से आपके बीच हूं।वैसे तो कोई साधना नहीं है पर अगर कुछ है तो उसका फल इस नयी पीढी को लगे।मैं एक ही बात कहना चाहता हूं कि साधना करते हुये अपने स्वाभिमान की रक्षा करना और हमारी आबरू रखना यह माला जो आपने मुझे पहनायी उसको उतरन मैं इसके गले में नहीं पहना सकता ।पर अपनी यह माला मैं विनोद के चरणों में डालता हूं ।उसकी कविता को यह मेरा नमन है।
मैं उन विरल, ऐतिहासिक भावुक क्षणों का गवाह रहा इसलिये यह कविता मुझे बहुत पसंद है। खास कर अंतिम पंक्तियां-
आओ भी साथ चलें हम-तुम,मिल-जुल कर ढूंढें राह नई,
संघर्ष भरा पथ है तो क्या, है संग हमारे चाह नई।
यह कविता मैंने कई बार सुनी है। अपने कई मित्रों को मेल से भेजकर सुनवा भी चुका हूं। आज इसे पाडकास्ट कर रहा हूं। सुनिये और बताइये कैसी लगी।
जैसे तुम सोच रहे साथी
जैसे तुम सोच रहे साथी,वैसे आजाद नहीं हैं हम,
जैसे तुम सोच रहे साथी,वैसे आजाद नहीं हैं हम।पिंजरे जैसी इस दुनिया में, पंछी जैसा ही रहना है,
भर पेट मिले दाना-पानी,लेकिन मन ही मन दहना है।
जैसे तुम सोच रहे साथी, वैसे संवाद नहीं हैं हम,
जैसे तुम सोच रहे साथी, वैसे आजाद नहीं हैं हम।आगे बढ़नें की कोशिश में ,रिश्ते-नाते सब छूट गये,
तन को जितना गढ़ना चाहा,मन से उतना ही टूट गये।
जैसे तुम सोच रहे साथी,वैसे आबाद नहीं हैं हम,
जैसे तुम सोच रहे साथी,वैसे आजाद नहीं हैं हम।पलकों ने लौटाये सपने, आंखे बोली अब मत आना,
आना ही तो सच में आना,आकर फिर लौट नहीं जाना।
जितना तुम सोच रहे साथी,उतना बरबाद नहीं हैं हम,
जैसे तुम सोच रहे साथी,वैसे आजाद नहीं हैं हम।आओ भी साथ चलें हम-तुम,मिल-जुल कर ढूंढें राह नई,
संघर्ष भरा पथ है तो क्या, है संग हमारे चाह नई।
जैसी तुम सोच रहे साथी,वैसी फरियाद नहीं हैं हम,
जैसे तुम सोच रहे साथी,वैसे आजाद नहीं हैं हम।
संबंधित कड़ियां:
१.विनोद श्रीवास्तव का परिचय और कुछ कवितायें
२. इतने भी आजाद नहीं हैं हम साथी
३.कौन मुस्काया







कविता सुन्दर ही नहीं, अच्छी भी है। यह आर्थिक-सामाजिक बदलावों के बीच मानवता को जो आघात मिलते हैं और उन से हो रही भावनात्मक टूट के दर्द को पूरी शिद्दत के साथ अभिव्यक्त करती है। साथ-साथ एक आशावादी दृटि भी है जो इन सब अवश्यंभावी परिणामों के बीच एक नया भावनात्मक संसार रचने का साहस और आशा प्रकट करती है। ऐसी कविता को सस्वर पाठकों तक पंहुचाने के लिए अनूप बधाई के पात्र हैं।
पता नहीं; ये कवि महोदय इतने उत्साहित हैं, साथ चलने आगे बढ़ने को; जरूर नव शृजन करेंगे। अपना तो यह हाल है कि परछाई भी कभी कभी कहती है – तुम्हें जाना हो तो जाओ। मैं तो थकी हूं, आराम करने दो।
बहुत अच्छी लगी कविता। आपका नया प्रयोग बहुत जम रहा है।
अनूप जी कविता बहुत ही अच्छी है, एकदम दिल को छू गयी। कविता की तो खूबी ही यही है कि हर सुनने वाला अपने अपने अर्थ दे देता है, मुझे क्युं अच्छी लगी, विस्तार से बताउंगी अगली बार , पर आप इसी तरह अपने खजाने में से हीरों (कविसम्मेलन जो आप ने रिकॉरड कर रक्खे है, उनमें से कविताएं)की चमक हमें भी दिखाते रहें …॥आभार, अगली कविता का इंतजार
भई बहुत बढिया है जी।
आप मोबाइल घर क्यों छोड़ जाते हैं जी। मोबाइल को मोबाइल ही रहना चाहिए।
दिल को छू लेने वाली कविता है अनूपजी। विनोद जी का परिचय कराने के लिए धन्यवाद।
नया प्रयोग बहुत अच्छा है, आपके लेख आपकी आवाज में सुनाने का प्रयास करें।
दीपोत्सव के इस उल्लास में..
न जाने क्यों यह कविता पढ़ने का मन किया
सुराग लेते हुये आ ही गया यहाँ
पढ़ा, खूब डूब कर पढ़ा
अब इस कविता से उबर कर मन में एक हलचल मची है
GDP वाली नहीं, मेरी अपनी ओरिज़िनल ’हलचल’
मेरे भी तो मन है, तभी तो मैं हूँ !
पर मेरे ‘मैं’ का मन कहीं निराशावादी तो नहीं
यह संगीत में क्रंदन क्यों सुन रहा, इस बेला