एक खुशनुमा मुलाकात…


ब्लागर परिवार

कानपुरियों के साथ बस यही दिक्कत है , जहाँ कानपुरिये देखे बत्तीसी दिखा दी :lol: डा.टंडन

डा. प्रभात टंडन से लखनऊ में हुयी मुलाकात का विवरण देते हुये हमने लिखा था-
१.ये खुशनुमा पहलू भाभीजी थीं जो पानी और मिठाई लेकर उपस्थित हो गयीं। एक मामले में वे और खुशनुमा लगीं कि वे चिट्ठाजगत के चिट्ठों से ज्यादा जुड़ी नहीं हैं इसलिये हमसे वे उतनी आतंकित नहीं दिखीं जितने टंडनजी। :)

२.कुछ देर में हमारा और उनका मायका, गली, मोहल्ला सब एक एक हो गया। हम डा. टंडन को किनारे करके अपने बचपन की गलियों और मकानों की शिनाख्त करने में जुट गये।

३.डा. टंडन घर में घरेलू पति की तरह दिखे। बाअदब, बामुलाहिजा। आवाज धीमी-धीमी जिसे हम संयत कह रहे हैं। शांति का प्रतीक कुर्ता-पायजामा धारण किये।

दो दिन पहले जब डा. टंडन कानपुर मेरे घर मिलने आये तो हमने पाया कि इन बातों में कुछ नहीं बदला था सिवाय इस बात के कि उनके कुर्ता रंगीन हो गया था और साथ में हमारे अमिताभ बच्चन की जगह उनके सुपुत्र थे। जगह लखनऊ की जगह कानपुर हो गयी थी।

टंडनजी का फोन सुबह आया दिवाली के अगले दिन। आने की सूचना। उसी दिन सबेरे लखनऊ से चले थे। सुबह अपने कानपुर के ब्लागर दोस्त से मिलते हुये हमारे घर की तरफ़ आये। मुझे इससे पहले पता ही न था कि डा. देशबन्धु बाजपेयीजी कानपुर के ब्लागर हैं और आयुर्वेद की जानकारी देते हुये चिट्ठाकारी करते हैं।

डा.बाजपेयी से मिलने के बाद वे हमारे घर आने के पहले बिठूर होते हुये आये। नानाजी पेशवा का किला बन्द होने के कारण देख न पाये। कानपुर में होने के कारण डा.टंडनकी स्पीड बढ़ गयी थी। मेरे घर आने के पहले पनकी मन्दिर चले गये। वहां सलामी ठोंक कर वापस हमारे घर आये।

घर पहुंच कर बच्चे तो कम्प्यूटर मे जुट गये। हम लोग बतियाने में। परिवार वाले ऐसे बतिया रहे थे जैसे बहुत पहले से जानते -पहचानते हैं।

डा. टंडन ने समय की कमी और ब्लाग की बढ़ती संख्या की बात करते हुये बताया कि अक्सर पढ़ना छूट जाता है। मुझे भी यही समस्या होने लगी है। मुझे उनसे ही पता चला कि जीतेंन्द्र ने ब्लागिंग से जुड़े कुछ कार्टून पोस्ट किये हैं। बात जीतेंन्द्र, समीरलाल, अनुराग श्रीवास्तव और तमाम दूसरे ब्लागरों के बारे में हुयीं।हमारी तरह डा. टंडन भी निधि के लेखन के मुरीद हैं। आजकल निधि का लिखना बंद सा है।

हम और डा.टंडन आपस में न जाने कौन-कौन सी चोंचे लड़ाते रहे। उधर हमारी श्रीमतीजी डा.अनिका से गपियाने लगीं। बाद में हमें उनसे ही पता चला कि हमारी और टंडन दम्पति की शादी एक ही वर्ष १९८९ में हुयी।

डा. टंडन ने इस बीच अपना कैमरा बदल दिया था। पिछली बार लखनऊ में उन्होंने जो फोटो खींचे थे वे फिर दिखे नहीं। कैमरे की भेंट चढ़ गये। इस बार के फोटो अभी उनके कैमरे से देखना है।

करीब दो घंटे बतियाने के बाद वे लोग आगे चले गये। दीवाली के बाद का दिन ‘परेवा’ इनकेलिये एक मात्र छुट्टी का दिन होता है। बाकी दिन क्लीनिक खुला रहता है।

डा.अनिका लखनऊ में हमारी भाभी थी। लेकिन कानपुर में हम उनके मायके वाले हो गये।मायके में होने के कारण वे लखनऊ के मुकाबले अधिक खिली-खिली लग रहीं थी। विदाई में घर में उगाई गयी हल्दी भेंट की गयी। विदाई में बहनों को यही तो दिया जाता है। हल्दी ,कुंकुम। ब्लागिंग में भी रिश्ते बन जाते हैं। :)

इसके पहले डा.टंडन ने हमारी श्रीमती जी को उनकी स्किन एलर्जी के लिये कुछ दवाइयां लिखीं। अब उनका परीक्षण हो रहा है। छुट्टी के दिन भी उनकी दुकान चलती रही।

दीवाली के बाद की यह एक खुशनुमा यादगार मुलाकात रही। लखनऊ में होने के कारण ऐसे मौके और आते रहेंगे।

एक बात जो दोनों ब्लागर पत्नियों में दिखी वह यह कि दोनों ब्लागिंग को फ़ालतू काम मानती हैं। लेकिन यह सुखद है कि वे गांधीजी के रास्ते पर चलते हुये (पाप को घृणा करो पापी को नहीं) ब्लागर को उतना फ़ालतू नहीं मानतीं। :)

यह कम सुकूनदेह बात नहीं है भाई! :) :)
ये भी देखें:
1.डा. टंडन के दौलतखाने में फुर्सत के साथ पानी के बताशे

2.चन्द लम्हों की ब्लागरिया मुलाकात


डा.टंडन दम्पति

हम ब्लागर हैं भाई

बच्चे कम्प्यूटर पर

पुतुल,सुमन,सात्विक और अनन्य

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

15 responses to “एक खुशनुमा मुलाकात…”

  1. अभय तिवारी

    बहुत खूब..

  2. मीनाक्षी

    “ब्लागिंग में भी रिश्ते बन जाते हैं। ” जी हाँ , इस बात में कोई दो राय नहीं..

    आपकी खुशनुमा मुलाकात पढ़कर अच्छा लगा , ऐसे पल एक – दूसरे से बाँटने से करीब होने का एहसास होता है.

  3. प्रमेन्‍द्र प्रताप सिंह

    मिलन हुआ जान कर अच्‍छा लगा, लेख बाद में पढूँगा :)

  4. anita kumar

    जब हम ब्लोगरस पोस्ट से रोज बतियागें, कुछ न कुछ तो आत्मियता हो ही जाएगी, उतने पराए न लगेगें। आप की इस पोस्ट से और ऐसे ही अन्य ब्लोग्रस की भी पोस्ट से हम एक दूसरे के परिवार और घर बार देख लेते है तो रिश्ते तो बन ही जाते हैं। बहुत अच्छा करते है हमें ऐसे मिलने मिलाने के बारे में बता कर

  5. ज्ञानदत पाण्डेय

    मजे हैं आपके बन्धु, आयुर्वेदाचार्य, होम्योपैथ, और न जाने कौन किसम के डॉक्टर ब्लॉग-परिवारबन्द किये बैठे हैं आप। अब डाक्टर टण्डन हमको भी फ्रीफण्ड में कुछ दवाइयाँ बतायें तो बात बने! :-)

  6. आलोक पुराणिक

    सफेद कुरते में तो आप घणे बुद्धिजीवी लगते हैं जी।

  7. चौपटस्वामी

    हमेशा की तरह आत्मीय और सरस लेखन का उत्कृष्ट उदाहरण . हुज़ूर! हम भी उन्नीस सौ नवासी में ही बाजे-गाजे के साथ वीरगति को प्राप्त हुए थे .

  8. जीतू

    गुड है जी, सटीक जुमले लगे:
    ’हम डा. टंडन को किनारे करके अपने बचपन की गलियों और मकानों की शिनाख्त करने में जुट गये।’
    ’पाप से घृणा करो, पापी से नही’ और
    वे चिट्ठाजगत के चिट्ठों से ज्यादा जुड़ी नहीं हैं इसलिये हमसे वे उतनी आतंकित नहीं दिखीं जितने टंडनजी। ’

    बकिया मेल मुलाकात जारी रहनी चाहिए।

  9. पुनीत ओमर

    भइया कनपुरिये तो हम भी हैं

  10. डा प्रभात टन्डन

    …एक यादगार लम्हें… जल्द ही फ़ुर्सत मे बैठ कर फ़ुरसतिया पर एक पोस्ट लिखेगें ।

    एक बात जो दोनों ब्लागर पत्नियों में दिखी वह यह कि दोनों ब्लागिंग को फ़ालतू काम मानती हैं। लेकिन यह सुखद है कि वे गांधीजी के रास्ते पर चलते हुये (पाप को घृणा करो पापी को नहीं) ब्लागर को उतना फ़ालतू नहीं मानतीं। :)

    अब जल्दी से बाकी ब्लागर की भी राय लेकर एक पोल सर्वेक्षण करवा लें :)

  11. Sanjeet Tripathi

    बढ़िया!!!
    दुबारा हुई मुलाकात अक्सर अंतरंगता बढ़ाती है!!

  12. नितिन

    ” शांति का प्रतीक कुर्ता-पायजामा धारण किये।” बढिया!

  13. प्रमेन्‍द्र प्रताप सिंह

    अब पढ़ लिया है, काफी अच्‍छा लगा।

    अच्‍छे डाक्‍टर साहब है, हम दवा लेगे वो भी फ्री में :)

  14. अनुराग

    सुकुल जी, ज़रा अपने चिट्ठे की पूरी फीड उपलब्ध कराइए।

  15. फुरसतिया » ब्लागिंग के साइड इफ़ेक्ट…

    [...] ब्लागिंग का सबसे बड़ा साइड इफ़ेक्ट यह हुआ कि तमाम लोगों को नये-नये मित्र मिले। उम्र के उस दौर में जब लोग मित्र बनाने के मामले में धीमें हो जाते हैं और सोचते हैं पुराने ही निभते रहें वही बहुत है। यह मित्र संबंध परिवारों तक भी जुड़े। पिछले सप्ताह टंडनजी सपरिवार हमारे यहां आये तो ऐसा लगा ही नहीं कि हम लोग पहली बार मिल रहे हैं। इसके अलावा तमाम बिछुड़े हुये दोस्त और जानपहचान वाले इस माध्यम के चलते फिर से मिले। यह ब्लागिंग के माध्यम से बने संबंध ही हैं जिनके चलते हम आशीष के साथरचना बजाज के परिवार से मिलने के लिये पूना से नासिक गये और जिंदगी में पहली बार मुलाकात करने वाले ब्लाग-वीरों ने जबरियन हमसे बर्थडे-केक कटवा दिया। जिन्दगी में पहली बार। [...]

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