वो तुम्हारे जैसा ही था-दुबला ,पतला.भयंकर जाडे़ में भी हाफ स्वेटर पहन के आता संगीत टाकीज के पास से पैदल.किताबें यहां लाइब्रेरी से मिलीं थीं.घर में कोई पढा़ने वाला नहीं .पिता गरीब थे.वह छोटे बच्चों को ट्यूशन पढा़ता था खर्चे का जुगाड़ करने के लिये.रात को पढने बैठता सबेरे तक पढ़ता.कभी समय बरबाद नहीं करता था…
गुरुजी जब यह वर्णन कर रहे होते तो हमारी निगाहें उनके दिव्य प्रकाश बिखेरते चेहरे से चिपक जाती तथा हम ‘उस लड़के’ से धीरे-धीरे,अनायास जुड़ते चले जाते.हमारी उत्सुकता ‘आगे क्या हुआ’जानने के लिये बढ़ती जाती.जब हमारी उत्सुकता चरम पर पहुंचती तो गुरुजी बहुत धीमी आवाज में लगभग झटके से कहते:- और… वो टाप कर गया.आज वो अमेरिका की (फलानी)यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर है.
गुरुजी जब यह बता रहे होते तो उनकी वाणी में न जाने कहां का सम्मोहन आ जाता कि हम मुंह बाये उनकी बात सुनते रहते.जिस लड़के के बारे में वह बता रहे होते थी वह आशुतोष,दीपक,सुधाकर,सियाराम या और कोई भी हो सकता था.अमेरिका में प्रोफेसर की जगह वह कहीं चीफ सेक्रेटरी,चीफ इंजीनियर या अन्य किसी जगह पर हो सकता था जो दुनिया के लिहाज से सफल माना जाता था उन दिनों.
जब गुरुजी ‘उस लड़के’ के बारे में बता चुकते तो हम सबको मुस्कराते हुये देखते गोया चुनौती दे रहे हों कि ‘उसने’ इतना कर लिया तुम कर सकते हो ऐसा? सच तो यह है कि हमें लगता कि वे हमसे कह रहे हैं कि जब वह कर सकता है तो तुम क्यों नहीं कर सकते?तुम भी कर सकते हो.तुम्हारे अंदर क्षमता है करने की .बस जरूरत है मेहनत तथा लगन की.हम उत्साह से लबालब भर जाते. हमें लगता दुनिया में क्या ऐसा है जो हम कर नहीं सकते.हम भले हनुमान न बन पाये लेकिन गुरुजी हम जैसे हजारों बच्चों के लिये जामवन्त बनने के सदैव तत्पर रहे.
कानपुर में जो लोग पढे़ हैं वे जानते होंगे कि आज से पचीस-तीस साल पहले बी.एन.एस.डी.इंटर कालेज का एफ.वन.सेक्सन मशहूर था.जिन बच्चों के हाईस्कूल में ७५% नंबर आते उन्हीं को उसमें दाखिला मिलता.लड़के अच्छे रहते तो परिणाम भी अच्छा होना लाजिमी था.लगभग सारे लड़के इंटरमीडियट करने के एकाध साल में कहीं न कहीं किसी न किसी प्रोफेशनल कालेज में चले जाते.आज भी मैं याद करता हूं तो पाता हूं कि जितने अच्छे अध्यापक मुझे उन दो वर्षों में मिले उतने अच्छे सब मिला कर भी न बाद में मिले न पहले.हमारे गुरुजी ,यानि एस.के.बाजपेयी यानि सुशील कुमार बाजपेयी जिन्हें हम ‘बाजपेयी सर’ कहते थे ,उनमें से एक थे.
गुरुजी हमें अंग्रेजी पढा़ते थे.उन दिनों कम्पटीशन का दौर शुरु हो चुका था.बच्चे पी.सी.एम.(फिजिक्स,केमेस्ट्री,मैथ्स)के अलावा बाकी विषय केवल पास होने के लिये पढ़ना चाहते.लेकिन हमारे हिंदी के अध्यापक के पढा़ने के अंदाज तथा हमारे गुरुजी के सम्मोहन से बचना बहुत मुश्किल काम था.गुरुजी छात्रों को पढा़ने के साथ-साथ यू.पी.बोर्ड में टाप करने के किस्से सुनाते रहते.सब बच्चे सोचते यह हमारे लिये ही कहा जा रहा है.कच्ची उमर के बच्चे संभावित सफलता के नशे में सनसनाने लगते.हम भी इस सनसनाहट का शिकार हुये.
दिसम्बर का महीना खतम होने वाला था.मार्च से यू.पी.बोर्ड की परीक्षायें शुरु होने वालीं थीं.हम सोच रहे थे कि अंग्रेजी में पास होने में बहुत मेहनत करनी पडे़गी.अंग्रेजी इंटर में काफी कठिन होती थी उन दिनों .हमारे लिये तो और बवाल जिसने ए.बी.सी.डी. कक्षा ६ में सीखी थी.एक दिन बाजपेयी सर ने हम कुछ बच्चों को बुलाया.बोले-तुम लोगों के पी.सी.एम.में अच्छे नम्बर आते है.अंग्रेजी में सुधार हो सकता है .मेरे पास आया करो .मैं तुम लोगों को लिखने के लिये दूंगा .तुम लोग लिखकर लाया करो . मैं जांच दिया करूंगा.एक महीने में तुम लोग अच्छा करने लगोगे.
शुरुआत हो गयी.गुरुजी बताते ,हम लिखते.वो जांचते.दुबारा,तिबारा लिखके लाते.कभी-कभी देखते के हम निराश तो नहीं हो रहे हैं बार-बार लिख के लाने से.उनकी मुस्कान हमारी सारी थकान हर लेती.उत्साहित करने वाले उदाहरण सुनाते तो लगता कि टाप करना इतना सरल है कि जैसे हमें इतना तो करना ही है.होते-होते दो माह में इतना आत्मविश्वास से लबालब भर गये कि लगता कि बस समय की बात है.मेरिट में नाम तो आना ही है.
इस बीच गुरुजी ने बताया कि कैसे तैयारी की जाये.कैसे पेपर हल लिये जायें.कैसे आत्मपरीक्षण किये जायें.होने यह लगा कि हम रोज नियम से घडी़ देखकर हर विषय के पूरे तीन घंटे बैठ के पर्चा हल करते.खुद कापी जांचते और जैसे नंबर आते वैसी पोजीशन अपने लिये तय कर लेते.कम नंबर आने पर लगता फेल हो गये.
हममें से कोई भी लड़का ट्यूशन नहीं पढ़्ता था .सो प्रैक्टिकल में नंबर कम न हो जायें उसके लिये गुरुजी ने साइंस के अध्यापकों से कहा. जो कुछ उनसे बन पढ़ता था वो हमारे लिये करते थे- निस्वार्थ.हमारा आत्मविश्वास तथा तैयारी अंगरेजी में उन्होंने ऐसी करा दी कि हमने अंगरेजी के पेपर वाले दिन कुछ नहीं पढा़.
यह संयोग रहा कि उनके विश्वास की रक्षा हुई.जिन बच्चों को वे पढा़ते थे उनमें से तीन की पहली दस में पोजीशन आयी.मुझे अभी भी याद है कि जब रिजल्ट निकला तो मैं लगभग भागते हुये उनके घर पहुंचा.सारे जीने उछलते हुये चढ़ गया .उन्होनें देखते ही मुझे सीने से चिपटा लिया.बहुत देर बाद वही सम्मोहनी मुस्कान बिखेरते हुयी बोले-देखो मैं कहता था न कि तुम लोग कर लोगे.हो गया न!
हम लोग चले गये पढ़ने आगे.गुरुजी के ‘उन’ लड़कों में मुनीश, सुनील, अनूप के नाम भी जुड़ गये थे.
गुरुजी हम लोगों को अपना मानस पुत्र मानते थे.हमारे जैसे सैकडो़ मानस-पुत्र थे उनके.लेकिन उन जैसा मानस पिता हमने दूसरा नहीं पाया.
आज जब मैं सोचता हूं तो पाता हूं आज मैं जो भी हूं जितना भी धनात्मक है मेरे अन्दर उसका बहुत हद तक श्रेय हमारे गुरुजी को है.मेहनत और लगन पर अगाध विश्वास है मुझे. किसी भी किसिम की कुंठा, हीनभावना, असुरक्षा के अहसास से मैं (अपनी समझ में) मुक्त रहता हूं तो उसके पीछे हमारे गुरुजी द्वारा भरे आत्मविश्वास का हाथ है.
मैंने तमाम चीजें सीखीं उनसे उन कुछ महीनों में तथा बाद के कई सालों में .वे किसी को जब कुछ बताते थे तो उसे यह अहसास कभी नहीं होने देते थे कि उसमें कोई कमी है.कहते थे -तुमको आता है,कर लोगो.कमतरी का अहसास कभी नहीं कराते थे किसी को.कभी नहीं कहते थे कि मैने पढा़या तो वो ऐसा हो गया.हमेशा श्रेय छात्रोंको ही देते रहे.मानते थे- बच्चे तो हीरे हैं .हमें तो बस जरा सा पालिस करनी है.
उनकी सिखाई गयी अग्रेजी के कसौटी पर मैं सैकडों अंग्रेजीदां लोगों को फेल कर चुका हूं.though/although के बाद बहुतों धाकड़ लोगों को मैं but लगाते पकड़ चुका हूं.बहुत से कन्वेंटियों को can और not अलग-अलग लिखते पाया है.
मेरे बाद के जीवन पर भी मेरे गुरुजी का बहुत प्रभाव रहा.अपनी शादी के निर्णय के बारे में जब मैंने बताया तो गुरुजी ने तुरंत कहा -यस,कर लो.सब ठीक हो जायेगा.
बाद में सब ठीक ही हुआ.
गुरुजी मु्झे ताजिन्दगी बच्चा ही मानते रहे.सारी बातें ‘शेयर’करने के बाद अचानक उनको लगता कि देर हो गयी तो झटके से कहते-रात हो गयी है .संभाल के जाना. स्कूटर धीरे चलाना.अचानक मैं बराबरी के स्तर से बच्चे के स्तर पर आ जाता .
अंतिम बार जब मैनें देखा था तब वो अस्पताल में थे.सांस की तकलीफ थी.देखा तो खुश हो गये.बोले-तुमको देखकर बहुत खुशी हुई.ठीक हो रहा हूं.जल्दी ही ठीक हो जाऊंगा.बहू कैसी है?बच्चों की पढा़ई कैसी चल रही है? अचानक बोले -अच्छा तुम जाओ .रात हो रही है.धीरे-धीरे जाना.
मैं चला आया .कुछ दिन बाद वे चले गये.मैं उनको अंतिम समय देख नहीं पाया.अच्छा ही रहा.मैं जब भी उनके बारे में याद करता हूं तो मेरे सामने उनका रोशनी की मीनार सा चमकता चेहरा ही दिखता है.अभी भी मुझे लगता है कि कहीं दिख जायेंगे और कहेंगे-तुम यह कर सकते हो.
जब मैं पूछिये फुरसतिया से के जवाब निरंतर के लिये लिखता था तोजीतेन्दर ने सवाल पूछा था – अगर आपके पास ‘टाइम मशीन’ होती तो किस घटना को होने से रोकते ? अगर व्यक्तिगत जीवन की बात कहूं तथा अगर संभव हो तो आज भी अपने गुरुजी के साथ होना चाहता.अगर एक घटना रोक सकता तो मैं उनकी अनुपस्थिति को रोकता.
मैंने दुनिया में बहुतों को खोया,मरते देखा .कभी बहुत दिनों तक उनकी याद ने सताया भले हो लेकिन मैं भावुक कभी नहीं हुआ.लेकिन बाजपेयीजी के साथ की यादें तथा उनकी अनुपस्थिति का अहसास मुझे हमेशा भावुक कर देता है.आज इस समय अगर मुझसे कोई पूछे कि मेरे लिये सबसे कठिन काम क्या है तो वह् होगा इस लिखे हुये को बोलकर पढना.मैं शायद न पढ़ पाऊं पूरा बोलकर.
कभी-कभी टीस सी उठती है कि मैं उन गुरुजी के लिये कुछ कर न सका जिंन्होंने मेरे जीवन निर्धारण में मुख्य भूमिका निभाई.यह ‘गुरुऋण रहा सोच बड़ जी के’ का भाव ज्यादा देर तक ठहर नहीं पाता.मुझे लगता है कि गुरुऋण से उऋण हुआ ही नहीं जा सकता है.गुरु-शिष्य संबंध वो नान-रिटर्न वाल्व है जिससे पानी केवल एक ही तरफ बह सकता है.शिष्य केवल यह कर सकता है कि वह अपनी पात्रता को साबित करता रहे.
यह मेरा व्यक्तिगत पहलू है.इसे बेहतर शायद वे लोग महसूस कर सकें जो ऐसे किसी प्रेरक का सानिध्य लाभ उठाया है.याद तो मैं अक्सर करता हूं अपने गुरुजी को लेकिन आज जब मेरा छोटा बच्चा अपनी टीचर्स को शिक्षक दिवस(५ सितम्बर) पर देने के लिये ग्रीटिंग तैयार कर रहा था तो मेरी यादों में अचानक मेरे गुरुजीमुस्कराने लगे जिनको मैंने आज तक कुछ नहीं दिया और अब न दे पाने की स्थिति में हूं -सिवाय उनको विनम्रतापूर्वक याद करके उनकी नजदीकी का अहसास पाने के,जो कि सदैव मुझे ताकत देती रही है.
लोग कह सकते हैं कि आज ऐसे गुरु कहां मिलते हैं? मैं विनम्रता पूर्वक इससे असहमत होना चाहता हूं.आज भी सैकडों-हजारों गुरु होंगे जो अपने लाखों मानस-पुत्रों के चेहरों पर निगाह गडा़ये सम्मोहनी मुस्कराहट बिखेरते हुये कह रहे होंगे-तुम्हारे जैसा ही लड़का था जिसने ये किया था तुम भी यह कर सकते हो.







बहुत अच्छा लिखे हो गुरु, बहुत अच्छे.दरअसल आपकी पोस्ट को पढकर ही मैने अपना टीचर्स डे वाला ब्लाग लिखा.
लेकिन एक बात समझ मे नही आयी,तुम्हारी इतनी अच्छी पोस्ट पर ये टिप्प्णियों का टोटा कैसे हो गया? क्या लोगों को समझ मे नही आया या लिखने का टाइम ही नही है.
लेकिन भई, हम तो बस यही कहेंगे, लिखते रहो……. हम तो हैये ही पढने और दाद देने वाले.
आनंद आ गया बाजपेयी जी जैसे गुरु जी की कहानी सुनकर. यह बात सच है कि ऐसे गुरुओं की आज भी कमी नहीं होगी. जरूरत है हनुमानों की.
इनके बारे में तुम पहले भी ‘बचपन के मेरे मीत’ में लिख चुके हो. असली आनंद तो दर्शन करके ही आता, मगर…
bahut bhadiya likhe rahe guru. Tumhare Bajpayee ji jaise guru ke baare main sun ki hi maan prasaan ho gaya. Kaash hamein bhi aise guru milte, hamare convent school main to baas tuition ki judadment main lagi rehti teacher junta. Hume to capitalism aur family ke combined force ne hi inspire kiya.
[...] दिवस पर गुरुजनों को याद कर रहे हैं फुरसतिया तथा जीतेन्द्र ,जिनके ब्लागमेरा [...]
फुरसतिया जी,
बहुत ही बढ़िया हृदयस्पर्शी संस्मरण है। पढ़ के बहुत सी पुरानी यादें याद आगयीं। मैं भी बी एन एस डी का पढ़ा हूँ, आपसे कुछ सालों पूर्व। एक गणित के शिक्षक थे, नाम था शिव नारायण दास लेकिन सभी लोग उन्हें गांधी जी कहते थे। खद्दर का कुर्ता धोती पहनते थे और उनका सारा जीवन विद्यार्थियों पर समर्पित था। ९वें का सर्वोत्तम सेक्शन एफ था और दसवें का था सी। मेरा परिचय गांधी जी से नवीं और दसवीं के बीच की गर्मियों में हुआ जब मुझे दसवीं के सेक्शन सी में डाला गया। उस गर्मी के हर रविवार को गांधी जी दो घंटे की extra class लेते थे। उस क्लास में उन्होंने हमें गणित के अलावा बहुत कुछ पढ़ाया, पाणिनि के सूत्र, Mrs. Annie Beasant की पुस्तकें, पौराणिक कथायें। दसवीं कक्षा में रोज़ गणित की एक extra class होती थी। अगर कोई लड़का गलती करता था तो गांधी जी अपने गालों पर चाँटे मारते थे। अगर वे हमें चाँटे मारते तो शायद इतनी चोट न लगती हमें। गांधी जी के class में हम लोगों को शिक्षा दी गयी थी कि एक दूसरे को जी कह के बुलाओ जैसे अशोक जी। नवें में करीब करीब गणित में फेल हो रहा था। हिन्दी और अंग्रेज़ी में मेरे अच्छे नम्बर थे जिनकी वज़ह से मुझे दसवीं के सी सेक्शन में डाला गया था। गांधी जी से गणित पढ़ने के बाद मेरी गणित में रुचि बढ़ी और अन्ततः मैंने गणित में पी एच डी की। गांधी जी जैसा समर्पित शिक्षक मैंने आज तक नहीं देखा न भारत में, न अमेरिका में।
लक्ष्मीनारायण
गुरू गोविन्द दोउ खडे, काके लागु पाय
बलीहारी गुरू आपनी, गोविंद दियो बताय
आशिष
बी एन एस डी की याद दिला दी गुरुदेव। एफ़ वन में तो मैं भी था लेकिन मज़ा नहीं आता था क्योंकि लड़के बहुत पढ़ाकू थे। हमको भी अंग्रेज़ी सिखाने वाले थे श्री जे पी श्रीवास्तव जिनकी सिखायी हुई अंग्रेज़ी के बूते पर हमने कान्वेंट वालों के छक्के छुड़ा दिये हैं। आदरणीय शिक्षकों को हमारा भी नमन।
[...] कहे बिना सिर्फ यही कहूँगा कि चाहे गुरू महिमा हो या चाहे मेढक कथा , जिस दिन ब् [...]
[...] ूमने,आवारागर्दी करने? लेकिन हमारेगुरुजी फिर हमारे लिये सहायक सिद्ध हुये। ह [...]
[...] om/fursatiya/?p=42″ rel=”bookmark” title=”Permanent Link: “> मेरे लेख सदगुरु की महिमा अनत पर आश [...]
[...] हमारे जीवन को दिशा देने वाले सबसे महत्वपूर्ण योगदान हमारे गुरूजी बाजपेयी जी का रहा है। लेकिन हमारे जीवन में पढ़ाई के शुरुआती संस्कार डाले हमारे पंडितजी ने। पंडित श्याम किशोर अवस्थी जी ने। जिनको हम अवस्थी पंडितजी कहते थे। [...]
Mujhey achchi hindi aati hai, par hindi support enabled nahin hai system mein, kabhi padhiye “tuesday’s with Morrie”, aise hi ek adhyapak ke baarey mein.
[...] पसंदीदा पोस्ट: वैसे तो अपनी कई पोस्टें मुझे पसंद हैं। स्वामीजी तो कहते हैं कि मैंने ये पीला वासंतिया चांद से अच्छी कोई पोस्ट अभी तक नहीं लिखी। लेकिन मुझे इसके अलावा अपने गुरुजी के ऊपर लिखा संस्मरण सतगुरु की महिमा अनत सबसे ज्यादा अच्छा लगता है। मैं उसे पढ़ने की बात तो छोडि़ये उसको याद करने मात्र से भावुक हो जाता हूं। [...]
[...] मुझे आज फिर अपने गुरूजी याद आये। जो हमसे अक्सर कहा करते थे- तुम भी यह कर सकते हो। [...]
अनूप जी आप की ये पोस्ट पढ़ कर आखें नम हो आयी हैं , हम सब जो किसी न किसी मुकाम पर पहुंचे हैं किसी न किसी ऐसे ही टीचर की बदौलत ही पहुंचे हैं। टीचर होने के नाते आप की पोस्ट से और जुड़ सी गयी। आशा करती हूँ कि कल कोई छात्र हमसे भी इसी तरह संतुष्ट हो। वैसे बाजपेयी जी की बराबरी करना मुश्किल है। मेरा उनको शत शत प्रणाम
बहुत भावुक पोस्ट,ऐसा लग रहा है जैसे मेरा बडा भाई सब कुछ कह रहा है वो भी कनवेन्टियो की जब देखो तब नौबत लगाए रहता है अपनी तो हालत ऐसी है कि नौबत आ जाती है तो मरते जीते बात कर लेती हूँ और मरते खपते बच्चों की स्कल नोटिस लिख लेती हूँ , पर खुश हूँ ऐसे ऐसे भाई जो हैं मेरे , हालांकि मै पहले ही आप को पढते पढते जान गई थी कि आप बडे गुनियाँ हैं ,इस पोस्ट ने पुख्ता किया ।बेटा सो गया है कल उसे पढाऊगी ,आप की पोस्ट…….
At my time, Bajpai used to teach in the morning section so I did not have him as a teacher. But, I knew him a little bit because his son Yogesh was my classmate during my BNSD days. I have lost touch with him. Maybe one of these Yogesh is going to join this group.
This article takes me back to 1985-86 when I joined F1 section in BNSD. Still it looks like yesterday with committed teachers like Shri Bajpai ji. Also, I feel sorry of our next generation who are a deprived lot as we don’t have any teacher who has only student’s interest in thier hearts. Everyhting is commercial and priced….Where we are going to find teacher like Bajpaiji….
यह संयोग रहा कि उनके विश्वास की रक्षा हुई.जिन बच्चों को वे पढा़ते थे उनमें से तीन की पहली दस में पोजीशन आयी.मुझे अभी भी याद है कि जब रिजल्ट निकला तो मैं लगभग भागते हुये उनके घर पहुंचा.सारे जीने उछलते हुये चढ़ गया .उन्होनें देखते ही मुझे सीने से चिपटा लिया.बहुत देर बाद वही सम्मोहनी मुस्कान बिखेरते हुयी बोले-देखो मैं कहता था न कि तुम लोग कर लोगे.हो गया न!
” great, kee aap logon ne apne guru je ka confidece nahe todaa verna hume to umeed kum he thee ha ha ha ha ”
Regards
कारुणिक, किन्तु अत्यन्त ‘मोटिवेशन’ से संयुत हो कर लिखी गई यह श्रद्धांजलि है; जिसका सूत्रवाक्य
“शिष्य केवल यह कर सकता है कि वह अपनी पात्रता को साबित करता रहे” आपने लिख दिया है।
हमारे यहाँ भारतीय दर्शन में कहा गया है कि पिता व गुरु की जीत/सफलता की कसौटी होती है – “पुत्रात् शिष्यात् पराभवम्” अर्थात् गुरु और पिता उस दिन गौरवान्वित होते हैं जिस दिन उनकी सन्तान और शिष्य उन्हें पछाड़ कर आगे निकल जाते हैं।
ऐसे गुरु बड़े बड़भाग से मिलते हैं। आप सच में इन मायनों में भाग्यशाली हैं और आपने अपनी विनम्रता से गुरु जी के यश को यह जो प्रसार दिया है, उसके लिए उनकी आत्मा आपको असीसती होगी।
उन्हें व उन जैसे प्रत्येक गुरु के लिए मेरा भी विनम्र प्रणाम!
[...] तो सबको है,जी के भी देख लें 2. सतगुरु की महिमा अनत 3.मेढक ने पानी में कूदा,छ्पाऽऽऽक [...]
[...] पर बहस तो शिक्षाविद करेंगे। हम तो अपने गुरुजी को याद करते हुये कुछ उलटी-पुलटी [...]
आपने बहुत अच्छा संस्मरण लिखा है अनूप जी, आज भी ऐसे गुरु हैं और कई जगह हैं. हमारे कॉलेज के टीचर्स ने हमारे बैच में एक एकदम नया सोचने का नजरिया और दिशा दी…हमारे जैसे कई लोग वहां से पढ़ के निकले और अच्छी अच्छी जगहों पर पहुंचे. आज भी टीचर्स डे पर उनसे बात जरूर करती हूँ.
और गुरु ऋण से मुक्त होना संभव नहीं है.
एक बेहद अच्छी पोस्ट के लिए धन्यवाद.
आपके गुरु जी कि बात पढ़ कर मुझे अपने पिता जी याद आ गए…उनके भी ना जाने कितने मानस पुत्र हैं….दुनिया के कोने कोने में …और आज भी जब भी येशिष्य मिलते हैं चरणों में लोट ही जाते हैं…घर से बाहर निकलते ही हज़ारों हाथ अभिवादन को जुड़ ही जाते हैं….सचमुच …शीश दिए जो गुरु मिले तब भी सस्ता जान…
बहुत ही अच्छा लिखा है आपने…
आभार..
it’s nice