फ़ुरसतिया लफ़ड़ा भी भला, जो थोरे दिन होय,
भले -बुरे की समझ हो, उठा-पटक भी होय।
इस चिट्ठा संसार में, भांति-भांति के लोग,
कुछ तो चिरकुट लोग हैं, कुछ बहुतै चिरकुट लोग।
बूढ़न को गरियाइये, बनिये बड़का मर्द,
जो कोई रोकन चले, चटा दीजिये गर्द।
ऐसी बानी बोलिये, मन का संयम खोय,
औरन को नंगा करे, आपहुं नंगा होय।
गोधन,गजधन, बाजिधन और रतनधन खान,
जब आवै सनसनी धन, सब धन धूरि समान।
बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे ब्लागिंग वीर,
लिखने की फ़ुरसत नहीं, टिप्पण में मजबूर।
रहिमन सिलसिला ब्लाग का मत तोरो झटकाय,
टुटे से फ़िर न जुड़े, जुड़े तो गांठ परि जाय।
ब्लागिंग करि-करि जुग गया, गया न मन का फ़ेर,
टिप्पण को हेरत फिरत, इधर-उधर सब ऒर।
ब्लाग पढ़त, सर्फ़िंग करत, इधर-उधर बतियात,
मित्र दिखे, भड़कन लगे, काहे नहिं टिपियात।
होली आती देख के, शिवकुमार भये मस्त,
दुइ-दुइ कर निपटा रहे, स्पीड बहुत है सुस्त।
लरकी छिरती देखकर , अजदक गये भन्नाय,
पहन बूट , धोती नई, गये सिनेमा धाय ।
ब्लाग सखी ने झट से गहा ब्लाग सखा का हाथ,
बिना टिप्पणी यदि तुम गये, छूट जायेगा साथ।
गोरी पनघट पर मिली, सखी रही कोहनियाय,
करती चैटिंग रात भर, अब यहां खड़ी जमुहाय।
चोखों से डरकर रहें, कबहुं न लीजिये बैर,
भंगड़ कहि हड़कायेंगी, नहीं मिलेगा ठौर।
बात कीजिये दोस्त से, रखिये पास प्रमान,
तुरत चढ़ायें ब्लाग पर, दोस्त फ़िरे हलकान।
काल्ह करे को सो आज कर, आज करे सो अब,
अभी अगर न कर सके, बहुरि टिप्पणी करोगे कब।
बढ़िया है जी। जमाये रहिये।
ब्लाग पढ़त, सर्फ़िंग करत, इधर-उधर बतियात,
मित्र दिखे, भड़कन लगे, काहे नहिं टिपियात।
छा गए। शानदार दोहरे, होली की रंगत नज़र आ रही है।
फुरसतिया के चिट्ठे पर, भई पाठकन की भीड़,
हंसत हंसत बल पड़ गये, शुरू हुई पेट में पीड़।
लिखे फुरसतिया कमाल को, फिर काहे न टिप्पियाएं हम
टिप्पणी करते बार बार, फिर भी लागे हमको कम.
गजब दोहे, अजब दोहे…..ब्लॉग पर दो हे अनूप भइया….सारे दोहे…. वाह!
फुरसत में दोहे लिखे, दिए ब्लॉग पर डाल
सगरे मस्ती में पढ़ें, अपना-अपना हाल
रहिमन दोहा लिख गए, और ‘वहाँ’ पछतात
बिन पूछे कॉपी करें, ब्लॉगर ऐसी जात
होली के इस मूड को, चलने दीजे और
मेरे इस अनुरोध पर, करें जरा सा गौर
बड़की वाली पोस्ट पर, कछु दिन अंकुश डार
छोटी-छोटी पोस्ट से, चलती रही बयार
शिवकुमार भी क्या करें, इत्ती बड़ी जमात
दुई दुई को निपटाय के, बाकी पर टिपियात
फुरसतिया से ले रहे,हम भी ब्लॉगिंग ज्ञान
त्रस्त,व्यस्त और मस्त हैं,संग राखी के ज्ञान
होली आती पास है, फुरसतिया हैं व्यस्त
किसकी टांग खिचेंगी अब,सोच सोच हम मस्त
“…ऐसी बानी बोलिये, मन का संयम खोय,
औरन को नंगा करे, आपहुं नंगा होय।…”
जय हो! सत्य वचन, नव-कबीर, नव-तुलसी, नव-रहीम, नव-रैदास महाराज!
बाप रे होली के ठीक पहले इतना ज्ञान ?
आज से चार दिन के लिये शहर से बाहर प्रवास पर ..अतः तुरंते टिप्पणी चिपका दे रहे हैं. बेहतरीन दोहा नरेश..होली के रंग चढ़ रहे हैं.
होली के रंग होली के पहले ही, मजा आ गया, अब किस की टांग खीचने वाले हैं।विस्तार में टिप्पणी करने बाद में आयेगें
हुरिया रहे हैं, मस्त!!
गोरी पनघट पर मिली, सखी रही कोहनियाय,
करती चैटिंग रात भर, अब यहां खड़ी जमुहाय।
तभी आपकी आंखें भी लाल है ।सब माजरा समझ में आ रहा है।
ब्लाग सखी ने झट से गहा ब्लाग सखा का हाथ,
बिना टिप्पणी यदि तुम गये, छूट जायेगा साथ।
हा हा सही कहा… ये ब्लाग दोस्त बनाना भी अजीब सा काम है… टिप्पणी वरना दोस्ती गयी.. अगले दिन बात भी नही करेंगे, फ़िर पहचानन भी बन्द.. भगवान बचाये ऐसे दोस्तो से।
Cha gaye, baras gaye, itni kehne me baras gaye
dohe pehle bhi sune, lekin aapne sab naye kahe
ek se barkar ek, holi ka shurur chane laga hai shayad
सरिक सरिक हिलगे रहे नहिं लरिकपन जाय
पाइंट जाकिट धार लिये, जंघिया दिये हेराय।
बहुत सही,
होली का सही रंग जमा रहे हो।
गोधन,गजधन, बाजिधन और रतनधन खान,
जब आवै सनसनी धन, सब धन धूरि समान।
सही कहा।
अब हम कवि तो है नही, नही तो हम भी वापसी मे एक झोला भर कर कविताएं/दोहे टिकाते। अभी इत्ते से काम चलाओ, बाकी पोस्ट मे सलटाते है।
“ऐसी बानी बोलिये, मन का संयम खोय,
औरन को नंगा करे, आपहुं नंगा होय।”
छा गये गुरू. जय हो प्रात्:स्मरणीय फुरसतियादास जी की.
21वीं सदी की वर्चुअल रीमिक्स दोहावली………..
बात कीजिये दोस्त से, रखिये पास प्रमान,
तुरत चढ़ायें ब्लाग पर, दोस्त फ़िरे हलकान।
hehehehe mazeydaar
ये दोहे बहुत मस्त हैं… अब होली के लिये ही तो साल भर से इकट्ठा कर रहे थे, ऐन वक्त पर उड़ेल दिये सभी को रंगने के लिये।
होलाष्टक के शुरू में ही सुरू हो लिए गुरू। पूनम तक रोज हाजरी बजानी होगी।
भंग का रंग होली के एक हफ़्ता पहले ही से
, [ हो भी क्यों नही , आखिर कानपुर वालों की होली एक हफ़्ते पहले से और एक हफ़्ते बाद तक जो चलती है
]
क्या कहने!अच्छा रँग जम रहा है.
फुसतिया की होली
जिंदाबाद
Kah Deepak uttam prakrit ka kar sakat ye internet kusang.
Din bhar surfat karat rahen, par padhne na den blogging ka rang.
Holi hai.
Anoopjee,
Hamesha ki tarah se hee, aapne bahut accha likha hai.
Lagata hai, sabatical lekar kuchh dinon ke liye Blogging ki training lene chale gaye the kya? Aur bhi nikharkar (lekhni vidha ki baat kara raha hun, aapke shakal-surat ke nikhrane se mera koi tatparya nahin hai, vaise bhi aap Shaadi-Shuda, bal-bachhon vale aadmi hain.)vapas aaye hain. Sabatical se aane ke baad bhai chha gaye ho aap. Kuchh dinon ka aapka PAUSE kafi khala tha. Shayad isliye ki yah PAUSE state bahut hi kam dinon ke liye tha. Agle baar thodha lamba rakhiyega.
Hum to baithe huye gaana gaye ja rahe the “Tera intjaar karenge hum kayamat tak, khuda kare ki kayamat mat ho aur tum vapas na aao”. Lekin shayad Khudajee ko mera gaana bilkul hee raas nahin aaya.
Bhai, holi hai, isliye kuchh keecharh to lagega hee.
Deepak
Ek aur tipparhi, kyonki aapne tipparhi na karne ki shikayat kar rakhi hai.
Aalok-Anoop donon kharhe, khinchu kiski taang.
Aalok aayen pahile, Anoop Diyo bataye.
Pahile taang Aalok ki, phir aayen Apoop,
Prasad khao Shivjee ka, Gyan mein to barhi dhoop.
Aalok, Anoop se pahle shayad vaise hi aate hai, jaise khushi ka kha, dukh ke da se pahle aata hai. Vaise bhi Anoop ka roop to tabhi dikhayee dega, jab Aalok ka Gyan ho aur Shivjee ka bhang ho.
Anoopjee-Aalokjee aap log to blogjagat ke stambh hain. Stambh bole to khambha, vo Rambhajee vala nahin, Retajee vaala. Jinko sara SMS mila tha, inculding Rambhajee ka khambha ka bhi.
मजा आ गया। होली तो १ सप्ताह पहले ही हो ली!
अनूपजी मजा आ गया। जबरदस्त। संग्रहणीय रचनाएं हैं हमेशा दार्जिलिंग से सीधे तोड़कर लाई गई चाय की पत्तियों से बनाई चाय की ताजगी जैसी।
गजब का लिखा है अनूप भाई आपने। सबसे शानदार दोहे हैं –
ब्लाग सखी ने झट से गहा ब्लाग सखा का हाथ,
बिना टिप्पणी यदि तुम गये, छूट जायेगा साथ।
गोरी पनघट पर मिली, सखी रही कोहनियाय,
करती चैटिंग रात भर, अब यहां खड़ी जमुहाय।
वैसे कायदन फुरसतिया का सिगनेचर पहले नहीं, आखिरी दोहे में होना चाहिए था। मजा आ गया पढ़कर। सच्चाई को इस तरह दोहों के खांचे में फिट करने में काफी देर लगी होगी, और मेहनत भी।
सच है, टिप्पणी करने के लिये क्या इंतजार किया जाये। पर टिप्पणी करना अंतिम बात नहीँ है। फुरसतिया फुरसत से लिखेँ और हम फुरसत से न पढ़ पायें, वह कष्ट होना कहीं अधिक गहरे की बात है।
लिखा बहुत बढ़िया है जी।
अई लियो सुकुल दद्दू,
अत्ती धाँसू उखाड़ पछाड़ पर हमरी टिप्पणी दर्ज़ कई लेयो ।
अब चलै देयो आज बहुतन का टिप्पियावे का है,हमका ओरखत होंईहें ।
जय राम
माइन्ड ब्लोइन्ग । आपका ये पेज http://hindini.com/fursatiya/?p=404 तो मेरा् बुकमार्क हो गया हमेशा के लिये।