पिछले दिनों कुछ पोस्टें पढ़ीं। सोचने पर मजबूर हो गये। संयोग यह कि इन सभी पोस्टों का संबंध किसी ने किसी तरह इलाहाबाद से है। सबसे पहले ज्ञानजी की दोषारोपण तालिका देखी। मन दुखी हुआ। मैंने टिपियाया भी-
मुझे लगता है जो कारण आपने गिनाये वे आपके दुख के कारण नहीं हैं। बड़ा दुख छिपाने के लिये छोटे घाव दिखा रहे हैं। हम यही सोचकर दुखी हैं।
आज मुझे लगा कि ज्ञानजी के इतने दुख, जो तीन-चौथाई लोगों के दर्द हैं, मुझे छोटे क्यों लग रहे हैं! जब भारत सरकार का राजपत्रित अधिकारी आर्थिक अभावों से त्रस्त-पस्त सा है तो उनका क्या हाल होगा जिनकी अगले जून की रोटी का ठिकाना नहीं!
खासकर आजकल के दिनों में जब मंहगाई के कारण दुनिया बेहाल है! कोई किसी को पूछता नहीं है। लोग तोतचश्म हो रहे हैं। सब अपने में परेशान हैं, हैरान हैं, ह़ड़बड़ाये हैं!
लुटे-पिटे हैं। खट रहे हैं। हर मोर्चे पर जबरिया पिट रहे हैं।
अनिल रघुराज दूसरे इलाहाबादी हैं जिनकी पोस्ट ने थोड़ी हलचल मचाई मन में। कल को जब हम न होंगे तो मेरे ब्लाग का क्या होगा! इस पोस्ट पर हालांकि चंदू जी की टिप्प्णी (सो बोरिंग) से सहमत होते हुये प्रमोदजी ने लिखा है
मेरी आवाज़ चंदू के साथ है. महाराज, आप तो सच्चे ज़मीन-आसमान एक करने लगे, एत्ता बड़ा मसला है? तेवारी जी कह ही रहे हैं कि एगो, ससुरा, बटन दब गया पूरा बिलाग वइसे ही टें बोल जावेगा..
लेकिन इसके बावजूद भी हम चिंतित तो हो ही गये न!
ये तो कहो अनिल रघुराज की कल की पोस्ट से कुछ सुकून मिला। इसमें उन्होंने मस्त होकर जीने का संदेश दिया है। कुछ-कुछ दम बनी रहे घर चूता है तो चूने दो टाइप! लेकिन इस वाक्य की याद ने और दुखी कर दिया। बबाल हैं यादें भी।
आभाजी की चिंता , जिसका कोई हल नहीं सूझा मुझे , ने भी मुझे सोचने पर मजबूर किया। मैं भी आजकल दफ़्तर के कामों में अतिव्यस्तता के चलते घर-परिवार को समय नहीं दे पाता। बच्चे को देख नहीं पाता, पढ़ा नहीं पाता। यह सब चीजें बेचैन करती हैं।
एक और खबर ने बहुत दुखी किया। अमरकान्तजी , जिनको लोग प्रेमचन्द जी के बाद का सबसे अच्छा कथाकार बताते है, के बारे में खबर आयी कि आर्थिक अभावों के चलते
खाने और दवाओं की जरूरत पूरी करने के लिए ‘वह’ अपने मेडल और अन्य सम्मान बेचने की तैयारी कर रहे हैं। इसमें उन्हें, 2007 में मिला साहित्य अकादमी सम्मान भी शामिल है। ये हैं भारी आर्थिक तंगी से जूझ रहे, वयोवृध्द हिंदी उपन्यासकार और स्वतंत्रता सेनानी अमर कांत, जो अपनी मूल हस्तलिपियां तक बेच चुके हैं।
यह खबर अखबार में पढ़कर लखीमपुर से हमारी दीदी ने फोन किया और अमरकांतजी के लिये आर्थिक सहयोग की बात कही। लोग सरकार को कोसते हैं लेकिन यह हमारा समाज कैसा है जो ऐसे साहित्यकारों को अपने हाल पर छोड़ देता हैं!
आज अमरकांत जी के बारे में खबर के नीचे ही यह अनाम टिप्पणी देखने को मिली-
अमरकांत जी को कोई दिक्कत नहीं है ….यह सब उनके छोटे बेटे बिंदु का खेल है….अगर आपको यकीन न हो तो अमरकांत जी के बड़े बेटे और बहू से बात करके देख लें….उनका फोन नंबर राजकमल के मालिक अशोक माहेश्वरी से मिल जाएगा….यह सब एक बड़े और कद्दावर पिता के टुच्चे बेटे और बहू का खेल है…..
समझ ही नहीं आता , सच क्या है!
मेरी पसन्द
राह हारी मैं न हाराथक गये पथ धूल के-
उड़ते हुये रज-कण घनेरे।
पर न अब तक मिट सके हैं,
वायु में पदचिन्ह मेरे।जो प्रकृति के जन्म ही से ले चुके गति का सहारा।
राह हारी मैं न हारा।
स्वप्न-मग्ना रात्रि सोई,
दिवस संध्या के किनारे।
थक गये वन-विहग, मृगतरु-
थके सूरज-चांद-तारे।पर न अब तक थका मेरे लक्ष्य की ध्रुव ध्येय तारा।
राह हारी मैं न हारा।
-मन्नू लाल द्विवेदी’ शील’



ओह! सहानुभूति दु:ख को और उभार देती है मित्र!
चलें अंत में आपने भी आशावादी कविता पढ़ा दी
मन की किसी नाजुक सतह को छेड़ गई आपकी बातें। जायज चिंताएं, व्यथित करती हैं। खासकर अमरकांत जी की खबर के दो पहलू तो बेचैन करने वाले हैं। अगर अनाम की टिप्पणी में सच है तो यह हमारी पारिवारिक संस्था के क्षरण का सबूत है। इसलिए मुझे लगता है कि सरकार जैसी संस्थाओं के साथ पारिवारिक टूटन पर भी जमकर लिखा जाना चाहिए।
जमाये रहियेजी।
सारे दोष कानपुर में ही नहीं रहते।
बहुत से इलाहाबाद में भी हैं।
वन लाइनर वाला प्रोजेक्ट लगता है कि ठंडे बस्ते में डाल दिया है आपने।
इलाहाबद के बहाने बहुत कुछ कह गये..कुछ बातों का पता चला….पर समझ नहीं आता सच क्या है?
जो भी है इंसान है तो निस्सहाय कीड़ा ही।
अनिल रघुराजजी का लेखन वाकई काबिले तारीफ है.
कविता अच्छी लगी
स्वप्न-मग्ना रात्रि सोई,
दिवस संध्या के किनारे।
थक गये वन-विहग, मृगतरु-
थके सूरज-चांद-तारे।
पर न अब तक थका मेरे लक्ष्य की ध्रुव ध्येय तारा।
राह हारी मैं न हारा।
bahut khub….!
शील जी की कविता बहुत पसंद आई।
कविता के भाव बहुत ही गूढ़ है।
राह हारी मै न हारा -,मे मुख्य समस्या अमर कान्त जी की है,- जो यह कहने को मजबूर कर रही है- कि पूत सपूत तो क्यों धन संचय पूत कपूत तो क्यो धन संचय ,या कि बेटों को बुढापे मे मां बाप का सम्मान बडाना चाहिए ,यदि वो इतना भी नहीं कर सकते तो जो पिता का खुद का सम्मान है तो खोने से बचाए, पर हे प्रभू क्या कहें।किस्मत परिस्थित इन सब का भी खेल है।-
अपनी व्यस्तता के बावजूद आप दूसरों के दुख से दुखी हो रहे हैं ये बात काबिलेतारीफ़ है और कविता तो अच्छी है ही
इस बहाने शील जी की कविता का प्रस्तुत होना मेरे लिए उपलब्धि है।
दुःख का फैलाव बड़ा है. दुखी रहने की प्रैक्टिस होती रहती है.
अच्छी लगी मन्नू जी की आशावान कविता…
सचमुच अमरकांतजी के बारे मे विरोधाभासी खबरें मिलती रहती हैं…कोई कहता है सच है…कोई कहता है झूठ….समझ में नही आ रहा कि आखिर माजरा क्या है , लेकिन यह सच है कि उनकी लेखनी अद्वितिय है…एकदम सरल सपाट और निर्मलता लिये हुए।
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