कल पाण्डेयजी ने सांड़ के बारे में लिखा। इस पर द्विवेदीजी की टिप्पणी भी आई। हम कल टिपिया न पाये सो सोचा अपने ब्लाग पर लिख मारें।
दो साल पहले मैंने सांड़ के बहाने कुछ हायकू लिखे थे। फिर से देखिये-
दौड़ता हुआ
सांड़, सांड़ ही तो है
नही -दूसरा.
सिद्ध है सिद्ध
देख रहा है गिद्ध
नहीं बेचारा.
कुत्ते हैं भौंके
सांड़ चले मस्त
या गया सिरा ?
सिक्के खोटे
चलेंगे क्या सोंटे?
मरा ससुरा.
पूंछ पकड़ी
उचकेगा वो सांड
अबे ये गिरा..
हमारे स्वामीजी सांड़ प्रेमी जीव हैं। उनका सांड़ प्रेम भावुकता वाला नहीं है। वे कहते हैं-
गुरुदेव,
निःश्छल के क्रोध में भी एक सौंदर्य होता है, प्रतिक्रियात्मक आवेश तो होता है पर क्रियात्मक आवेग नहीं होता. मेरे विचार में सांड १०० मेसे ९९ बार सींग दिखाता है पर मारता नहीं, क्रोध आता है और चला जाता है फ़िर क्रोध का आवेश खुद को दिख जाता होगा हंसी आ जाती होगी अपने प्रतिक्रियात्मक आवेश पर!
हरिराम पंसारीजी ने इस बात को विस्तार देते हुये कहा था-
साँड शुद्ध शाकाहारी होता है. शुद्ध शाकाहारी गायों का परमेश्वर होता है. साँड ही असली पौरुषवाला होता है. एकाध को ही साँड छोड़ कर शेष बछड़ों को तो बैल बना दिया जाता है. साँड से न तो बैलगाड़ी चलवाई जा सकती है, न हल में लगा खेत जोता जा सकता है. साँड तो मस्त और स्वतन्त्र होता है. उसे कौन बाँध सकता है? सिर्फ भगवान शिव ही उस पर सवारी कर सकते हैं. वह भी बिना कोई नकेल बाँधे, बिना कोई काठी लगाए. साँड अर्थात् नन्दीश्वर स्वयं चाहें तभी शिव को स्वयं पर सवार होने देते हैं. पार्वती का वाहन सिंह भी साँड के शौर्य-वीर्य से डरा रहता है. जय साँड बाबा की.
ऐसे महिमावान जीव की तुलना सरकारी कर्मचारियों, नेताओं और निठल्लों से होना दुखद है। लेकिन क्या करें लोग! हरेक का समय होता है। जो कभी पूजे जाते थे वे आज उपहास के पात्र बन गये। हर सक्रिय सांड़ को यह मर्म समझ लेना चाहिये कि यदि वो अनुशासित न रहा तो बधिया कर दिया जायेगा। और निठल्ला रहा तो उस पर पोस्ट लिखी जायेंगी। उसके हाल रागदरबारी के दूरबीन सिंह सरीखे हो जायेगें।
जो लोग अपने आसपास की हर चीज से सीख लेने की आदत से लाचार हैं उनको इस बात से सीख लेनी चाहिये। जो बहुत उग्र होकर सांड़पना दिखायेगा वो आज नहीं तो कल बधिया कर दिया जायेगा। और जो केवल निठल्लेपन के सहारे अपनी जिंदगी पार करने की सोचेगा वह उपहास का पात्र बनेगा। दोनों में संतुलन की आवश्यकता है जीवन में। दुनिया को डिजाइनर सांड़ चाहिये। जिसकी उग्रता जब चाहे नियंत्रित की जा सके और बाकी समय वो गधा बना रहे है। निठल्ला नहीं। दुनिया ऐसे जीव पसंद करती है जिसमें शेर, सांड़ और न जाने कैसे-कैसे जीवों जैसी आक्रामकता हो, गधे-घोड़ों जैसी बिना बोले काम करने की दक्षता हो, मालिक के इशारे पर बिना सोचे मर-मिटने की बुद्धि हो और न जाने क्या-क्या हो। इसके अलावा उनमें यह हुनर जरूर होना चाहिये ताकि वे अपने आका के हर सही-गलत हरकत को तर्क पूर्ण तरीके से सही साबित कर सकें। इस सांड़ों से ये अपेक्षा की जाती है कि अपने कार्य-कलापों और व्यवहार ये मई दिवस जैसी किसी भी अवधारणा को हास्यास्पद बना के रख दें।
दुनिया के तमाम प्रतिभाशाली , आला दिमाग के मालिकान ऐसे ही डिजाइनर सांड़ की परिभाषा के बहुत निकट हैं। वे आदर्श डिजाइनर सांड़ बनने के लिये कमरकसे जुटे हैं। सरकारी सांड़ तो सामने दिखते हैं। आप गिनती कर सकते हैं। संसद के सांड़ को आप प्रयास करके बाहर कर सकते हैं लेकिन ऐसे डिजाइनर सांड़ों के लिये क्या किया जाये?
स्वाभाविक/प्राकृतिक सांड़ों में जरा भी अकल अगर बची हो तो समय रहते उनको सावधान हो जाना चाहिये और अपने को सुधार लेना चाहिये। केवल सांड़ बने रहने से कुछ न होगा। उनको डिजाइनर सांड़ बनना होगा। अगर न बने तो अपने हाल के लिये वे खुद जिम्मेदार होंगे।
यह सूचना दुनिया के तमाम सांड़ों के हित के लिये जारी की जा रही है। फिर कोई सांड़ ये शिकायत लेकर न आये कि हमें बताया नहीं।
संबंधित कड़ियां :
1.. मुंसीपाल्टी का सांड़
2. साँड, मई दिवस और स्त्रियाँ
3. मोहब्बत में बुरी नीयत से कुछ भी सोचा नहीं जाता
4.पुरुष बली नहिं होत है…
5.कविता के बहाने सांड़ से गप्प
6. ठाकुर बाबा



जय हो सांड महाराज की…
अच्छा तो आज प्रवचन यहां शुरु है। लेकिन बात तो पते की ही है , सच में डिजाइनर सांड बनने की ही जरुरत है
भई वाह वाह घणी डिजाइनर पोस्ट लिखी है जी।
ब्लाग जगत के सांड़ों की सूची बनाइये ना।
आप है ना
सही है जी, जमाये रखिये ,
सही क़लम चलाई है आप ने!
सांड बाबा की जय. ई-स्वामी जी की भी जय.
सही है। हमें भी पसन्द है लाल बैल।
सांड़ पर डिजाइनर मुअल्लमा – क्या बात है। आधुनिक सांड़। जैसे बंता सिन्ह जी कच्छे पर टाई पहन कर जचें, वैसे ही यह डिजाइनर सांड़ जंचेगा!
सूचित हुए। आज से आप की दी हुई अकल का इस्तेमाल कर सुधरने का श्री गणेश करते हैं। जरा प्रोग्रेस जाचते रहिएगा। प्रोग्रेस रिपोर्ट का इंतजार रहेगा। समय समय पर देते रहिएगा।
ऐसे महिमावान जीव की तुलना सरकारी कर्मचारियों, नेताओं और निठल्लों से होना दुखद है।
सत्य वचन. अब आलोक पौराणिकजी की बात पर गौर करें
बड़े भाई,
आपकी सांड़कथा ज्ञानजी की पोस्ट से प्रेरित होकर जरूर निकली है लेकिन इसकी डिजाइन ओरिजिनल लगती है, बिल्कुल डिजायनर सांड़ की तरह। एक दिन पहले मैने भी एक सांड़ की सत्यकथा पोस्ट की थी – ठाकुर बाबा। अगर पसंद आये तो संबन्धित कड़ियों में इसका लिंक भी फिट कर दें। शायद कुछ पाठक मुझे भी मिल जांय।
यह सूचना दुनिया के तमाम सांड़ों के हित के लिये जारी की जा रही है।
–कृप्या इस पोस्ट की एक कॉपी लोकसभा और एक कॉपी राज्य सभा एवं सभी विधान सभाओं के बाहर भी चस्पा की जाये.
झक्कास!!
ज्ञानदत्त जी ने ऎसा साँड़ छोड़ा कि लगता है कि
ब्लागजगत में साँड़मेघ यज्ञ हो कर ही रहेगा ।
लेकिन संभावना कम ही है, क्योंकि वह तो मेरे
पोस्ट लिखने से पहले ही कराह उठा ,
” साँड़ साँड़ ना रहा , तू मुझी को चर रहा …
ब्लागर.. मुझे तेरा ऎतबार ना रहा.. ऎतबार ना रहा
बेहतरीन इससे ज़्यादा क्या कहूँ… शेष समीर जी ने पहले ही कह डाला!