पिछले माह जब हम लखनऊ गये थे तो श्रीलालशुक्ल जी और अखिलेशजी के अलावा कंचन और टंडनजी से भी मिले थे। कंचन का फोन नम्बर हमने लिया था और आदतन गुमा दिया था। किसी का फोन नम्बर, पता आदि लेते ही हम सबसे पहला काम यह करते हैं कि उसे इधर-उधर धर देते हैं। इधर-उधर धरी चीजें फ़िर गुम हो जाती हैं। इससे हम हलकान नहीं होते। हमें यह विश्वास रहता है कि जब जरूरत होगी, पते-फोन मिल जायेंगे। जेहि पर जाकर सत्य सनेहू/ मिलहिं सो तेहि नहिं कछु संदेहू।
कंचन के फोन के लिये हमने लखनऊ से मनीष को और समीरलालजी को मिलियाया। समीर जी से नम्बर मिला तो हमने कंचन को फोनियाया। तय हुआ कि कंचन आयेंगी मिलने। हम जहां रुके थे वहां निर्माण कार्य चल रहा था इसलिये हमने वहां बुलाने में संकोच का नाटक किया लेकिन दीदी चूंकि कंचन से कानपुर में मिल चुकीं थीं इसलिये उन्होंने खुद फोन लपककर कंचन को बुलवा लिया। अब हमको कोई दोष नहीं दे सकता था कि काहे सबको परेशान किया।
बताते चलें कि यह वही ऐतिहासिक घर है जहां हमारी शादी की बात तय हुयी थी। वह हमारी जिंदगी का मेरे द्वारा लिया गया अंतिम निर्णय था। इसके बाद के सारे अहम फ़ैसले उसने लिये जिससे जुड़ने का फ़ैसला मैंने यहां लिया। देख लीजिये एक निर्णय कित्ती दूर तक और देर तक असर करता है।
कंचन अपनी भांजी सौम्या के साथ आयीं। आयीं क्या पधारी। खूब बतियाती है लड़की। ढेर-ढेर। न जाने कित्ते किस्से सुना डाले।
हम कंचन से ज्यादा सौम्या की बात पर यकीन कर रहे थे। हमने पूछा भी- सुना है तुम्हारी मौसी बड़ी
कड़क हैं। बहुत हड़काती हैं?
ठीक से याद नहीं कि क्या जबाब दिया सौम्या ने लेकिन जो दिया उसका लब्बो और लुआब दोनों मिलाकर यही था कि मौसी उनकी फ़्रेंड, फ़िलासफ़र और गाइड हैं।
मौसी के फ़्रेंड, फ़िलासफ़र और गाइड होने की वजह बाद में पता चली। सौम्या से उसकी हाबी पूछी गयी तो पता चला -डांसिंग। फ़ेवरिट गाना जिसपर डांस करती हैं पूछा गया तो पता चला- बीड़ी जलिइलो, जिगर मां बड़ी आग है।
कंचन ने आगे पुष्टि करते हुये बताया -हो सकता है विपाशा बसु अपने डांस के स्टेप भले भूल जायें लेकिन ये नहीं भूल सकती। आगे खुलासा हुआ कि सौम्या की कोरियोग्राफ़र उनकी फ़्रेंड, फ़िलासफ़र और गाइड उनकी मौसी ही हैं। कुर्सी पर बैठे-बैठे अपनी भांजी को डांस के स्टेप सिखाये हैं कंचन ने। कंचन खुद तेजी से चलने से लाचार हैं लेकिन उसकी कमी अपनी भांजी को सबसे तेज गाने के स्टेप सिखाकर पूरी करती हैं। घर में निर्माण कार्य चल रहा था इसलिये हम सौम्या का डांस न देख सके लेकिन सोचते रहे कि यह कुछ ऐसा ही है कि जिसके साथ ईश्वर ने मौज ली , बचपन से चलना-फिरना बेहद कष्टप्रद बना दिया वह भगवान को अपने चेलों के माध्यम ठेंगा दिखा रहा है और कह रहा है-
ओ माये काबा से जाके कह दो
कि अपनी किरणों को चुन के रख लें
मैं अपने पहलू के जर्रे-जर्रे को
खुद चमकना सिखा रहा हूं॥
पिछले दिनों जब हाईस्कूल का रिजल्ट आया तो कंचन ने फोन करके बताया कि सौम्या के ९५% नंबर आये हैं। अपनी एकेडमी में टाप किया है। बिटिया सौम्या की सफ़लता पर खुशी जाहिर करते हुये हमने उसके डांस के बारे में जानना चाहा। पता चला कि आजकल विपाशा की बीड़ी बुझी है। सारी आग, आगे की पढ़ाई में लगी हुयी है। ये पढ़ाई जो न कराये।
कंचन के तमाम संस्मरण और बचपन के कष्ट्प्रद किस्से सुनते रहे। पोलियो के कारण बचपन से ही चलने-फिरने से लाचार कंचन की पढ़ाई लिखाई उनके भाई-बहनों के सहयोग से हुई। कृत्तिम पैर तो अभी लगे लेकिन बचपन में पढ़ाई के दौरान स्कूल में एक कमरे से दूसरे कमरे तक ले जाने के लिये घर के लोग लगे रहे। उस समय के किस्से स्कूली किस्से सुनाये। उनकी प्रिंसिपल साहिबा ने जो स्वयं प्रख्यात कवियत्री थीं उनके घर वालों की कंचन के लिये व्हीलचेयर पर स्कूल आने की आने की अनुमति प्रदान करने से मना कर दिया। बकौन कंचन, “मैं वह घट्ना कभी नहीं भूल सकती जब प्रिंसिपल मैडम एक बार क्लास खत्म होने पर कुचलते हुये चले गयीं थीं । उन्होंने पलट के यह भी नहीं देखा कि उनके पैर के नीचे कोई कुचला गया है।”
कंचन के घर वाले उनको कष्टों में पालने-संवारने का प्रयास करे। मां रो-रोकर बिटिया को बड़ा होते देखती रहीं। कंचन के नानाजी को ईश्वर से इस बात पर शिकायत भी थी। अपनी शिकायत करते हुये उन्होंने परमपिता परमेश्वर को उलाहना देते हुये लिखा-
पेट बल घिसट-घिसट कर चलना,
दौड़ की आशा मन में लिये,
आह कंचन की करुण की पुकार,
फ़ाड़ता सबल शरीर हिये।बालकों के करुण कौतुक को देख
मचलती रहती है दिन-रात,
पैर से चलने में असमर्थ
जीभ से कहती नाना-बात।उछलना गेंदों का चुपचाप
देखती मन में लिये हुलास
गेंद से मन में उठते भाव
बैठती गोधूलि से आस।दो मम्मी मुझे एक रस्सी
मैं भर लूंगी ऊंची कुदान
दीदी, भैया से आगे बढ़
मैं भर लूंगी ऐसी छलांग।इस तरह मांगती उत्तर वह
मां देती आंखों का पानी
पैरों में जान फ़ूकने को
करती किस्मत आना-कानी।हे परमपिता परमेश्वर तुम
यदि समदर्शी कहलाते हो
तो मेरी बिटिया कंचन को
क्यों इतना अधिक रुलाते हो।
कंचन जब यह कविता सुना रहीं थी, मेरी आंखों में पानी आ रहा था।
इसी बीच मनीष का फोन आया। उनसे भी बात हुयी। किसी बात पर कंचन उनको उलाहना दे रही है। आदतन हड़काऊ हो गयी है कानपुर की लड़की।
हमने इस बात की पुष्टि कंचन के भैया से अवधेश से नहीं की। हमें डर था वे फ़ट पड़ेंगे और कहेंगे- अब हमारा मुंह न खुलवाओ। हम पहिले से ही भरे बैठे हैं।
अपनी आगे की पढ़ाई का जिक्र करते हुये कंचन ने बताया कि वो हिंदी में पी.एच.डी. करना चाहती हैं। विषय है- हिंदी की कालजयी रचनाओं का अंग्रेजी अनुवाद। इसके लिये सामग्री जुटा रही हैं। अपने काम के लिये कंचन को कालजयी रचनाऒं के अग्रेजी अनुवाद की तलाश है जिससे कि वे दोनों का अध्ययन करके अपना शोध कार्य कर सकें। मैंने मसिजीवी का नाम सुझाया। उनका हिंदी पी.एच.डी. धारी परिवार इसमें अवश्य सहायक हो सकता है। किसी ने कंचन को डराया भी कि यह विषय तो कुछ कठिन है। सामग्री नहीं मिलेगी। इस पर उनका कहना है तब तो इसे करना और अच्छा रहेगा। बचपन से झेलते-झेलते ” कस्ती को अभ्यास हो गया/लहरों से टकराने का” जज्बा कंचन की ताकत बन गया है। उनका कहना है कोई काम पूरा नहीं होगा तो नहीं होगा। जितना हो सकता है उतना करने में क्या हर्ज है। पीछे तो कभी भी लौटा जा सकता है। मैं सोचता हूं- “ऐसे खुराफ़ाती जज्बे वाले लोग क्या पीछे लौटते हैं? ”
अपने जीवन में जिन ‘लीजेंडरी’ लोगों से कंचन मिलना चाहती थीं उनमें से एक के.पी.सक्सेनाजी हैं। के.पी.सक्सेनाजी ने कंचन से मुलाकात बाद कहा- आज जब तुम मुझसे ‘लीजेंडरी’ मानते हुये मिल रही हो। फोटो खिचवा रही हो। मुझे इस बात का अफ़सोस रहेगा कि कल को जब तुम ‘लीजेंडरी’ बनोगी तब मैं तुम्हारे साथ फोटो खिंचवाने के न रहूं।”
चलते समय घर के बाहर फोटो सेशन हुआ। कंचन को यह शिकायत रहती है कि उनकी फोटो साफ़ नहीं खींचते लोग। लेकिन खिली-खिली धूप ने यह शिकायत दूर कर दी। हमने खिलखिलाते हुये फोटुयें खिंचवाईं और आगे की खिंचाई के लिये यहां पोस्ट कर रहे हैं।
अपनी सवारी पर बैठकर कंचन, बकौल मनीष, रानी लक्ष्मीबाई की तरह सवार होकर चली गयी।
हम बहुत देर तक उनके हौसले और जीवन में आशावाद के जब्बे का जिक्र करते रहे।
कंचन की घरवालों, मां-पिता, भइया-भाभी, दीदी आदि ने अपने -अपने हिसाब से अपनी इस बच्ची को हौसले से भरा। अब वह खुद लोगों के लिये मिसाल हो गयी है। कम से कम मुझे तो यह लगता है कंचन का हौसला तमाम लोगों के लिये प्रेरक है।
मुझे अनायास बचपन में पढ़ी महादेवी वर्मा की कविता याद आ रही है-
अन्य होंगे चरण हारे,
और हैं जो लौटते
दे शूल को संकल्प सारे।
तू न अपनी छांह को
अपने लिये कारा बनाना
जाग तुझको दूर जाना।
संबंधित कड़ियां:
1.उड़न तश्तरी का फुरसतिया पड़ाव हृदय गवाक्ष पर
2.अथ कानपुर ब्लागर मिलन कथा
3.मुलाकात गवाक्ष के प्रेरक पवन मनीष जी से
4.आइए झांके हृदय गवाक्ष के अंदर और मिलें कंचन सिंह चौहान से..
मेरी पसंद
पंथ होने दो अपरिचित
प्राण रहने दो अकेला!
और होंगे चरण हारे,
अन्य हैं जो लौटते दे शूल को संकल्प सारे;
दुखव्रती निर्माण-उन्मद
यह अमरता नापते पद;
बाँध देंगे अंक-संसृति से तिमिर में स्वर्ण बेला!
दूसरी होगी कहानी
शून्य में जिसके मिटे स्वर, धूलि में खोई निशानी;
आज जिसपर प्यार विस्मित,
मैं लगाती चल रही नित,
मोतियों की हाट औ, चिनगारियों का एक मेला!
हास का मधु-दूत भेजो,
रोष की भ्रूभंगिमा पतझार को चाहे सहेजो;
ले मिलेगा उर अचंचल
वेदना-जल स्वप्न-शतदल,
जान लो, वह मिलन-एकाकी विरह में है दुकेला!












अरे वाह!
फुरसतिया का नया जन्म?
कंचन बहुत साहसी हैं,
मगर उन की माता जी की कविता पूरी पढ़ना हमारे साहस की परिधि के बाहर था।
साहस जुटा कर पढ़ेंगे।
यह साहस की कमी हो गई है, हमें हम किसी को अस्पताल में मिलने जाने से घबराते हैं। जब तक कि वहाँ हमारी सकारात्मक भूमिका न हो।
पोस्ट अच्छी है, मगर अवसाद दे गई।
क्या बात है सही है जी
ऐसे खुराफ़ाती जज्बे वाले लोग क्या पीछे लौटते हैं? बड़ा ही वाजिब सा सवाल है. जिसको लोग ये कह रहे हैं की थोड़ा मुश्किल है और कोई वही करने को तैयार है तो वह या तो दूरदर्शी है बेवकूफ…. कंचन में इतना माद्दा तो है की वह लड़ने को तैयार है… मेरे लिए तुम अभी से लीजेंडरी हो गई. इसको पढ़वाने के लिए फुरसतिया को भी बधाई.
कंचन जी कइयों के लिए प्रेरणा स्त्रोत हैं। उनसे अंतरंग मुलाकात कराने का शुक्रिया। हर घर को कंचन जैसी एक शख्सियत की जरुरत है।
नया कलेवर बढ़िया .. एकदम हाईटेक ..और कंचन के बारे में पढ़कर अच्छा लगा
पोस्ट के बारे में क्या कहें। ब्लॉग ही दीदा फाड़ कर देख रहे हैं हम – यह फुरसतिया का ब्लॉग है या “हाईटेकिया” का!
हमारी भी कोचिंग क्लास ले लो जी ऐसा ब्लॉग बनवाने को।
क्या बम्पर मारा है!
ग़ज़्ज़ब !
गिरा अनयन, नयन बिनु बानी ।
कहीं तुलसी बाबा को पकड़ पाऊँ,
तो लाकर यहाँ खड़ा कर दूँ, कि चल बता ‘ इस सादगी पर क्यों न मरें हम ? ‘
बधाई जी बधाई,
बधावा भेजो जी चेले को !
फिर लौट आया हूँ,
गुरु यह तो खरी बकैती है,
फोटू चुनने का च्वायस तो दो, यहाँ !
नहीं तो, टिप्पणी बक्से में कमेंट ठोक ठोक कर प्रिव्यू में फोटू देखते रह जाया करेंगे, भाई लोग !
नहीं कुछ ख़ास नहीं,
अभी फ़ुरसत में था, सोचा देखता चलूँ कि अब कौन सा फोटू लगेगा,
गुरु, दूसरे चक्कर में पंडिताइन से शर्त हार चुका हूँ, इस बार गुरुवर हलचल ज्ञानू वाला फोटू लगवा देयो ।
गुरु लगवा देयो ।
पहले ये थीम टेस्ट कर लें अपनी साइट पर बाकी पढ़ना लिखना बाद मे
क्या बात है जी. बहुत अच्छा लगा ये नया कलेवर
कंचनजी के बारे में पढ़कर बहुत अच्छा लगा….और तस्वीरें भी
मैं क्यूँ इतनी देर से आया यहाँ. कैसे मिस कर गया यह पोस्ट.
आँखें नम हैं मगर कंचन की बात सुन बस यही कहूँगा–हौसलों मे दम हैं…खूब जिओ कंचन..जीत तुम्हारी मुट्ठी में है और हम तुम्हारे साथ हैं. यही जज्बा बनाये रखना. तुम तो वो प्रेरणा हो..जिससे खुद प्रेरणा अपने होने की प्रेरणा लेती है….कभी हिम्मत न हारना. फुरसतिया का आभार जो ऐसा मार्मिक आलेख ्को यहाँ लाये..किन शब्दों में आभार कहूँ.
कंचन जी के बारे में पढ कर यह आस्था प्रबल हुई कि ’ज़िन्दगी ने जो दिया है उसी को मान कर चलना ज़रूरी नहीं है” ।
एक अच्छे लेख और सुन्दर कविताओं के लिये साधुवाद ।
और सब तो ठीक है.. पर ई स्वामी जी ने फूलों से काहे बैर ले लिया.. बैनर में ऊपर कित्ते अच्छे लगते थे.. और बाकी सब लोग भी लड़ियाए चले जा रहे हैं कि बड़ा अच्छा है .. बड़ा अच्छा है.. चलो माना बुरा नहीं है .. ठीक है.. पर जब तक फूल नहीं आएंगे हम अच्छा नहीं कहेंगे..
ये पोस्ट पढ़ कर आखें नम होना वाजिब सी बात है , कंचन लिजेडरी बनेगी ही और पहले से है भी ,मै भी उसके साथ फ़ोटो खिचवाऊंगी जरूर…. कंचन को हमारा स्नेह सहित आशीष ……..।
अन्य होंगे चरण हारे,
और हैं जो लौटते
दे शूल को संकल्प सारे।
तू न अपनी छांह को
अपने लिये कारा बनाना
जाग तुझको दूर जाना।
मेरे लिये कही जा रही हैं ये पंक्तियाँ… विश्वास नही हो रहा।
दो मम्मी मुझे एक रस्सी
मैं भर लूंगी ऊंची कुदान
दीदी, भैया से आगे बढ़
मैं भर लूंगी ऐसी छलांग।
इस तरह मांगती उत्तर वह
मां देती आंखों का पानी
पैरों में जान फ़ूकने को
करती किस्मत आना-कानी।
हाँ ये स्थितियाँ आज भी जहाँ की तहाँ हैं… मैं आज भी जब माँ से कहती हूँ कि आप बस देखती जाओ, आपकी बेटी आपका हर सपना सच करेगी तो वो अब भी आँख का पानी ही देती हैं
(ठीक से याद नहीं कि क्या जबाब दिया सौम्या ने )
मैं याद दिला दूँ कि उसने कहा था कि ” जब गलती होती है तो डाँटती हैं..जो कि totally manipulation था
साथ ही यह भी बताती चलूँ कि मसिजीवी जी ने पोस्ट पर कमेंट भले न दिया हो मगर मेरे पास उनका मेल आ गया है कि वे मेरी हर प्रकार से सहायता करने को तैयार है… आप सभी का धन्यवाद
राजेश जी, अनीता जी, प्रत्यक्षा जी, अमर जी, भुवनेश जी, समीर जी एवं अनूप जी को उनकी शुभकामनाओं के लिये धन्यवाद और दिनेश जी से क्षमा..मैने अपने ब्लॉग पर शुरुआत में अपनी फोटो सिर्फ इसलिये नही लगाई थी, क्योंकि मैं उनमें अवसाद नही भरना चाहती थी, तथापि कोई मेरे कारण अवसाद में जाये मेरे लिये इससे बड़ा कष्ट कोई नही है।
@अभयजी, आप क्या बस ताज़ा पोस्ट पढ कर ही लौट जाते हैं? .. तनिक Home वाली कडी पर क्लिक करके देखिये मुख्य पन्ने पर हमेंशा की तरह फूल हैं.. हां वे अब पोस्ट वाले पन्नों पर भी साईड बार में दिखेंगे – उपर नया नेविगेटर जोड दिया है ना, इसलिये!
सही है जी
कंचन के बारे में पढ़कर दिल भर आया।
पी एच डी का विषय रोचक है।
उनसे कहिए कि, कानपूर से मीलों दूर दक्षिण भारत में कोई है जो उसकी सफ़लता और सुख के लिए कामना करता रहेगा।
कंचन को इस अजनबी का आशीर्वाद।
गोपालकृष्ण विश्वनाथ, जे पी नगर, बेंगळूरु
@ कंचन
अवसाद पैदा किया था कविता ने। आप का चित्र तो अवसाद नहीं साहस और हर हाल में उल्लास का सृजन करता है। उस में क्षमा की कोई बात ही नहीं थी।
नया आवरण चकाचक है. हमरी फोटू भी दिखाता है, टिप्पणी के साथ
mai kanchan se miltey miltey rah gayi..magar jab bhi ph par baat hoti hai..bahut puurani sakhi si lagti hai..aur iski himmat ko mai sadaa se naman karti huun..post mun bhaayii
पढ़कर आँख नम नहीं हुई. गर्व हो रहा है कि हम कंचन जी को जानते हैं. बहुत शानदार पोस्ट है.
कभी लखनऊ गए तो उनसे जरूर मिलेंगे. …
एक बात और..सन १९८७ से मेरी भी बहुत इच्छा है कि कभी के पी सक्सेना जी से मिलूँ. जब भी लखनऊ गया तो कोशिश जरूर करूंगा.
कंचन जी की हिम्मत को सलाम। ईश्वर उनकी झोली में अब बस, सिर्फ खुशियां ही डाले।
बाकी अभयजी की बातों से सहमत हैं । हमें तो पहले वाला ही हाईटेक लगता था।
आपने तो रुला ही दिया…पहले चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आई..फिर आँखों में आँसू… कभी कभी यही मुस्कान और आँसू प्रेमभाव में डूबे होते है जो कंचन को खूब प्यार और आशीर्वाद दे रहे हैं..
अनूप जी कल रात तक आपकी पोस्ट एग्रगेटर पर नज़र नहीं आ रही थी इसलिए नहीं पहुँच पाया। कंचन से आपकी इस मुलाकात के बारे में पढ़कर अच्छा लगा। आपने सही कहा कि उनका व्यक्तित्व ऍसा है कि आप उनकी जीवटता से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते। आपने कंचन के लिए जो महादेवी वर्मा की कविता उद्धृत की है वो बेहद पसंद आई।
आपके चिट्ठे का नया कलेवर भी प्यारा लगा।
अनूप भाई,
बढिया कविताएँ पढने का आनँद और साथ मेँ हमारी कँचन बिटिया के बारे मेँ स विस्तार बातेँ -
बडा अच्छा अपना सा लगा और
कँचन,
याद रखना ” आग मेँ तपने से ही सोना, शुध्ध हो जाता है ”
यही तुम्हारी पहचान बनेगा -
” क़ँचन नाम ” सार्थक होगा ~~
लिखती रहो, खूब तरक्की करो ~~
स्नेहाशिष
-लावण्या
प्रेरक पोस्ट. कंचन जी के साहस और लगन को मेरा नमन. उनके उज्जवल भविष्य के लिये ढेरों शुभकामनायें.
कंचनजी,
जिन्दगी में सफ़लतायें आपके हमेशा कदम चूमे, यही दुआ करता हूँ।
फुरसतिया जी
कंचनजी के बारे में आपने जो जानकारी दी उसके लिये आपको भी धन्यवाद।
क्या बात है अनूप जी. पढ़ कर क्या कहूँ कैसा लगा. बहुत बहुत शुक्रिया ….. बहुत अच्छा लगा कंचन जी. हम सब को, या कमस्कम मुझे तो बहुत सीख मिलती है आप से. जैसा कि अनूप जी ने कहा है, आप जैसे लोग, सिर्फ़ “अपने पहलू के ज़र्रे-ज़र्रे को” नहीं चमकाते, बहुतों को चमकना सिखाते हैं. हमेशा हँसती रहें यूँ ही ….
बहुत दिनों के बाद एक मौका मिला एक कमेंट देने का। अनूपजी, अपनी बहन की हिम्मत और संघर्ष को बचपन से ही देखता रहा हूं लेकिन आज सभी लोगों के द्वारा उसे हिम्मत देने और प्रोत्साहन प्रदान करने पर अंतरात्मा बहुत ही प्रसन्नचित्त है।
मैटर सीरियस था भाई अपुन मुंह खोलने का नहीं। अपुन का नाम आया अपुन एतने में ही खुश हैं।
वाकई प्रेरक!
सलाम कंचन जी को!
और शुक्रिया आपको कि उनका इस तरह से परिचय करवाया आपने!
मुआफी चाहूंगा इन दिनों ब्लॉग्स पर आ-जा नही पा रहा हूं, जल्द ही पुरानी रूटीन मे आ जाऊंगा।
कलेवर पसंद आया!
लेख अच्छा है..लेकिन जिनके लिये लिखा है वे और ज्यादा अच्छी हैं.
फूलों की जगह बनाये रखने के लिये खास धन्यवाद.
इस प्रेरणादायक विवरण के लिए धन्यवाद! हमारी शुभकामनाएँ कंचन जी के साथ हैं.
(आपके ब्लॉग का नया रूप पहले से बहुत बेहतर है.)
कंचन के बारे में ये सब कुछ पता नही था, ये भी क्या इत्तेफाक है आज दो पोस्ट पढ़ी उनमे एक ये थी दूसरी चांद बीबी की। साहस, लगन, हौसला हो तो ऐसा। प्रिंसीपल वाली बात पढ़कर आंखें नम हो आयी।
तीन दिन पहले अपने ब्लॉग पर अपने दोस्त की स्टोरी लिखी थी तब मालूम नही था की एक ओर हीरो हमारे बीच मौजूद है….इस लड़की के लिखने में जाने क्या था जो मुझे शुरू से अच्छा लगा ओर हम दोनों के बीच एक सम्मान का रिश्ता बना….एस एक दो पोस्ट पढ़कर मैंने बहुत कुछ लिखा….दो बार काफी लम्बी लम्बी पोस्ट…लेकिन आज ये कविता पढ़कर मेरा मन किया उसे फोन घुमा दूँ…जिंदगी के इस जज्बे को मेरा सलाम….
मेरी निगाह में अब उसका कद कही ओर ऊँचा है……
कंचन के बारे मे जिनता जानते थे उससे और आपकी पोस्ट पढ़कर यही कह सकते है कि कंचन बहुत लोगों को प्रेरणा देती है। जितनी सुंदर कविता लिखती है उतनी ही सुंदर मन की भी है।
एक बहुत ही बढ़िया पोस्ट के लिए शुक्रिया ।
जी निवासन जी आपका संदेश बड़ा स्नेहपूर्ण था..! मेरी पहली पोस्टिंग दक्षिण भारत मे ही हुई थी..उस सुदूर प्रदेश से यूँ बी बहुत लगाव है मुझे…! आपका पता न जान सकी, परंतु इस स्नेह की कृतज्ञ हूँ …!
पारुल मुझे तो ऐसा लगता ही नही कि मैं तुम से मिली नही हूँ..!
शिव जी, लखनऊ में आपका स्वागत है..!
अजीत जी, निधि जी, सागर जी, संजीत जी, हिंदी ब्लॉगर, ममता जी एवं तरुण जी शुभाकांक्षा हेतु धन्यवाद
मीनाक्षी दी और लावण्या दी आप लोग तो हमेशा ही इतना स्नेह देती हैं कि बड़ी बहन की सीमा पार कर वो मातृत्व में बदल जाता है…लावण्या दी आपकी बात याद रखूँगी वैसे यही बात मीनाक्षी दी ने मेरे मेल में भी लिखी है…अपना स्नेह यूँ ही बनाये रखियेगा
मनीष जी आप के लिये कुछ नही….बस देर से आने की उलाहना
मीत जी आप तो हमेशा से आदरणीय रहे हैं, ये आप और जी अचानक कहाँ से आ गया …?
भईया के कमेंट के लिये तो अनूप जी आपको ही धन्यवाद बोलना पड़ेगा, क्योंकि मैने तो इनके मुँह से अपने लिये जो विशेषण सुना है वो है..सैलक्खी और पगलिया..:)
रचना दीदी आप का स्नेह है तो आप ऐसा कह रही हैं।
अनुराग जी इतने कम दिनो में एक लंबी फेहरिश्त है आपके चाहने वालों की और उनमें एक मैं हूँ आप की प्रशंसा बहुत मायने रखती है मेरे लिये..!
और अंत में धन्यवाद अनूप जी को जिन्होने इतने सारे लोगो का स्नेह मेरे लिये एकत्रित किया
Kanchan DIDI se main hamesha ashirwad mangta hun. Ab pata nahi ki woh bari hai yan main?
Di ke liye, kuchh bhi kahna,aasan nahi hai, aapne kafi sanyojit tareeke se unke jeevan ke bare me kaha hai, main bhi do shabda kahta hun apki baat me jod kar, maine ek aamul-chul badlav apne jeevan main paya is vyaktitva ke sampark me aane ke bad. apki lekhni ka koi kusur nahi hai, unki dastan hee esi hai, ki aansuon ko bhi rona aa jaye. Meri Pyari di ko kotishah naman.
कंचन को अब जाना…और इतने विलंब से आया इस पोस्ट पर। कुछ लोगों से मिलने-जानने के बाद जो एक विचित्र सा अहसास होता है कि क्यों इतनी देर से जाना…कुछ ऐसा ही अहसास कंचन को जानने के बाद…
जिस अधिकार से वो मेरी जिंदगी में चली आयी वो जरा भी अचरज भरा नहीं लगा, उल्टा एक अपरिभाषित-सा अपनापन लिये…
कंचन तुम, कंचन रहो हमेशा अनवरत सदैव-सदैव !
kanchan di k jivan k bare me pad kar hume yeh sikh mili ki, hume kathinaiyo se darna nahi chahiye balki uska dat kr mukabla karna chahiye. shukla sir, aapne bahut hi sahaj language me likha hai aapne kanchn di k bae me.kanchan di hum sab ko ashirwad dijiye
अब इनके बारे में मैं क्या कहूँ.. कुछ भी तो नहीं कह सकता ऐसी असाधारण शक्सियत के बारे में कुछ कहना अपने बस की बात तो नहीं है ,…मगर इस बात से जरुर इतफाक रखता हूँ के ये बहोत हड़कायू हैं ये तो मैं भली भाँती जानता हूँ… हा हा हा हा… अब मेरी खरियत की दुआएं करो आप सभी इस कड़वी सच्चाई के लिए…
मगर सलाम इनको यही कहूँगा और अल्लाह मियाँ से यही गुजारिश करूँगा के हमेशा ही इन्हें कंचन बनाए रखे…
अर्श
कंचन जी से आपकी मुलाक़ात को बयान करती इस पोस्ट को पढ़ा, और पढने के बाद सबसे पहले तारीख देखी की ये पोस्ट मुझसे छूट कैसे गई फिर सन देखा तो पताचला पिछले साल की पोस्ट है
कंचन जी से मेरा परिचय गुरु जी के ब्लॉग पर हुआ अब तो कंचन जी ka ब्लॉग नियमित पढता हूँ
किसी के जीवन संघर्ष को हम शब्दों में बयान नहीं कर सकते ख़ास कर उसका जिसका जीवन दुःख की छ्या में बीता हो
venus kesari
ek saal bad bhi utna hi sarthaka..
sochta hun salana ise padha karun, shayad mere sare depression door ho jaye ise padhkar..
पता नहीं कैसे-कैसे यहाँ तक आया… आया तो काफी उबा और थका हुआ था… माउस टिक करते करते जब बेमन से इसे पढना शुरू किया तो दिमाग के दोनों हिस्से जागने शुरू हुए… और अंत तक… आँखों में आंसू आये… लगा की फिर से जिस्म से जान आ गयी है… और जीवन चल रहा है… जिंदगी से दो-चार होता रहूँ… और क्या चाहिए… मैंने कंचन जी का कमेन्ट बहुत कम ही देखा है वो भी डॉ. अनुराग के ब्लॉग पर कभी कभार पढ़ा है… मगर एक ही चीज़ निकलकर सामने आये थी की वो बहुत भावुक हैं… मगर ऐसी जिजीविषा, औ जीवटता काबिल-ए-तारीफ है…
मैं आपका भी शुक्रगुजार हूँ जो आपने इनसे हमारा तार्रुफ़ करवाया…