दो दिन पहले ज्ञानजी ने अपनी पोस्ट में लिखा-
कल घोस्ट बस्टर जी ने मेरी पोस्ट पर टिप्पणी नहीं की। शायद नाराज हो गये। मेरा उन्हे नाराज करने या उनके विचारों से टकराने का कोई इरादा न था, न है। मैं तो एक सम्भावना पर सोच व्यक्त कर रहा था। पर उन्हें यह बुरा लगा हो तो क्षमा याचना करता हूं। उनके जैसा अच्छा मित्र और टिप्पणीकार खोना नहीं चाहता मैं।
इस पर घोस्ट बस्टर जी ने भी क्षमा की अर्जी ठेल दी और बोले-
सबसे पहले तो आपसे क्षमा मांग लें. आपके आज के शब्दों ने हमें वाकई शर्मसार कर दिया. कृपया ऐसा न कहें.
क्षमा-क्षमा की ट्क्कर का कचरा अभी भी इस पोस्ट पर पड़ा है देख लीजिये।
मोहल्ले वाले अविनाश ने अपने ब्लाग की काम भर की जगह में जो यहां नहीं आते आप वहां भी जायें
लिखकर प्रमोदजी, मनीषा, ज्ञानजी, अनिल रघुराज, ज्ञानजी, शिवकुमार मिश्र, सुजाता और हमारा माने अनूप शुक्ल का नाम लिख रहा है।
जहां तक मुझे याद है अविनाश ने मुझे जाहिल, कूपमंडूक और यथास्थितिवादी टाइप उपाधियां सस्नेह प्रदान की हैं। प्रमोद जी के लिये भी अभी लिखा वैसे भी अज़दकी बिलाड़ों का समूह ऐसी बहसों पर खाऊं खाऊं रहता है और भाषा में नकली छौंक से चमत्कार करने की कोशिश करता रहता है। ये कविता उन्हें असल देशज रोशनी दिखाएगी।
ये कैसा चरित्र है मीडिया से जुड़े लोगों का भाई कि जाहिलों, कूपमंडूकों के पास पब्लिक को खदेड़ रहे हैं। नकली भाषा की छौंक वाले का ब्लाग बांचने की सलाह दे रहे हैं। ई दुचित्तापन कैसा है जी?
अविनाश की बात तो ऐसे ही आ गयी लेकिन बात आम शिकायत की ही करना चाहते थे- आपने मेरे ब्लाग पर कमेंट नहीं किया क्या आप मुझसे नाराज हैं?
आपने मेरी मेल का जबाब नहीं दिया लगता है आप मुझसे खफ़ा हैं।
इसी तरह की और भी शिकायतें आपके अपने आपसे करते होंगे। शिकायत अपनों से ही की जाती है। इस स्वर्णिम सूत्र को थाम कर सारी शिकायतें उड़ेल दीजिये। शिकायत करना अपनापा प्रदर्शन का सबसे सरल उपाय है। हर्र लगे न फिटकरी अपनापा चोखा।
आपकी जो सबसे ज्यादा शिकायत करता है समझ लीजिये आपको सबसे ज्यादा चाहता।
यह हर जगह हो रहा है। हर आदमी अपने आप-पास से नाराज है। देश-समाज से परेशान है। शिकायत है हर एक को दूसरे से। यह शिकायत दूसरे के प्रति अपनापे का प्रतीक है। देश को दिलोजान से चाहने वाले ही देश के रेशे-रेशे के प्रति शिकायत रख सकते हैं।
कहां से कहां पहुंच गये। ज्ञान गली , मोहल्ला रोड से होते हुये देश का बखान होने लगा।
कहना सिर्फ़ हम यह चाहते थे कि (और हैं भी) कि टिप्पणी को अपने प्रति प्रेम का पैमाना न बनायें। बहुत लोग हैं जो आपसे बहुत खुश होंगे लेकिन आपके ब्लाग पर टिपियाते नहीं। टिप्पणी तो क्षणिक है जी। प्रेम शाश्वत है। आराम से प्रकट होगा।
हमारे तमाम दोस्त हैं जो मेरे ब्लाग पर टिप्पणी नहीं करते। लेकिन जब पढ़ते हैं जबरिया सलाह देते हैं। ये अच्छा है, वो कूड़ा है। ये क्यों लिखा, वो क्यों लिखा। बहुत दिन से मजेदार नहीं लिखा, टाइप्ड हो गया, इससे अच्छा लिखना बंद कर दो, अरे लिखना बंद क्यों कर दिया। अजब हो यार! हमने तो मजाक किया था।
अब ऐसे दोस्तों से हम शिकायत करें ,वो भी अपने ब्लाग पर, कि तुम मेरे ब्लाग पर कमेंट नहीं करते तो कित्ती अजब-गजब बात होगी। है कि नहीं?
बहुत दिन के अपने अनुभव से बताते हैं कि टिप्पणी किसी पोस्ट पर आयें या न आयें लिखते रहें। टिप्पणी से किसी की नाराजगी /खुशी न तौले। मित्रों के कमेंट न करने को उनकी नाराजगी से जोड़ना अच्छी बात नहीं है। मित्रों के साथ और तमाम तरह के अन्याय करने के लिये होते हैं। फ़िर यह नया अन्याय किस अर्थ अहो?
हमारे लिये टिप्पणी तो मन की मौज है। जब मन , मौका, मूड होगा -निकलगी। टिप्पणी का तो ऐसा है- टिप्पणी करी करी न करी।
पठनीय
अगर आपने यह लेख न पढ़ा हो तो अवश्य बांचे। ये लिखते हैं-
अयं कः।
अयं ब्लागरः
ब्लागरं किं करोति
कटपट-पश्यति-खटपट- पश्यति, क्लिकति पुनपुनः मूषकम्।
अब बतायें ऐसा शोध लेख लिखने के बावजूद अनिल यादव की इस पोस्ट पर कोई टिपिया नहीं रहा है तो क्या लोग इनसे नाराज हैं।
तकनीकी कारणों से वहां तारीफ़ न कर पायें यहीं कर दें। उन तक शायद पहुंच जायें।



लगता है आप मुझसे नाराज हैं. आपने मेरी पिछली तीन पोस्ट पर कमेन्ट नहीं किया…..
सवेरे आपने टिप्पणी मना कर रखी थी, सो चार घण्टे की देर हो गयी टिप्पणी करने में।
चार घण्टे के लिये क्षमा क्षमा क्षमा क्षमा याचना।
ज्ञानजी, हमें पता है कि आपको क्षमा-वमा से मतलब नहीं है। आप मौज ले रहे हैं। क्षमा-वमा का हिसाब-किताब आपै करॊ। हमें तो उत्पात ही करनें दें।
‘शिकायत करना अपनापा प्रदर्शन का सबसे सरल उपाय है।’
तब तो हमरी भी शिकायत दर्ज़ की जाए . वरना जनता सोचेगी आत्मीयता नहीं है हममें . है जी है . लो कर दी शिकायत .
चलिए अपना असमंजस दूर कर हम भी टिपण्णी कर ही देते हैं… वैसे हमें किसी से शिकायत नहीं है… जो हमारे यहाँ टिपण्णी करते हैं उनके लिए आभार जरूर है
टिप्पणी_ करी करी न करी ” satya vachan
हमें तो जब से प्रमोदसिंह ने हड़काया है कि माई-बापू के रहते टिप्पणियों के लिए रोवत हो, सरम नहीं न आती ? सो तबसे टिप्पणी मोह से दूर हो गए। हम यही समझे है कि अनाथों की तरह टिप्पणियों का आसरा चाहना शोभा नहीं देता । यही प्रमोदबाबू समझाना चाहते थे।
बाकी आपने सही लिखा है। सहमत है।
चलो हटो भी ?
खुद तो पता नहीं कबसे मुझे टिप्पणी नहीं दी, अउर ईहाँ बापू आसाराम बन के पिंगल छाँट रहे हो !
रेशमी मसनद का टेक लगाय के विहँस विहँस माया का पाठ पढ़ाना कउन मुस्किल है ?
आजै नवा चौंचक सूट पहन के निकरो अउर कउनो मेहरिया कनखिओ से ना देखे , तो लौट के.. ई पाठ पढ़ायो !
शिकायत का मौका न देते हुए टिप्पणी कर रहा हूँ. पहले आपने ही टिप्पणी लेने से मना कर रखा था.
शिकायत करना अपनापा प्रदर्शन का सबसे सरल उपाय है- इसी बात को मद्देनजर रखते हुए शिकायत है कि व्यक्तिगत वार्तालाप को सार्वजनिक करना भी क्या अपनापा प्रदर्शन का ही कोई उपाय है??
आप ज्ञानी है, अनुभवी हैं और वस्तु स्थिति का विश्लेषण कर लेते हैं, इसीलिये इस शिकायत के माध्यम से सलाह चाह रहा था.
समीरजी, व्यक्तिगत वार्तालाप को सार्वजनिक करना अपनापा प्रदर्शन करने का उपाय है या नहीं यह इस बात पर निर्भर करता है कि व्यक्तिगत वार्तालाप कैसे, किससे, किस उद्देश्य से हुआ और उसको सार्वजनिक किस उद्देश्य से किया गया। अगर व्यक्तिगत वार्तालाप को सार्वजनिक करने से वार्ताकार को तकलीफ़ होती है तब तो यह निंदनीय भी कहलायेगा।
आपकी शिकायत जायज है। जो हुआ उसका पूरा निराकरण तो नही हो सकता लेकिन जित्ता हो सके उत्ते के लिये इस पोस्ट से व्यक्तिगत वार्तालाप हटा दिया। आपकी टिप्पणी भी इसी क्रम में संसोधित की गयी है।
एक के साथ एक फ़्री के मौसम में एक बात जिसको मानता हूं वह बता रहा हूं वह यह है कि अगर आप अपने अलावा किसी से बतिया रहे हैं तो यह समझकर बतियाइये कि सारी दुनिया से बतिया रहे हैं। अपने अलावा किसी से भी गयी बातें देर-सबेर लोगों को पता चल ही जाती हैं। इति श्री सलाह चर्चा।
सही बात कही – टिप्पणी करी करी , न करी !
कुछ तो करी, पंसद ही करी -अगर समय का आभाव हो तो मै तो ऐसा ही करती हूँ .
आप तो सिरियस मोड में आ गये सलाह देते देते.
ऎ भाई,
आप लोग अपना सल्टियाते रहो, आओ पहले एक टिप्पणी ठेलो हमरे गली मा !
देखि लेयो, इसी बहाने आपका टिप्पणी संख्या यक ठईं अउर बढ़ा दिया, काहे अपना कर्ज़ा
बढ़ाये जा रहे हो ? ई कर्ज़वा तो सोनिया गाँधी माफ़ करे से रहीं !
अपने अपने तर्क सही हो सकते हैं,किंतु मेरा यह मानना है कि बिना सहमति कुछ भी सार्वज़निक
किया जाना उचित नहीं लगता । बात दीगर है कि जग जानता है कि चोली के पीछे क्या है, फिर भी चोली में खुल्लम-खुल्ला हाथ नहीं डाल देता । क्षमा करें, उपमा कुछ बेहूदी किसिम की लिख
गयी है, किंतु इस बक्से के नीचे से स्वानुभूति की याद भी तो दिलायी जा रही है । यही सही !
टिप्पणी स्वतःस्फूर्त रहे तभी उसका असल आनंद है।
अलहियाकानी, नाखूनतानी जबान में टिप्पणी करूं, चलेगा?या मुंहबिरानी बान में? लेकिन ठहरिये, अभी पंद्रह सवाल और हैं, उनको सलटाय लें, फिर तय करें आपके यहां टिपियाने पर कवन रूख लें..
हम तो ६ घँटे पूर्व आये थे तब आपका पन्ना खुल ही नहीँ रहा था –
अभी दुबारा पढकर कह देते हैँ
- “उपस्थित ”
-लावण्या
ऐसी टिप्पणी चर्चा पढ़कर तो मुझे अपना संतोषी मन ही ठीक लग रहा है। शुरू में थोड़ा खटकता था, लेकिन अबतो यह मान बैठा हूँ कि यह सब मेरे लिए नहीं है। हाँ आदरणीय ज्ञानजी का जो समर्पण मैने ब्लॉग जगत के प्रति देखा है उसके हिसाब से वे बेशुमार टिप्पणियों के अधिकारी हैं।
आख़िर आपकी यह पोस्ट भी टिप्पणी ललचाऊ बन गयी !
हम तो इतने दिन बाद छुपते-छुपाते आए लेकिन टिप्पणी करने के मोह से बच न पाए
अनूप जी मैंने आपके इस पोस्ट को पढ़ा था और टिप्पणी भी की थी …..आप भूल गए न रियाया को !
लगता है आप मुझसे नाराज हैं. आपने मेरी पिछली तीन पोस्ट पर कमेन्ट नहीं किया…..
‘शिकायत करना अपनापा प्रदर्शन का सबसे सरल उपाय है।’
हमने तो करी और आपको भी करनी होगी ! कैसे नहीं करेंगे हमारी उधार है आप पर
[...] टिप्पणी_ करी करी न करी [...]
[...] टिप्पणी_ करी करी न करी [...]
[...] टिप्पणी_ करी करी न करी [...]