फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

26 responses to “टिप्पणी_ करी करी न करी”

  1. Shiv Kumar Mishra

    लगता है आप मुझसे नाराज हैं. आपने मेरी पिछली तीन पोस्ट पर कमेन्ट नहीं किया….. :)

  2. Gyandutt Pandey

    सवेरे आपने टिप्पणी मना कर रखी थी, सो चार घण्टे की देर हो गयी टिप्पणी करने में।
    चार घण्टे के लिये क्षमा क्षमा क्षमा क्षमा याचना। :-)

    ज्ञानजी, हमें पता है कि आपको क्षमा-वमा से मतलब नहीं है। आप मौज ले रहे हैं। क्षमा-वमा का हिसाब-किताब आपै करॊ। हमें तो उत्पात ही करनें दें। :)

  3. प्रियंकर

    ‘शिकायत करना अपनापा प्रदर्शन का सबसे सरल उपाय है।’

    तब तो हमरी भी शिकायत दर्ज़ की जाए . वरना जनता सोचेगी आत्मीयता नहीं है हममें . है जी है . लो कर दी शिकायत .

  4. Abhishek Ojha

    चलिए अपना असमंजस दूर कर हम भी टिपण्णी कर ही देते हैं… वैसे हमें किसी से शिकायत नहीं है… जो हमारे यहाँ टिपण्णी करते हैं उनके लिए आभार जरूर है :-)

  5. parul

    टिप्पणी_ करी करी न करी ” satya vachan

  6. अजित वडनेरकर

    हमें तो जब से प्रमोदसिंह ने हड़काया है कि माई-बापू के रहते टिप्पणियों के लिए रोवत हो, सरम नहीं न आती ? सो तबसे टिप्पणी मोह से दूर हो गए। हम यही समझे है कि अनाथों की तरह टिप्पणियों का आसरा चाहना शोभा नहीं देता । यही प्रमोदबाबू समझाना चाहते थे।
    बाकी आपने सही लिखा है। सहमत है।

  7. डा०अमर कुमार

    चलो हटो भी ?
    खुद तो पता नहीं कबसे मुझे टिप्पणी नहीं दी, अउर ईहाँ बापू आसाराम बन के पिंगल छाँट रहे हो !

    रेशमी मसनद का टेक लगाय के विहँस विहँस माया का पाठ पढ़ाना कउन मुस्किल है ?
    आजै नवा चौंचक सूट पहन के निकरो अउर कउनो मेहरिया कनखिओ से ना देखे , तो लौट के.. ई पाठ पढ़ायो !

  8. संजय बेंगाणी

    शिकायत का मौका न देते हुए टिप्पणी कर रहा हूँ. पहले आपने ही टिप्पणी लेने से मना कर रखा था.

  9. समीर लाल

    शिकायत करना अपनापा प्रदर्शन का सबसे सरल उपाय है- इसी बात को मद्देनजर रखते हुए शिकायत है कि व्यक्तिगत वार्तालाप को सार्वजनिक करना भी क्या अपनापा प्रदर्शन का ही कोई उपाय है??

    आप ज्ञानी है, अनुभवी हैं और वस्तु स्थिति का विश्लेषण कर लेते हैं, इसीलिये इस शिकायत के माध्यम से सलाह चाह रहा था.

    समीरजी, व्यक्तिगत वार्तालाप को सार्वजनिक करना अपनापा प्रदर्शन करने का उपाय है या नहीं यह इस बात पर निर्भर करता है कि व्यक्तिगत वार्तालाप कैसे, किससे, किस उद्देश्य से हुआ और उसको सार्वजनिक किस उद्देश्य से किया गया। अगर व्यक्तिगत वार्तालाप को सार्वजनिक करने से वार्ताकार को तकलीफ़ होती है तब तो यह निंदनीय भी कहलायेगा।

    आपकी शिकायत जायज है। जो हुआ उसका पूरा निराकरण तो नही हो सकता लेकिन जित्ता हो सके उत्ते के लिये इस पोस्ट से व्यक्तिगत वार्तालाप हटा दिया। आपकी टिप्पणी भी इसी क्रम में संसोधित की गयी है।

    एक के साथ एक फ़्री के मौसम में एक बात जिसको मानता हूं वह बता रहा हूं वह यह है कि अगर आप अपने अलावा किसी से बतिया रहे हैं तो यह समझकर बतियाइये कि सारी दुनिया से बतिया रहे हैं। अपने अलावा किसी से भी गयी बातें देर-सबेर लोगों को पता चल ही जाती हैं। इति श्री सलाह चर्चा। :)

  10. sujata

    सही बात कही – टिप्पणी करी करी , न करी !

  11. abha

    कुछ तो करी, पंसद ही करी -अगर समय का आभाव हो तो मै तो ऐसा ही करती हूँ .

  12. समीर लाल

    आप तो सिरियस मोड में आ गये सलाह देते देते. :)

  13. anitakumar

    :) आज प्रवचन देने के मूड में हैं? सच है शिकायत अपनापन दिखाने का तरीका है , देखिए हम शिकायत कर रहे हैं कि आज हम प्रवचन सुनने के मूड में नहीं थे और “मेरी पंसद” भी नहीं डाला, कितना अपनापन दिखा रहे हैं, है न?

  14. डा० अमर कुमार

    ऎ भाई,
    आप लोग अपना सल्टियाते रहो, आओ पहले एक टिप्पणी ठेलो हमरे गली मा !
    देखि लेयो, इसी बहाने आपका टिप्पणी संख्या यक ठईं अउर बढ़ा दिया, काहे अपना कर्ज़ा
    बढ़ाये जा रहे हो ? ई कर्ज़वा तो सोनिया गाँधी माफ़ करे से रहीं !

    अपने अपने तर्क सही हो सकते हैं,किंतु मेरा यह मानना है कि बिना सहमति कुछ भी सार्वज़निक
    किया जाना उचित नहीं लगता । बात दीगर है कि जग जानता है कि चोली के पीछे क्या है, फिर भी चोली में खुल्लम-खुल्ला हाथ नहीं डाल देता । क्षमा करें, उपमा कुछ बेहूदी किसिम की लिख
    गयी है, किंतु इस बक्से के नीचे से स्वानुभूति की याद भी तो दिलायी जा रही है । यही सही !

  15. Manish Kumar

    टिप्पणी स्वतःस्फूर्त रहे तभी उसका असल आनंद है।

  16. प्रमोद सिंह

    अलहियाकानी, नाखूनतानी जबान में टिप्‍पणी करूं, चलेगा?या मुंहबिरानी बान में? लेकिन ठहरिये, अभी पंद्रह सवाल और हैं, उनको सलटाय लें, फिर तय करें आपके यहां टिपियाने पर कवन रूख लें..

  17. लावण्या

    हम तो ६ घँटे पूर्व आये थे तब आपका पन्ना खुल ही नहीँ रहा था –
    अभी दुबारा पढकर कह देते हैँ
    - “उपस्थित ” :)
    -लावण्या

  18. siddharth

    ऐसी टिप्पणी चर्चा पढ़कर तो मुझे अपना संतोषी मन ही ठीक लग रहा है। शुरू में थोड़ा खटकता था, लेकिन अबतो यह मान बैठा हूँ कि यह सब मेरे लिए नहीं है। हाँ आदरणीय ज्ञानजी का जो समर्पण मैने ब्लॉग जगत के प्रति देखा है उसके हिसाब से वे बेशुमार टिप्पणियों के अधिकारी हैं।

  19. Dr.Arvind Mishra

    आख़िर आपकी यह पोस्ट भी टिप्पणी ललचाऊ बन गयी !

  20. Sanjeet Tripathi

    हम तो इतने दिन बाद छुपते-छुपाते आए लेकिन टिप्पणी करने के मोह से बच न पाए ;)

  21. arvind mishra

    अनूप जी मैंने आपके इस पोस्ट को पढ़ा था और टिप्पणी भी की थी …..आप भूल गए न रियाया को !

  22. प्रवीण त्रिवेदी-प्राइमरी का मास्टर

    लगता है आप मुझसे नाराज हैं. आपने मेरी पिछली तीन पोस्ट पर कमेन्ट नहीं किया….. :)

    ‘शिकायत करना अपनापा प्रदर्शन का सबसे सरल उपाय है।’

  23. विवेक सिंह

    हमने तो करी और आपको भी करनी होगी ! कैसे नहीं करेंगे हमारी उधार है आप पर :)

  24. टिप्पणी का शास्त्र और मनोविज्ञान « उठो !जागो!

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  25. टिप्पणी का शास्त्र और मनोविज्ञान भाग- एक « उठो !जागो!

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  26. टिप्पणी का शास्त्र और मनोविज्ञान भाग- एक « उठो! जागो!

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