फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

19 responses to “पानी बरसा जोर से”

  1. अभय तिवारी

    आप का गीत भी सफ़दर की टक्कर का है!

  2. प्रभाकर पाण्डेय

    बहुत ही मजेदार रचनाएँ। सादर आभार।

  3. Gyan Dutt Pandey

    हचक के पढ़े दोहे। इतने मस्त कि बार-बार पढ़ने पर हिचकी आने लगी। लगता है – कवि महराज ही याद करने लगे – “अब पढ़ना छोड़ो, टिपियाओ!”

  4. Shiv Kumar Mishra

    आती बारिश देख के कवी गए बौराय
    ब्लॉगर सारे पढ़ रहे सर पे मस्ती छाय

    बहुत खूब धोये…सॉरी दोहे.

  5. सतीश पंचम

    सूरज भागा जोर से, छुपा बादलों की ऒट,
    जैसा कोई नेता भगे, डलवा के सब वोट।
    - बहुत अच्छा

  6. दिनेशराय द्विवेदी

    बारिश से फिसलन भई, फिसलें लोग-लुगाय।
    फिसल रहे जै सबद भी, छंदन में न समाँय।।

  7. Ghost Buster

    भीगे भीगे से कवित्त फुरसतिया बिखराएँ
    संभल संभल कर पढ़ रहे कहीं फिसल ना जायें
    कहीं फिसल ना जायें कि टूटे हड्डी पसली
    श्रीमती घोस्ट बस्टर को हो जाए तसल्ली
    कब से कहती रहीं कि छोडो चिट्ठा विट्ठा
    पड़ें झेलने सौ पचास डायलॉग इकठ्ठा

  8. विवेक रस्तोगी

    बहुत ही बढिया, आपकी साहित्यिक शैली बहुत ही पसंद आयी ।

  9. संजय बेंगाणी

    पूरे के पूरे भीग गए….यू छमछम बरसे सबद.

  10. डा०अमर कुमार

    सूखाग्रस्त की फ़ाइल पे साहेब दीन टिपियाय
    पकौड़ी मुँह मा टूँगि कै, बोलै धीमें से मुस्काय
    एहिमाँ अब का धरा है एहिका देयो बिसराय
    बाढ़ग्रस्त की फाइल चलाओ पइसा वहीं दिखाय

  11. abha

    ज्ञान भाई की तरह मै भी पढ़ रही हूँ. जोर की बारिश का रंग जोरदार है..।

  12. Advocate Rashmi Saurana

    bhut sundar. pahali bar aapke blog par aai. aapko padhana bhut achha laga. ati uttam. jari rhe.

  13. RC Mishra

    बहुत मज़ेदार, यहां भी इस समय रिमझिम चल रही है!

  14. प्रभात टन्डन

    बच्चा भीगत देखि के, मम्मी दिहिन एक कंटाप,
    रेन डांस जब शुरू भा, फ़ट थिरकन लगीं आप।

    जबर्दस्त :) बिल्कुल मूसलाधार बारिश की तरह :)

  15. लावण्या

    वाह जी वाह अँदाज खालिस सुकुल जी का
    कविता, बरसात की ,तब तो,
    आनँद ही आनँद :)

  16. समीर लाल

    बारिश बरसत जात है, भीगत एक समान,
    पानी को सब एक हैं, हिन्दु औ’ मुसलमान.

    फुरसतिया भी भीगकर, बदल गये हैं यार
    गद्य छोड़ कर आ गये, कविता के दरबार.

    अब तो कोई गम नहीं, बारिश हो या बाढ़
    कविता में भी आप तो, सबको दये पछाड़.

    –बहुत बढ़िया भीगे, महाराज बारिश में. और भीगये. शुभकामनाऐं.

  17. अनूप भार्गव

    सुन्दर …
    भीग गये अन्दर अन्दर तक …

  18. anitakumar

    ह्म्म तो बरसात का रंग फ़ुरसतिया जी पर भी चढ़ गया, कविताई पर उतर आए…।बहुत खूब बहुत खूब, क्या खूब रंग जमा दिए
    पानी बरसत देखिकर, गैयन करी पुकार,
    चलौ बैठकी करन को, चौराहा रहा पुकार।

    वाह क्या कल्पना है…:)

  19. rajni bhargava

    क्या कहने कविराय!बरसात का खूब मज़ा ले रहें हैं आप। बहुत दिनो बाद आपको फ़ुर्सत से बैठ कर पढ़ा है।

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