
कल बारिश में बाहर निकलना हुआ। कुछ् दिखा। उसे आपको भी दिखाता क्या, बताता हूं।
१. एक मौरम से लदा एक ट्रक कीचड़ और पानी में फ़ंसा था। उसका अगला पहिया मंहगाई की तरह ऊपर उठा था, पिछला हिस्सा खरीददारी की औकात की तरह नीचे जा रहा था। ट्रक वाले ने बालू ज्यादा लाद ली होगी। ऊपर से इंद्र देवता ने झल्ला के पानी हचक के बरसा दिया। सड़क ने भी बारिश के स्वागत में दिल खोल दिया और ट्रक उस दिल में समा गया।
२. बारिश में सड़कों का पानी के साथ बह जाना आम बात है। जैसे ही कोई सड़क बही लोग भ्रष्टाचार को गरियाने लगते हैं। लोग पैसा क्या पूरी सड़क खा गये।
सड़क चाहे जित्ती ईमानदारी से बनायी जाये लेकिन जब तक उसके किनारे पानी की निकासी की व्यवस्था नहीं होगी सड़क बह जायेगी। सड़क पर जमा हुआ पानी सड़क के लिये जानलेवा है। १०% -२०% की बेईमानी को गरियाते-गरियाते लोग ८०%-९०% चिरकुट प्लानिंग को अनदेखा कर देते हैं।
भ्रष्टाचार की आड़ में चिरकुट योजनाविद मलाई काटते हैं। खराब योजना भ्रष्टाचार से ज्यादा खतरनाक है। यह भी तब जब ज्यादातर लोगों को योजना बनाकर काम करना सबसे बड़ी चिरकुटई लगती है।

३. सड़क पर के गढ्ढे और गढ्ढे और गढ्ढे में धंसी सड़क भारत के स्वर्णिम अतीत का अनायास भान कराते हैं। बचपन में पढ़ा हुआ इतिहास भड़ से याद आ जाता है -मोहनजोदाड़ो और हड़प्पा में पानी की निकासी की उत्तम व्यवस्था थी।
४. सड़क पर भरा पानी, पटरी पर बैठे दुकानदारों को डराने का प्रयास करता है। लेकिन जब पानी देखता है कि यहां पटरी पर तो प्लास्टिक, रबड़ की जूते-चप्पलों की दुकानें सज गयीं, पालीथीन का मोलभाव होने लगा तो बेचारा शर्मा के थका-थका नाले,नाली, गटर,शटर में छुप जाता है। बादल भी जूते-चप्पल की दुकाने देखकर डर जाता है कि ससुरे कहीं जुतिया न दें।
५. ऊपर की बात से यह निष्कर्ष निकालना गलत न होगा कि जहां पानी ज्यादा बरसे वहां जूते-चप्पल की दुकान खुल जाने से पानी बन्द हो सकता है। यह् हर जगह सफ़ल होता है। अगर असफ़ल भी हुआ तो क्या हुआ? पानी बन्द न हो तो दुकान तो बन्द् हो ही सकती है।
६. बारिश में सड़क के किनारे खड़े एक उम्रदराज पेड़ से जमीन ने अपना समर्थन वापस ले लिया। पेड़ की सरकार गिर गयी। सड़क पर जाम लग गया। गाडियों की पेंपें-पेंपें और हार्नबाजी के बावजूद जब गाडियां टस से मस नहीं हुईं। तमाम भाईसाहब इधर होइये उधर होइये बेकार हो गये। अंतत: पुलिस के दो सिपाहियों ने मां-बहन का सहारा लिया। सारा ट्रैफिक थोड़ी देर में सीधा हो गया। जाम रास्ता, आम रास्ता हो गया।
अलग-थलग पड़े सैकड़ों भाईसाहब , बहनजी जिस काम को नहीं कर पाते उसी काम को एक मां_बहन मिलकर कर लेते हैं। इससे सिद्ध होता है कि संगठन में शक्ति है।

७.जैसे आपके सर पर उगे हुये बाल आपकी चांद को भिगाने से रोक नहीं सकते वैसे ही आपकी छत पर उगे पीपल, बरगद के पेड़ , चाहे उन पर कोई देवता बसते हों, छत को टपकने से बचा नहीं सकते। छत टपकने से बचाने के लिये पानी का छत से सटकना जरूरी है। छत पर ठहरा हुआ पानी दायें-बायें होकर नहीं निकलता। वह आज नहीं तो कल छत पर छेद करके ही नीचे बहेगा। इस मामले में पानी बहुत जिद्दी होता है। इसलिये अपनी छत हमेशा घुटी हुयी चांद की तरह रखें। छत का कोई भी कचरा आपके कमरे के आमलेट बनने की दिशा में बढ़ा हुआ कदम है।
८. बारिश में सड़क पर जमा हुआ पानी सभी के साथ एक समान व्यवहार करता है। वह कार और स्कूटर के इंजिन में एक ही इश्टाईल में घुसता है। अब यह बात अलग है कि आप स्कूटर की तरह कार को टेढ़ा करके उसको दौड़ाकर उछलते हुये उस पर बैठकर उसको झटके से गीयर में लाने की कोशिश नहीं कर पाते।
९. दफ़्तर में आपकी छत से टपकता हुआ पानी आपको इस बात का विश्वास दिलाता है कि भगवान अपने बंदों के पास अपनी करुणा का प्रसाद पहुंचानें में देर भले कर दे अधेर नहीं करता। वह जमीन के जिस टुकड़े को चाहता है उस तक पहुंच के रहता है चाहे इसके लिये उसे छत ही क्यों न फोड़नी पड़े। इसलिये छत और आपके के कमरे की फ़र्श का जब मिलन हो रहा हो तो आपको सब क्रिया-कलाप छोड़कर भगवान पर आस्था रखनी चाहिये और यह सोचना चाहिये कि भगवान को और भक्तों से भी मिलने जाना है इसलिये ये यहां से चले ही जायेंगे।
१०. भक्त और भगवान के मिलन में अगर आपको देर लगती दिखे तो आप चाय की चुस्कियों के बीच देश, समाज, जनता, नेता को अपने मन की स्थिति के अनुसार याद करते हुये समय काटिये। लेकिन कोई काम करने से पहले फ़ाइलों को वापस जरूर भेज देजिये ताकि वे आपके दफ़्तर में जब दुबारा आयें तो और भीगी हुयी हों।






छत टपकाने की गारण्टी वाले बरगद और पीपल कत्तई काटे भी नहीं जा सकते , चूँकि देवताओं पर खतरा है । विश्वविद्यालय के निर्माण विभाग में विशेष रूप से इस काम के लिए स्थायी पद पर एक मुसलिम कर्मी नियुक्त है।
सारे गद्यात्मक बिम्बों से पूरी तरह से सहमत.
चिरकुट प्लानिंग का एक उदाहरण पिछले बरस हमारे शहर में देखा गया. एक फ्लाईओवर बनाकर उदघाटन कर दिया गया. फ्लाईओवर के आस-पास सड़क बड़ी धाँसू बनाई गई. करीब छ महीने बाद प्लानिंग करने वालों को याद आया कि वे लोग मैनहोल बनाना भूल गए. बाद में उस धाँसू सड़क को पूरी तरह से खोद दिया गया. नई सड़क बनने में फिर से छ महीने लग गए.
आपका लेख पढ मुसकुराहट आगाई ऐसे
सही है ..बारिश से उपजी चिंतन मनन की मानसिक स्थिति .सही है
बहुत बढ़िया बिम्ब. उत्तम विवरण. मज़ा आ गया पढ़ कर. लगा जैसे हमारे शहर की ही बात हो रही है.
वर्षा में गरमागरम पकौड़े खाने सा आनन्द आया.
लगता है बारिश में भीगते हुए लिखा है. हम भी भीग लिए जी इन बिम्बों में.
खराब योजना भ्रष्टाचार से ज्यादा खतरनाक है।
यह तो बहुत पते की बात है।
गड्ढा खोदो…फिर पाटो । फिर खोदो…फिर पाटो …इस खुदाई में पाटने की ग़ुंज़ाइश और पाटने में फिर से खुदाई की ग़ुंज़ाइश बनाये रखने की समझदारी को आप चिरकुटई , भ्रष्टाचार पता नहीं किस झोंक में कह गये, अब तो….
आपके ‘ गर्व से कहो-हम भारतीय हैं ‘ पर मुझे संदेह होने लगा है, अनूप भाई !
बरसात की प्रतीक्षा है।
आम जनता की बारीश मेँ और भी दुर्दशा हुई जात है ..
बहुत सही चित्रण किये हो आप !
- लावण्या
अजी शरीर का 80% हिस्सा तो पानी ही है तो पानी से क्या घबराना, चाहे छ्त से आये या नल से , पानी के मजे लो, क्या कहा? हाल बुरा है तो उसके लिए पानी को क्युं दोष भाई , सड़कों को दोष दें। छ्त चांद सी घुटी रखे ये बात पते की है…।:) मजा आया पढ़ कर
यहाँ इलाहाबाद में पिछले पन्द्रह दिन से रोज़-ब-रोज़ मूसलाधार बारिश हो रही है। आपके सारे बिम्ब यहाँ सजीव हो उठे हैं। ख़ासकर, मेरे सरकारी आवास की छत तो जैसे मेनहोल की मौसी लगती है। सारा पानी सहेज कर नीचे भेज देती है, मेरे कंप्यूटर को भी स्नान करने की आदत पड़ती जा रही है। डरता हूँ कहीं इसे न्यूमोनिआ न पकड़ ले। दतर की फाल्स सीलिंग आधा ‘फाल’ कर चुकी है। वायरिंग को भींगने से ‘वाइरल’ हो गया फिर सन्निपात हो चुका है। आजकल प्राकृतिक हवा और रोशनी का आनन्द ले रहा हूँ। वैधानिक चेतावनी: यह बिम्ब नहीं सत्यकथा है।