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	<title>Comments on: जीवन अपने आप में अमूल्य है</title>
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	<description>हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै?</description>
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		<title>By: manoj kumar</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/468/comment-page-1#comment-44283</link>
		<dc:creator>manoj kumar</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 11 Jan 2010 02:37:40 +0000</pubDate>
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		<description>लिंक देने का शुक्रिया। बहुत ही अच्छा आलेख। विषय के विभिन्न पक्षों पर गंभीरता से चर्चा गई है। प्रभावकारी।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>लिंक देने का शुक्रिया। बहुत ही अच्छा आलेख। विषय के विभिन्न पक्षों पर गंभीरता से चर्चा गई है। प्रभावकारी।</p>
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		<title>By: ज्ञानजी हिंदी ब्लागजगत के मार्निंग ब्लागर हैं</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/468/comment-page-1#comment-25509</link>
		<dc:creator>ज्ञानजी हिंदी ब्लागजगत के मार्निंग ब्लागर हैं</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 13 Jul 2008 20:06:11 +0000</pubDate>
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		<description>[...] हैं न। उनके ब्लाग पर एक पोस्ट पढ़ी कि जीवन अपने आप में अमूल्य है। उसी से उत्साहित हुये। गरदन की रस्सी [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] हैं न। उनके ब्लाग पर एक पोस्ट पढ़ी कि जीवन अपने आप में अमूल्य है। उसी से उत्साहित हुये। गरदन की रस्सी [...]</p>
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		<title>By: महेन</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/468/comment-page-1#comment-25478</link>
		<dc:creator>महेन</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 13 Jul 2008 10:14:49 +0000</pubDate>
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		<description>पहली बार इस ओर आया। यह खबर गलती से मैनें भी देख ली थी किसी चैनल पर मगर कुछ ज़्यादा सोचा नहीं। ऐसी घटनाएं इतनी बहुतायत से होती हैं कि उनके प्रति हमारी संवेदनशीलता को बाहर निकलने में समय लग जाता है। एक संघर्षशील कवि की कुछ पंक्तियाँ याद आ रही है:
मैं मर जाउंगा पर मेरे जीवन का आनंद नही,
झर जाएंगे पत्र कुसुम तरु,
पर मधु-प्राण् वसंत नही,
सच है घन तम में खो जाते स्रोत सुनहरे दिन के,
पर प्राची से झरने वाली आशा का तो अंत नहीं।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>पहली बार इस ओर आया। यह खबर गलती से मैनें भी देख ली थी किसी चैनल पर मगर कुछ ज़्यादा सोचा नहीं। ऐसी घटनाएं इतनी बहुतायत से होती हैं कि उनके प्रति हमारी संवेदनशीलता को बाहर निकलने में समय लग जाता है। एक संघर्षशील कवि की कुछ पंक्तियाँ याद आ रही है:<br />
मैं मर जाउंगा पर मेरे जीवन का आनंद नही,<br />
झर जाएंगे पत्र कुसुम तरु,<br />
पर मधु-प्राण् वसंत नही,<br />
सच है घन तम में खो जाते स्रोत सुनहरे दिन के,<br />
पर प्राची से झरने वाली आशा का तो अंत नहीं।</p>
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		<title>By: अजित वडनेरकर</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/468/comment-page-1#comment-25321</link>
		<dc:creator>अजित वडनेरकर</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 10 Jul 2008 20:43:33 +0000</pubDate>
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		<description>सार्थक लेखन। सकारात्मक सोच को बढ़ावा देती, राह सुझाती पोस्ट लिखनेवाले 
अनूपजी का आभार। हावर्ड फास्ट की 
आदि विद्रोही मेरी भी प्रिय पुस्तकों में है। और हां , कविता की तारीफ करना तो भूल ही गया-लाजवाब है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सार्थक लेखन। सकारात्मक सोच को बढ़ावा देती, राह सुझाती पोस्ट लिखनेवाले<br />
अनूपजी का आभार। हावर्ड फास्ट की<br />
आदि विद्रोही मेरी भी प्रिय पुस्तकों में है। और हां , कविता की तारीफ करना तो भूल ही गया-लाजवाब है।</p>
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		<title>By: आत्महत्या: दोषी कौन? &#171; निंदा पुराण</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/468/comment-page-1#comment-25308</link>
		<dc:creator>आत्महत्या: दोषी कौन? &#171; निंदा पुराण</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 10 Jul 2008 17:02:54 +0000</pubDate>
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		<description>[...] से सोच रहा था इस विषय पर लिखने की पर आज अनूप जी के लेख ने उत्प्रेरक का कार्य किया। जब भी हम [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] से सोच रहा था इस विषय पर लिखने की पर आज अनूप जी के लेख ने उत्प्रेरक का कार्य किया। जब भी हम [...]</p>
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		<title>By: abha</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/468/comment-page-1#comment-25299</link>
		<dc:creator>abha</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 10 Jul 2008 14:41:53 +0000</pubDate>
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		<description>सामान बाध कर चल देते हैं ये बढ़िया रहा .....</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सामान बाध कर चल देते हैं ये बढ़िया रहा &#8230;..</p>
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		<title>By: Indra</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/468/comment-page-1#comment-25257</link>
		<dc:creator>Indra</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 10 Jul 2008 00:00:30 +0000</pubDate>
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		<description>bahut badhiya lekh!
bahut din baad blog dekhe, to ise padh kar anand aaya</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>bahut badhiya lekh!<br />
bahut din baad blog dekhe, to ise padh kar anand aaya</p>
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	<item>
		<title>By: vijayshankar</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/468/comment-page-1#comment-25250</link>
		<dc:creator>vijayshankar</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 09 Jul 2008 16:31:30 +0000</pubDate>
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		<description>&#039;सामूहिक लक्ष्य में असफ़लता के चलते लोगों को आत्महत्या करने के किस्से नहीं सुनने को मिलते हैं। aur &#039;सामूहिकता का एहसास लोगों में आस्था और विश्वास पैदा करता है।&#039;- yehi hai taale ki chaabi, lekin sampradayik log kahan mel-jol badhane dete hain? kabhee jaati ke naam par akela karenge, kabhi dharm ke naam par, kabhee kshtera ke nam par. ye saamoohik hatyare hain.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>&#8216;सामूहिक लक्ष्य में असफ़लता के चलते लोगों को आत्महत्या करने के किस्से नहीं सुनने को मिलते हैं। aur &#8216;सामूहिकता का एहसास लोगों में आस्था और विश्वास पैदा करता है।&#8217;- yehi hai taale ki chaabi, lekin sampradayik log kahan mel-jol badhane dete hain? kabhee jaati ke naam par akela karenge, kabhi dharm ke naam par, kabhee kshtera ke nam par. ye saamoohik hatyare hain.</p>
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		<title>By: नीरज दीवान</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/468/comment-page-1#comment-25246</link>
		<dc:creator>नीरज दीवान</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 09 Jul 2008 15:56:43 +0000</pubDate>
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		<description>अद्भुत प्रेरक लेख बन पड़ा है. असफलता का मज़ा लेने की हिम्मत बहुत कमों में होती है. बच्चे तो फिर भी बच्चे हैं. हमारा समाज ही कुछ इस तरह का है कि असफलता हाथ लगी नहीं कि धिक्कारना और ताने देना शुरू कर देता है. कुछ तो असफलता की आशंका में मारे फिरते हैं. 
एक असफल व्यक्ति ही जानता है कि सफलता किन रास्तो से गुज़रती है.. मुझ जैसों को देखकर तो सफलता ही रास्ता बदल लेती है. 
कई दिनों बाद आपका लेख पड़ा.. हास्य की परतें उतारते हुए गंभीरता की ओर ले गए..</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अद्भुत प्रेरक लेख बन पड़ा है. असफलता का मज़ा लेने की हिम्मत बहुत कमों में होती है. बच्चे तो फिर भी बच्चे हैं. हमारा समाज ही कुछ इस तरह का है कि असफलता हाथ लगी नहीं कि धिक्कारना और ताने देना शुरू कर देता है. कुछ तो असफलता की आशंका में मारे फिरते हैं.<br />
एक असफल व्यक्ति ही जानता है कि सफलता किन रास्तो से गुज़रती है.. मुझ जैसों को देखकर तो सफलता ही रास्ता बदल लेती है.<br />
कई दिनों बाद आपका लेख पड़ा.. हास्य की परतें उतारते हुए गंभीरता की ओर ले गए..</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/468/comment-page-1#comment-25245</link>
		<dc:creator>सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 09 Jul 2008 15:55:26 +0000</pubDate>
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		<description>अनूप जी, एक दिन मैं अपनी पत्नी और बच्चों के साथ इलाहाबाद से लखनऊ के लिए सुबह-सुबह अपनी गाड़ी से निकला। फाफामऊ में गंगाजी के पुल पर ट्रकों का जाम लगा था। गाड़ी बन्द करके नीचे उतर रहा था कि मेरी नज़र पुल की रेलिंग से नदी की ओर लटक कर रो रहे एक जवान लड़के पर पड़ी। मैं घबराकर उधर दौड़ पड़ा। मैने इशारे से एक-दो साइकिल वालों को रोका तो वे कौतूहल से वहाँ आ गए। लम्बी कतार में मौजूद अनेक ट्रकों के ड्राइवर अपनी जगह से उसे देख रहे थे। मैं उसके नजदीक गया और लगभग डाँटते हुए रेलिंग के इस पार आने को कहा। उसकी रुलाई और बढ़ गयी। …पर उसे छूने की हिम्मत किसी को नहीं थी। कुछ घुड़की और कुछ मान-मनौवल के बाद वह इसपार गया। क्यों मरना चाहते हो? …मुझे बीमारी है, काफी दवा के बाद भी ठीक नहीं हो रही है। …मैं तो कबका कूद गया होता, लेकिन अम्मा की बहुत याद आ रही है। …वह बहुत रोएगी। …वह बेतहाशा रोता रहा। 
तभी जाम रास्ता खुल गया। सारी भीड़ एकाएक गायब हो गयी। मेरी गाड़ी के पीछे वाले जोरदार हॉर्न देने लगे। मैने उन्हें बगल से निकल जाने का इशारा किया। सबने निष्कर्ष निकाला कि नाटक कर रहा है और चलते बने। मैं थोड़ी दुविधा में पड़ गया। लखनऊ में तय कार्यक्रम में शामिल होना भी जरूरी था, और इसे यहाँ अकेले छोड़कर जाना भी ठीक नहीं लग रहा था। मैने अपने मित्र पुलिस उपाधीक्षक को फोन मिलाया और अपनी चिन्ता से अवगत कराया। उन्होंने मुझे निश्चिन्त कराते हुए कहा कि आप आराम से जाइए, मैं किसी सिपाही को भेजता हूँ। …मै एक चिन्ता लिए वहाँ से चल पड़ा।
रास्ते भर मुझे यह सोच सालती रही कि हम ऐसे मौकों पर भी कितने आत्म-केन्द्रित हो जाते हैं। एक ज़िन्दगी क्या इतनी बेमानी हो गयी है?</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अनूप जी, एक दिन मैं अपनी पत्नी और बच्चों के साथ इलाहाबाद से लखनऊ के लिए सुबह-सुबह अपनी गाड़ी से निकला। फाफामऊ में गंगाजी के पुल पर ट्रकों का जाम लगा था। गाड़ी बन्द करके नीचे उतर रहा था कि मेरी नज़र पुल की रेलिंग से नदी की ओर लटक कर रो रहे एक जवान लड़के पर पड़ी। मैं घबराकर उधर दौड़ पड़ा। मैने इशारे से एक-दो साइकिल वालों को रोका तो वे कौतूहल से वहाँ आ गए। लम्बी कतार में मौजूद अनेक ट्रकों के ड्राइवर अपनी जगह से उसे देख रहे थे। मैं उसके नजदीक गया और लगभग डाँटते हुए रेलिंग के इस पार आने को कहा। उसकी रुलाई और बढ़ गयी। …पर उसे छूने की हिम्मत किसी को नहीं थी। कुछ घुड़की और कुछ मान-मनौवल के बाद वह इसपार गया। क्यों मरना चाहते हो? …मुझे बीमारी है, काफी दवा के बाद भी ठीक नहीं हो रही है। …मैं तो कबका कूद गया होता, लेकिन अम्मा की बहुत याद आ रही है। …वह बहुत रोएगी। …वह बेतहाशा रोता रहा।<br />
तभी जाम रास्ता खुल गया। सारी भीड़ एकाएक गायब हो गयी। मेरी गाड़ी के पीछे वाले जोरदार हॉर्न देने लगे। मैने उन्हें बगल से निकल जाने का इशारा किया। सबने निष्कर्ष निकाला कि नाटक कर रहा है और चलते बने। मैं थोड़ी दुविधा में पड़ गया। लखनऊ में तय कार्यक्रम में शामिल होना भी जरूरी था, और इसे यहाँ अकेले छोड़कर जाना भी ठीक नहीं लग रहा था। मैने अपने मित्र पुलिस उपाधीक्षक को फोन मिलाया और अपनी चिन्ता से अवगत कराया। उन्होंने मुझे निश्चिन्त कराते हुए कहा कि आप आराम से जाइए, मैं किसी सिपाही को भेजता हूँ। …मै एक चिन्ता लिए वहाँ से चल पड़ा।<br />
रास्ते भर मुझे यह सोच सालती रही कि हम ऐसे मौकों पर भी कितने आत्म-केन्द्रित हो जाते हैं। एक ज़िन्दगी क्या इतनी बेमानी हो गयी है?</p>
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