
प्रेमी-प्रेमिका की झील सी गहरी आंखों में बिना लाइफ़ जैकेट के कूद गया। तैरना नहीं जानता फ़िर भी बेखौफ़ छ्प्प- छैंया करता रहा। इस तरह की बेवकूफ़ी कोई बावरा प्रेमी ही कर सकता है। प्रेम-मंदिर में प्रवेश के लिये अकल-पादुकायें उतारके बाहर रखनी पड़ती हैं!
अचानक प्रेमिका ने कजरारे नैनों के इशारे से बताया प्रेमी से कुछ कहा। उसके होंठ मूक फ़िल्मों की हीरोइन की तरह सिर्फ़ हिल रहे थे, बोलने का काम आंखों ने संभाल रखा था। प्रेमी समझा वो लिपिस्टिक के शेड की तारीफ़ सुनना चाह रही सो उसने तारीफ़ शुरू कर दी। उसने फ़िर नैन कटारी से घायल किया। प्रेमी ने प्रेमिका के मुखड़े, दुखड़े, बाल, गाल, होंठ के बारे में सब झूठ बोल डाले लेकिन प्रेमिका की कतल-कटारी चलती ही रही। प्रेमी को समझ ही में नहीं आ रहा था कि दिलरुबा चाहती क्या है।
आखिर में प्रेमिका ने झल्लाकर अपने संवाद का स्तर नीचा किया और आंखों का काम होंठों को थमा दिया। काम से मुक्त आंखे बेरोजगार होकर फ़ड़फ़ड़ाने लगीं और होंठ नये नवेले कामगार की तरह बुदबुदाये- तुमने कोई गाना तो गाया ही नहीं! बिना गाने के भी कहीं प्रेम होता है।
प्रेमी बोला -कईसे नहीं होता है। हम कर रहे हैं न! क्या हमारा प्रेम -प्रेम नहीं है?
प्रेमिका उवाच- होता है लेकिन बिना गाने के प्रेम में वो मजा नहीं आता। प्रेम में जब तक कोई बेवकूफ़ी न हो तब तक मजा नहीं आता। वह बिना नमक की दाल, बिना गाली का बबाल , बिना बुश के अमरीका और बिना ठाकरे की मुम्बई लगता है। बिना गाने के प्रेम में वो ग्रेस , वो फ़ील, वो टज या तुम्हारी भाषा में कहें तो वो झस नहीं आता जो लव बिद सांग में आता है। तुम भी गाओ न प्लीज!
प्रेमी बोला- प्रेम अपने आप में एक बेवकूफ़ी है। ये तुमसे किसने कहा कि प्रेम में गाना जरूरी होता है? क्या पहले भी तुमने किसी से प्यार किया है?
प्रेमिका बोली- हमारी सारी सहेलियां बताती हैं। जित्ते ने प्रेम किया सबने गाना गाया। जिनका नहीं हो पाया वे आसन्न प्रेम की याद में खोयीं रियाज करती हैं। हमारी एक सहेली ने आठ प्रेम किये, नवां चल रहा है। हरेक में गाना सुना। । मजाल है जो किसी भी लफ़ड़े में गाने के पहले आई लव यू तक बोला हो। भैया ने हाल ही में जबसे एक लफ़ड़ा शुरू किया, सबेरे से गाने का रियाज शुरू कर दिया है। कित्ता तो बेसुरा गाते हैं लेकिन हिम्मत नहीं हारते। तुम भी गाओ न!

प्रेमी थका-हारा तो पहले ही था। लुटा-पिटा भी हो लिया और उसके होंठ थरथराने लगे- मैं कहीं कवि न बन जाऊं तेरे प्यार में वो कवीईईईईईईईता।
प्रेमिका कान में अंगुली डाले चेहरे पर प्रेम-संतोष के भाव छितराये आंखें मूंदे सुनती रही। आकश में टंगा चांद गाने से घबड़ाकर हड़बड़ाते हुये झील में कूद गया। झील की बदबू और गंदगी से उकताकर फ़िर ऊपर आ गया लेकिन प्रेम गीत सुनकर दुबारा झील में कूद गया।
चांद सारी रात झील में डूबता-उतराता रहा। प्रेम परवान चढ़ता रहा। वातावरण में आवाज गूंजती रही- मैं कहीं कवि न बन जाऊं तेरे प्यार में वो कबीईईईता।
इस हादसे का विस्तार से अध्ययन करने पर पता चलता है कि दुनिया में प्रेम क्यों कम होता जा रहा है। लोग कवि बनने से डरते हैं इसलिये प्यार नहीं करते। सबको लगता है कि जहां वे प्यार में डूबे वे कवि बन जायेंगे। कवि बनने के लिये जित्ता बड़ा जिगर चाहिये वो आजकल बनने बन्द हो गये हैं। खुदा के यहां भी नैनो-दिल बनने लगे हैं। इसलिये लोग मजबूरी में चाहते हुये भी प्यार नहीं कर पाते-अफ़ेयर से काम चलाते हैं। प्यार की कीमत कवि बनकर चुकानी पड़ती है। सबके बस की बात नहीं इत्ता मंहगा सौदा अफ़ोर्ड करने का।
सबको पता है कि कवि की हालत मेहतर से भी बदतर होती है। बहुत शुरू से यह नियम बना दिया गया है- जहां न जाये रवि/वहां जाये कवि। रवि यानी सूरज को मेहतर का काम सौंपा गया है। सूरज भी जिस काम को करने से इंकार कर देता है वो काम कवि के मत्थे मढ़ दिया जाता है। कोने-अंतरे, गली-कूचे जहां जाने में सूरज की भी हवा खिसकती है वहां भी जाकर कवि को ड्यूटी बजानी पड़ती है। बहुत टफ़ सर्विस कंडीशन है भाई कवि की। सूरज को केवल बारह घंटे ड्यूटी बजानी पड़ती है। कवि के तो चौबीसो घंटे बारह बजे रहते हैं। न जाने कब कहां से बुलावा आ जाये।
पता लगा कि रात को सो रहे हैं अचानक किसी दुखद हादसे ने बुला लिया। आओ हमारे बारे में लिखो। लिख ही रहे हैं तब तक किसी की खिलखिलाहटों ने डिस्टर्ब कर दिया- ये कविजी! हमारे बारे में लिखो न! कित्ती देर दे खिलखिला रहे हैं, गाल दर्द करने लगे आप हम पर ध्यान ही नहीं दे रहे। आप बड़े वो हैं।
खिलखिलाहटों में मन लगाया तो पता किसी के ठहाकों ने हल्ला मजा दिया। कित्ते तो पचड़े। हर समय कलम लिये ड्यूटी बजाते रहो और मिलना-दिलना कुछ नहीं सिवा जलालत के, वाह-वाह के। आह-आह, अश-अश के।
हमारे देश में कवि का मूल्यांकन ठीक से हुआ नहीं। न ही इस प्राकृतिक सम्पदा का समुचित उपयोग किया गया है। अगर ऐसा किया गया होता तो न जाने कित्ती शाश्वत समस्यायें हल हो जातीं और न जाने कित्ती आधुनिक समस्यायें मिल जाती हल करने को। लेकिन हम हैं कि समस्यायें हल नहीं करना चाहते, आधुनिक होना नहीं चाहते।

हमारे देश की रक्षा के लिये हम लोग बहुत सारा धन खर्च करते हैं। लाखों सैनिक सीमा पर पहरेदारी करते हैं। घर-परिवार से दूर। छुट्टी न मिलने पर लोग अपने अफ़सरों तक को मार देते हैं। बहुत कठिन परिस्थितियां हैं सैनिकों कॊ। इत्ती कि घबरा कर बड़े अफ़सर घोटाला तक कर बैठते हैं।
इन सारी समस्याओं को वीर रस के कवियों का उपयोग करके दूर किया जा सकता है। लाखों सैनिकों का काम चंद टाइप के चंद कवि कर सकते हैं। सीमा पर माइक लगाकर जहां हुंकारा भरते हुये कवि गायेगा – दूर हटो, दूर हटो ये हिन्दुस्तान हमारा है। सुनते ही सारे पाकिस्तानी, चीनी अपना चीन पाकिस्तान भी कवि को मेहनताने में देकर निकल लिये होते!
कहीं दंगा हो गया तो फ़टाक से चार ठो प्रेम-कवि कविता पढ़ने लगें। भाई चारे की ऐसी नदी बहा दें कि सबरे दंगाई उसमें डूबने-उतराने लगें। सारी घृणा प्रेम-नदी में कचरे की तरह बह जाये। जिस शहर में दंगा फ़ैला था वो शहर प्रेम-रंगा हो जाये। हिन्दू-मुसलमान-सिख-ईसाई किसी भी धर्म के दंगाइयों की रुह नफ़रत की बात सोचते ही कांप जाये। सारे धर्मों के पेशेवर दंगाई किसी ढाबे पर चाय सुड़कते, पान चबाते, सुर्ती फ़टकारते हुये कहते फ़िरें- यार दंगे की बात सपने में भी न सोचना। दंगा किया तो प्रेम कवि-आ जायेगा।
अमेरिका/इंग्लैंड और जित्ते भी दुनिया के बहुत ज्ञानी देश हैं वहां चार ठो चितंक कवि भेज देंगे। वहां ऐसा चिंतन छितरा देंगे ये सब कि वे कहने लगें -मंदी इससे बेहतर है भाई। वे मंदी झेल लेंगे लेकिन चिंतन नहीं। बड़ा दुख छोटे को काटता है। चिंतन मंदी को पटक देगा और मूंछों और पूंछों पर ताव देता हुआ वापस आ जायेगा। अमेरिकी एक बार फ़िर से कहने लगेंगे- भारतीय चिंतन हमारी मंदी से भी महान है।
कवि हमारे देश के प्राकृतिक संसाधन हैं। इसका समुचित उपयोग करके हम सारी दुनिया से आगे निकल सकते हैं। दुनिया में ईंधन की कमी हो रही है। तेल के लिये मारा-मारी हो रही है। लोग शादियों में कार के साथ प्रेट्रोल के पैसे भी मांगने लगें हैं। ईंधन की कमी का हल प्रयाण-गीतों के रूप में किया जा सकता है। लोग कार के पास खड़े होकर एक प्रयाण गीत पढ़ेंगे कार चल छैयां छैयां करती हुय़ी चल देगी। तेज चलाना होगा तो तेज प्रयाण गीत पढ़ देंगे। कवि विज्ञापन छपवायेंगे- कार के लिये प्रयाण गीत रचवायें। एक गीत में अस्सी किलोमीटर की गारन्टी। कम चलने पर एक गीत मुफ़्त। गाडियों की फ़्यूल इकोनामी के स्थान पर गीत इकोनामी की बात होने लगेगी।
कविता के चलते हथियारों का बिजनेस बोल जायेगा। अमेरिकी स्कूल का लड़का अपने दोस्त से लड़ेगा तो अब बंदूक नहीं चलायेगा। एक ठो कविता चलायेगा तो वो ह्यूस्टन स्कूल से उड़के सीधे झुमरी तलैया के बोरिस हाईस्कूल से बिनाका गीत माला को फ़रमाइसे भेजते पाया जायेगा -हमनी के तनी ऊ वाला गाना सुनवाइये!
दुनिया में जहां सूखा पड़ेगा बादल-राग के कवि भेजे जायेंगे। जहां बाढ़ आयेगी सूखे कवि रवाना होंगे। ऐसी सूखी कविता पढेंगे- उफ़नाती नदी बोर होकर अपना सा मुंह लेकर लौट जायेगी। ठंडे इलाके में कवि एक कविता पढ़ेगा तो लू चलने लगेगी। गर्म रेगिस्तान में शीतल काव्य ठिठुरन सी पैदा कर देंगे। अकाल ग्रस्त इलाके में देश की धरती में सोना,हीरे, मोती उपजाऊ टाइप के कवि डेपुटेशन पर भेजे जायेंगी।
कविता पर जगह-जगह शोध होंगे। बड़े-बड़े विद्वान कवितागीरी करते पाये जायेंगे। वैज्ञानिक एक बहर-दो बहर के संयोजन में लगे रहेंगे।
ऐसा हो जायेगा तब कविता का महत्व करेंसी की तरह बढ़ जायेगा। कवि हाथ हिलाता हुआ बाजार जायेगा। एक किलो आलू की कीमत में चार लाइन की कविता पढ़कर सब्जी वाले को सुना देगा। सब्जी वाला बोलेगा- भाई साहब इत्ते आलू के बदले दो लाइन बहुत हैं। बाकी की दो लाइने आप वापस ले लीजिये। कवि उससे कहेगा- फ़ुटकर अपने पास रख लो।(कीप द चेंज स्टाइल मारते हुये)।
जब कभी ऐसा होगा अपने देश के तो पौ बारह हो जायेंगे। किसी विश्व बैठक के दौरान अमेरिका का कोई प्रतिनिध जब अमिताभ स्टाइल में अकड़ते हुये कहेंगे- हमारे पास एफ़िल टावर है, बुश जैसा अडियल राष्ट्रपति है, दीवालिया होती बैंके हैं, मंदी है, टूटते परिवार हैं। इस पर भारत का प्रतिनिधि शशि कपूर ईस्टाइल में कहेगा – हमारे पास कवि हैं। अमेरिकी प्रतिनिधि का मुंह झोले जैसा लटक जायेगा और वह हमारे समर्थन में उसी तरह लग लेगा जैसे हिलेरी भौजी ओबामाजी का कर रहीं हैं।
उपयोग और भी बहुत हैं। जब होने लगेगा तब और भी आयाम खुलेंगे। अभी तो इनकी टेस्टिंग होगी, योजना बनेगी। योजना बनने के बाद धूल खायेगी। इसके बाद धूल झड़ेगी। फ़िर आयोग बैठेगा। पब्लिक खड़ी होगी। हल्ला मचेगा। गुल्ला होगा। एक गुट कहेगा रिपोर्ट लागू करो। दूसरा कहेगा लागू किया तो खैर नहीं।
समय चाहे जित्ता भी लगे लेकिन किसी योजना के लागू होने के जो नियम हैं उनको तो पूरा करना ही पड़ेगा। हर काम से कायदे से करना चाहिये न!
अभी योजना बनी ही नहीं कि इसके विरोधियों ने हल्ला मचाना शुरू कर दिया। योजना की अदूरदर्शिता गिना रहे हैं, लोचे बता रहे हैं।
कह रहे हैं कि सीमा पर वीर रस का कवि अगर प्रेम गीत गाने लगा तो क्या होयेंगा, चिंतक कवि अपने देश में ही चिंतन करने लगेगा तो कहां भेजा जायेगा। भाई चारे वाले की कविता अगर कहीं प्रेमियों ने सुन ली तो मानव संतति आगे कैसे बढ़ेगी।
हमें कुछ समझ में नहीं आ रहा है। सिर्फ़ बौढ़म प्रेमी की आवाज सुनाई दे रही है- जिसके सामने उसकी प्रेमिका कान में
ऊंगली डाले, बाब्डकट होने के बावजूद, अपने बालों की लटों से खेल रही है, चांद झील में डूब उतरा रहा है,फ़ोटो ग्राफ़र जोड़े को फ़ोटो खींचने के लिये पटा रहा है, नाव वाला नौका विहार के लिये उकसा रहा है, झील में ताजा फ़ेंका गया प्लास्टिक का टुकड़ा फ़ड़फ़ड़ा रहा है। प्रेमी इन सबसे बेखबर आंखे मूंदे गा रहा है- मैं कहीं कवि न बन जाऊं तेरे प्यार में वो कबीईईईता।
प्यार और कविता का गठबंधन बड़े-बड़ों की आंखें बन्द कर देता है।




बेचारा कवि किस-किस के बारे में लिखे ..वैसे हमने आज ही जाना गाना इतना जरुरी होता है प्रेम में
आप सोचकर लिखते हैं कि क्या लिखूँ ? या लिखकर सोचते हैं कि क्या लिख गया ?
हर कवि को महीने में एक घंटे के लिए प्रेमिका दिलवा दो। मंदी में निहाल हो जाएगा। मुश्किल से न जाने कितनी तिकड़में कर के एक दो मुंसीपेलटी के कवि-सम्मेलन कबाडते हैं। वहाँ कविता हूट हो जाती है। चुटकुले हिट हो जाते हैं।
काफ़ी हंसते हुए गोल-गोल घुमने के बाद लग रहा है की अकल पादुका उतार के पहले प्रेम से ही शुरुआत करनी पड़ेगी वरना इस नैनो दिल से क्या होगा ! और इ कबीईईईता बड़े काम की चीज लग रही है कल को कौनो उद्योगपति कारखाना न बैठा दे कवि बनाने का
प्रेम में जब तक कोई बेवकूफ़ी न हो तब तक मजा नहीं आता।
आपकी ये उक्ति रास आ गई है। स्वानुभूत जान पड़ती है….
अजी तीस पेंतीस साल पहले लिखते तो हम भी जुते चप्पल उत्तार कर डुबकी ओर गोते खा लेते , भई अब तो ऎसा किया तो हमारे उतारे जुते हमारे ही सर पर पढेगे, ओर कविता या गीत तो समझ मै नही आता तो गायेगे केसे??? चलिये थोडा हंस लू फ़िर चलता हुं.
धन्यवाद एक सुंदर लेख के लिये.
ये क्या था??? विवेक से सहमत हूँ, आप सोच कर लिखते हैं कि लिख जाते हैं फिर सोचते हैं क्या लिखा। हमेशा की तरह हँसाने वाला पोस्ट…
मध्ययुगीन प्रेमाख्यान काव्य- परम्परा से अब आप समकालीन प्रेमाख्यान काव्यों तक आ गए हैं। अब आगे इनकी शाखाओं व प्रतिशाखाओं की बारी लगती है।
बहुत कठिन परिस्थितियां हैं सैनिकों की इत्ती कि घबरा कर बड़े अफ़सर घोटाला तक कर बैठते हैं।
वाह, मजा आ गया…। कैसे-कैसे खयाल आ जाते हैं आपके मन में…। लगता है बहुत जल्दी यह कवि-कर्म सिर चढ़कर बोलने वाला है। कवि बनना ही है तो जल्दी बन जाइये जी…। हमने ताली बजाने के लिए हाथ खाली कर लिए हैं।
कविता का नॉन-प्लूटॉनिक प्रेम में योगदान और उसके अर्थशास्त्र की सम्भावनायें! — मुझे कभी पी.एच.डी. करनी पड़ी तो बड़ा सुन्दर विषय बन जायेगा। और शोध में ज्यादा कुछ नहीं करना होगा – हवाई गुब्बारे फुलाने से काम बन जायेगा!
इस पोस्ट की जय हो!
ये कवि तो कुछ हमारे टाईप लग रहा है// थोड़ा व्यस्त टाईप..हा हा!!!
सबको पता है कि कवि की हालत मेहतर से भी बदतर होती है।
—सारे कवियों की तरफ से…घोर आब्जेक्शनेबल!!! हद हो गई.
वैसे बात है तो सही!!
“मैं कहीं कवि न बन जाऊं तेरे प्यार में वो कबीईईईता।”
भाई शुक्ल जी ! आप क्यूँ पुराने दिल के छाले हमारे उघाड़ रहे हैं ? ई धर्मेन्द्र-वैजंतीमाला का गाना याद दिलवा के ? शुक्रिया आपका उन दिनों की याद दिलाने के लिए ! आख़िर पुरानी यादे भी अच्छी तो लगती ही हैं !
पर आप गजब का लिखते हैं ! बहुत शुभकामनाएं !
अगर आप कवि बन गये तो सारे कवि कवियत्री भाग खड़े होंगे, ब्लोगर जगत आधा विरान हो जायेगा इसलिये ये जुल्म मत करिये। कबीईईईईता को छोड़िये बाजार जाईये पपीईईईईईता लाईये खाईये और फिर से फुरसतिया हो जाईये
” ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha hahaha ha ha ha ha hah aaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaa,ha ha ha ha ha ha haha ha ha ha ha ha ha ha ha haha..iske aagey kuch smej nahee a rha, dil deemag sub chakkar kha gya hai, khan ka sira khan jakr mila…… pr ek baat to ptta chlee ke love song kitna jrure hotta hai, pehle ptta hotta to ek adh hum hee yaad kr laite ha ha ha ha haha ha ha…… ab kitna hanse….”
Regards
अनूप भैय्या पहले नही बताना था,प्रेम के लिये अकल पादूकायें उतारना जरुरी होता है।जबरन हम अपनी खडूस सूरत पर डाऊट करते आ रहे थे।उसी चक्कर मे अकेले रह गये। वर्ना प्रेम विवाह करवाने का रिकार्ड हम बना चुके हैं,मगर प्रेम जैसी बेवकूफ़ी नही कर पाये। अब बता रहे हो भैय्या, इच्छा हुई भी तो भाटिया साब डरा रहे हैं।जाने दिजीये ,गाना तो आता है,ये प्रोब्लेम तो नही आयेगा। निर्मल आणंद आ गया ।
ऎ फ़ुरसतिया जी, कभि विरह का गाना.. वियोग गित पर भि दू लाइन लीखिये न !
ई तो आप जो लीखे हैं, सो बहुतै अच्छा लीखे हैं.. तनि विरह पिड़ा से पिड़ीत लोग
का भी ध्यान रखीयेगा माने अभि नहिं लेकीन भविश्य में..
मेरे दिमाग में एक शैतानी आइडिया आया है,
सार्वजनिक रूप से ऎलान कर दूँ… ?
क्यों न आपका अपहरण करके आपसे ही अपनी पोस्ट लिखवाया करूँ ?
कोख में गड़ते रमपुरिया से उपजा गान क्या गज़ब की चीज होगी, जरा सोचिये ?
लिखेंगे तो खुशी होगी, नहीं लिखेंगे तो अपना रमपुरिया तो है ही.. वह लिखवा लेगा !
जब आपने लिखा है तो मजेदार होगा ही….मगर कोई बता रहा था, यहाँ टिप्पियाने वाले हरेक को एक एक कविता सुननी पड़ेगी
समीरलालजी बूरा मान गए दिखे है.
दीपक उवाच: अर्थात कोई आपसे भी बेसुरा गाने वाला इस दुनिया मे है जिसने चाँद की सेहत बिगाड दी !!रहा सवाल कविता का
तो लोग कविता इसलिये लिखते है कि उन्हे कुछ पाना है जब्की यथार्थ कविता कुछ पा लेनेके बाद ही जन्मती है!!
अरे ज्ञान जी !
प्रेम चाहे प्लैटोनिक हो या नॉन-प्लैटिनिक ,उसमें कविता का योगदान हो या उम्र की अपने आपसे शुरुआती पहचान का ,उसे बाज़ार में काहे ले जाते हैं . वह तो वैसे ही तेजी से सब कुछ ग्रसता हुआ हमारी ओर बढा चला आ रहा है . कुछ विषयों को तो अर्थशास्त्र से बाहर रहने दीजिए . कुछ संभावनाएं अर्थशास्त्र के बाहर भी हैं . अब तक .
पर इधर तो प्रेम और विवाह दोनों में ही अर्थशास्त्र की भूमिका है . सो आप उसी पर शोध की बात कह रहे हैं जो आसपास देख रहे हैं .
और ये जो अपने फ़ुरसतिया हैं न, नितान्त प्रेमविरोधी जीव हैं . मौजिया घराने के औरंगजेब . अभी एक-दो दिन हुए मजनू बिचारे को पछीट के धर दिया . लैला को फ़्रांसिस बेकन नुमा नुस्खे दे दे कर . और आज प्रेमी-प्रेमिका की चिकाही कर रहे हैं . लगता है प्रेम का फिचकुर निकाल के मानेंगे .
दुनिया भर की चर्चा करेंगे ये अपने फुरसतिया पर अपनी साइकल की पहली घंटी प्रेम गली में ही मारेंगे . कबीरदास कह गए हैं कि ‘प्रेम गली अति सांकरी’ , लगता है उन्हें इस कनपुरिया प्रेम गली का पता कौनो नहीं बताया रहा . पछांह से लेकर बनारस-मगहर मंझाते रहे और कलट्टरगंज के नगीच के ई प्रेम मार्ग का कौनो जुगराफ़िया नहीं ताड़ पाए . ऊ तो हम लोगन के भाग से फुरसतिया बने हुए हैं . नहीं तो कौन बतलाता जगत-गति वाया प्रेम-मार्ग उर्फ़ बीच बजरिया खटमल काटे .
जय हो !
कवियों के ऊपर ऐसा कटाक्ष! कल ही हम कवि आपके द्वारे आकर विकट धरना देंगे. हम तो सरकार को ज्ञापन भी देंगे कि भारतीय दंड संहिता में एक धारा की खोज हो, जिसके तहत कवियों के ऊपर कटाक्ष करने वालों को सजा निर्धारित की जाए.
लाल कवि ‘वियोगी’
अध्यक्ष, अखिल भारतीय कवि महासभा
अद्भुद……….लाजवाब……बहुत बहुत सुंदर………..और क्या कहूँ………
जबसे ये मोबाइल ओर एस .एम् एस आये है …प्यार में न तो खतो खवात रहे …न वो कविताये…. कवि अब ओल्ड फैशन जो ठहरा ……
हा हा हा ही ही ही हा हा हा!!!
“कवि विज्ञापन छपवायेंगे- कार के लिये प्रयाण गीत रचवायें। एक गीत में अस्सी किलोमीटर की गारन्टी। कम चलने पर एक गीत मुफ़्त। ”
मेरा दो कवि का ऑर्डर अग्रिम रुप से बुक कर दिजिए, रिसर्च जब होगी तब होगी।
कवि भाई नाहक हलकान हो रहे हैं, कित्ते तो फ़ायदे गिना दिये आप ने, लगता है मोबाइल के साथ एक एक कवि भी बैग में रख कर घूमना पड़ेगा, पता नहीं ये मास्टर चाबी कब काम आ जाए। सड़क छाप रोमियो परेशान करे तो लड़की फ़ट से बैग से कवि निकाल खड़ा कर दे रोमियो सर पर पैर रख भाग लेगा। रेलवे की रिजर्वेशन की लंबी लाइन में सबसे पीछे खड़ा ग्राहक बस कवि निकालेगा और लोग उसे सबसे आगे ठेल देगें। मिनिस्टरों की जेड सिक्युरिटी की भी जरुरत नहीं रहेगी जी । हम तो सोच सोच कर रोमांचित हो रहे हैं कि कविता विषय कित्ता पापुलर हो जाएगा, रोजगार के इत्ते आयाम जो खुल जायेगें। एक और बात जेहन में आ रही है। प्रेम विवाह तो हम भी किए, ये उस समय के प्रेमी ( अब के पति) से गाना सुनना तो रह ही गया, हाय हम भी कित्ते बुद्धु थे जी, अब जा के पता चला। चलो देर आये दुरुस्त आये, पहले बगल वाली झील साफ़ करवा लें फ़िर पति देव को पकड़ेगें गाना सुनाने के लिए। डर सिर्फ़ इस बात का है कि वो ये न कह दें कि अब तो समय निकल गया अक्ल की चप्पल उतारने का…।:)
किसे बना रहे हैं -कवि तो आप पहले से है -कविता भी ये जानती है फिर भी मनुहार कर रही है -इनकी आदत ही ऐसयीच जो है !
बदूक के परिवेश में ये कविताई उफान सचमुच एक इतिहास रच रहा है -और हम कितने फख्र के साथ उसके चश्मदीद बन रहे हैं ! !
सच मे कलजुग आ गया दिख्खे है मने। एक कवि(तुम्हरे गद्य लेखों ने नीचे लिखी कविता ही है ना?) (भले ही पार्टटाइम कवि) ही दूसरे कवियों को धो रहा है। रामराम, कैसा जमाना आ गया है!
बकिया, गाना अधूरा काहे गाए हो, कविता (वो पड़ोसन) के किस्से भी लिखो।
बस ऐसी बातेँ होतीँ रहेँ
..
बेचारे “तथाकथित प्रेमी ” व “कविगण” दोनोँ ही
दुनिया की उपेक्षा ही झेलते आये हैँ
और क्या चाहिये !!
परिवार के सभी के सँग दीपावली का त्योहार खुशी खुशी सेलीब्रेट कीजै
यही शुभकाँक्षा है
स्नेह सहित -
- लावण्या
jheel aur chaand ka rishta pasand aaya….
कहीं यह मोती झील के आस पास की घटना तो नही है , फ़ोटू कुछ पहचानी-२ लग रही है
(aaj likhane me hath tang hai)