
मुश्किलों में मुस्कराना सीखिये,
हर फ़टे में टांग अड़ाना सीखिये।
काम की बात तो सब करते हैं,
आप बेसिर-पैर की उड़ाना सीखिये।
डूबता है बैंक तो डूब जाने दो,
कर्ज लेकर भूल जाना सीखिये।
न जाने कब बेचारा बुश उधार मांग बैठे,
कभी तो दो-चार पैसे बचाना सीखिये।
अपने पैसे से ऐश किये तो क्या किये,
गैर के पैसे को हिल्ले से लगाना सीखिये।
नशे में तो सब बहक लेते हैं,
आप बिन पिये लड़खड़ाना सीखिये।
देश के हालत बड़ी खराब है दोस्तों,
तसल्ली से इस पर बहसियाना सीखिये।
लैला-मजनू में पट नहीं रही आजकल,
उनको लिव-इन के फ़ायदे गिनाना सीखिये।
जलवे हैं आशिकों के आजकल बहुत,
न मिले कोई तो खुद लटपटाना सीखिये।
गैर की तारीफ़ तो फ़िजूल है यार,
अपनी तारीफ़ों के कनकौवे उड़ाना सीखिये।






न जाने कब बेचारा बुश उधार मांग बैठे,
कभी तो दो-चार पैसे बचाना सीखिये।
लैला-मजनू में पट नहीं रही आजकल,
उनको लिव-इन के फ़ायदे गिनाना सीखिये।
bahut achchi lagi aapki ye panktiyan
bahut sunder
कानपुर कनकौव्वा,ऊपर चले रेल का पहिया,नीचे बहती गंगा मैय्या , चना जोर गरम !
बहुत मौजूँ है। पर यह तो पाठ सूची लगती है। एक एक पाठ को सीखने में कुछ समय तो लगेगा। हो सकता है, तब तक मंदी निपट ले। हालांकि आसार कम हैं। पर आस पर तो दुनियाँ कायम है।
आपने नीरज गोस्वामी जी से प्रभावित होकर हमको प्रभावित कर कर दिया . नकल (सॉरी गजल) अच्छी है . आभार !
अच्छी तहरीर है.
मुश्किलों में मुस्कुराना सीखिए
टांग फटने से बचाना सीखिए
सर्दियों की शाम में पानी गरम कर
टांग को बस गुनगुनाना सीखिए
फिर भी गर फट जाए तो मुश्किल नहीं
क्रीम बढ़िया सी लगाना सीखिए
क्रीम से भी काम गर जो न बने
मोजों में रुई घुसाना सीखिए
अपने पैसे से ऐश किये तो क्या किये,
गैर के पैसे को हिल्ले से लगाना सीखिये।
बहुत बढिया है जी ! आपके आदेश का पालन करते हुए हम तो पहले ही लट्ठ छोड़ कर फटे में टांग उलझाने को तैयार रहते हैं !:)
लैला-मजनू में पट नहीं रही आजकल,
उनको लिव-इन के फ़ायदे गिनाना सीखिये।
जलवे हैं आशिकों के आजकल बहुत,
न मिले कोई तो खुद लटपटाना सीखिये।
“ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha kya kmaal kee class lee hai aaj aapne, bhut kuch seekha diya….. or han vo apkee janch ka kya hua, koee inquery vgerh beethaee kya…report aa jaye to ek photopocy humko bhee dejega”
Regards
फटे में टांग अड़ाना तो हिन्दी ब्लॉगरी का च्यवनप्राश है! खूब खाया खिलाया जाता है।
कैसे न अड़ाया जाये फटे में टांग, वह संयम सिखाने का यत्न करें महामहिम ब्लॉगर जी!
लिखा (ऐज यूजुअल) बहुत बढ़िया है!
वाह भैय्या वाह ।
बहुत अच्छे. मज़ा आ गया. सुखी जीवन के कारगर नुस्खे. आभार.
क्या खूब लिखा है आपने-
देश के हालत बड़ी खराब है दोस्तों,
तसल्ली से इस पर बहसियाना सीखिये।
वाह वाह वाह वाआह
मज़ा आगया।
छोडिये ये कागज कलम जनाब
थामिये कम्पूटर ओर फुरसतियाना सीखिये
लगता है ….दीवाली के बाद अभी भी छुट्टियों का खुमार है….टांग अडा ही दी !
नसीहतों की ग़ज़ल…वाह !!
शायरी गजल तो सब कह लेते हैं,
फुरसतिया की तरह जमीनी बातें करना सीखिए !
भाई जी, यह करवा के एक बार तो पिटवा चुके हो…
अब और क्या चाहते हो, इस मासूम से ?
badhiyaa hai….ekdum kanpuriyaa
टांग गर छोटी हो औ फटहा बड़ा
फिर वहां से भाग जाना सीखिए
लैला बेचारी है रोये जार-जार
मंजनू से उसको रुलाना सीखिए
बुश की हालत देखकर हैं सब खुशी
कुछ तो उसपे तरस खाना सीखिए
आपने पिटवा दिया मासूम को
थोड़ा मरहम भी लगाना सीखिए
क्या गज़ब की रचना है अनूप भाई, आपकी इस रचना और भाई शिव कुमार जी की पूरक रचना को जोड़कर एक विमोचन समारोह का इंतजाम करें ! और हो सके तो चिटठा चर्चा पर लायें …मज़ा आजायेगा हँसते हँसते …
क्या कहू अब मै कहने को क्या रह गया,
बस ….मजा आ गया
जो डबलरोटी पर ही मरहम लगा तिबल बनाकर खा लेते
उनको सही जगह मरहम लगाने की जगह दिखाना सीखिए
लैला-मजनू में पट नहीं रही आजकल,
उनको लिव-इन के फ़ायदे गिनाना सीखिये।
जलवे हैं आशिकों के आजकल बहुत,
न मिले कोई तो खुद लटपटाना सीखिये।
गैर की तारीफ़ तो फ़िजूल है यार,
अपनी तारीफ़ों के कनकौवे उड़ाना सीखिये।
बहुत बढिया, मजा आ गया
सीख लिया है तुमने गज़ल का लिखना
अब इसे तर्रन्नुम में सुनाना सीखिये.
अपना लिखा तो सभी पढ़वाते हैं, मियाँ
)
आप गैरों को पढ़ कर टिपियाना सीखिये. (ये दूसरों के लिए है, आप तो सीखे सिखाये हो.
-बहुत उम्दा!! वाह वाह!!
अभी सीखते है।
ग़ज़ल नीरज की चुराना सीखिये.
गाहे गाहे हिनहिनाना सीखिये.
नक्ल में भी अक्ल लाज़िम है जनाब,
यो हीं मत भोंपू बजाना सीखिये.
दिल भी मिल जायेंगे इक दिन देखना,
हाथ तो पहले मिलाना सीखिये.
आप लिखती हो ग़जब की शायरी
मछलियाँ ऐसे फँसाना सीखिये.
हम अछूतों से रखे हो दूरियाँ,
पांव बुलबुल के दबाना सीखिये.
वज़्न से गिरते हो फुरसतिया चचा,
ग़ज़ल पहले गुनगुना सीखिये.
हम तो मुंबई के पचहा हैं…टाँग किसकी है…
या वज्जीवेत सुखं जीवेत, ऋण कृत्वा घृतं पीवेत।
चार्वाक जिंदाबाद।
दूसरों के फटे में टांग अड़ाना, हर चलते-फिरते को सलाह देना और मुश्किलों में मुस्कुराना। ऐसी बातें तो अपन लोगों की आदत में शामिल है।
बहुत कागज कुण्डली में रंग दिया।
अब ग़जल को आजमाना सीखिए॥
हैं ग़जलगो ब्लॉग में बिखरे हुए।
अब इन्हें पहचान जाना सीखिए॥
काफिया जो तंग हो कम वज्न भी।
तो बहर को भी भुलाना सीखिए॥
मौका-ए-फुरसत अगर मिल जाय तो।
ग़जल की कक्षा में जाना सीखिए॥
बेवजन, बेबहर, बिना काफिया और रदीफ रहित
हमने सीख ली, आप भी फुरसतिया ग़ज़ल कहना सीखिए
भाई वाह क्या व्यंज़ल है!
दूसरों के फटे में टांग अड़ाना,अरे भाई कही टांग आडते आडते गिर गये तो बत्तीशी के पेसे कोन देगा, ना बाबा ना.
धन्यवाद इस टांग अडाई की नसीयत के लिये,
अपने पैसे से ऐश किये तो क्या किये,
गैर के पैसे को हिल्ले से लगाना सीखिये।
गैर की तारीफ़ तो फ़िजूल है यार,
अपनी तारीफ़ों के कनकौवे उड़ाना सीखिये।
waah
अपने पैसे से ऐश किये तो क्या किये,
गैर के पैसे को हिल्ले से लगाना सीखिये।
Wah wah…
बढिया लिखा है जनाब .ऐसे ही लिखते रहे.
शुभ्कामनाए
प्रभावित होकर बहुत कुछ अच्छा लिखा है, अच्छा लगा।
वाह जनाब वाह…आप ने मेरी ग़ज़ल को जो इज्ज़त बक्शी है उसके लिए तहे दिल से शुक्रिया…मैंने देखा की आप की ग़ज़ल के सामने मेरी वाली तो बेचारी पानी सी भरती दिखाई देती है…इतने सारे लोगों ने इस में शिरकत की है की देख कर मजा आ गया…उम्मीद है आईन्दा भी मेरी ग़ज़लों पर आप नजरे इनायत करते रहेंगे…इतनी रोचक पैरोडी पढ़ कर हमारा तो ग़ज़ल लिखना सार्थक हो गया बंधू….सच कहते हैं.
नीरज
सब सीख गये , गुरुजी
ek dam kanpuriya andaz hai … maza aa gaya.