पिंटू का कोई भरोसा नहीं
समीरलाल ने पिछली पोस्ट में टिपियाया कि गजल ऊ वाली नहीं पढ़ी गयी थी ये वाली पढ़ी गयी थी। बबाल भाई ने भी कह मारा कि
कहाँ सेहरा और कहाँ मर्सिया पढ़ना है, ये इल्म न होता तो बवाल क़व्वाल न होता महज़ वबाल होता ।
अब हम क्या कहें? हमारा इशारा और एतराज इस बात पर था और है कि जब बबुआ ब्याहने के लिये जबलपुर कैंप किया जा रहा हो तो मर्सिया टाइप गजल लिखना गुनाह है। कल को कोई अनजान आदमी देखेगा तो यही कहेगा न कि देखो कित्ता दुखी इन्सान था जो लड़के की शादी में भी ऐसी भीगी गजल लिख रहा था कि पूरा जबलपुर भीगा जा रहा था। जब फ़ैशन के हिसाब से ही लिखना है आंसू, गम, जिल्लत ही पर ही काहे टाइम खर्च करना? उल्लास, उछल-कूद के भी भतेरे खिलौने मिलते हैं गजल-बाजार में।
हूटर किसी मौके का मोहताज नहीं होता
वैसे हम वहां तो हूट कर ही दिये होते। हूटर किसी मौके का मोहताज नहीं होता। किसी बहाने का इंतजार नहीं करता। हम होते तो समीरलाल को उचका के उनका ही पर्चा थमा देते। जैसे ही पढ़ते हम शुरू हो जाते- क्या बेमौसम गजल पढ़ रहे हो भाई।
टुन्नू (बबाल) की समझ पर तो भरोसा है लेकिन पिंटू(समीरलाल) के हाल न पूछो। कोई भरोसा नहीं। अब बताओ हमने अपने मोबाइल कैमरे से उनकी इत्ती फ़ोटॊ खैंच दी क्यूट सी लेकिन पिंटू ने हमारे साथ क्या किया? केवल नेचुरल सी फोटो खींच के धर दी। जरको स्मार्टनेस का ख्याल नहीं रखा। उनके कैमरे से अच्छा तो हमारे यहां के फ़टाफ़ट स्टूडियो का फोटो होता है। अच्छा न लगे तो कह तो सकते हो कि ये हमारा नहीं, समीरलाल का फोटो है, लेकिन अच्छा आया है।
आप को पता नहीं है लेकिन भुगते तो हम हैं न! आपको बतायें कि समीरलाल को हमने अपने मोबाइल कैमरे में पहले खाते हुये पकड़ लिया। उनकी प्लेट में मार नास्ते भरे थे , उनके ब्लाग में टिप्पणियों की तरह! हम छूंछी प्लेट लिये खड़े थे। हमने उनको वहीं धमका सा दिया। क्या समझते हैं भाई! हम ब्लागर हैं। ब्लाग में फोटो लगाना जानते हैं! यही फोटो सबको दिखायेंगे कि सम्मानित ब्लागरों को भूखा मारा जा रहा है।
तो बस भैया टुन्नू क्या बतायें कि आपके पिंटू ने फ़टाक से हमारी प्लेट में ढेर नास्ता डलवा के फ़ोटॊ खैंच लिया। सच तो यह है कि फोटो नहीं हमको खैंचा गया। अगले को ये चिंता नहीं कि हम खा रहे हैं कि नहीं बस भरी प्लेट के फोटो खैंच के हमारा मुंह बंद कर दिया। सब जगह फ़ोटो सटा दिये। ये भी न देखा कि क्यूट लगे रहे हैं कि नहीं, स्मार्ट बने हैं कि नहीं बस छाप दिया । अब बताओ कोई क्या कहेगा- क्या खाली खाने-पीने गये थे सांस्कृतिक राजधानी।
खोये की जलेबी
बहुत लोगों ने खाने के विवरण चाहे हैं। वो हमने जानबूझकर नहीं लिखे। हम नहीं चाहते कि किसी के मुंह में पानी आये और उसके की-बोर्ड को पोंछे की जरूरत पड़े। वैसे स्वीट डिस में हमने जबलपुरिया जलेबी धांस के खायी। जबलपुर की खोये की जलेबी बड़ी स्वाददार और मजेदार होती है। जबलपुरिया ब्लागर साथियों ने ही मुझे वहां बताया कि इसका पेटेंट कराने के लिये परसाई जी ने लोगों को सलाह दी थी।
ये भी कोई शादी है
शादी तो निपट गयी लेकिन हमें लगा कि यह भी कोई शादी है भला। शादी में जब तक दे तेरे की , ले तेरे की न हो तब तक भला कहीं मजा आता है। जबलपुर की ही शादी के किस्से परसाई जी ने मुन्नू भैया की बारात में लिखे हैं। हमें लगा कि उनमें से कोई एक तो ,भले ही रस्म के तौर पर ही सही ,तो दोहराया जाता। लेकिन हमारे अरमान न पूरे हुये। समीरलाल के इंतजाम से सब चौपट कर दिया।
वैसे पसड़ने के फ़िर भी बहुत बहाने थे यथा:
१. जलेबी के साथ दही का इंतजाम काहे नहीं था?
२. सारे बरातियों को खुले आकाश के नीचे बैठा दिया गया ?
३. रायते में पानी ज्यादा मिला दिया गया।
४. खाने का इंतजाम खुले में काहे किया गया?
५. मान्यों का उचित सत्कार नहीं किया गया!
६. मंडप के नीचे उनको बुलाया लेकिन इनको काहे नहीं बुलाया।
७. घर की बहू-बेटियां डांस कर रही थीं (बुजुर्गों को काहे नहीं नचाया गया)
८. बारात स्थल पर आनलाइन ब्लागिंग की सुविधा काहे नहीं थी?
इत्ते सारे धांसू बहानों के बावजूद कोई पसड़ा नहीं और बीचबचाव की कोई गुंजाइश नहीं निकली। हम भी इसलिये कुछ नहीं बोले काहे से कि टिकट अगले दिन का था। अगर पसड़ते तो जाते कहां जाड़े के मौसम में होटल छोड़कर!

समीरलाल ने और तो और अपने इंतजाम के चक्कर में सालों पुरानी से चली आई कहावत लौटी बारात और गुजरे गवाह को कोई नहीं पूछता को भी आधा झूठा साबित कर दिया और शादी के अगले दिन भी बारातियों का ख्याल रखते रहे। आधा झूठा इसलिये कहा कि वहां गवाह वाला कोई मामला नहीं था इसलिये उसमें बेचारे वे क्या कर सकते थे।
हैप्पी बर्थ डे टु बहूरानी
रात जयमाल होकर निपटी तो पता चला अगले दिन ही बहूरानी का जन्मदिन था। रात के बारह बजते ही माहौल हैप्पी बर्थ डे टू यू नुमा हो गया। अगले दिन दोपहर के बाद हाल में ही केक काटा गया। सबने केक खाया और बहूरानी को नये जीवन की फ़िर से मंगलकामनायें दीं। प्रगति को जीवन पथ पर अविराम प्रगति करते रहने की दुआयें दी गईं!
आगे शायद जारी रहे। ऊपर के फोटो जयमाल के और प्रगति के जन्मदिन के अवसर पर केक-कटाई के। ये एकदम ऊपर का फोटो हमारा और दीपक बजाज का है जो समीरलाल ने साजिशन नेचुरल खींचा है। स्मार्टनेस और क्यूटनेस का जरा सा भी ख्याल किये बिना!





अच्छा किया खाने का विवरण नही छापा, मुँह में पानी आता तो जमीन में टपकने से पहले ही मुँह में जम जाता, इत्ती ढंड जो हो रही है यहाँ।
अथ जबलपुर कथा के बाद ये स्मरण भी खास लगे . आज अपने समीर जी का घरेलू नाम “पिंटू” सबको बता दिया . रोचक चर्चा के लिए आभार .
एक कमी और बताये देते हैं.. WI-FI का नेट कनेक्शन क्यों नहीं था वहां पर..
पिण्टू और टुन्नू की है जोडी कमाल !
एक है लाल तो दूजा बवाल !
“हैप्पी बर्थ डे का इत्ता बडा केक देख कर तो बस अब का कहें ……. इत्ती देर से काहे बताये रही की बहु रानी का जन्मदिन बा अगले ही दिन….अब आज ही जन्मदिन की मुबारकबाद दे देते हैं…” बाकि सारा नजारा तो बहुत जबरदस्त रही ….अब इत्ती पोल खोल दी की सबके घर के नाम भी…..इरादे नेक नाही का आपके ”
regards
बढ़िया ..पिंटू नाम जान कर खुशी हुई ..:)
सबसे पहले तो बहुरानी को जन्मदिन की बधाई.
आप भी फुरसतिया जी पहले कराने का काम बाद में कर दिए.. ये ख़बर पहले देनी चाहिए थी.. अब हम इत्ती लेट होगये जन्म दिन की बधाई देने में ..और इब कोई हमारे लिए केक थोड़े ही बचा होगा.
आपकी लच्सदार भाषा में जबलपुर यात्रा वृतांत में बेहद मजे आ रहे हैं. सो पिंटू जी …नही नही..हमारे गुरुदेव के सारे किस्से जारी रहना चाहिए.
आज आपने वर्षों बाद जलेबी की के साथ दही की याद दिला दी सो हम तो जा रहे हैं दही जलेबी खाने अब.
और हां जबलपुर के बडकुल हलवाई की खोये की जलेबी का स्वाद तो लाजवाब है. पर हमारे यहाँ तो मैदा वाली से ही काम चलाना पडेगा.
रामराम.
अब और ज्यादा मत लिखियेगा. बड़ी ईर्षा हो रही है. हम लोगों को तो नॉन-जात समझ पुछा भी नहीं है. कम से कम चिट्ठे में ही छाप देते – वर्चुअल इनविटेशन. मजेदार पोस्ट के लिये आभार.
बामुलाहिज़ा बयान ग़ुज़रे हुये ग़वाह
हर लाइन पर निकलती है, वाह वाह !
सारी सर, टुन्नू मेरा भी नाम है..
सो, टिप्पणी भी बवालनुमा निकल पड़ी,
निकल पड़ी तो.. यह मेरे दिल की बात ही समझी जाये ।
kya kahaa बारात स्थल पर आनलाइन ब्लागिंग की सुविधा नहीं थी….?????
achchha hua ki ham nahi aaye….!!!!!!!! itani asuvidhao.n ke beech bhala kaise rah paate ham log ):
mazaa aa gaya baarat me khud ko mahasoos kar rahe hai.n….!
dhanyavaad
हम तो इतने में ही संतोष कर लेते हैं कि चलिये किस्से तो पल्ले पड़ रहे हैं वर्ना वहां न जा पाने का मलाल अब तक है
आईला !
स्वेटर बदल गया…..
केक देखकर अच्छा लगा ……बहू को ढेरो शुभकामनाये …..
‘.ऐसे शरीफ बाराती भगवन हर लड़की के बाप को दे …पर ये wi fi कनेक्शन की मांग ????
जबलपुर की जलेबी के बारे में बता आपने जिज्ञासा बढ़ा दी है, अब इसके समाधान का मार्ग देखना पड़ेगा।
अंत वाली फोटू में समीर जी आपको और दीपक जी को सूप का मज़ा लेते हुए पकड़े हैं ताकि सबको साबित किया जा सके कि सम्मानित ब्लॉगरों को भूखा नहीं रखा गया (यदि आप ऐसा दावा करते तो)!!
खाने के बारे मे न लिखते हुए भी जलेबी का जिक्र आप कर ही गए । और नाश्ते से भरी हुई प्लेट की फोटो काहे नही लगाई ।
प्रगति को देर से ही सही जन्मदिन की बधाई ।
और आपका शुक्रिया क्योंकि आपके बहाने हम भी बारात का लुत्फ़ उठा रहे है।
पिंटू! पिंटू! पिंटू!
धांसू विवरण चल रहा है… जलेबी सुन के तो कानपुर याद आ गया. जबलपुर की स्पेसल का भी कुछ जुगाड़ करना पड़ेगा. ब्लॉग्गिंग की व्यवस्था तो होनी ही चाहिए थी, पिंटू को इतना ख्याल तो रखना चाहिए था
बकरे की जान गयी खाने वालों को मजा ही नही आया !
यह इंडिया है !
बहूरानी को जन्मदिन की बधाई।
आज ज्यादा नहीं टिपियाएँगे। बिजली जाने का खतरा नहीं उठाएँगे। अच्छा किया पकवानों का उल्लेख न किया। वरना शादी में गैरहाजरी का अफसोस गुणित हो जाता।
बारात स्थल पर आनलाइन ब्लागिंग की सुविधा काहे नहीं थी?
यह तो बहुत नाइंसाफी थी . पिंटू के बेटे की शादी मे ऑन लाइन ब्लॉग्गिंग सुविधा नही थी . और आप कानपुरिया हो कर शांत रहे .
चलिये हमारा क्रेडिट है कि आपको वहां तक पंहुचाने हेतु कुछ यत्न किया। वर्ना इतना बढ़िया वर्णन आप कहां लिख पाते!
सुकुल जी के सुपर हीट जाल घर पर पधारे सभी पाठकोँ को मकर सँक्रात की बधाई
सौ. प्रगति बहुरानी को सालगिरह पर आशीर्वाद
और अब जो फोटो लगायेँ हैँ हम तो
बेहद खुश हुए देख कर
शानदार च जानदार सब -चकाचक लगा -
खास तौर से,
जबलपुर की जलेबी और केक के क्या कहने …
- लावण्या
वाह! क्या बात है..! मजेदार, रसीला और सच्चा। शुक्रिया।
हमारे बचपन में शादी में हिस्सा लेने वाले के हाथ लौटते समय कुनबे भर के लिए मिठाई भिजवाई जाती थी।
समीर जी को खोए की जलेबी आप के हाथ भिजवानी चाहिए थी ना !!
आखिर बाकी ब्लॊगरों का कुनबा खाली-पीली पढ़-पढ़ कर दूल्हेवालों से मुँह मीठा करवाने के जलेबीदार सपने तो न पालता।
सुंदर ,आत्मीय, मनोरंजक विवरण के लिए बधाई.
- विजय
शब्द पकड़ के रह जाने की लगता है इस ब्लागिस्ताँ की बड़ी पुरानी आदत है। भावार्थ और निहितार्थ पे लगता है सर खुजलाने से बेहतर तड़ तड़ करते जाने में ही विश्वास है। तो फिर सुनिए पिंटू के ज़माने के टुन्नू का मतलब होता मि. फ़ुरसतिया जी, बचपन के यार। न कि वो पिंटू और हम टुन्नू। आप हमारे सामने चैंप रहे थे लाल को फ़लाने ज़माने से जानते हैं सो हमने कहावत कह दिया था। और किसी और से न कहना के बड़्कुल की जलेबी में दही डालो, लोग हँसेंगे। हत्ता कि रबड़ी मलाई की तक ज़रूरत नहीं होती उसमें। और ये जो तीन बार कह रहे हैं पिंटू पिंटू पिंटू इन्हें काफ़ी वाफ़ी पिलवा देना तो रट लगाना बन्द कर देंगे। सीमाजी, महेन्द्र मिश्रा जी, रन्जू जी, विवेक जी,धीरू सिंग और डा॓.अमर कुमार (टुन्नू), फ़ुरसतिया जी की वजह से रघुनाथ हो गए और किसी को पिंटू और किसी को टुन्नू समझ बैठे इसके लिए इस बवाल को बड़ा खेद है।
वैसे मैं इन फ़ुरसतिया जी को पहचान चुका था बात करते वक्त ही के “दीर्घ दन्ता क्वचित मूर्खा” सो मैंने जानबूझकर बातें भी की थीं और कहावत पटकी थी। हमारी नानी जी सही कहा करती थीं। कानपुरिया कान का कच्चा होता है। सिद्ध हुआ।
वर्णन बहुत अच्छा था फ़ुरसतिया साहब बुरा मत मानियेगा ।
—आपका अपना बवाल
बहुत उम्दा चित्रण कर गये आप.
पूरी श्रृंखला एलबम की तरह संग्रहणीय है.
मैं इन सभी आलेकों को लेमिनेट करा कर बिना आपकी इजाजत उनकी फोटो एलबम में लगवा रहा हूँ..एलबम के साथ आँखों देखा विवरण उसे सजीव बना देगा.
बहुत आभार इन आलेखों का.
–समीर लाल ( पिन्टू)
p.s. बाकी सारे लोग भी आमंत्रित हैं जबलपुर..भेड़ाघाट गुमाया जायेगा, जलेबी खिलाई जायेगी और ठहरने की उत्तम व्यवस्था. नहाने के लिए गरम पानी और तिवारी के यहाँ की कट चाय. आने की अग्रिम सूवना भेजें तो स्टेशन से लिवाने की व्यवस्था.
[...] बहरहाल, जबलपुर यात्रा की तमाम उपलब्धियां रहीं। समीरलालजी के परिवार के सभी लोगों से मिले। जबलपुर के ब्लागर बन्धुओं से मिलना हुआ। रचना बजाज-दीपक बजाज से सपरिवार फ़िर मुलाकात हुई। भेड़ाघाट , धुंआधार देखने का मौका मिला और अंत में इल्म के बादशाह बबाल भाई के सौजन्य से एक कहावत की जानकारी हुई- ’दीर्घ दन्ता क्वचित मूर्खा’! [...]
ज्ञान जी आपको कोशिश करके जबलपुर भिजवाए . आप हुआं खोए की जलेबी तन्ना कर खाए . वापसी में किछु परोसा-अरोसा लाए ? कि अइसेहिं ब्लॉग की तई पर बातन की जलेबी बना रहे हैं ?
मतलब अइसेहि पूछत हैं . सामान्य ज्ञान बढावै खातिर .
बकिया आपके पसड़ने के बहाने ‘ट्रैडीशनल’ भी हैं और ‘कंटेम्परेरी’ भी . कौनो पसड़ा नहीं इहै अजीब ट्विस्ट है कहानी का . वैसे हिंदुस्तानी शादी बिना पसड़े-फैले और बिना रूठा-मनउअल के सम्पन्न हो जाए तो परम्परागत हिंदुस्तानी शादी नहीं लगती . कौनो ‘साउंड बाइट’ , कौनो कहानी नहीं बनती . आगे जुगाली करने के लिए .
खोए की जलेबी, भई वो कैसे बनती है। अब तो जबलपुर जाना ही पड़ेगा। हम कविता जी से सहमत, बहुरानी को जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामनाएं।