फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

31 responses to “जबलपुर के कुछ और किस्से”

  1. Tarun

    अच्छा किया खाने का विवरण नही छापा, मुँह में पानी आता तो जमीन में टपकने से पहले ही मुँह में जम जाता, इत्ती ढंड जो हो रही है यहाँ।

  2. mahendra mishra

    अथ जबलपुर कथा के बाद ये स्मरण भी खास लगे . आज अपने समीर जी का घरेलू नाम “पिंटू” सबको बता दिया . रोचक चर्चा के लिए आभार .

  3. Prashant (PD)

    एक कमी और बताये देते हैं.. WI-FI का नेट कनेक्शन क्यों नहीं था वहां पर..

  4. विवेक सिंह

    पिण्टू और टुन्नू की है जोडी कमाल !
    एक है लाल तो दूजा बवाल !

  5. seema gupta

    “हैप्पी बर्थ डे का इत्ता बडा केक देख कर तो बस अब का कहें ……. इत्ती देर से काहे बताये रही की बहु रानी का जन्मदिन बा अगले ही दिन….अब आज ही जन्मदिन की मुबारकबाद दे देते हैं…” बाकि सारा नजारा तो बहुत जबरदस्त रही ….अब इत्ती पोल खोल दी की सबके घर के नाम भी…..इरादे नेक नाही का आपके ”

    regards

  6. ranju

    बढ़िया ..पिंटू नाम जान कर खुशी हुई ..:)

  7. ताऊ रामपुरिया

    सबसे पहले तो बहुरानी को जन्मदिन की बधाई.
    आप भी फुरसतिया जी पहले कराने का काम बाद में कर दिए.. ये ख़बर पहले देनी चाहिए थी.. अब हम इत्ती लेट होगये जन्म दिन की बधाई देने में ..और इब कोई हमारे लिए केक थोड़े ही बचा होगा. :)

    आपकी लच्सदार भाषा में जबलपुर यात्रा वृतांत में बेहद मजे आ रहे हैं. सो पिंटू जी …नही नही..हमारे गुरुदेव के सारे किस्से जारी रहना चाहिए.

    आज आपने वर्षों बाद जलेबी की के साथ दही की याद दिला दी सो हम तो जा रहे हैं दही जलेबी खाने अब.
    और हां जबलपुर के बडकुल हलवाई की खोये की जलेबी का स्वाद तो लाजवाब है. पर हमारे यहाँ तो मैदा वाली से ही काम चलाना पडेगा.

    रामराम.

  8. PN Subramanian

    अब और ज्यादा मत लिखियेगा. बड़ी ईर्षा हो रही है. हम लोगों को तो नॉन-जात समझ पुछा भी नहीं है. कम से कम चिट्ठे में ही छाप देते – वर्चुअल इनविटेशन. मजेदार पोस्ट के लिये आभार.

  9. डा. अमर कुमार


    बामुलाहिज़ा बयान ग़ुज़रे हुये ग़वाह
    हर लाइन पर निकलती है, वाह वाह !

    सारी सर, टुन्नू मेरा भी नाम है..
    सो, टिप्पणी भी बवालनुमा निकल पड़ी,
    निकल पड़ी तो.. यह मेरे दिल की बात ही समझी जाये ।

  10. kanchan

    kya kahaa बारात स्थल पर आनलाइन ब्लागिंग की सुविधा नहीं थी….?????

    achchha hua ki ham nahi aaye….!!!!!!!! itani asuvidhao.n ke beech bhala kaise rah paate ham log ):

    mazaa aa gaya baarat me khud ko mahasoos kar rahe hai.n….!
    dhanyavaad

  11. अजित वडनेरकर

    हम तो इतने में ही संतोष कर लेते हैं कि चलिये किस्से तो पल्ले पड़ रहे हैं वर्ना वहां न जा पाने का मलाल अब तक है :(

  12. Dr.anurag

    आईला !
    स्वेटर बदल गया…..
    केक देखकर अच्छा लगा ……बहू को ढेरो शुभकामनाये …..
    ‘.ऐसे शरीफ बाराती भगवन हर लड़की के बाप को दे …पर ये wi fi कनेक्शन की मांग ????

  13. amit

    जबलपुर की जलेबी के बारे में बता आपने जिज्ञासा बढ़ा दी है, अब इसके समाधान का मार्ग देखना पड़ेगा। ;)

    अंत वाली फोटू में समीर जी आपको और दीपक जी को सूप का मज़ा लेते हुए पकड़े हैं ताकि सबको साबित किया जा सके कि सम्मानित ब्लॉगरों को भूखा नहीं रखा गया (यदि आप ऐसा दावा करते तो)!! :D

  14. mamta

    खाने के बारे मे न लिखते हुए भी जलेबी का जिक्र आप कर ही गए । और नाश्ते से भरी हुई प्लेट की फोटो काहे नही लगाई । :)
    प्रगति को देर से ही सही जन्मदिन की बधाई ।

    और आपका शुक्रिया क्योंकि आपके बहाने हम भी बारात का लुत्फ़ उठा रहे है।

  15. कुश

    पिंटू! पिंटू! पिंटू!

  16. Abhishek Ojha

    धांसू विवरण चल रहा है… जलेबी सुन के तो कानपुर याद आ गया. जबलपुर की स्पेसल का भी कुछ जुगाड़ करना पड़ेगा. ब्लॉग्गिंग की व्यवस्था तो होनी ही चाहिए थी, पिंटू को इतना ख्याल तो रखना चाहिए था :-)

  17. Arvind Mishra

    बकरे की जान गयी खाने वालों को मजा ही नही आया !
    यह इंडिया है !

  18. उन्मुक्त

    बहूरानी को जन्मदिन की बधाई।

  19. दिनेशराय द्विवेदी

    आज ज्यादा नहीं टिपियाएँगे। बिजली जाने का खतरा नहीं उठाएँगे। अच्छा किया पकवानों का उल्लेख न किया। वरना शादी में गैरहाजरी का अफसोस गुणित हो जाता।

  20. dhirusingh

    बारात स्थल पर आनलाइन ब्लागिंग की सुविधा काहे नहीं थी?
    यह तो बहुत नाइंसाफी थी . पिंटू के बेटे की शादी मे ऑन लाइन ब्लॉग्गिंग सुविधा नही थी . और आप कानपुरिया हो कर शांत रहे .

  21. Gyan Dutt Pandey

    चलिये हमारा क्रेडिट है कि आपको वहां तक पंहुचाने हेतु कुछ यत्न किया। वर्ना इतना बढ़िया वर्णन आप कहां लिख पाते!

  22. लावण्या

    सुकुल जी के सुपर हीट जाल घर पर पधारे सभी पाठकोँ को मकर सँक्रात की बधाई

    सौ. प्रगति बहुरानी को सालगिरह पर आशीर्वाद
    और अब जो फोटो लगायेँ हैँ हम तो
    बेहद खुश हुए देख कर :)
    शानदार च जानदार सब -चकाचक लगा -
    खास तौर से,
    जबलपुर की जलेबी और केक के क्या कहने …
    - लावण्या

  23. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी

    वाह! क्या बात है..! मजेदार, रसीला और सच्चा। शुक्रिया।

  24. कविता वाचक्नवी

    हमारे बचपन में शादी में हिस्सा लेने वाले के हाथ लौटते समय कुनबे भर के लिए मिठाई भिजवाई जाती थी।
    समीर जी को खोए की जलेबी आप के हाथ भिजवानी चाहिए थी ना !!
    आखिर बाकी ब्लॊगरों का कुनबा खाली-पीली पढ़-पढ़ कर दूल्हेवालों से मुँह मीठा करवाने के जलेबीदार सपने तो न पालता।

  25. Dr. Vijay Tiwari " Kislay "

    सुंदर ,आत्मीय, मनोरंजक विवरण के लिए बधाई.
    - विजय

  26. बवाल

    शब्द पकड़ के रह जाने की लगता है इस ब्लागिस्ताँ की बड़ी पुरानी आदत है। भावार्थ और निहितार्थ पे लगता है सर खुजलाने से बेहतर तड़ तड़ करते जाने में ही विश्वास है। तो फिर सुनिए पिंटू के ज़माने के टुन्नू का मतलब होता मि. फ़ुरसतिया जी, बचपन के यार। न कि वो पिंटू और हम टुन्नू। आप हमारे सामने चैंप रहे थे लाल को फ़लाने ज़माने से जानते हैं सो हमने कहावत कह दिया था। और किसी और से न कहना के बड़्कुल की जलेबी में दही डालो, लोग हँसेंगे। हत्ता कि रबड़ी मलाई की तक ज़रूरत नहीं होती उसमें। और ये जो तीन बार कह रहे हैं पिंटू पिंटू पिंटू इन्हें काफ़ी वाफ़ी पिलवा देना तो रट लगाना बन्द कर देंगे। सीमाजी, महेन्द्र मिश्रा जी, रन्जू जी, विवेक जी,धीरू सिंग और डा॓.अमर कुमार (टुन्नू), फ़ुरसतिया जी की वजह से रघुनाथ हो गए और किसी को पिंटू और किसी को टुन्नू समझ बैठे इसके लिए इस बवाल को बड़ा खेद है।
    वैसे मैं इन फ़ुरसतिया जी को पहचान चुका था बात करते वक्त ही के “दीर्घ दन्ता क्वचित मूर्खा” सो मैंने जानबूझकर बातें भी की थीं और कहावत पटकी थी। हमारी नानी जी सही कहा करती थीं। कानपुरिया कान का कच्चा होता है। सिद्ध हुआ।

  27. बवाल

    वर्णन बहुत अच्छा था फ़ुरसतिया साहब बुरा मत मानियेगा ।
    —आपका अपना बवाल

  28. समीरलाल

    बहुत उम्दा चित्रण कर गये आप.
    पूरी श्रृंखला एलबम की तरह संग्रहणीय है.
    मैं इन सभी आलेकों को लेमिनेट करा कर बिना आपकी इजाजत उनकी फोटो एलबम में लगवा रहा हूँ..एलबम के साथ आँखों देखा विवरण उसे सजीव बना देगा.
    बहुत आभार इन आलेखों का.
    –समीर लाल ( पिन्टू) :)

    p.s. बाकी सारे लोग भी आमंत्रित हैं जबलपुर..भेड़ाघाट गुमाया जायेगा, जलेबी खिलाई जायेगी और ठहरने की उत्तम व्यवस्था. नहाने के लिए गरम पानी और तिवारी के यहाँ की कट चाय. आने की अग्रिम सूवना भेजें तो स्टेशन से लिवाने की व्यवस्था.

  29. जबलपुर , कानपुर और जन्मदिन

    [...] बहरहाल, जबलपुर यात्रा की तमाम उपलब्धियां रहीं। समीरलालजी के परिवार के सभी लोगों से मिले। जबलपुर के ब्लागर बन्धुओं से मिलना हुआ। रचना बजाज-दीपक बजाज से सपरिवार फ़िर मुलाकात हुई। भेड़ाघाट , धुंआधार देखने का मौका मिला और अंत में इल्म के बादशाह बबाल भाई के सौजन्य से एक कहावत की जानकारी हुई- ’दीर्घ दन्ता क्वचित मूर्खा’! [...]

  30. प्रियंकर

    ज्ञान जी आपको कोशिश करके जबलपुर भिजवाए . आप हुआं खोए की जलेबी तन्ना कर खाए . वापसी में किछु परोसा-अरोसा लाए ? कि अइसेहिं ब्लॉग की तई पर बातन की जलेबी बना रहे हैं ?

    मतलब अइसेहि पूछत हैं . सामान्य ज्ञान बढावै खातिर .

    बकिया आपके पसड़ने के बहाने ‘ट्रैडीशनल’ भी हैं और ‘कंटेम्परेरी’ भी . कौनो पसड़ा नहीं इहै अजीब ट्विस्ट है कहानी का . वैसे हिंदुस्तानी शादी बिना पसड़े-फैले और बिना रूठा-मनउअल के सम्पन्न हो जाए तो परम्परागत हिंदुस्तानी शादी नहीं लगती . कौनो ‘साउंड बाइट’ , कौनो कहानी नहीं बनती . आगे जुगाली करने के लिए .

  31. anitakumar

    खोए की जलेबी, भई वो कैसे बनती है। अब तो जबलपुर जाना ही पड़ेगा। हम कविता जी से सहमत, बहुरानी को जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामनाएं।

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