फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

24 responses to “एक ठो ओबामा इधर भी लाओ यार”

  1. दिनेशराय द्विवेदी

    हमें नही चाहिए ओबामा। हम अपना कुछ खुद बना लेंगे।

  2. Tarun

    यहाँ देखिये इंडिया घुस के मारने से बच रहा है तो पब्लिक गाली दे रही है और वहाँ देखिये अमेरिका ने घुस के मारा तो भी पब्लिक गाली दे रही है – वैसा ही लड्डू हो गया ये तो जो खाये वो चिल्लाये जो ना खाये वो भी चिल्लाये

  3. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी

    अभिमन्यू के भरोसे इस कलियुग में जीत की उम्मीद करना बेमानी है जी। द्वापर में साक्षात्‌ भगवान के साथ रहते बेचारे की वैसी दुर्गति हुई थी। आज जब भगवान के विरुद्ध ही ‘नो-कान्फिडेन्स’ चल रहा है तो क्या कर लेगा एक अभिमन्यू। उसका अपना भाई ही गोली से उड़ा देगा…।

  4. P.N. Subramanian

    शानदार पोस्ट. लगता है अब पूरा का पूरा भारत अभिमन्यु को ही तलाश रहा है. आभार.

  5. Arvind Mishra

    अब हमें तो इंतजार है कि कब ओ बा माँ भारत आयें !

  6. Brijmohanshrivastava

    शब्द कम ,अर्थ ज़्यादा

  7. seema gupta

    हमें इंतजार है अभिमन्यु का
    लेकिन अब अभिमन्यु भी समझदार हो गया है
    वो भी अपने लिये अनुकूल माहौल का इंतजार कर रहा है।
    वो आयेगा लेकिन आहिस्ते से
    देख-दाख के आयेगा।
    कोई भी अपनी जान फ़ालतू में
    फ़ंसाना नहीं चाहता!

    “अभिमन्यु भी लगता है चिट्टा चर्चा पढ़ कर सीख रहा है हा हा हा कब कब क्या क्या करना बोले तो लिखना चाहिए …ओबामा का आँखों देखा हाल मजेदार रहा….”

    Regards

  8. समीर लाल

    यहाँ भी ५० लफड़े फंसे हैं. अभिमन्यू का मोबाईल नम्बर है क्या? बहुत अर्जेन्ट ही समझो.

    बेहतरीन आलेख.

  9. ज्ञानदत्त पाण्डेय

    हमारे यहां तो बहनों-अम्माओं के घणे विकल्प हैं। जिस रंग का चाहिये, मिलेगा(गी)। :-)

  10. ताऊ रामपुरिया

    हमारे पास कोई चारा भी नहीं है जी
    सिवाय इंतजार के।
    हम तो अभिमन्यु बनने से रहे
    हमारे अपने ही लफ़ड़े कम हैं क्या यार
    जो फ़ालतू में अपनी जान फ़ंसाये यार
    अभिमन्यु के लिये तो कर लेंगे जी हम इंतजार!

    बहुत लाजवाब. अब तो सही मे ओबा-मामा क्या करेंगे? देखना दिल्चस्प होगा.

    रामराम.

  11. Suresh Chiplunkar

    “…हम तो अभिमन्यु बनने से रहे
    हमारे अपने ही लफ़ड़े कम हैं क्या यार
    जो फ़ालतू में अपनी जान फ़ंसाये यार
    अभिमन्यु के लिये तो कर लेंगे जी हम इंतजार…” बहुत खूब कही है…
    भगतसिंह पैदा तो होना चाहिये, लेकिन पड़ोसी के घर पर… मेरा नौनिहाल तो सॉफ़्टवेयर इंजीनियर बने और अमेरिका जाये तो जीवन तर जाये…

  12. संजय बेंगाणी

    कोई आये और समस्याओं के चक्रव्यूह से हमारा उद्धार करके चला जाये, साठ साल हो गए पता नहीं कहाँ फुरसत में बैठा है. आता ही नहीं.

  13. Rachana

    O MAA!!

    One 0–MA was (/ is??) the one who has created certain hopelessness and the other O–MA is the one who came up with Hope for America!! :)

  14. amit

    अल्पसंख्यक का सत्ता में आना अमेरिका के लिए बड़ी बात हो सकती है, यहाँ तो पिछले पचास-साठ वर्षों से ऐसे लोग भी पॉवर में हैं और पिछड़े कहे जाने वाले लोग भी हैं!! जो तीर अमेरिका ने अब मारा है ऊ तो भारतीय बौत टेम से मारते आ रहे हैं, का बड़ी बात है!! ;)

  15. radhika budhkar

    जिस दिन हम किसी अभिमन्यु या कृष्ण का इंतजार करना बंद कर देंगे हम सारे चक्रव्यूह से बहार आ जायंगे . आपक्ली पोस्ट बहुत ही अच्छी लगी .बधाई

  16. डा. अमर कुमार


    जरा को धीर धरो गुरु,
    पंडिताइन ने अपुन के थोबड़े पर फ़ेयर एन लवली लगाने से
    तत्काल प्रभावी पाबंदी लगा दी है । बड़ी कड़ाई से अपुन की निगरानी चल रैली है ।
    कलमुँहीं गोरेपन की इस नामुराद क्रीम का इफ़ेक्ट उतरते ही,
    जौन कहोगे तौन बन के हाज़िर होता हूँ ।
    तब तक आप इसी तरियों की घणी ढिंचक पोस्ट लिखने में अपना मन लगाते रहो ।
    तो फिर मिलता हूँ… आदाब अर्ज़ है !:)

  17. Dr.anurag

    इन्तजार कीजिये ……..कल तक !

  18. Abhishek Ojha

    ‘ओबामा का मतलब अगर अल्पसंख्यक, अश्वेत, वंचित समुदाय से आने की बात है’ क्या कहूं जहाँ देखो यही मतलब निकाले बैठे हैं लोग. पता नहीं… हम अपने यहाँ तो दूर ओबामा को भी बस इसीलिए देख रहे हैं की वो ब्लैक हैं. कोई उस व्यक्ति की प्रतिभा क्यों नहीं देखता. क्या ओबामा इसलिए राष्ट्रपति बने की उन्होंने ब्लैक राजनीती की? रविशजी के जितने उदहारण थे उनमें से किसने ऐसी राजनीती की? सबने बस अपनी जाति के नाम पर वोट माँगा और समाज में विभाजन ही बढाया. हमारे यहाँ वोट मांगने में और डालने दोनों ही में हम बस जाति ही देखते हैं. अमेरिका की तरह हम जिस दिन ‘सिर्फ़ और सिर्फ़ प्रतिभा’ देखेंगे उस दिन बहुत कुछ अपने आप सही हो जायेगा…. लेकिन हम तो ओबामा से भी उल्टा ही सीख्नेगे !

    खैर हमें क्या… जो मन में आया बक गए :-)

  19. mahendra mishra

    पंडित जी कितने ओबामा चाहिए अपुन अमेरिका को मेल कर देते है इम्पोर्ट कर लेंगे जी .

  20. विवेक सिंह

    ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा

    अब आपसे क्या हिसाब किताब करना . अपने ही आदमी हैं . जितने ओबामा चाहिए रख लेना बाकी वापस भेज देना .या और जरूरत हो तो बता देना . शरमाने की क्या बात है !
    - आपका विवेक

  21. बवाल

    आदरणीय फ़ुरसतिया साहब, ओबामा के बहाने से जो दर्द आपने आज उलीच दिया है शायद ही उस पर किसी की नज़र पड़ी हो। अब तक आपका सिर्फ़ सम्मान था दिल में, पर आज नतमस्तक हुआ जी। ओ चेहरे चेहरे से हँसने और हँसाने वाले फ़ुरसतिया जी, इतना संजीदा भी कहते हो ? धन्य हो ।

  22. ranjana

    waah ! lajawaab…..
    ekdam sadha hua vyangy…sadhuwaad.

  23. राज भाटिया

    बहुत सुंदर लेख लिखा, अरे हमारे यहां भी तो एक ऒबामी है, जिसने थोडे दिन पहले ही एक गरीब …….. की… पर अपना जन्म दिन मनाया, उस के सिवा ओर भी ऒबामा है हमारे यहां तो भरे पढे है.
    अब हमे हिटलर चाहिये…..जेसे जर्मन सीधा हो गया, यहां के लोग सीधे हो गये वेसे ही हमे भी कोई सीधा सिरफ़ हिटलर जेसा ही कर सकता है, आम आदमी के हम बस के नही.
    धन्यवाद

  24. anitakumar

    हमें भी है अभिमन्यु का इंतजार

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