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	<title>Comments on: सोचते हैं उदास ही हो जायें</title>
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	<description>हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै?</description>
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		<title>By: कविता वाचक्नवी</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/575/comment-page-1#comment-38281</link>
		<dc:creator>कविता वाचक्नवी</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 10 Apr 2009 16:06:21 +0000</pubDate>
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		<description>इसे एक बार २-३ फ़रवरी को पढ़ा था, उन दिनों घर में जीजी को सिधारे २ दिन ही हुए थे, सो कुछ कहना मानो हुआ ही नहीं। क्योंकि इस पोस्ट का मनोविज्ञान उदास होने की कोशिश नहीं बल्कि उदासी को हँसी में टालने की कोशिश लगी थी। तब यह सोचकर नहीं लिखा कि (कहीं अपने यहाँ की परिस्थितिवश) ऐसा आरोपित किया गया न लगे। सोचा था,कभी दुबारा पढ़ कर फिर देखूँगी।

सरपराइज़िंगली, आज पढ़ा, तो आज भी वहीं पहुँची। उदास होने की कोशिश के नाम ‘ सोचते है उदास हो जाएँ’  वस्तुत: ‘लगता है उदास हैं’ है।

गीत की पंक्तियाँ बड़ी मधुरिम किन्तु पीड़ा में डूबी हैं। श्रॄंगार रस को इसलिए भी उज्ज्वल रस कहा जाता होगा।
किस्सागोई के सारे सूत्र यहाँ साफ़ साफ़ दिखाई देते हैं।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>इसे एक बार २-३ फ़रवरी को पढ़ा था, उन दिनों घर में जीजी को सिधारे २ दिन ही हुए थे, सो कुछ कहना मानो हुआ ही नहीं। क्योंकि इस पोस्ट का मनोविज्ञान उदास होने की कोशिश नहीं बल्कि उदासी को हँसी में टालने की कोशिश लगी थी। तब यह सोचकर नहीं लिखा कि (कहीं अपने यहाँ की परिस्थितिवश) ऐसा आरोपित किया गया न लगे। सोचा था,कभी दुबारा पढ़ कर फिर देखूँगी।</p>
<p>सरपराइज़िंगली, आज पढ़ा, तो आज भी वहीं पहुँची। उदास होने की कोशिश के नाम ‘ सोचते है उदास हो जाएँ’  वस्तुत: ‘लगता है उदास हैं’ है।</p>
<p>गीत की पंक्तियाँ बड़ी मधुरिम किन्तु पीड़ा में डूबी हैं। श्रॄंगार रस को इसलिए भी उज्ज्वल रस कहा जाता होगा।<br />
किस्सागोई के सारे सूत्र यहाँ साफ़ साफ़ दिखाई देते हैं।</p>
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		<title>By: roushan</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/575/comment-page-1#comment-36281</link>
		<dc:creator>roushan</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 05 Feb 2009 06:54:51 +0000</pubDate>
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		<description>सोच में डाल दिया गुरु 
अब और क्या सोचें ?</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सोच में डाल दिया गुरु<br />
अब और क्या सोचें ?</p>
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		<title>By: anitakumar</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/575/comment-page-1#comment-36237</link>
		<dc:creator>anitakumar</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 03 Feb 2009 11:03:51 +0000</pubDate>
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		<description>साफ़ आईनों चेहरे भी नजर आते हैं साफ़
धुंधला चेहरा हो तो आईना भी धुंधला चाहिये..

एकदम सही और कविता बेमिसाल्। आज की ये बिना एजेंडा वाली पोस्त पढ़ कर तो सच में हम उदास हो लिए, अब उदास किए हैं तो हंसाने की जिम्मेदारी आप की है न</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>साफ़ आईनों चेहरे भी नजर आते हैं साफ़<br />
धुंधला चेहरा हो तो आईना भी धुंधला चाहिये..</p>
<p>एकदम सही और कविता बेमिसाल्। आज की ये बिना एजेंडा वाली पोस्त पढ़ कर तो सच में हम उदास हो लिए, अब उदास किए हैं तो हंसाने की जिम्मेदारी आप की है न</p>
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		<title>By: बवाल</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/575/comment-page-1#comment-36096</link>
		<dc:creator>बवाल</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 30 Jan 2009 16:56:26 +0000</pubDate>
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		<description>ऎ फ़ुरसतिया साहब, तोहार ऊ नवा पोस्ट कमेण्टवा काहे नहीं पचावत है, भाई ? का बदहज्मी होय गई के कौनौ अऊर बातबा। द्याखा अऊर बतावा हम्का तनी। बहूत टैन्शनवा होय गवा है हियाँ।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>ऎ फ़ुरसतिया साहब, तोहार ऊ नवा पोस्ट कमेण्टवा काहे नहीं पचावत है, भाई ? का बदहज्मी होय गई के कौनौ अऊर बातबा। द्याखा अऊर बतावा हम्का तनी। बहूत टैन्शनवा होय गवा है हियाँ।</p>
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		<title>By: ताऊ रामपुरिया</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/575/comment-page-1#comment-36086</link>
		<dc:creator>ताऊ रामपुरिया</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 30 Jan 2009 05:46:12 +0000</pubDate>
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		<description>आपकी आज की यानि ३० जनवरी की पोस्ट पर कमेंट बाक्स नही दिखाई दे रहा है. सब जोगाड लगा लिया, जबकि दुसरे कमेंट मौजूद हैं.

रामराम.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आपकी आज की यानि ३० जनवरी की पोस्ट पर कमेंट बाक्स नही दिखाई दे रहा है. सब जोगाड लगा लिया, जबकि दुसरे कमेंट मौजूद हैं.</p>
<p>रामराम.</p>
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		<title>By: आइये घाटा पूरा करें और सुखी हो जायें</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/575/comment-page-1#comment-36074</link>
		<dc:creator>आइये घाटा पूरा करें और सुखी हो जायें</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 30 Jan 2009 02:53:28 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://hindini.com/fursatiya/?p=575#comment-36074</guid>
		<description>[...] पिछली पोस्ट में प्रशान्त प्रियदर्शी हमारे टोटल टाइम वेस्ट से दुखी से हो गये और ऐसन टिपियाये: हद है भाई.. आप अपना टाइम बर्बाद किये तो किये.. अब फिर से आप सोचिये.. ई अल्ल-बल्ल जो लिखे हैं उसे केतना आदमी पढेगा.. चलिए मान लेते हैं कि कम से कम १०० आदमी पढेगा.. एतना लंबा लिखे हैं कि सब कोई कम से कम 10 मिनट तो पढ़बे करेगा ना? कम से कम १० आदमी हमरे जैसन लम्बा-लम्बा टिपियायेगा.. जिसमे फिर से १० मिनट मान लीजिये.. तो केतना हुआ? (10×100)+(10*10)=1000+100=1100 अब ई मिनटवा को घंटवा में बदलते हैं.. 1100/60=18.33 अब एक आदमी एक दिन में औसत ८ घंटा काम करता है.. सो इसको ८ से भागा देते हैं.. 18.33/8=2.29 एक बिलोगर का एक पोस्ट २.२९ आदमी के बराबर काम का हर्जा करता है तो सोचिये कि एतना पोस्ट हर दिन पोस्ट होता है, ऊ केतना हर्जा करता होगा?  हम तो कहते हैं कि खाली ई बिलोगर्वा के चलते भारत में आर्थिक संकट है.. सब कोई पोस्ट पढ़े लिखे में मस्त है.. कोई काम धाम करता नहीं है.. तो और का होगा? [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] पिछली पोस्ट में प्रशान्त प्रियदर्शी हमारे टोटल टाइम वेस्ट से दुखी से हो गये और ऐसन टिपियाये: हद है भाई.. आप अपना टाइम बर्बाद किये तो किये.. अब फिर से आप सोचिये.. ई अल्ल-बल्ल जो लिखे हैं उसे केतना आदमी पढेगा.. चलिए मान लेते हैं कि कम से कम १०० आदमी पढेगा.. एतना लंबा लिखे हैं कि सब कोई कम से कम 10 मिनट तो पढ़बे करेगा ना? कम से कम १० आदमी हमरे जैसन लम्बा-लम्बा टिपियायेगा.. जिसमे फिर से १० मिनट मान लीजिये.. तो केतना हुआ? (10×100)+(10*10)=1000+100=1100 अब ई मिनटवा को घंटवा में बदलते हैं.. 1100/60=18.33 अब एक आदमी एक दिन में औसत ८ घंटा काम करता है.. सो इसको ८ से भागा देते हैं.. 18.33/8=2.29 एक बिलोगर का एक पोस्ट २.२९ आदमी के बराबर काम का हर्जा करता है तो सोचिये कि एतना पोस्ट हर दिन पोस्ट होता है, ऊ केतना हर्जा करता होगा?  हम तो कहते हैं कि खाली ई बिलोगर्वा के चलते भारत में आर्थिक संकट है.. सब कोई पोस्ट पढ़े लिखे में मस्त है.. कोई काम धाम करता नहीं है.. तो और का होगा? [...]</p>
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		<title>By: नीरज रोहिल्ला</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/575/comment-page-1#comment-36073</link>
		<dc:creator>नीरज रोहिल्ला</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 30 Jan 2009 00:57:59 +0000</pubDate>
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		<description>सोचा कि टिप्पणी लिख दें, फ़िर सोचा लिखेंगे थोडे ही टाईप करेंगे। टाईपिंग एक जमाने में हमने भी सीखी थी &quot;अरोडा टाईपिंग एंड शार्टहैंड इन्सटीट्यूट&quot; से, लेकिन अब वो बच्चों को इंगलिश स्पीकिंग कोर्स सिखाते हैं। इंगलिश स्पीकिंग के लिये हमने रैपीडेक्स वाली किताब भी पढी है लेकिन उसको पढके हम ३० दिनों में फ़र्राटेदार इंगलिश नहीं बोल पाये, बापू को लगा कि ६० रूपये बेकार गये। बापू तो वैसे भी चिन्ता करते रहते हैं, अभी पूछ रहे थे कि अब भी दुकाने बचाकर रखें या बेच दें, हम कुछ बोलते इससे पहले बोले कि रिसेशन का जमाना है बचा के रख लेते हैं तुम्हारी नौकरी न लगी और परचूने की दुकान खोलनी पडी तो।  दुकानों में परचूने की दुकान का अपना मजा है मेरे पडौसी अपनी दुकान पर मोटा से तकिये पर अजदकी मुद्रा में लेटे(बैठे) ही काम चला लेते हैं।  दुकान वैसे हमें हलवाई की भी बहुत पसन्द है, कभी दुकान खोले तो या तो परचूने की वरना हलवाई की।

अरे चले तो टिप्पणी लिखने थे लेकिन गडबड में फ़ुरसतीय़ टिप्पणी लिख गये।  चलो अगली पोस्ट में इसका बदला चुका देंगे :-) कविता बहुत जोरदार रही, हमने सहेज ली है अपने कई मित्रों को जरूर पढवायेंगे।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सोचा कि टिप्पणी लिख दें, फ़िर सोचा लिखेंगे थोडे ही टाईप करेंगे। टाईपिंग एक जमाने में हमने भी सीखी थी &#8220;अरोडा टाईपिंग एंड शार्टहैंड इन्सटीट्यूट&#8221; से, लेकिन अब वो बच्चों को इंगलिश स्पीकिंग कोर्स सिखाते हैं। इंगलिश स्पीकिंग के लिये हमने रैपीडेक्स वाली किताब भी पढी है लेकिन उसको पढके हम ३० दिनों में फ़र्राटेदार इंगलिश नहीं बोल पाये, बापू को लगा कि ६० रूपये बेकार गये। बापू तो वैसे भी चिन्ता करते रहते हैं, अभी पूछ रहे थे कि अब भी दुकाने बचाकर रखें या बेच दें, हम कुछ बोलते इससे पहले बोले कि रिसेशन का जमाना है बचा के रख लेते हैं तुम्हारी नौकरी न लगी और परचूने की दुकान खोलनी पडी तो।  दुकानों में परचूने की दुकान का अपना मजा है मेरे पडौसी अपनी दुकान पर मोटा से तकिये पर अजदकी मुद्रा में लेटे(बैठे) ही काम चला लेते हैं।  दुकान वैसे हमें हलवाई की भी बहुत पसन्द है, कभी दुकान खोले तो या तो परचूने की वरना हलवाई की।</p>
<p>अरे चले तो टिप्पणी लिखने थे लेकिन गडबड में फ़ुरसतीय़ टिप्पणी लिख गये।  चलो अगली पोस्ट में इसका बदला चुका देंगे <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':-)' class='wp-smiley' />  कविता बहुत जोरदार रही, हमने सहेज ली है अपने कई मित्रों को जरूर पढवायेंगे।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: बवाल</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/575/comment-page-1#comment-36066</link>
		<dc:creator>बवाल</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 29 Jan 2009 19:26:12 +0000</pubDate>
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		<description>बहुत ख़ूब फ़ुर्सतिया जी, कौन टाइप के हो गए आज भाई ? एक दम सीरियस । चलो मालूम तो पड़ा के कभी इ भी हुआ करते हो। और ज़्यादा अनमने वनमने होने की ज़रूरत नहीं। आप फ़ुरसत में ही सूट करते हैं। हा हा हा</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत ख़ूब फ़ुर्सतिया जी, कौन टाइप के हो गए आज भाई ? एक दम सीरियस । चलो मालूम तो पड़ा के कभी इ भी हुआ करते हो। और ज़्यादा अनमने वनमने होने की ज़रूरत नहीं। आप फ़ुरसत में ही सूट करते हैं। हा हा हा</p>
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	<item>
		<title>By: लावण्या</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/575/comment-page-1#comment-36064</link>
		<dc:creator>लावण्या</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 29 Jan 2009 18:44:39 +0000</pubDate>
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		<description>उदासी ,
जब आहिस्ता से पीछे छूट जाती है 
तब सच मानिये 
खुशियाँ मुस्कुराकर और दिल लुभातीँ हैँ 
- लावण्या</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>उदासी ,<br />
जब आहिस्ता से पीछे छूट जाती है<br />
तब सच मानिये<br />
खुशियाँ मुस्कुराकर और दिल लुभातीँ हैँ<br />
- लावण्या</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: डा. अमर कुमार</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/575/comment-page-1#comment-36061</link>
		<dc:creator>डा. अमर कुमार</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 29 Jan 2009 17:01:20 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://hindini.com/fursatiya/?p=575#comment-36061</guid>
		<description>&lt;em&gt;
हम तो तेरह घंटे से सोच रहे हैं,जी ।
टिप्पणी को सही शब्द सोच ही नहीं पा रहे हैं ।
किसी कंदरा में या वटवृक्ष के तले बैठ के सोचता हूँ,
फिर, वापस लौटता हूँ ।
&lt;/em&gt;</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p><em><br />
हम तो तेरह घंटे से सोच रहे हैं,जी ।<br />
टिप्पणी को सही शब्द सोच ही नहीं पा रहे हैं ।<br />
किसी कंदरा में या वटवृक्ष के तले बैठ के सोचता हूँ,<br />
फिर, वापस लौटता हूँ ।<br />
</em></p>
]]></content:encoded>
	</item>
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