आजकल लुलिन धूमकेतु के आने की बात चल रही है। बताया गया कि २३-२४ फ़रवरी को दिखेगा। कल अरविन्द मिश्र को दिखा नहीं। शायद आज दिखा हो।
अंतरिक्ष बहुतों की तरह हमारे लिये भी जिज्ञासा का विषय रहा है। बचपन से अब तक इत्ती बातें पढ़ीं हैं कि बहुत कुछ तो गड्ड-मड्ड हो गयी हैं। कोई बताता है सारी आकाश गंगायें एक-दूसरे से दूर भागी जा रही हैं। भागी जा रहीं हैं। ऐसी-वैसी स्पीड से नहीं प्रकाश की स्पीड से। मतलब तीन लाख किलोमीटर प्रति सेकेंड! मतलब अपनी राजधानी एक्सप्रेस भी तेज!
मैं सोचता हूं कब तक भागेंगी ये आकाश गंगायें। काहे को भागी चली जा रही हैं। कहां तक जायेंगी? कभी हांफ़ते हुये सुस्ताने की बात भी करेंगी क्या?
हम तो इस पर कवितागिरी भी कर दिये थे
:
ये दुनिया बड़ी तेज चलती है ,
बस जीने के खातिर मरती है।
पता नहीं कहां पहुंचेगी ,
वहां पहुंचकर क्या कर लेगी ।
हमारी औकात देखिये। ससुर छह फ़िटा आदमी ताजिदगी ऐंठा रहता है। हिटलर की तरह गरदन अकड़ाये! साठ-सत्तर साल में गो-वेन्ट-गान हो लेता है। बड़े उछल के कहते हैं इत्ती स्पीड से गाड़ियां चलती हैं। ये है वो है! ये तीर मार लिया वो जलवे दिखा दिये। ये झगड़े निपटा दिये वो बलवे करा दिये!
मतलब हमका अईसा वईसा न समझो हम बड़े काम की चीज!
तुलना करिये जरा! सबसे पास जो तारा है सूरजजी के बाद वाला उस तक पहुंचने में प्रकाश को चार साल से ज्यादा लगते हैं। तीन लाख किलोमीटर प्रति सेकेंड के हिसाब से लगातार चार साल से ज्यादा चलो तब पहुंचो उसके द्वारे।
सूरज अपना माल ऊर्जा जो फ़्री में सप्लाई करते हैं उसको हम तक पहुंचने में आठ मिनट लग जाते हैं। लोग कहते हैं अगर हम अपने पास उपलब्ध सबसे तेज साधन से भी चलें तो भी पहुंचने में पचास-साठ पीढ़ियां निपट लेंगी। अब अगर वहां जाने की बात करी जाये जहां से हम तक प्रकाश पहुंचने में हज्जारों साल लेता है तो कित्ते साल में पहुंचेंगे। सोचते हैं और बस सोचते ही रह जाते हैं। सोचने में कुछ पल्ले से जाता नहीं है न!
उधर दूसरे बयान भी हैं! हनुमान जी सूरज को मधुर फ़ल जान कर लील जाते हैं! लक्ष्मण कहते हैं अगर राम जी आज्ञा दें तो इस ससुरे ब्रम्हाण्ड को गेंद की तरह उठाकर कच्चे घड़े की तरह फ़ोड़ दूं:
जौ राउर अनुशासन पाऊं। कंदुक इव ब्रम्हाण्ड उठाऊं॥
कांचे घट जिमि डारौं फ़ोरी। सकऊं मेरू मूलक जिमि तोरी॥
इसी बहाने हमें आज फ़िर लगा कि जब आदमी गुस्सा होता है तो तर्क उसके पास से विदा हो लेता है। अब बताओ दुनिया को उठाओगे गेंद की तरह और फोड़ोगे घड़े की तरह! दूसरी बात कि जब आप खुद ब्रम्हाण्ड में मौजूद हैं तो उसे उठायेंगे कैसे! हो सकता कि प्रभु भक्तों के पास कोई भक्तिपूर्ण तर्क हो इस बात का। लेकिन सहज बुद्धि की बात है अपनी सो कह गये। भक्तगण क्षमा करेंगे।
लोग कहते हैं कि अगर आदमी की गति प्रकाश की गति से तेज हो तो वह अतीत में जा सकता है। अतीत की घटनाओं को नियंत्रित कर सकता है। गणितीय सूत्रों से भी यह बात तय पायी गई। लेकिन वैज्ञानिको ने शायद इसे सहज बुद्धि के तराजू पर तौल कर खारिज कर दिया। उनका कहना है कि अगर ऐसा होगा तो कोई अतीत में जाकर अपने मां-बाप का टेटुआ दबा देगा। फ़िर उसकी पैदाइश डाउटफ़ुल हो जायेगी।
क्या बतायें बहुत उलझ से गये दुनिया के बारे में सोचते-सोचते। कहते हैं लोग कि ब्रम्हाण्ड में हर क्षण हजारों तारे जन्म ले रहे हैं, हजारों मर रहे हैं। एक दूसरे से दूर भाग रहे हैं! नजदीक भी आ रहे हैं। कृष्णजी तो सब कुछ अपने मुंह में दिखा दिये थे अर्जुन को। बेचारे इत्ता डर गये कि मरने-मारने पर उतारू हो गये।
न जाने कित्ती बड़ी है दुनिया। अभी तो हमारे और हमारी फ़ैक्ट्री तक सीमित है! जा रहे हैं अपनी दुनिया में!
मेरी पसंद
तेरा जहान बड़ा है , तमाम होगी जगह
उसी में थोड़ी जगह मेरी मुकर्रर कर दे
मैं ईंट- गारे वाले घर का तलबगार नहीं
तू मेरे नाम मुहब्बत का एक घर कर दे।
मैं गम को जी के निकल आया, बच गईं खुशियां,
उन्हें जीने का सलीका़ मेरी नज़र कर दे।
मैं कोई तो बात कह लूं कभी करीने से,
खुदारा!मेरे मुकद्दर में वो हुनर कर दे।
डा.कन्हैयालाल नंदन






जोरदार रहा अन्तरिक्ष चिंतन -अच्छा लगा कि आपका यह ज्ञान भी अपडेट है -तनिक काक्भुशुन्दी का ब्रह्माण्ड दर्शन बकुल तुलसी पर फिर से एकबारगी नजरें फिरा लें ! भी अन्तरिक्ष ज्ञान की कई गलतियं अनसुलझी ही हैं ! अब प्रकाश की गति से तेज चलने वाला धरती से चला कोई यान मंगल ग्रह पर उतरता हुआ पहले दिखेगा ,धरती से टेक आफ करता बाद में !
जय हो !
काहें गुस्से में हैं जी? कवि लोगों को आकाश-पाताल एक करने दीजिए। वैज्ञानिक गण को सच्चाई का पता लगाने दीजिए। दोनो अपने काम के परफेक्ट अन्त तक नहीं पहुँच पाएंगे। यह बात पक्की है।
इस अखिल ब्रह्माण्ड में बहुत कुछ रह जाएगा जाने बगैर। केवल कुछ अंश तक ही हमारी पहुँच होने वाली है। तो फिर सबको अपने-अपने ढंग से गोता लगाने की छूट होनी ही चाहिए। क्या फर्क पड़ता है…?
अतिः उतम रचना है।साथ ही दिनांक 24.02.2009 मंगलवार की जो अमावस्या है वो भौमवती अमावस्या है तथा चन्द्रमा भी शतभिषा नक्षत्र पर है। अतः इस दिन सम्पतिशाली बनने का देवी उपाय करनें का दिन है विस्तार से मेरे ब्लोग पर पढें यदि अन्य ब्लोगर इस जानकारी को पुनः प्रकाशित करते हैं तो मुझे कोइ एतराज नहीं है।
वाह! एकदम फुरसतिया आलेख।
जब ब्रह्मांड फैल रहा है तो लक्ष्मण जी के जमाने में मटके जैसा ही रहा होगा? और हनुमान ने तो बचपन में ही सूरज को मुँह में रख लिया था, तब वह जरूर गेंद जितना ही रहा होगा? जब हम ने ये कथाएँ सच्ची माननी ही हैं तो यह मान लेने में क्या आपत्ति है?
आप मानना चाहें तो यह भी मान सकते हैं कि धरती पर बतौर सजा आदम हव्वा आए और चाहें तो यह भी कि डार्विन सही थे। यह तो मानने मानने की बात है।
मैं गम को जी के निकल आया, बच गईं खुशियां,
उन्हें जीने का सलीका़ मेरी नज़र कर दे।
आ.नन्दन जी की पंक्तियां जीवन का एक अलग ही नजरिया दिखाती हैं. बहुत सुंदर कविता आपने दी यहां पर.
लूलिन तो हमारे को दिखा था, दिखा क्या था? मिल गया था, कह रहा था ताऊ मैं तो घूमते घूमते थक गया हूं. अब मेरा भी एक ब्लाग बनवा दो, तो थोडे दिन यहीं आराम कर लूं.
हमने आदर्णिय मिश्रा जी का पता दे दिया है, और अभी हमारे ब्लाग पर श्री मिश्रा जी की टिपणि आई है कि वो लूलिन से दी्दे लडा रहे हैं. शायद ब्लाग की लूलिन ब्लाग कीडिस्कशन
चल रही दिखती है.:)
रामराम.
लूलिन तो शायद ही किसी को दिखा हो…अधिकांश जगहों से नहीं की ही रिपोर्ट आ रही है….एक धरती तो मानवों के हाथ संभल ही नहीं पा रही….पूरे ब्रह्मांड की रक्षा क्या कर पाएगी…इसलिए तो सिर्फ अवलोकण का अधिकार ही मिला है हमें….शायद ग्लोबल वार्मिंग की वजह से अवोकण में भी दिक्कत आ रही हो।
अपनी लघुता का अहसास करने के लिए बस नजर उठा कर अनंत आकाश को देख लेता हूँ.
अरे प्रकाश को आने में कोई समय नही लगता.. हमारे पीछे वाली गली में ही रहता है. ससुर जब देखो तब आ जाता है.. फिर ये कौनसा प्रकाश है जिसको चार साल लगते है??
और आप भक्तो को रुष्ट नही कर सकते.. जो आपने लिखा है उसे तुरंत हटाइए वरना हम आ रहे है झंडा लेकर..
मैं गम को जी के निकल आया, बच गईं खुशियां,
उन्हें जीने का सलीका़ मेरी नज़र कर दे।
” waah waha aaj to shabd nahi hmare pass in panktiyon ke liye..”
Regards
बहुत कुछ ऐसा है इस दिमाग में भी जो अबूझ और सुदूर है। मैं सोच रहा हूं कि इस प्रविष्टि को किसी सूक्ष्म अर्थ की प्रतीति कराती हुई सामान्य अभिव्यक्ति मानूं या सामान्यतः व्यक्त कर दिया जाने वाला वाक्-विलास !
आपकी पसंद के अंत में आ जाने से मैंने देखा है कि आपकी प्रविष्टियों से बहुत सारा ध्यान बहक कर इस पसंद पर अटक जाता है। जैसे आज ही –
“मैं कोई तो बात कह लूं कभी करीने से,
खुदारा!मेरे मुकद्दर में वो हुनर कर दे।”
निश्चित बहुत कुछ अन्जाना है अभी और न जाने कितनी सदियों तक अन्जाना रहने वाला है बहुत कुछ।
उसको टाइम मशीन कहते है जी….हम कब से ढूंढ रहे है .पर वेटिंग लाइन लम्बी है .ओर पासवर्ड मिलता नही
अजी आप तो वैसे ही बडे़ काम की चीज़ है….
हमरी क्या मजार जो अईसा-वईसा समझ लें ?
मैं कोई तो बात कह लूं कभी करीने से,
खुदारा!मेरे मुकद्दर में वो हुनर कर दे।
नंदन जी का यह शेर बहुत पसंद आया…
साभार
अजित
बाप का जन्म बेटा कैसे जान सकता है? सो जितना मर्जी उड़ो हाथ कुछ भी नही आएगा।सो बेहतर है जो आपने अंत मे कहा -डा.कन्हैयालाल नंदन जी शब्दो में।
बड़ी दनादन दो पोस्टें ठेल दीं! फुरसत में आ गये लगता है!
लगता है अरविन्द मिसिर जी ने आपको भी जगा दिया. इसीलिए इतने ज़ोर का ग़ुस्सा आपके कपारविन्द पर चड़ा हुआ है.
शानदार है…..जानदार भी…..
ये अंतरिक्ष की बातें वो भी गणित के साथ…अपनी समझ से तो बाहर हैं जी। हम तो इंजिनियर हैं नहीं। हम तो जब भी नजर ऊपर उठा के देखते है चंदा तारे बड़े प्यारे लगते हैं , चंदा में बैठी बुढ़िया भी दिखती है। तारों को देख शम्मी कपूर गाता दिखाई देता है ‘बदन पर सितारे लपेटे हुए…’ इस लिए भाई ये ज्ञानियों वाले नजरिए आप को और अरविन्द जी को ही मुबारक।
नन्दन जी की कविता रोज पढ़वाई जाए, ये हमारा आग्रह है। आसमान को ताकने से ( वैसे भी बंबई में आसमान देखना सबके नसीब में नहीं, सिर्फ़ छत दिखती है) नन्दन जी की कविता को पढ़ना ज्यादा रोचक लगता है।
प्लीज……… अपनी चिंतन सरिता इसी तरह निर्बाध बहाते रहिएगा ,ताकि हम उसमे डुबकी लगा लगा कर अपना दिन बनाते,गमकाते(सुवासित करते) रहें…….
एकदम आनंद आ गया…..और क्या कहें…..LLLLLLLLLAAAAJJJJJAAAAAWWWWWWWWAAAAABB..
देखिए महानुभाव आप हमारी भावनाओं को ठेस न पहुँचाएं . हनुमान जी ने सूरज को निगल लिया था मतलब निगल लिया था .फाइनल . आगे कोई बहस नहीं .
हा हा…आपके चिंतन के तो हम कायल हो गए! सूरज को निगलने वाली बात एक बार हमारे भेजे में भी आई थी और कुछ ऐसा ही तर्क देकर अपने किसी बढे बूढे से पूछ लिया था….फिर क्या था डांट खाकर अपने सा मुंह लेकर लौट आये थे! आज आपकी बात सुनकर फिर से हौसला बढ़ गया!
आपकी पूरी प्रोफाइल नहीं पढ़ी लेकिन ऐसा लगता है कि बंदूक- वंदूक बनाने के कारखाने में काम करते हैं. आपके जैसा खुर्राट या दुर्दांत ब्लॉगर कोई ऐसे ही थोड़े ही बनता है. ठीक है नाम फुरसतिया है लेकिन क्या वास्तव में इतना झक्काझोर लिखने की फुरसत रहती है या फुरसज ही फुरसत. वैसे आप लिखते बढिय़ा हैं. और क्या-क्या करते हैं?
“कोई अतीत में जाकर अपने मां-बाप का टेटुआ दबा देगा। फ़िर उसकी पैदाइश डाउटफ़ुल हो जायेगी।”
थोडा सीरियस हो कर कहें तो …
एक धरती का तो सत्यानाश करने का इंतजाम कर लिया इन वैज्ञानिकों ने, अब दूसरी ढूंढ रहे हैं. वैसे लगता नहीं कि दूसरी धरती की खोज तक हम मनुष्य अपनी जाति को सुरक्षित रख पाएंगे.
ये सब लोग लूलिन के पीछे क्यों पड़ गए हैं, मान लेते हैं की वैज्ञानिक देख कर कुछ उल्टे सीधे जोड़ घटाव करेंगे पर ये आम इंसान धूमकेतु देख कर क्या करेगा? या न देख कर क्या करेगा…हाँ ब्लॉगर जरूर धूमकेतु पर पोस्ट लिख सकता है. मज़ेदार पोस्ट है…और अंत वाली कविता बहुत अच्छी लगी हमें.
ऐसा वैसा किसको कौन समझता है, एक हम हैं की डरते डरते टिपण्णी करते हैं कि जाने किसकी डांट पड़ जाए की क्या लिखा है.
नँदन जी ने बडे पते की बात कह दी !
और नासावाले भी इस ब्रह्माण्ड का ब्योर जुटाने मेँ मिलियनोँ डालर
जाया किये जा रहे हैँ और हनुमान जी उसे गेँद बनाकर खेल रहे हैँ
लुलिन की चमक आकाश मेँ धूम मचाकर विलीन हो जायेगी ..
फिर कोई दूसरा धूमकेति आएगा ..
“सकल ब्रह्माण्ड माँ एक तू श्री हरि “( नरसिँह मेहतो )
- लावण्या
पोस्ट तो बहुत पसंद आई थी. कमेंट भी किये थे शायद. दिख नहीं रहा.
लीलत उगलत पीर घनेरी, फ़ुर्सतिया जी ख़ूब कहै री
ज्ञानवर्धन हो गया अपना भी
गुरुदक्षिना में टिप्पणी अर्पण कर रहे हैं स्वीकार करें
pata nahi aap kya likataen hain,line lenght hi samajh me nahi aa rahi hai ,lekhan ko rochak banaiye…