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36 responses to “रंग बरसे भीगे चुनर वाली”

  1. मानसी

    “हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै?”

    सच्ची।

  2. seema gupta

    रंग बहुत पर मैं कुछ ऐसी भीगी पापी काया
    तूने एक-एक रंग में कितनी बार मुझे दोहराया
    मौसम आये मौसम बीते मैंने आंख न खोली
    मगर अब साजन कैसी होली!

    ” ha ha ha ha ha ha ha ha ha bhut mjedaar post ”

    Regards

  3. nirmla.kapila

    vah fursatia ji holi par itni fursat ki itni badi post karne ka time mil gaya khoob rang barsaaye hain bhut bahut bdhai holi mubarak

  4. दिनेशराय द्विवेदी

    इधर चूनर वाली भीगती रही उधर रघुवीरा होली खेलता रहा। वसीम बरेलवी की होली पसंद आई, और वजह भी मिली कि चूनर वाली ही क्यों भीगती है।

  5. dhiru singh

    चुनर वाली न सही जींस वाली ही सही आपने भिगो तो दी ही होगी . होली तो मना ही ली होगी .

  6. himanshu

    एकदम होलियाना मूड की प्रविष्टि । यूं ही आ गये विचार को यूं ही नहीं रहने देते आप, उसे साज सज्जा देने में आप माहिर हैं । ’रैंडम थाट डेकोरेटर’ हिन्दी चिट्ठाजगत में दो ही को मानता हूं – एक आपको और दूसरा ‘ज्ञानदत्त जी’ को ।

    प्रविष्टि का धन्यवाद |

  7. anil pusadkar

    अच्छा पकड़ा आपने,वाकई इत्ते सालो से सिर्फ़ चूनर वाली ही भीग रही है,ठंड भी नही लगती क्या इसको।

  8. समीर लाल

    तोहरा रंग चढ़ा तो मैंने खेली रंग मिचोली
    मगर अब साजन कैसी होली!
    -हो गया विमर्श चुनरवाली का? अभी होली ठीक से बीती भी नहीं और आप भी चिन्ता लिए बैठ गये. अभी तो खेलिए..यह सब बाद में देख लिया जायेगा,

    :)

  9. संजय बेंगाणी

    आपने ऐसे ही कह दिया और हमने ऐसे ही पढ़ भी लिया. अगले वर्ष फिर चुनरवाली भीगेगी कोई का करिहे? :)

  10. चुनर वाली

    हाय राम! जमाना बीत गया. .अब जाके तुमने हमारा दर्द जाना.. मैं तो मारे शर्म के भीग ही गयी…

  11. ranju

    रंग बहाना रंग जमाना रंग बड़ा दीवाना
    रंग में ऐसी डूबी साजन रंग को रंग न जाना
    रंगों का इतिहास सजाये रंगो-रंगो होली
    मगर अब साजन कैसी होली।

    बढ़िया रहायह ..हाँ चुनर और चुनार वाली बात लॉजिक तो है इस में :) बढ़िया लगी यह पोस्ट

  12. mamta

    माने होली अच्छी हुई । :)

  13. Dr.Arvind Mishra

    अभी खुमारी उतरी नहीं है -नतीजा यह चुनरी से चुनार तक की छलांग !

  14. ताऊ रामपुरिया

    तोहरा रंग चढ़ा तो मैंने खेली रंग मिचोली
    मगर अब साजन कैसी होली!

    अभी तो रंग पंचमी बाकी है. आपको आजकल चुनर वाली की तबियत की बडी फ़िकर रहती है कि कहीं डबल निमोनिया ना हो जाये? सब ठीक तो है ना?:)

  15. Shiv Kumar Mishra

    चुनार वाली ही चुनर वाली बनी है.
    महान समाजशास्त्री डॉक्टर महेश चन्द्र ने अपनी पुस्तक ‘होली का इतिहास’ में लिखा है……..

  16. विवेक सिंह

    सन्दर्भ:प्रस्तुत पद्यांश महाकवि फ़ुरसतिया की सुप्रसिद्ध कविता रंग बरसे भीगे चुनर वाली से लिया गया है !

    प्रसंग:कवि ने होली विमर्श के बहाने भारतीय समाज में नारियों की दशा पर गहन चिन्तन किया है . किन्तु यहाँ कवि अपनी भावनाएं पाठकों तक पहुंचाने में पर्याप्त सफ़ल नहीं हो सका है . क्योंकि पाठकों को कवि को हल्के में लेने की बुरी आदत पड़ गयी है !

    व्याख्या: भारतीय समाज में नारियों की स्थिति अभी तक किसी खिलौने से ऊपर नहीं उठ सकी है . नारियों को यहाँ उनकी मरजी के खिलाफ़ नाम दिया जाना पुरानी परम्परा रही है . और उनकी अपनी कोई पहचान बना पाना अभी भी टेढ़ी खीर है .

    विशेष: कवि ने अन्त में मुस्कराकर माहौल को हल्का करने की कोशिश की है . पर कदाचित कवि को नहीं मालूम कि माहौल तो पहले से ही हल्का है !

  17. PN Subramanian

    यह भी तो हो सकता है कि पहले सब खुल्ला खुल्ला रहता होगा.(जैसे आजकल है) अचानक कोई चुनरी पहनकर आ गयी. लोगों ने उसे घेर लिया. फिर बज गया बाजा. भिगा दिया चुनर वाली को. बुरा न मानो होली है!

  18. अजित वडनेरकर

    चाहे होली हो या दीवाली,मस्ती न जाए खाली…

  19. Gyan Dutt Pandey

    चुनर वाली काव्यात्मक है और चुनारवाली तो देसी सिरेमिक पॉटरी जैसी लगती है। वो जो भीगने पर भी बिल्कुल न बदले!
    अगले साल भी यथावत रहेगी।
    अगली होली पर भी यह सुन्दर पोस्ट ठेलेबल है।

  20. anitakumar

    :) होली का खुमार अभी उतरा नहीं लगता है । रेन्डाम थॉट डेकोरेटर समाजशात्री भी हैं? चुनार कहां है जी , हमें तो भारत के नक्शे में कहीं नहीं दिख रहा, वैसे अपना जुगराफ़िया काफ़ी खराब है। चुनरवाली को निमोनिया हो भी गया तो काहे का गम है जी इत्ते सारे डाग्दर बैठे हैं यहां उसका इलाज करने को……।:) आप तो जी जग की चिंता छोड़िए और रंग पचंमी मनाइए

  21. लावण्या

    होली का अब अगले साल आगमन होगा पर ये गीत याद रह जायेगा
    - लावण्या

  22. राज भाटिया

    अनुप जी इसी लिये तो अब चुनर गायव होनी शुरु हो गई, क्योकि सभी इस चुनर वाली के पीछे ही लग गये….. बेचारी…. जाओ अब हम नही लेते मुयी चुनर, अगर निमोनिया हो गया तो इलाज कोन करवायेगां.
    बहुत सुंदर

  23. Smart Indian

    रंग बरसे … और बरसे … बरसता रहे!

  24. nitin

    वाह वाह वाह! मौज लेना तो कोई आपसे सीखे!

  25. cmpershad

    @” पैंट-शर्ट में होली खेल रहे थे लेकिन प्रचार चुनर वाली के भीगने का हो रहा था। ”
    यही माहौल पचास के दशक में उस समय था जब नागिन फिल्म मे बज तो रही थी बीन पर लता जी गा रही थी- ये कौन बजाए बांसुरिया……:)

  26. बवाल

    क्या फ़ुर्सतिया साहब, आप भी ना ! अब हटाइए, क्योंकि पाठकों को कवि को हल्के में लेने की बुरी आदत तो पड़ ही चुकी है ! हा हा !

  27. kanchan

    aap ki pasand hamesha achchhi hoti hai

  28. dhiresh saini

    हां ये मूलत: लोगकगीत ही है। हरिवंश ने अपने नाम से मार दिया फिल्म में, क्या करिएगा?

  29. Darpan Sah

    “चुनरवाली वीआईपी है। अकेले भीगती है। वो भीगती रहती है गोरी का यार पान चबाता रहता है। पच्चीस साल से बेचारा पान चबा रहा है। उसको पता ही नही होगा कि इस बीच कित्ते पान-मसाले आ गये हैं।”
    wakai maza aa gaya apke blog main aake.

    “हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै?”

    Ap agar jabriya likhenge to hum jabriya comment bhi karenge.

    aur chahe apke blog main follower ka koi option na ho hum to ‘blogroll’ jabriya karange.
    ab chahey ise apna apharan manie ya hamara apko padhne ki lalsa

  30. रौशन

    अब जब आप ठान ही के बैठे हैं कि लिखना ही लिखना है तो चुनर वाली क्या कोई भी होती आप लिख ही मारते
    हम तो इतने सालों से मान के बैठे थे कि चुनरवाली सहियै होगा आपने चुनार वाला एंगल फंसा डाला . जबरिया लिखने वालों का लिखा पढने से यही होता है. अब चुनर वाली डाक्टर के पास जाए न जाए पढने वाले जायेंगे ही.
    वैसे वसीम बरेलवी की कविता शानदार है

  31. dr anurag

    वसीम बरेलवी की कविता पहली बार पढ़ी….आपके नजदीक बनारस में थे होली पर इस बार हम…..

  32. sciblogindia

    लेकिन अब ऐसे दृश्य कहां देखने को मिलते हैं।

  33. Abhishek Ojha

    जींस के जमाने में भी चुनर वाली को बड़े ध्यान से देखें हैं आप होली के दिन :-)

  34. amit

    वाह, आपने तो अमिताभ के गाए हुए गाने का नया अर्थ निकाल बता दिया!! :D

  35. : जबरियन छपाई के हसीन साइड इफ़ेक्ट

    [...] बार पता चला कि हमारा एक लेख रंग बरसे भीगे चुनर वाली होली के मौके पर दो अखबारों ने छापा। एक [...]

  36. फ़ुरसतिया-पुराने लेख

    [...] रंग बरसे भीगे चुनर वाली [...]

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