एक
सोचते हैं चले ही जायें अगले हफ़्ते कलकत्ते
वहां रहता है अपना बचपन का यार फ़त्ते,
बता रहा था वहां वो थोक में बेचता है गत्ते
लौटते में हमेशा सिलवा देता है कपड़े लत्ते!
बच्चा बोला पापा हमें भी अपने साथ लेते चलते,
हम बोले बोर होगे लौटने को कहोगे अधरस्ते,
बच्चा बोले हम भी देखेंगे नई जगहें,नये-नये रस्ते,
ट्रेन में संस्कृत के रूप भी रट लेंगे स:,तौ, ते।
दो
सादा जीवन उच्च विचार
क्या ये भी झेलाओगे यार
सुन लेंगे यदि लोग दो-चार
कोसेंगे, रोयेंगे, दौड़ा लेंगे यार!
तीन
जीवन सादा अच्छा है,लेकिन कुछ एक्सेपशन के संग
मौज-मसाला बना रहे,चकाचक जमा रहे फ़ुरसतिया रंग!
आज कहें या काल्हि सुन, है बड़े काम की बात,
मुंह लटका यदि आपका, होगा बहुत बड़ा व्याघात!
होगा बहुत बड़ा व्याघात उधड़ जायेगी जिंदगी की सीवन
छौक मसाला मौज का जियो धांस के सादा जीवन। ![]()
चार
झुलसेगा शरीर
चल जा भाग।
परछाइयां
दुबक गयीं सब
धंसी खुद में।
जरा सी बात
फ़ैली गर्म लू जैसी
चिलचिलाती।
कोई दिखे न
सन्नाटा पसरा है
चारो तरफ़।
अमलताश
खिलखिलाता खड़ा
बाकी उदास।
धरती तपी
बर्फ़ भी पिघलेगी
डूबेंगे सब।
अपनी गर्मी
सब बाहर करें
सनसनाते।
‘एच’ अलग
‘टू’ भी दूर भगेगा
सब अकेले।
पौशाला है ये
खुद खड़ा धूप में
पानी पिलाता।







कलकत्ते से तुक मिलाते
आप पहुँच भी गये होँगेँ रस्ते ..
अब हुई समझो ..फत्ते !!
- लावण्या
आज कहें या काल्हि सुन, है बड़े काम की बात,
मुंह लटका यदि आपका, होगा बहुत बड़ा व्याघात!
सही
प्रस्थान तिथि की सूचना अविलम्ब दें,
रिजेक्टेड टिप्पणियों के कुछ गत्ते इधर भी पड़े हैं,
फ़त्ते को दे दीजियेगा, बिल्कुल मुफ़्त !
सः,तौ,ते,स्कूल की याद दिला रहे हो भैया।संस्कृत से जितना डर लगता था उतना तो अमेरिकियों को ओसामा से भी नही लगता होगा।
अब संस्कृत की बात की है तो रूप भी सुनो, बिना किताब देखे स्मृति से सुना रहे हैं
स: तौ ते,
तम् तौ तान्
तेन् ताभ्याम् तै
तस्माय ताभ्याम् तेभ्य:
तस्मात् ताभ्याम् तेभ्य:
तस्य तयो तेषाम्
तस्मिन तयो तेषु
कहो तो बालक, बालिका और पठति के पांचों विभक्तियों में रूप सुना दें, भूतकाल वाला सबसे कठिन होता था
वैसे क्या बात हैं, आज फ़ुरसतिया मिजाज अलग नजर आ रहे हैं। सब खैरियत तो है? आप भी कहीं निरापद लेखन के चक्कर में तो नहीं फ़ंस गये
सभी निरापद लेखन की अलग अलग मिसालें कायम करने में लगे हैं. आपने भी कर ही दिया.
वैसे कविता कितनी अच्छी कर लेते हैं आप. गौरैय्या पर भी कुछ लिखिये न!! ज्ञान जी का भी मन रह जायेगा.
अगले हफ़्ते नहीं दो हफ़्ते बाद…!
वाह निरापद लेखन का कितना सटीक उदाहरण दिया आपने. पर आपका चित्र निरापद नही है. रेल्वे आपसे रायल्टी की मांग कर सकता है अत: आपको सलाह दी जाती है कि साभार का प्रदर्शन करें. इस तरह रेल पटरियों का उपयोग दंडनिय है.
और गौरैया पर लिखने की कोशीश भी कापीराईट का उल्लंघन होगा. इसका कापी राईट ज्ञानजी ने हमको किया है. आप अपने लिये कोई अन्य निरापद सबजेक्ट मांग लिजिये.
रामराम.
चले ही जाइए…फुर्सत का इससे अच्छा इस्तेमाल कहाँ होगा
फिर हमें कलकत्ता की बातें बताइयेगा, छौंक मसाला मार के
बच्चा बोले हम भी देखेंगे नई जगहें,नये-नये रस्ते,
ट्रेन में संस्कृत के रूप भी रट लेंगे स:,तौ, ते।
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इतनी सुन्दर कविता का करते हम सम्मान।
तम् तौ तान्, तम् तौ तान्!
कलकत्ते ज़रूर आईये. बढ़िया शहर है. लेकिन;
गर्मी से बेहाल हुए सब
झुलस रहा पूरा कलकत्ता
लिए पसीना घूम रहे सब
भीगा रहता कपड़ा-लत्ता
बिजली भी अब गायब रहती
पूरे दिन में छ-छ घंटे
जीवन जाने कैसे गुजरे
गले पड़े हैं कितने टंटे
फत्ते को कुछ समय दीजिये
ताकि कर ले कुछ तैयारी
बारिश की भी कृपा रहे गर
जीवन से जाए दुस्वारी
तबियत तो ठीक है ना जी ?
फुर्सत में बहुत बढ़िया कविता कर लेते हैं आप…कलकत्ते वाली कविता पढ़ कर गोपाल प्रसाद व्यास जी की ये कविता याद आ गयी…
“हवा चली डाल हिली
गिरा एक पत्ता
दिल्ली से उड़ा उड़ा
पहुंचा कलकत्ता
वाह रे रंगीले पिया
ये तुमने क्या किया
बासंती मौसम में
ले आये छत्ता”
नीरज
नीरज की टिपण्णी पढ़ी तो सोचा हमभी लगे हाथो दो-चार सुना जाएँ. कुश की पढ़ी तो हंसी आ गयी
वाह, क्या बात है, एक ही में चार ठेल दी, बिना गद्य के??!! कुछ हम जैसे कविता रस से अछूते लोगों का भी ख्याल करते महाराज!
चार चार कविताये ???? देखिये चार बार प्रशन चिन्ह लगाया है …पहेली पूछते तो अच्छा लगता या किसी कीडे मकोडे के काटने का इलाज़ बताते पर आप ठहरे कवि…
औसत हिन्दुतानी कविता के बोझ से नहीं मारा जा रहा है मी लोर्ड …वो बेचारा अभिव्यक्ति के बोझ से मरा जा रहा है …..आपकी इन प्रतीकात्मक चेष्टाओं से कोई उपाय नहीं निकलने वाला हे कवि .क्यूंकि अभिव्यक्ति का कोई मेनिफेस्टो नाही होता …..इ बात समझने में ओर समझाने में …दोनों में बहुत टाइम लगता है…..
पुनाश्चा :गौरया पे लिखी कविता की प्रतीक्षा रहेगी
अहा..देव का अलबेलापन…!!!
आपने लिखा इसीलिये अच्छा लगा.
Bade dinon baad tippanee denekee himmat juta payi hun..lekin alfaaz nahee hain !
Meree URLs de rahee hun..
http://lalitlekh.blogspot.com
http://kavitasbyshama.blogspot.com
http://aajtakyahantak-thelightbyalonelypath.blogspot.com
kaafi mazedaar soch hai…ek nayaapan saaf dikha is post me..kaafi lambe break ke baad laute aap
http://www.pyasasajal.blogspot.com
इत्ती गर्मी में तो घर में ही रहना ठीक है, बाकी आपकी मर्जी।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }
Itti Dher Sari kavitayen ek bar mein likh di. Yatra mein to Darzan bhar likh marenge. Vaise Garmi Bahut pad rahi hai. Meri maniye to T.V. par hi Culcutta dekh lijiye.
चलो बढिया है अनूप जी, अब कविता भी करने लगे आप. कलकत्ता से होते हुए गर्मी पर टूट पडे? असल में अब गर्मी की चर्चा हम सब की बातों का स्थाई भाव हो गया है. उसके बिना बात पूरी ही नहे होती.
कलकत्ते में बैठकर, करें रेल की सैर . बच्चे को ले जाइये, उससे क्या है बैर ?