By फ़ुरसतिया on July 24, 2009
पानी बरसत देखि के, अम्मा करिन पुकार
कपड़ा अरगनी से उतारि के, कमरा मां देव डार।
बादल फ़टा पहाड़ पर मर गये दो सौ लोग,
जांच हुई पता चला उसको गुस्से का था रोग।
बादल से बदली भिड़ी फ़िर होती गयी तकरार,
विदा हुये जब बरसकर हो गया उनमें प्यार।
बदरी-बदरे की प्रीत से सुलगे पंचायत के लोग,
फ़ांसी, आगी , चिता का अब प्रेमकुंडली में योग।
मुंबई डूबी रो रही, है कम्पू गर्मी से हलकान,
टब सा उसको उलट दो, आये जान में जान!
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अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।
मुंबई डूबी रो रही, है कम्पू गर्मी से हलकान,
टब सा उसको उलट दो, आये जान में जान!
-आप तो बारिश में कवि हो लिए जी!! कुछ लेते क्यूँ नहीं?
शानदार जानदार धारदार
मुला अपुन का तो अभी यही हाल है -
बादल से बदली भिड़ी फ़िर होती गयी तकरार,
बादल से बदली भिड़ी फ़िर होती गयी तकरार,
विदा हुये जब बरसकर हो गया उनमें प्यार।
खुबसूरत पंक्तियाँ भई, उ का है न बादल बदली का प्यार वाह ”
regards
जब बादल से बदरी भिडी
अब पैदा हो गई है.. बूंदे
खूब बरस रही है….. बूंदे
जोरो से होने लगी बरसात
पंडित जी आपकी रचना बहुत ही बढ़िया है . खूब लिखी है आपने .आभार
बादल से बदली भिड़ी फ़िर होती गयी तकरार,
विदा हुये जब बरसकर हो गया उनमें प्यार।
waah bahut khub
जनजीवन को आप बहुत सुंदर तरीके से अभिव्यक्त कर लेते हैं।
बादल से बदली भिड़ी फ़िर होती गयी तकरार,
विदा हुये जब बरसकर हो गया उनमें प्यार।
बादल ने ही कुछ कहा होगा पहिले….लेकिन अंत भला त सब भला.
बारिश आवत देख के, अम्मा करिन पुकार
कपड़ा अरगनी से उतार के, कमरा में दो डार।
उपरोक्त पंक्तियों से सिद्ध होता है कि बिना अम्मा के कहे कवि अपनी समझ से बाहर से कपड़ों को अन्दर नहीं लाता, और लाकर भी व्यवस्थित करके रखने की बजाय उससे यही उम्मीद की जाती है कि वह डाल ही दे तो काफ़ी है, अम्मा की नजरों में कवि कितने काम की चीज है इससे साफ़ पता चलता है .
बादल फ़टा पहाड़ पर मर गये दो सौ लोग,
जांच हुई पता चला उसको गुस्से का था रोग।
यहाँ बादल की गलती को रोग बताकर उसकी सजा कम करवाने की साजिश रचने से कवि के वकील होने का आभास होता है .
बादल से बदली भिड़ी फ़िर होती गयी तकरार,
विदा हुये जब बरसकर हो गया उनमें प्यार।
बादल से बदली भिड़ी को यह क्यों नहीं कहा कि बदली से बादल भिड़ा ? इससे कवि के पुरुषवादी , और महिला विरोधी विचारों का खुलासा हो रहा है.
बदरी-बदरे की प्रीत से सुलगे पंचायत के लोग,
फ़ांसी, आगी , चिता का अब प्रेमकुंडली में योग।
पंचायत के लोगों को सुलगा हुआ बताने में अतिशयोक्ति अलंकार है .
मुंबई डूबी रो रही, है कम्पू गर्मी से हलकान,
टब सा उसको उलट दो, आये जान में जान!
मुंबई को उलटने की बात कहकर कवि ने मराठी मानुष को ठेस पहुँचाई है .
बादल फ़टा पहाड़ पर मर गये दो सौ लोग,
जांच हुई पता चला उसको गुस्से का था रोग।
ये पहाडियों पर ही क्यों गुस्सा उतारा बादल जी ने ?
बहुत ही सुन्दर. आभार
दोहे मन को सोह रहे भैया शुक्ल अनूप.
बारिश कब तक होएगी रुला रही है धूप.
बदली के (बहाने) खूब मौज लिए जा रहे हैं
बादल पहाड पर क्युं फ़टा? इस साजिश मे कौन कौन शामिल था? तुरंत एक जांच आयोग बैठाया जाये. और इस बात की तसल्ली की जाये कि इस घटना मे कहीं आतंक वादियों का हाथ तो नही है. और हो सकता है लादेन साहब के शहजादे भी उपर पहुंच कर बादलों को बरगला कर यह आतंक वादी कारवाई करवा रहे हों.
रामराम.
बरस बरस जब थक गयी, कमर गयी है टूट!
“प्यार हुआ क्यूं देरी से?” बदली गयी है रूठ!!
मुम्बई मे साहस भरा, बादल से वो डरती नही!!
डर कर या फ़िर घबरा कर, ऐसे कभी वो रुकती नही!!
सचमुच इधर कवितायें ज़्यादा लिख रहे हैं आप…सूखे की स्थिति ने कवि बना दिया? है बहुत अच्छी कविता. बधाई.
बढिया बरसाती लाइन है
बहुत अच्छे
अब पता चला हमारे यहां बारिश क्यों नहीं हो रही… बादल बदली प्यार कर फरार जो हो जा रहे हैं
आखिर भिड़ा ही दिया.. मुझे तो पहले ही पता था..
बादल से बदली लड़ गयी,
बढ़ गयी फिर तकरार ,
इहाँ इत्ती गर्मी बड़ी,
हमने कपडे लिए सब फाड़.
कोई डूबत है..कोई सूखत है,
अजब लीला है सरकार ,
ना जान इहाँ बचे , न जान उहाँ ,
कैसे होइंहें बेडा पार
बादल से बदली भिड़ी फ़िर होती गयी तकरार,
विदा हुये जब बरसकर हो गया उनमें प्यार।……..
क्या खूब वर्णन है.
गजब का विश्लेषण किया विवेक जी ने
मजे की बात यह है की हम अनूप जी के ब्लॉग पर आ कर उनकी पोस्ट की धुलाई की तारीफ़ कर रहे हैं
अहा!
वाह वाह फ़ुर्सतिया जी क्या बेहतरीन कविता लिख डाली साहब! बहुत ही लाजवाब! और उतना ही बढ़िया विश्लेषण हमारे भाई विवेक जी का, इस पोस्ट पर टिप्पणी के माध्यम से।
बरसात में बदली से मिले बादल राजा
और बज गया कविता का बंद बाजा
सस्नेह,
- लावण्या
अच्छा लिखते हैं आप…ऐसे ही लिखते रहें…शुभकामनाएं. एक बात और–आप मेरे ब्लॉग http://www.chauraha1.blogspot.com पर आए. आपने एक पोस्ट पसंद की….अपनी टिप्पणी दी….अच्छा लगा. ऐसे ही चौराहे पर आते रहें और हौसला बढ़ाते रहें. बहुत-बहुत धन्यवाद.
चण्डीदत्त शुक्ल, फोकस टेलिविजन, नोएडा
अच्छा हुआ विवेक सिंह ने अर्थ समझा दिया। वर्ना इतनी कड़ी कविता पल्ले नहीं पड़ रही थी!
पहली लाइन बडी ही भावपूर्ण लिखी।
महोदय अम्मा कवि से कपड़े उतारने को नही कह रही है।
कवि कोई हिरोइन थोड़े ही हैँ।
परिहास भी स्तरीय होने चाहिऐँ।
बारिश पर ऊपर इतनी व्याख्या हो चुकी की अब नया कुछ करने की गुंजाइश कम ही है. पर हमारे ब्लॉग पर आने और टिप्पणी के लिए धन्यवाद
सुकवि फुरसतिया का बारिश सौन्दर्य !
aapka blog padha…achcha laga,ab krisan bihari ji ko thanx kahna padega aapse parichay ke liye…..
बदरी संग बादल गए इ कैसन बतिया
बिन बरखा कवि बन गए भैया फुरसतिया!
बदरा बदरी की का कहें
इहाँ (बंगलोर में) छुप के रहें
मौज मनावत छुप छुप के
उत्तर में लोगबाग झुलस रहे.
वाह वाह वाह !!!!! क्या बात कही…….कमाल के दोहे हैं…
बादल से बदली को यूं ही भिड़ाते और प्रेम की वर्षा कराते रहिए . बल्कि एक-दो बादल-बदली को तो अर्मापुर में स्थाई रूप से बसा दीजिए . बार-बार बुलाने झंझट से मुक्ति और मर्जी से टैम-टैम पर बारिश की व्यवस्था . जमताऊ दोहे .