फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

33 responses to “क्या देह ही है सब कुछ?”

  1. हक्का व्लागर वेबलाग वाले


    निःसँदेह अनुगूँज जैसा विषय के प्रति गम्भीर और ईमानदार प्रयास दुबारा न हुआ ।
    यह लेख पहले भी पढ़ा था, और जहाँ तक याद आता है इस नोंक झोंक का साक्षी भी रहा ।
    तब हिन्दी ब्लागिंग से परिचय हुआ ही था । हिन्दी टूल का समुचित ज्ञान न था, सो कम्प्यूटर से चिपका इन्हीं सबको पढ़ा करता ।

    पर, यह तो अमानत में ख़यानत है, गुरु । एक बार आप ठेल दिहौ, अब यह सब छोड़ो हमारे लिये । इसको उचित अवसर पर प्रस्तुत करने के लिये सँजो रखा था.. पर आप हो कि ?
    कभी किसी भूली बिसरी पोस्ट का लिंक याद आ जाये तो मेल करके सुझा भी दिया करो, वेबलाग पर सहेज लेंगे । श्रेय तो देंगे ही, चाहोगे तो ताऊ से पूछ कर वही वाली फोटउआ भी साट देंगे ।
    मुला मौज़िया अँदाज़ में एक ज़ुदा किसिम की दर्शन खूब छँटी भयी है, इहाँ ।

    अमानत में खयानत के लिये माफ़ करें डा.साहब! इस लेख की कड़ियां इस लेख से कम महत्वपूर्ण नहीं है। इनसे यह पता चलता है कि शुरुआती प्रयास कैसे थे। शुरुआती दौर की नोकझोंक का स्वरूप कैसा था। फ़ोटुआ आप किस से भी सटाओ , हमारी फ़ोटॊ आजतक कब्भी अच्छी नहीं आयी। सब नेचुरल आयी हैं! :)

  2. venus kesari

    jai ho, jai ho

    venus kesari

    शुक्रिया हो, धन्यवाद हो!

  3. venus kesari

    पोस्ट पढना शुरू किये १.१२ बजे
    पूरा पढ़े
    फिर से अच्छे बच्चे की तरह मन लगा कर पढ़े और कमेन्ट किये रात १.३० बजे :)

    अब सोने जाते है और उसके पहिले पढेंगे परसाई जी की पुस्तक “कहत कबीर”
    शुभ रात्रि

    अच्छे बच्चे वीनस, शुभ प्रभात! तीन घूंट चाय पीकर सुबह छह बजकर चालीस मिनट पर मुस्कराते हुये यह प्रतिटिप्पणी ठेल रहे हैं। मौज लेने में शायर भी कौनौ कम नहीं हैं। सब कुछ बहर में है। :)

  4. ताऊ रामपुरिया

    फिलहाल तो जिस देह का हल्ला है चारो तरफ वह कुछ नहीं है सिर्फ पैकिंग है। ज्यादा जरूरी है सामान। जब पैकिंग अपने अंदर सबसे ऊपर रखे सामान (दिमाग)पर हावी होती है तो समझिये कि सामान में कुछ गड़बड़ है।

    वाकई समापन की दो लाईनो मे आपने फ़ुरसतिया पोस्ट का शानदार समापन किया है. हमको तो अभी बाहर जाना है सो रात दो बजे ऊठे थे. जाते जाते सोचा पोस्ट देख ले तो आपकी यह पोस्ट फ़ीड मे आई हुई है. कित्ते बजे ठेली गई?:)अभी रात्रि के २:४५ AM हो रहे हैं.

    ताऊजी , आपकी यात्रा टनाटन शुभ हो। पोस्ट ठेली गयी सुबह बारह बजकर सम मिनट पर। बाहर से आकर दुबारा पढ़ियेगा फ़िर से! :)

  5. Dr.Arvind Mishra

    मन इन दिनों कुछ चंचल सा हो उठा है और बार बार अतीत रमण से वर्तमान को कोई गुप्त गुम्फित सदेश देता लग रहा है -सच तो आप ही जाने ! देह और मन का गुत्थमगुत्था (अमीर खुसरों) उस संस्कृति वाले अपने बेजोड़ लेख में आपने दर्शित कर ही दिया था -तभी से आपको फालो करता रहा हूँ !

    अरे डा.साहब,मन तो मौजमस्ती का बादशाह है। इधर-उधर डोलता रहता है। आप हमको फ़ालॊ कर रहे हैं! हाऊ स्वीट च क्यूट! वैसे आपको सच बतायें कि शुरुआती दौर में अनुगूंज के लेख लिखने में हम बाकायदा होमवर्क करते थे। संस्कृति वाले लेख को लिखने के लिये खूब पढ़ाई भी की थी
    ! :)

  6. समीर लाल ’उड़न तश्तरी’ वाले

    आज पोस्ट फिर से पढ़कर मैं भी कई बार अपनी देह को घूर निहार चुका हूं-दर्पण में। बेदर्दी आईना हर बार बोला निष्ठुरता से-नहीं,कुछ नहीं है(तुम्हारी) देहें।

    ससुरा, कैसन कमेडियन है, जर्रा भी झूठ नहीं कह रहा इस मामले में…

    मस्त पोस्ट!!

    भैये, आपके यहां आइने कुछ ज्यादा ही गड़बड़ दीखते हैं। ससुरे आपके जैसी क्यूट-दर्शना देह को बोलते हैं कुछ नहीं है देह! हाऊ बैड रादर हाऊ सैड! देखो कहीं बहर में तो नहीं देख रहा आईना आपकी देह को। देखो वर्ना उन सहेलियों के दिल पर क्या बीतेगी जो डा.अरविन्द मिश्र से आपकी क्यूटनेस की कसमें खाते पकड़ी गयीं थी। मामले को गम्भीरता से लीजिये भाई! :)

  7. सतीश पंचम

    क्या देह ही सब कुछ है ?
    आपके इस प्रश्न से उन गानों की वाट लग जाएगी जो देह पर रचित हैं –
    I wan to show my body…..हल्ला रे हल्ला रे…..हल्ला…..Omm…..I wan to show my body…… :)

    सतीशजी, ऐसे गानों की कभी वाट नहीं लगती। और क्या फ़ायदा वाट लगाने स। मेगावाट तो हमारा मन है।
    :)

  8. कुश

    आपने ऊपर फोटो अच्छी लगायी है.. बिलकुल आपके लेख के विषय के अनुरूप..

    अनुगूंज जैसे प्रयोग अब क्यों नहीं हो रहे?? किस चीज़ की कमी है??

    कुश: अनुगूंज जैसे आयोजन बस इसीलिये नहीं होते कि सबकी अपनी प्राथमिकतायें हैं। लेकिन हो सकते हैं फ़िर से। होंगे भी।

    वैसे हमें पता है! फ़ोटॊ और लेख की अनुरूपता की बात कहकर बहाने से मौज ले रहे हो। इतने अनजान हम भी नहीं हैं। :)

  9. उन्मुक्त

    अनुगूंज का आयोजन हिन्दी चिट्टाकारी में सहभागिता बढ़ाने का अच्छा तरीका था। इसे फिर से शुरू करना चाहिये।

    उन्मुक्तजी: इस मसले पर कई बार विचार हुआ। अभी फ़िर करते हैं। देबाशीष से और लोगों से चर्चा करके। पहले यह अक्षरग्राम पर होता था। वह अभी बन्द है। उसका हिसाब-किताब तय हो जाये तब फ़िर शुरू किया जाये इसे दोबारा। आपको भी शामिल करते हैं इसमें। :)

  10. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी

    हम तो भकुआ कर देखते रहे आपकी लिंक्स को…। पढ़ना भूल गये थे\ वो तो श्रीमती जी पकड़ लीं मुझे स्कर्ट वाली लिंक पर नजर जमाते हुए। ऑफिस का समय होने को आया तो जल्दी-जल्दी पढ़कर कमेण्टिया रहा हूँ।

    आप जनमै से मौज ले रहे लगते हैं। शुरुआत में भी गजब धारदार लिखते थे। वाह! क्या कहने…!

    अरे आफ़िस में बैठके आराम से टिपियाइये न! मना तो नहीं है न! वैसे आप जीतेन्द्र के लिये बताई लिंक ही सबसे पहिले काहे देखे? वर्जित आइटम देखने में ज्यादा मौज आता है। श्रीमतीजी पकड़ लीं इसके बाद क्या हुआ ई कौन बतायेगा। :)

  11. जीतू

    सही है गुरु, लेख पढकर पुराने दिनो की याद हो आयी।
    फोटो भी सही ढूंढ कर लाए हो, बुढापे मे बस यही सब करना बाकी था (मेरा नही, तुम्हरे बुढापे की बात कर रहा हूँ, अभी तो हम माशा-अल्लाह जवान है।)

    मेरे विचार से अनुगूँज का आयोजन फिर से किया जाना चाहिए, चलो फिर से शुरु किया जाए, इसी बहाने कुछ लिखना पढना हो जाया करेगा। फिर जब तगादा करने वाला फुरसतिया हो तो कौन ना लिखबे?

    सही है भैये! सब याद आ गया हौले-हौले। वैसे तुम अपने जवान होने की बात क्यों करने लगे? ई सब तो बुजुर्ग लोगों का चोचला है। वही कहते हैं- अभी तो मैं जवान हूं! :)
    अनुगूंज फ़िर से शुरू करना अच्छा विचार है। देखो! कब, कहां शुरू हो पाता है। :)

  12. वन्दना अवस्थी दुबे

    ” सम्पूर्णता में उसका सौंदर्य उपेक्षित हो गया। यह विखंडन कारी दर्शन आदमी को आइटम बना देता है”
    क्या बात कही है सच्ची! मज़ा आ गया पूरा आलेख पढ के.जाते-जाते तो कमाल ही कर दिया. काश युवा-वर्ग इस समझाइश पर अमल कर सकता! कुछ करते भी होंगे, लेकिन केवल वही जो देह से इतर सोचते हैं. बधाई और धन्यवाद दोनों ही.

    वन्दनाजी: शुक्रिया! आपकी प्रतिक्रिया पढ़कर बहुत अच्छा लगा। सच्ची-मुच्ची।
    :)

  13. विवेक सिंह

    कुश जी की टिप्पणी के उत्तर के सन्दर्भ में : तो फिर आप कितने अनजान हैं जी ?( यह पॉजीटिव क्वेश्चन है)

    विवेक: अब इत्ते भी अनजान नहीं हम कि आपको यह बता दें कि कितने अनजान हैं हम! हम सब बूझते हैं कि आप बीड़ी ब्रेक के बाद मौज लेने के मूड में आ गये हैं! :)

  14. Saagar

    पहले कहते थे देह पानी के बुलबुले की तरह क्षणभंगुर है… लेकिन आज यह सच है… यह देह की महिमा ही है जो मल्लिका कुछ न होते हुए भी विदेशी पत्रिका में छप रही है और फ्रीदा भी… बहरहाल स्कर्ट प्रकरण रोचक है… निगार खान से लेकर अब तक या फिर कैरोल तक … खुदा जाने सच्चाई क्या है… लेकिन विदेसी लड़कियां हतप्रभ नहीं होती होंगी… उन्हें आदत है वो तो … यकीं ना हो तो कल का दिल्ली संस्करण का मेल टुडे देख लें…

    सागर भाई आपकी बात का पक्का यकीं है मुझको! अभी ये लाइने पढ़ीं आपकी तो लगा कि आप सच ही कह रहे है
    जिस्म गोया एक खूंटा है
    और मैं,
    इससे बंधा गाय

  15. alpana

    साफ आईनों में चेहरे भी नजर आते हैं साफ,
    धुंधला चेहरा हो तो धुंधला आईना भी चाहिये.

    बहुत खूब शेर कहा है!
    ———————-
    ‘बोल है कि वेद की ऋचायें
    सांसों में सूरज उग आयें
    आखों में ऋतुपति के छंद तैरने लगे
    मन सारा नील गगन हो गया.’

    -अद्भुत !!!
    ———————-
    -पहले सार्थक बहस हुआ करती थीं जानकार अच्छा लगा…मगर तब से अब के सफर में-ऐसा क्या हुआ Ki blogging mein निरर्थक बहसें..विवाद से ऊपर कुछ दिखता नहीं?

    अल्पनाजी, ये वाला शेर हमारे एक स्टाफ़ थे शाहजहांपुर में वासिफ़ मियां उन्होंने लिखा था और हमारे कहने पर अक्सर सुनाते भी थे!
    बहसें अब होती ही कहां हैं! बहसें अब भी होती हैं लेकिन लोग आमतौर पर एक के नहले पर अपना दहला मारने में ज्यादा रुचि लेते हैं। ब्लागिंग के शुरुआती दौर में ब्लागिंग को रुचिकर बनाने और लोगों की लिखने में आदत डालने के लिये तमाम काम हुये । अनुगूंज भी उनमें से एक था।

  16. अर्कजेश

    लेख जानदार है | यह कहना महज औपचारकता नहीं है |
    यह रि-पीट है | मतलब अभी तक आपके विचार वही हैं, जो उस समय थे |

    सबसे अच्छी लाइन जो लगीं – “मेरी तो कामना है कि युवाओं में खूब आकर्षण बढे शरीर के प्रति। पर यह आकर्षण लुच्चई में न बदले। यह आकर्षण युवाओं में सपने देखने और उन्हें हकीकत में बदलने का जज्बा पैदा करे। साथी के प्रति आकर्षण उनमें इतनी हिम्मत पैदा कर सके कि उनके साथ जुङने ,शादी करने की बात करने पर ,स्थितियां विपरीत होने पर उनमें श्रवण कुमार की आत्मा न हावी हो जाये और दहेज के लिये वो मां-बाप के बताये खूंटे से बंधने के लिये न तैयार हो जायें।”
    लेकिन देह को लेकर इतनी मगजमारी क्यों होती है | जो सबसे ज्यादा वास्तविक है |
    रही बाजार की बात तो जिस चीज की डिमांड होगी | उसे पेश ही किया जाएगा, नए-नए रूपों में |

    हमारे ऋषि-मुनियों की कल्पनाओं के आगे दुनिया पराजित है |
    वजह : क्षतिपूर्ती, जो नहीं कर सके उसकी कल्पनाएँ कर लीं | मन मजा लेने के लिए |
    वरना व्यावहारिक रूप से वह सब नहीं किया जा सकता |

    आपकी पोस्टें टिपण्णी उकसाऊ होती हैं |
    इस बार आपने अलग-अलग प्रति उत्तर भी दिया है |
    सावधान टिप्पकों !

    अर्कजेशजी: शुक्रिया लेकिन! सावधान विश्राम करके ब्लागर भाइयों को डरवायें नहीं। सब लोग सोचेंगे यहां संघ की शाखा खुल गयी। :)

  17. अर्कजेश

    बिलकुल चुनी हुई कविताएँ पढ़ने को मिलती हैं, हर बार |
    शुक्रिया |

    अर्कजेशजी: शुक्रिया का प्रतिशुक्रिया। वैसे अच्छी कवितायें मेरी पसंद के रूप में देने पर यह अक्सर होता है कि साथी लोग ,आपकी पसंद अच्छी है, कह कर निकल लेते हैं। :)

  18. dr anurag

    लगता है एक उम्र के बाद ब्लोगिंग फिर सिकुड़ गयी..बिंदास होने से हिचकती रही है ..कम से कम पिछले दो सालो से तो हमने गिने चुने चार पांच लेख ही देखे है ….
    शानदार लेख .फोटो की जरूर कुश खामखाँ तारीफ़ कर रहे है…

    डा.अनुराग: ब्लागिंग सिकुड़ी तो नहीं! कुछ ज्यादा फ़ैली है सो अच्छे लेख के मुकाबले कम अच्छे लेख ज्यादा दिखते हैं। काफ़ी सारे अच्छे लेख भी लिखे गये हैं! हमको एकदम अभी आपकी छह फ़ुटी रोशनी की मीनार याद आ रही है! ससुरा एक डायलाग अपने में एक मुकम्मल पोस्ट है! :)

  19. दरभंगिया

    देह अस्तित्व है,
    देह साधन है,
    देह साध्य है,
    देह रम्य है,
    देह भव्य है,
    देह आदि है,
    देह ही अंत है.

    हदे-देह से बाहर क्यों निकले कोई?
    एक देह से आना है,
    एक देह पाना है,
    एक देह बनाना है,
    एक देह संग जीना है,
    एक देह बिना मर जाना है.

    PS: एक प्ल्ग-इन आती है Indic Ime. वैसा ही कुछ इन्स्टाल कर दें तो सुविधा होगी.

    दरभंगिया: Indic Ime से देह का सब हिसाब-किताब मिल जायेगा?
    :)

  20. Lovely

    सुन्दर पोस्ट ..सार्थक फोटो :-)

    लवली: शुक्रिया, धन्यवाद! :)

  21. ज्ञानदत्त पाण्डेय

    जब पैकिंग अपने अंदर सबसे ऊपर रखे सामान (दिमाग)पर हावी होती है तो समझिये कि सामान में कुछ गड़बड़ है।
    ———————
    क्या बतायें, जब सामान स्तर का बन तैयार होता है, तब तक पैकिंग लत्ता हो चुकी होती है! :-)

    ज्ञानजी: लगता है इससे ही कुछ तुक-फ़ुक मिलाकर कहावत बनी होगी- तन पर नहीं लत्ता, पान खायें अलबत्ता :)

  22. दरभंगिया

    हा हा हा हा..मौज लेना तो कोई आपसे सीखे.

    लीजिये, यह रहा शुद्धिकरणः :)

    PS: एक प्ल्ग-इन आती है Indic Ime, वैसा ही कुछ इन्स्टाल कर दें तो टिप्पणीकारों को हिन्दी टंकण में सुविधा होगी.

    भाई दरभंगियाजी: बड़ा इस्टाइल वाला शुद्धिकरण है। मजाक का तो ऐसा है कि आप तो शरीफ़ लगते हैं लेकिन हमारे जो साथी लोग हैं उनसे तो मजाक न करो तो बुरा मान जाते हैं। कहते हैं हमको ई मजाक पसंद नहीं! :) बकिया ई प्लग-इन हमारे विश्वकर्माजी ई-स्वामीजी देखेंगे। :)

  23. रविकांत पाण्डेय

    दुनिया के सबसे खतरनाक हथियार(नजरों के तीर) का जिक्र आपने कर ही दिया तो हम भी “रसलीन” का दोहा सुना देते हैं-

    अमिय हलाहल मद भरे श्वेत श्याम रतनार
    जिअत मरत झुकि-झुकि परत जेहि चितवत एक बार

  24. विजय गौड

    हिंदी ब्लागिंग के आरम्भिक दिनों को पढना सुखद अनुभव है।

  25. प्रवीण शाह

    आदरणीय फुरसतिया जी,

    मानें या न मानें है देह ही सब कुछ….

    कारण जुड़े हैं होमो सेपियन्स (आधुनिक मानव) के विकास क्रम की HUNTER-GATHERER स्टेज

    से… तब स्त्रियां वरीयता देती थी सुगठित,लम्बे तगड़े,बलवान पुरुष को… साथी बनाने के लिये..

    ताकि उसे रोज शिकार मिल सके तथा जो इकठ्ठा किया है वो सुरक्षित रहे।

    इसी तरह रोज तो शिकार मिलता नहीं था… फाके होते थे कई कई दिनों तक…ऐसे में स्तन पान

    करते शिशु उन्हीं माताओं के बच पाते थे जिनके शरीर में ‘फैट स्टोर’ ज्यादा होता था, यह फैट

    जमा होता था जांघों, नितंबों तथा सीने पर…स्वाभाविक रूप से पुरुष ऐसी ही स्त्रियों को पसंद करते

    थे।

    आदिम काल की वही स्मृतियां अभी भी जगी हुई हैं हमारे दिमागों में… उन्हीं के आधार पर आज

    के सुन्दरता के पैमाने बने हैं…इसी लिये देह ही है सब कुछ …न शरमाइये, न सकुचाइये और न

    ज्यादा सोच विचार कीजिये… देख डालिये जो कुछ भी दिखाता है बाजार।

    एक बात और जोड़ूगा कि ऐसा नहीं कि केवल पुरुष ही करते हैं देह दर्शन… सलमान हर फिल्म में

    कमीज किसके लिये उतारता है ?

  26. shashi singhal

    फुरसतियाजी आपके द्वारा उठाए गए सवाल में काफी दम ही नही आज के वातावरण की जीती जागती तस्वीर का आईना है । आज के परिप्रेक्षय मे शायद देह ही सब्कुछ है।
    अपने लेख के आखिर में ”फिलहाल तो जिस देह का हल्ला है चारो तरफ वह कुछ नहीं है सिर्फ पैकिंग है। ज्यादा जरूरी है सामान। जब पैकिंग अपने अंदर सबसे ऊपर रखे सामान (दिमाग)पर हावी होती है तो समझिये कि सामान में कुछ गड़बड़ है।” कही गई ये लाइने आपने जितनी सरलता से लिखी हैं वास्तव में इसका अर्थ उतना सहज और सरल नही है ।
    अनूगूंज पर फिर से बहस होनी चाहिए ।

  27. Ranjana

    तो इससे साबित होता है कि कुछ नही है देह सिवा माध्यम के। सामान बेचने का माध्यम। उपभोक्तावाद का हथियार। उसकी अहमियत तभी तक है जब तक वह बिक्री में सक्षम है। जहां वह चुकी -वहां फिकी।

    इसे व्यंग्य आलेख कहने का तो बिलकुल ही मन नहीं कर रहा अनूप भाई…..यह तो नितांत ही गंभीर आलेख है…यथार्थ की तहें परत दर परत खोलती हुई…

    इस लाजवाब लेख को हमसे बांटने के लिए आपका बहुत बहुत आभार..

  28. Ghost Buster

    दो दिन से आ-आकर घूम-फ़िर कर लौट जाते हैं. कुछ सूझ नहीं रहा क्या कहें. लेख और टिप्पणियाँ, दोनों ही शानदार और मजेदार हैं.

  29. गौतम राजरिशी

    खुदाया! पहले तो इतनी लंबी पोस्ट और तिस पे इत्ते सारे लिंक..!!! हम जैसों पे कुछ तो रहम खाओ, देव!

    लेकिन यकीनन ये आपकी लेखनी का ही चमत्कार है कि हर लिंक को खोल कर देखने और पढ़ने पे विवश हो जाता हूँ। अमूमन इतना समय दे नहीं पाता ब्लौग के लिये।

    इस संपूर्ण देह-विमर्श पे किंतु राजेन्द्र यादव जी का विचार क्यों नहीं लिया गया? :)

    “मेरी पसंद” ने फिर से अचंभित किया।

  30. Abhishek

    लिंक और तस्वीर दोनों पाठक को भ्रमित करने में सक्षम हैं :)

  31. hempandey

    देह के महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता. देह के समर्थ होने पर ही मन और मस्तिष्क की क्रियायें संपन्न हो सकती हैं. देह सब कुछ नहीं, पर बहुत कुछ है.

  32. VIJAY ARORA

    भैया देह ही तो सब कुछ है
    देह के ऊपर ही तो दिमाग रखा है भगवान् ने
    देह ही नहीं तो क्या ……….
    पहीले पाकिंग ही देखेंगे ना
    तभिये तो मालवा देखेंगे भैया
    मालवा कु तो कोऊ भी नाही देखन देवेगा
    तो पेकइन्गे ही देखि के मालवा का अंदाजा लगावत है हम तो भैया

  33. VIJAY ARORA

    तन भी सुन्दर मन भी सुन्दर
    तू सुन्दरता कि मूरत है

    किसी और को कम होगी
    मुझे तेरी बहुत जरुरत है

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