पुष्प की गंध से कुछ खटक सी गई,
नैंन-सैन चुंबन की ले-दे फ़टाफ़ट हुई।
हवायें बेचारी सब गुमसुमा सी गईं
शाम मारे शरम के हो गई सुरमई
भौंरें भागे सभी सर पे धरे अपने पंख
तितलियां फ़ूल में बस दुबक सी गयीं।
कली जो सकुचाई खिल रही थी उधर
वो बेचारी सहमकर झटक सी गयी।
फ़ुस- फ़ुसाकर आपस में बतियाने लगीं
फ़िर मुस्कराने लगीं, खिलखिलाने लगीं
पुष्प और गंध से करने लगीं दिल्लगी ।
फ़ूल बेचैन था खुशबू के भी बारह बजे
चैन उड़ा खुशी हाथ से रपट सी गयी।
मौका ताड़कर गंध ने पुष्प को छू लिया
फ़ूल बादशाहों सा अकड़ा कहा- तखलिया
हवाओं ने उनके लिये एक परदा लगाया
क्या कहें उनने कैसे-क्या गुल खिलाया।
कली अधखिली उठ के मानों नींद से जगी
खिलने को सरपट वो फ़ौरन भगी सी गयी।
तितलियां अब भौंरे के पास आने लगीं
हमें भी प्यार का हक चिल्लाने लगीं
भौंरे बेचारे मजनूं ही तो बन सकते थे
तितलियों को लैला-लैला बताने लगे।
पुष्प ने गंध से फ़िर कुछ इशारा किया
मुस्कराकर कुछ किया बस लाइन कट गयी।
पुष्प की गंध से कुछ खटक सी गई,
नैंन-सैंन चुंबन की ले दे फ़टाफ़ट हुई।







ये क्या लफडा है..?
कुश: हर चीज में लफ़ड़ा ही देखते हो। पूरे ब्लागर हो। कभी हसीन मेल-मिलाप के बारे में भी सोचा करो।
ईयाँ भी लफड़ा…
संजय बेंगाणी: कित्ता हसीन है न!
शुक्ला जी बहुत ही सुन्दर शब्दों की प्रयोग और एक और फुर्सत से किया हुआ पोस्ट
खूबसूरत कविता..
फूल, भौंरों, तितलियों की खाप नहीं होती क्या? थोडा डरकर संभल कर रहने को कहिए इन सबको.
घुघूती बासूती
मौका ताड़कर गंध ने पुष्प को छू लिया
फ़ूल बादशाहों सा अकड़ा कहा- तखलिया
धीरे-धीरे कवि बनते जा रहे हैं आप. मज़ा आ गया.
पुष्प ने गंध से फ़िर कुछ इशारा किया
मुस्कराकर कुछ किया बस लाइन कट गयी।
बहुत शुभकामनाएं.
रामराम.
आप तो छायावादी कवि हो लिए
मुस्कराकर कुछ किया बस लाइन कट गयी।
बी . एस . एन . एल . की थी क्या ??
aapki rachana bemishal hai ………….isase jyad kuchhnahi kah paunga
कवि हृदय फुरसतिया जी को सलाम।
यहाँ भी आपको लफ़ड़े के नाम पर उकसाया जा रहा है। लेकिन हम जानते हैं कि आप केवल मौज ले रहे हैं। अन्तर यह है कि इस बार फूल, कलिया, भौंरे, खुशबू आदि आपकी मौज के पात्र हैं।
मनुष्य से कुछ डर गये हैं क्या?:)
बहुत सुन्दर कविता । आभार ।
जुकाम का इलाज़ कराया क्या ?
पहले करवा तो लीजिये, फिर गँध बताइयेगा ।
अपुन की खोपड़ी 360 डिग्री घूम रैली है, माईबाप !
कविश्रेष्ट का हार्दिक अभिनन्दन!!
कित्ते गहरे भाव हैं
कविता जी अच्छी लगीं.
वाह! क्या कथा है!
कविश्रेष्ट का हार्दिक अभिनन्दन!!
कित्ते गहरे भाव हैं
क्यों टाइम खोटा करते हो यार !डॉ अमर कुमार को बोलना चाहिए कुछ इस पोस्ट पर !
पुष्प की गंध से कुछ खटक सी गयी , क्या खटक गयी या गया… वह भी पुष्प गंध ,
विवेक सिंह ही सही हैं आपकी इस फुरसत से निपटने के लिए !
सुबह सुबह कविता पढ़ा कर सिर दर्द देने के लिए शुक्रिया , खासियत आपकी यह है की आपको पढना पूरा पढता है बाद में महसूस होता की हमारे साथ क्या हुआ
कौन वादी कविता है यह? मौज वादी?!
भाई आपकी कविता में कमाल की रवानगी है. खासकर – फ़िर तितलियां भौंरों से फ़ुसफ़ुसाने लगीं. यों आपके ब्लॉग पर टिप्पणी के जवाब पढ़ना भी रोचक लगता है.
“नैंन-सैन चुंबन की ले-दे फ़टाफ़ट हुई।”
बड़ी लटाफ़ट [लताफ़त!] वाली कविता ठेल दी आज तो:) बधाई।
इष्ट मित्रों एवम कुटुंब जनों सहित आपको दशहरे की घणी रामराम.
आप और कवि…? चलिये कवि भी ठीक है, मगर ऐसी फूल और भौंरे, तितली और खुश्बू की कविता???? सब ठीक है न?
हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हमने तो आज ही पढ़ी …..क्या चित्र खींचा है फुल तितली हवा और न जाने क्या क्या क्या…..आपही ने लिखी है न हा हा हा हा
regards
wah kya laazwab rachana ,aapki vyang shaily ki tarif jitni ki jaai utni kam hai .kamaal ka likhte hai .kal , vandana ji jo meri aziz mitr hai unke blog dwara baatchit ke dauraan aapka namaskar bhi mila aur aapki rachana bhi padhi ,padhne ke baad urja ka sanchar hone laga ho ,wo taazgi mahsoos hui .anup ji aapko phir namaskaar .
सुंदर अभिव्यक्ति।
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बड़े जवान अंदाज़ हैं आपके, पहले बताओ ये आईडिया कैसे आगया अचानक?
पुष्प ने गंध से फ़िर कुछ इशारा किया
मुस्कराकर कुछ किया बस लाइन कट गयी।nice
क्या कहने । कहाँ-कहाँ भटक रहे हैं ?