आज शिक्षक दिवस है। लोग कहते हैं कि शिक्षा का स्तर गिर गया है। पतित हो गयी है शिक्षा व्यवस्था। हर तरफ़ ट्यूशन का बोलबाला है। जितने मुंह उससे चार गुनी बातें!
हर जागरूक व्यक्ति का हर मामले में कुछ न कुछ “मेरा तो यह मानना है” रहता है । जागरुक चाहे एक बार भले न हो लेकिन “मेरा तो यह मानना है” हरेक के पास होता है। हमारे पास भी है। तो इस मामलें में मेरा तो यह मानना है कि ट्यूशन का प्रचलन आज से नहीं है। यह तो सतयुग से चला आ रहा है। रामचन्द्रजी तक ट्यूशन पढ़ते थे। गोस्वामीजी ने लिखा भी है:
गुरु गृह गये पढ़न रघुराई। अल्पकाल विद्या सब पाई।
मतलब उस समय भी महीने भर में अंग्रेजी बोलना सीखें या हफ़्ते भर में झुर्रियां हटायें टाइप कोई अल्पकाल शिक्षा पैकेज चलता होगा। दशरथजी ने रामचन्द्रजी और अन्य भाइयों के लिये ले लिया होगा -एक के साथ तीन को फ़्री वाले पैकज में!
बहरहाल आज शिक्षा के गिरते स्तर पर रोने की कवायद अब क्या करें? तमाम प्राइवेट स्कूलों के गुरुजन को अकुशल श्रमिकों के न्यूनतम वेतनमान से भी कम पैसे मिलते हैं! बेचारे मन मार के स्कूल में रोते-गाते पढ़ाते होंगे तो उसमें स्तर कहां से लायें।
बहरहाल शिक्षा पर बहस तो शिक्षाविद करेंगे। हमारी तो औकात मेरा तो यह मानना है तक ही है। हम तो अपने गुरुजी को याद करते हुये कुछ उलटी-पुलटी चौपाई-दोहे टाइप आइटम आपके सामने पेश करने का प्रयास करता हूं। दोहे पुराने हैं चौपाईयां अभी-अभी लिख रहे हैं! जिगर थामकर मुलाहिजा फ़र्मायें। मात्रादोष की तरफ़ करने का मन करे तो जरूर करें लेकिन हमारा जबाब भी वही शायराना रहेगा- अब स्कूलों में इस्पेलिंग पर नम्बर नहीं कटते।
इस्कूल पढ़न गये मुन्नाभाई। उसका हाल लिखौं का भाई॥
दिन भर खेलैं गुल्ली डंडा । नित-नित पावैं जीरो अंडा ॥
होमवर्क नहि कबहूं करहीं। जब देखो तब करत बतकही॥
फ़िरि इम्तहान के दिन आये। मुन्ना-सर्किट के होश उड़ाये॥
अपन हाल डैडिहिं बतलावा। डैडी ने गुरुको काल कराया॥
सी द केस मोरे बेटवा केरा। करहु नीडफ़ुल फ़ौरन सेरा॥
नहिं विलंबु केहु कारण कीजै। करके फ़ौरन निज सेलरी लीजै॥
जौ रिजल्ट कुछ होय खराबा। सेलरी फ़िरि न मिलिहै बाबा॥
सुनि प्राब्लम चेलाराज की , गुरुवर भये फ़ौरन ही हलकान।
दूध मंगाया पाव भर, पिया बिद चम्मच भर कम्प्लान॥
कम्प्लान बाद कान्फ़िडेंस आवा। उसके साथ आइडिया आवा॥
दोनों से फ़िर गुरुजी बतियाये । कैसे लौंडे को पास करावैं॥
चर्चा करत करत दिन बीता। लंच डिनर का लगा पलीता॥
सब शार्टकट गुरुवर सोचा । सबमें मिला कछु न कछु लोचा॥
सोचा मोबाइल एक दिलवावैं। इम्तहान में नकल करवावैं॥
कीन्हा डेमो औ मिली निराशा। न मिला कनेक्शन न कोई आशा।
चिट जौ उनका कौनौ दिलवैहैं। लिखि-लिखि कविता पुनि-पुनि गैंहैं।
गुरुजी चर्चा दिन करके हारे। थक हारि के चिंतन कक्ष पधारे॥
इसके बाद जो हुआ वह निजता और गोपनीयता के उल्लंघन के डर से लिख नहीं रहा हूं। लेकिन फ़िर एक नयी पृथा शुरू हुई जिसे दुनिया आजकल ट्यूशन और कोचिंग के नाम से जानती है। इस विधा की एक ही खासियत होती है कि इसकी फ़ीस स्कूल की फ़ीस से अधिक होती है और इसमें पास होने की गारंटी होती है। अगर गारंटी पूरी हो गयी तो पैसे वसूल और न हो पायी तो कहा जाता है-फ़ैशन के दौर में गारंटी की अपेक्षा न करें।
बहरहाल आप परेशान न हों। आप ये दोहे पढ़िये। दो साल पहले लिखे गये थे लेकिन मजा बरकरार है अभी भी। पढ़ लीजिये। मजा न आये तो वापस कर दीजिये। हम चेंज कर देंगे।
क्लास खत्म, घंटा बजा, गुरु प्रकट भे धरे मोबाइल कान
- सतगुरु हमसे रीझिकर, एक कह्या प्रसंग,
पढ़ना तो फ़िर होयगा, चलो सनीमा संग। - गुरु कुम्हार शिष कुम्भ है, गढ़-गढ़ काढै खोट,
नोट लाऒ ट्यूशन पढ़ो, मिट जायें सब खोट। - गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पांव,
नये जमाने का चलन, अब हेलो, टेक केयर, बाय। - सब धरती कागद करूं,लेखन सब बनराय,
सब जग के लफ़ड़े जोड़ लूं, गुरु गुन लिखा न जाये। - क्लास खत्म, घंटा बजा, गुरु प्रकट भे धरे मोबाइल कान,
सचिन संचुरी पीटि ले , तब शुरू किया जाये व्याख्यान। - चेले बहुत पढ़ा लिये अब चेली भी लाओ साथ,
मटुकनाथ सुनि चहक गये, थामा शिष्या(जूली) का हाथ। - डांटत-डांटत सुन री सखी, गुरुवर बहुत गये गरमाय,
चेहरा भट्टी सा लाल है, क्या चाय चढ़ायी जाये। - गुरुवर ऐसा चाहिये, जो हरदम होय सहाय,
बिनु आये हाजिर करे, और फिरि नकलौ देय कराय। - पढ़त-पढ़ावत दिन गया, गया न मनका फ़ेर,
अब तो परचा आउट करो, गुरुजी काहे करत हो देर। - राम-राम कर सब दिन गया, हम रटा राम का नाम,
गुरुजी ने झांसा दे दिया, पूछा- कौन गली गये श्याम! - गुरुवर ऐंठ-ऐंठे फ़िरत , मारत चेले को कंटाप,
चेला शिक्षामंत्री भवा, गुरुजी बोले-क्या लेंगे साहब आप! - पानी बरसत देखकर, गुरु का मन बहुत गया हरषाय,
‘रेनी डे’ कर क्लास में, गरम पकौड़ी रहे छ्नवाय। - गुरुवर आवत देखि के, लड़िकन करी पुकार,
लगता है अब पिट जायेंगे, है गई इंडिया हार। - काल्ह करे सो आजकर, आज करे सो अब
सरजी, परचा आउट करो, बहुरि करोगे कब? - चेले ऐसे चाहिये, जिससे गुरुवर को हो आराम,
राशन, सब्जी लाता रहे, करे सबरे घर के काम। - सतगुरु की महिमा अनत, अनत किया उपकार,
हमें बचाइन प्रेम से, खुद पैर में लिहिन(वही)कुल्हाड़ी मार। - गुरुवर पहुंचे बोर्ड पर, लगे सिखावन ज्ञान,
अटक गये अधबीच में, मुस्काकर बोले-चलो खिलायें पान! - राष्ट्रनिर्माता बन-बैठि के, गुरुवर बमचक दिहिन मचाय,
राजनीति में पैठि के, नारन ते आसमानौ दिहिनि गुंजाय। - गुरु-चेलन की चक्की देखकर, दिये ‘फुरसतिया’ रोय,
दो पाटन के बीच में, अब ज्ञान बचा न कोय।





गुरूजनों को सुंदर उपहार है!
अंत में ई तो लिखे ही नहीं. अथ श्री गुरूदेव की जै…..
हम तो सोच रहे है.. कि आप ही को अपना गुरु बना ले.. क्योंकि जो ज्ञान आपने दिया है वो कोई और तो क्या देगा..
वाह जी बहुत बडिया दोहे हैं और शिक्षकों के बारे मे भी अच्छी कही जब अनपढ ठेकेदार शिक्षकों की भरती करने लगे तो गुणवत्ता की आशा क्यों आभार्
मेरा तो मानना है कि बड़ी धाँसू पोस्ट लिक्खे हैं. (लिक्खे?) कोई बात नहीं आजकल इस्पेलिंग मिस्टिक का नम्बर नहीं कटता. दोहा-वोहा, चौपाई वगैरह सब धाँसू.
अब तक मेरे जितने गुरु हुए वे सब जहाँ भी हों मेरा उन्हें प्रणाम पहुँचे!
खालीपन-सा छा गया, पढ़के ब्लॉग तुम्हार
हिन्दुस्तानी मास्टरी की लीला अपरम्पार
लो जी …..अब दिन चढा नहीं .नर्सरी के बच्चे गुलाब के फूल लेकर स्कूल पहुचे नहीं ….की आपने अपनी पोस्ट ब्रॉड कास्ट भी कर दी…..इधर आप भी बहुत सेंटी मेंटल हो रहे है शुकल जी….जानते है कितना अवैज्ञानिक है सेंटी मेंटल होना …..कितना इलोजिकल .दोपहर तक इंतजार करते तो दोहो से अलग कुछ एडिशनल डाइलोग का क्रेडिट ले लेते …स्क्रिप्ट की पेचीदा सादगी .कसम से मटुकनाथ को कंफ्युस कर देती है .हम तो जी न तो स्कूल की दरजी से सेटिंग का कुछ बोलेगे ना किताबो कोपियो के एकमात्र मिलने के स्थान पर ….यूँ हफ्ते भर झुर्रिया हटवाने कई गुरुवाइन हमारे यहाँ आती है पर बोटोक्स के चार्ज सुनकर वापस नहीं आती .फेयर एंड लवली से काम चला लेती है .कोई भूल चुक हो तो तनिक मुआफ कीजिये वैसे भी
अब स्कूलों में इस्पेलिंग पर नम्बर नहीं कटते
jay ho sab guruo ki jay ho
चेले बहुत पढ़ा लिये अब चेली भी लाओ साथ,
मटुकनाथ सुनि चहक गये, थामा शिष्या(जूली) का हाथ
हे कलयुग के तुलसीदास…हे गुरु घंटाल…आपको शत शत नमन….क्या पोस्ट लिखी है…झकास…
नीरज
गज़ब दोहे, अजब गुरु दास्तान. सच है शिक्षा भी तो अब केवल व्यवसाय ही हो गयी है.
लेकिन सच्ची और मनोरन्जक पोस्ट. नीरज जी ने तो आपको तुलसीदास की उपमा दे ही दी है, तो क्यों न एक आधुनिक रामायण भी छपवा ही लें? शानदार पोस्ट. सभी गुरुओं को पढाने लायक.
आपके आलेख पर टिपण्णी करना बड़ा ही मुश्किल हुआ करता है…पढने के बाद मन में जो विचारों की जो रेलम पेल मचती है,उसमे से सटीक शब्दों को खोजना बड़ा ही दुष्कर कार्य हो जाया करती है….
सो टोटल एक ही शब्द अभी कह सकती हूँ……शानदार !!!
ये दो साल पहले वाले दोहे तो छा गए. मजा आ गया जी सही में. आपको तो टीचर होना चाहिए.
हम तो केवल सुनी सुनाई बात कहते हैं |
गुरूजी कि जय हो !:)
आप भी ?
वाअह!! जे भई गुरुवाणी..
सुनि प्राब्लम चेलाराज की , गुरुवर भये फ़ौरन ही हलकान।
दूध मंगाया पाव भर, पिया बिद चम्मच भर कम्प्लान॥
-कम्पलान बड़ा जोर दिखा गया कि बस पूछो मति, कितना आनन्द आ गया. जय हो!!
टूसन फीस क्या धरे हैं?? हमे ज्वाइन करना है.
guruvar pranaam mauj lene ke maamle me to aap hamaare guru hain
chele ko bhee kuch zyaan deejiye guru ji
venus kesari
गुरु गृह गये पढ़न रघुराई। पाछे लछिमन गुड़ गठियाई।
बिन असिस्टेण्ट और बिना सीधा-पिसान के क्या पढाई?
अनेक ब्लोगर बन्धु पेशे से गुरु हैं. उनकी भावनाओं का तो ध्यान रखा होता.
अब तो मटुक नाथ जैसे गुरुओ का बोलबाला है . ……. बहुत ही रोचक आलेख प्रस्तुति . आभार
हम अईसेहि आपको गुरु थोड़े ही बनाये हैं !
गुरु-दिवस की हार्दिक शुभकामनायें
( देर से सही )
मुझे भी शर्म आती है जब मैं अपने बच्चों के लिये सब्से सस्ता स्कूल ढूंढता हूँ. अब हम तो देते नहीं वे जुगारने लगे तो गड़ियावल जायें.
गुरुजी तो फटेली धोती में ही फबते हैं.
सुना हो पंडित जी, पूरा का पूरा गुरु पुराण वांच लिये हैं. ऐकै सांस मां.
कहे क पड़ी ,’ गुरु जी वही ,जो पंडित जी दिलवांय” .
ई जौन कलियुगी ‘गुरु पचासा’ है , ओके लिये आप तो ‘नो बल’ पुरुस्कार के पात्र हैं.
झाड़ै रहो….
age baap ge…..kyaa khoob likha hai….ham kahen bhi to kyaa kahen…..acchha…badhiyaa…. sundar…..aur kyaa….!!
वाह शानदार दोहे
मजा आ गया पढ़ कर
हम तो T’chers day को सुबह सुबह बढिया से तैयार होकर कोलेज गये थे… लगे हाथ कुछ गुलाब भी ले गये थे और गुरुजनो का आशिर्वाद भी ले आये थे… “खुश रहो… बढ़ती रहो… पढ़ती रहो… ” बस निहाल हो गये।
“हो चुकी एमएससी, अब क्यों ये सब ?” मुझसे मेरी एक जूनियर ने पूछा।
“अभी पीएचडी तो यहीं से करनी है… ” मैने कह दिया… उस छोटी सोच वाली प्राणी को भला कैसे समझाती कि जब मै टीचर्स के पैरो में झुकी और उन्होंने मेरे सर पे हाथ रख के जो अमुल्य शब्द कहे वो मेरे लिये सफ़लता के रहस्यमयी फ़ोर्मुले के महत्वपूर्ण तत्व हैं।
आपका ये लाजवाब गुरुपुराण हमने भी एक ही सांस में पढ़ डाला… मज़ा आ गया… सच में!
Thank you.
गुरुवर इन दोहों पे तो आप के पांव छू लेने का मन करता है। जय हो फ़ुरसतिया महाराज की। टीचर हो कर भी जय कर रही हूँ……:)