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	<title>Comments on: &#8230;जन भाषा के हायपर लिंक</title>
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	<description>हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै?</description>
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		<title>By: amrendra nath tripathi</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/683/comment-page-1#comment-44291</link>
		<dc:creator>amrendra nath tripathi</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 13 Jan 2010 10:28:46 +0000</pubDate>
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		<description>thoda sukoon mila</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>thoda sukoon mila</p>
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		<title>By: hempandey</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/683/comment-page-1#comment-43181</link>
		<dc:creator>hempandey</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 13 Sep 2009 10:39:47 +0000</pubDate>
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		<description>मेरे जैसे अनेक हिन्दीभाषियों को क्वचिदन्यतोऽपि जैसे शब्द उतने क्लिष्ट नहीं जान पड़ते होंगे जितना अंगरेजी का-
PNEUMONOULTRAMICROSCOPICSILICOVOLCANOCONIOSIS
या शेक्सपीयर द्बारा प्रयुक्त - Honorificabilitudinitatibus 
निर्मला जी की सुन्दर रचना पढ़वाने के लिए धन्यवाद.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मेरे जैसे अनेक हिन्दीभाषियों को क्वचिदन्यतोऽपि जैसे शब्द उतने क्लिष्ट नहीं जान पड़ते होंगे जितना अंगरेजी का-<br />
PNEUMONOULTRAMICROSCOPICSILICOVOLCANOCONIOSIS<br />
या शेक्सपीयर द्बारा प्रयुक्त &#8211; Honorificabilitudinitatibus<br />
निर्मला जी की सुन्दर रचना पढ़वाने के लिए धन्यवाद.</p>
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		<title>By: Lovely</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/683/comment-page-1#comment-43180</link>
		<dc:creator>Lovely</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 13 Sep 2009 09:12:39 +0000</pubDate>
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		<description>हा हा हा ..सार्थक बहस इसे कहते हैं? ..वाह! वाह! वाह!!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>हा हा हा ..सार्थक बहस इसे कहते हैं? ..वाह! वाह! वाह!!</p>
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		<title>By: Satish Pancham</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/683/comment-page-1#comment-43174</link>
		<dc:creator>Satish Pancham</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 13 Sep 2009 06:05:07 +0000</pubDate>
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		<description>बहुत जमकर संघर्ष हो रहा है :) 

 लगता है अनूप जी, साहित्यिक तौलिया लपेटे, जनेउ को कंधे के आगे पीछे घसीटते बनारस के तन्नी गुरू वाला कमेंट दिये हैं , तभी तो संक्षेप में ही बहुत कुछ कह रहा है उनका कमेंट।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत जमकर संघर्ष हो रहा है <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' />  </p>
<p> लगता है अनूप जी, साहित्यिक तौलिया लपेटे, जनेउ को कंधे के आगे पीछे घसीटते बनारस के तन्नी गुरू वाला कमेंट दिये हैं , तभी तो संक्षेप में ही बहुत कुछ कह रहा है उनका कमेंट।</p>
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		<title>By: गौतम राजरिशी</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/683/comment-page-1#comment-43172</link>
		<dc:creator>गौतम राजरिशी</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 13 Sep 2009 05:35:36 +0000</pubDate>
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		<description>बड़े दिनों बाद ब्लौग पे एक सार्थक बहस दिखी है। ये पोस्ट और इसकी टिप्पणियाँ धरोहर जैसी हैं इस हिंदी ब्लौग-जगत के लिये!

शुक्रिया देव!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बड़े दिनों बाद ब्लौग पे एक सार्थक बहस दिखी है। ये पोस्ट और इसकी टिप्पणियाँ धरोहर जैसी हैं इस हिंदी ब्लौग-जगत के लिये!</p>
<p>शुक्रिया देव!</p>
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		<title>By: सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/683/comment-page-1#comment-43151</link>
		<dc:creator>सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 12 Sep 2009 18:36:48 +0000</pubDate>
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		<description>मुझे आज इस चर्चा को पढ़ने का मौका बहुत देर से मिला। इससे एक अच्छी बात हुई और एक खराब। खराब यह कि मुझे अब अपना मत व्यक्त करने में कठिनाई महसूस हो रही है। इतने बड़े-बड़े लोगों के बोलने के बाद किसी छोटे का मुँह खोलना शोभा नहीं देता। खैर...

अच्छी बात यह हुई है कि पूरा मसला एक ही बैठकी में निपट लिया। सबने मिलकर जितनी बातें कही हैं उससे मुझे एक हाल का आजमाया उदाहरण फिर से आपलोगों के समक्ष प्रस्तुत करने का मन हो रहा है। भाषा के सम्बन्ध में हमारा आचरण और सोचने का तरीका वैसा ही होना चाहिए जैसा हम अपनी पोशाक के बारे में सोचते और धारण करते हैं।

किसी को सूट-बूट और टाई-कोट-पैंट में सहूलियत होती है तो कोई मटके का कुर्ता और ब्रैस्लेट की धोती झाड़ कर प्रसन्न है। कोई ‘फॉर्मल’ पहन रहा है तो कोई ‘कैजुअल’ में फिट है। कोई महंगी जीन्स और ट्रेण्डी टीशर्ट पहनकर आत्ममुग्ध है तो कोई कुर्ता-पाजामा पहनकर ‘नेता’ बना हुआ है। सभी परिधान अच्छे हो सकते हैं और देश, काल, वातावरण के अनुसार अलग-अलग लोगों द्वारा पसन्द किए जाते हैं। अब यदि एक खास पसन्द का व्यक्ति बाकी परिधानों को अस्वीकार्य बताने लगे या दूसरा आदमी पहले की पसन्द को नकारने लगे, और उससे भी आगे बढ़कर एक दूसरे की खींचाई करने का सीन बन जाय तो समझिए कि कुछ गड़बड़ हो रही है। वहाँ वही सब होगा जिसे हिन्दी में व्यर्थ की चिल्ल-पों कहा जाता है।:) [नकल मारने के लिए अ-शर्मिन्दा हूँ:), लीजिए एक और शब्द जिसका प्रयोग मैने पहली बार किया...]

भाषा तो ऐसी निधि है जो अपनी-अपनी क्षमता और व्यक्तिगत पसन्द के अनुसार नित्यप्रति बढ़ाई जा सकती है। मात्रा, गुणवत्ता और वैविध्य के तीनो आयाम खुले हुए हैं। इसमें कोई आपसी विरोध नहीं है। जिसकी जितनी पैठ हो वह उसे उतना आगे बढ़ा सकता है। बस एक बात का ध्यान रहे कि जिस प्रकार गन्दी, फटी, मैली-कुचैली और तन ढँकने के बजाय नंगा रखने वाली पोशाक को सभी खराब मानते हैं उसी प्रकार अशुद्ध, अश्लील, अनर्गल, असंप्रेष्य, और संवाद स्थापित करने में असफल भाषा की वकालत नहीं की जा सकती। बाकी, भाषा का मूल उद्देश्य संवाद पहुँचाना है जो जरूर पूरा होना चाहिए। नियमों से प्रतिबद्धता, अनुशासन और सलीका किसी भी काम को सर्वस्वीकार्य बनाते है। भाषा भी इसका अपवाद नहीं है।

हमें सूर, कबीर और तुलसी तीनों को समान रूप से सम्मान करना सिखाया गया है। सबने अपने-अपने तरीके से बात कही है। कभी एक को खराब और दूसरे को अच्छा कहना सही नहीं होगा। परसाई और शरद जोशीका अपना महत्व है तो महावीर प्रसाद द्विवेदी और रामचन्द्र शुक्ल का महत्व कमतर नहीं है। प्रेमचन्द सम्मानित हैं तो जयशंकर प्रसाद का भी अपना एक ऊँचा स्थान है। 

यह विविधता किसी बहस का विषय नहीं हो सकती बल्कि यह हमारे भाषा की समृद्धि को निरूपित करती है। अलग-अलग ब्लॉगर्स की भाषा भिन्न-भिन्न शैली की है तो यह अच्छा ही है। सबलोग एक ही जैसा लिखेंगे तो इसका अवसान तय जानिए। इसलिए फुरसतिया का जबरिया लेखन भी अच्छा है और क्वचिदन्यतोऽपि का गाम्भीर्य भी स्वागतयोग्य है। ज्ञानजी के दैनिक गंगादर्शन और रेलपरिचालन की रंगीन तस्वीरें भी लुभावनी हैं तो सत्यार्थमित्र के फीके रंग पर कार्तिकेय की छमाही दुश्चिन्ता भी आकर्षित करने वाली है। जिस बाजार में हर टाइप का माल मिले वही तो सुपरमार्केट है। 

भीड़ भी तभी आएगी इस कन्ने... :)
जय हो...!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मुझे आज इस चर्चा को पढ़ने का मौका बहुत देर से मिला। इससे एक अच्छी बात हुई और एक खराब। खराब यह कि मुझे अब अपना मत व्यक्त करने में कठिनाई महसूस हो रही है। इतने बड़े-बड़े लोगों के बोलने के बाद किसी छोटे का मुँह खोलना शोभा नहीं देता। खैर&#8230;</p>
<p>अच्छी बात यह हुई है कि पूरा मसला एक ही बैठकी में निपट लिया। सबने मिलकर जितनी बातें कही हैं उससे मुझे एक हाल का आजमाया उदाहरण फिर से आपलोगों के समक्ष प्रस्तुत करने का मन हो रहा है। भाषा के सम्बन्ध में हमारा आचरण और सोचने का तरीका वैसा ही होना चाहिए जैसा हम अपनी पोशाक के बारे में सोचते और धारण करते हैं।</p>
<p>किसी को सूट-बूट और टाई-कोट-पैंट में सहूलियत होती है तो कोई मटके का कुर्ता और ब्रैस्लेट की धोती झाड़ कर प्रसन्न है। कोई ‘फॉर्मल’ पहन रहा है तो कोई ‘कैजुअल’ में फिट है। कोई महंगी जीन्स और ट्रेण्डी टीशर्ट पहनकर आत्ममुग्ध है तो कोई कुर्ता-पाजामा पहनकर ‘नेता’ बना हुआ है। सभी परिधान अच्छे हो सकते हैं और देश, काल, वातावरण के अनुसार अलग-अलग लोगों द्वारा पसन्द किए जाते हैं। अब यदि एक खास पसन्द का व्यक्ति बाकी परिधानों को अस्वीकार्य बताने लगे या दूसरा आदमी पहले की पसन्द को नकारने लगे, और उससे भी आगे बढ़कर एक दूसरे की खींचाई करने का सीन बन जाय तो समझिए कि कुछ गड़बड़ हो रही है। वहाँ वही सब होगा जिसे हिन्दी में व्यर्थ की चिल्ल-पों कहा जाता है।:) [नकल मारने के लिए अ-शर्मिन्दा हूँ:), लीजिए एक और शब्द जिसका प्रयोग मैने पहली बार किया...]</p>
<p>भाषा तो ऐसी निधि है जो अपनी-अपनी क्षमता और व्यक्तिगत पसन्द के अनुसार नित्यप्रति बढ़ाई जा सकती है। मात्रा, गुणवत्ता और वैविध्य के तीनो आयाम खुले हुए हैं। इसमें कोई आपसी विरोध नहीं है। जिसकी जितनी पैठ हो वह उसे उतना आगे बढ़ा सकता है। बस एक बात का ध्यान रहे कि जिस प्रकार गन्दी, फटी, मैली-कुचैली और तन ढँकने के बजाय नंगा रखने वाली पोशाक को सभी खराब मानते हैं उसी प्रकार अशुद्ध, अश्लील, अनर्गल, असंप्रेष्य, और संवाद स्थापित करने में असफल भाषा की वकालत नहीं की जा सकती। बाकी, भाषा का मूल उद्देश्य संवाद पहुँचाना है जो जरूर पूरा होना चाहिए। नियमों से प्रतिबद्धता, अनुशासन और सलीका किसी भी काम को सर्वस्वीकार्य बनाते है। भाषा भी इसका अपवाद नहीं है।</p>
<p>हमें सूर, कबीर और तुलसी तीनों को समान रूप से सम्मान करना सिखाया गया है। सबने अपने-अपने तरीके से बात कही है। कभी एक को खराब और दूसरे को अच्छा कहना सही नहीं होगा। परसाई और शरद जोशीका अपना महत्व है तो महावीर प्रसाद द्विवेदी और रामचन्द्र शुक्ल का महत्व कमतर नहीं है। प्रेमचन्द सम्मानित हैं तो जयशंकर प्रसाद का भी अपना एक ऊँचा स्थान है। </p>
<p>यह विविधता किसी बहस का विषय नहीं हो सकती बल्कि यह हमारे भाषा की समृद्धि को निरूपित करती है। अलग-अलग ब्लॉगर्स की भाषा भिन्न-भिन्न शैली की है तो यह अच्छा ही है। सबलोग एक ही जैसा लिखेंगे तो इसका अवसान तय जानिए। इसलिए फुरसतिया का जबरिया लेखन भी अच्छा है और क्वचिदन्यतोऽपि का गाम्भीर्य भी स्वागतयोग्य है। ज्ञानजी के दैनिक गंगादर्शन और रेलपरिचालन की रंगीन तस्वीरें भी लुभावनी हैं तो सत्यार्थमित्र के फीके रंग पर कार्तिकेय की छमाही दुश्चिन्ता भी आकर्षित करने वाली है। जिस बाजार में हर टाइप का माल मिले वही तो सुपरमार्केट है। </p>
<p>भीड़ भी तभी आएगी इस कन्ने&#8230; <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /><br />
जय हो&#8230;!</p>
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	<item>
		<title>By: हिन्दी तेरा रूप अनूप- श्रीलाल शुक्ल</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/683/comment-page-1#comment-43150</link>
		<dc:creator>हिन्दी तेरा रूप अनूप- श्रीलाल शुक्ल</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 12 Sep 2009 18:28:55 +0000</pubDate>
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		<description>[...] पिछले लेख में बात शुरू हुई थी जनभाषा से और फ़िर वह सरकायी , धकेली जाती हुयी हिन्दी, संस्कृति, अंग्रेजी , मैकाले, फ़ैकाले होते हुये बरास्ते संस्कृति और विनम्रता आदि होते हुये हिन्दी दिवस पर जाकर खड़ी हो गयी। इसी सिलसिले में मुझे श्रीलाल शुक्लजी का एक लेख याद आया जो हिन्दी पर दो टिप्पणियां के नाम से है। उसमें से एक टिप्पणी मैं यहां पेश कर रहा हूं। देखें कि भाषा के संबंध में क्या कहना है श्रीलालजी का। [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] पिछले लेख में बात शुरू हुई थी जनभाषा से और फ़िर वह सरकायी , धकेली जाती हुयी हिन्दी, संस्कृति, अंग्रेजी , मैकाले, फ़ैकाले होते हुये बरास्ते संस्कृति और विनम्रता आदि होते हुये हिन्दी दिवस पर जाकर खड़ी हो गयी। इसी सिलसिले में मुझे श्रीलाल शुक्लजी का एक लेख याद आया जो हिन्दी पर दो टिप्पणियां के नाम से है। उसमें से एक टिप्पणी मैं यहां पेश कर रहा हूं। देखें कि भाषा के संबंध में क्या कहना है श्रीलालजी का। [...]</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: Abhishek</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/683/comment-page-1#comment-43149</link>
		<dc:creator>Abhishek</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 12 Sep 2009 17:18:33 +0000</pubDate>
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		<description>लगे रहो महारथियों :)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>लगे रहो महारथियों <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
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	<item>
		<title>By: anitakumar</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/683/comment-page-1#comment-43148</link>
		<dc:creator>anitakumar</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 12 Sep 2009 17:00:42 +0000</pubDate>
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		<description>हमें तो समझ नहीं आ रहा कि डा अरविन्द जी किस बात पर इतना बुरा मान रहे हैं। हंसी ठट्ठा अधकचरेपन और अपसंस्कृति का प्रसार कैसे हो गया? हंसना बुरी बात है क्या?</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>हमें तो समझ नहीं आ रहा कि डा अरविन्द जी किस बात पर इतना बुरा मान रहे हैं। हंसी ठट्ठा अधकचरेपन और अपसंस्कृति का प्रसार कैसे हो गया? हंसना बुरी बात है क्या?</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: विवेक रस्तोगी</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/683/comment-page-1#comment-43145</link>
		<dc:creator>विवेक रस्तोगी</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 12 Sep 2009 14:44:07 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://hindini.com/fursatiya/?p=683#comment-43145</guid>
		<description>एक स्वस्थ चर्चा चलो हमारा भी ज्ञान बढ़ गया है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>एक स्वस्थ चर्चा चलो हमारा भी ज्ञान बढ़ गया है।</p>
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